बच्चा गोद लेने वाली कामकाजी महिला के साथ 'भेदभाव' का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जन्म देने वाली नौकरीपेशा माँ और क्या बच्चा गोद लेने वाली माँ के अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ अलग-अलग हैं?

क्या ऐसे में उनको मिलने वाले मैटरनिटी बेनिफ़िट्स में भी फ़र्क हो सकता है या होना चाहिए?

ये सवाल हम इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) की वैधता को चुनौती देते हुए एक याचिका डाली गई है.

इसकी धारा 5(4) कहती है कि एक महिला जो क़ानूनी रूप से तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती है, तो वह 12 हफ़्ते के मातृत्व अवकाश या मैटरनिटी लीव की हक़दार होगी.

इस याचिका पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी.

दरअसल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक के वकील हमसानंदिनी नंदूरी ने जनहित याचिका डाली है.

इससे पहले इसी मामले में हुई सुनवाई में कोर्ट ने विधि और न्याय मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से जवाब भी मांगा है.

याचिका में आपत्ति

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याचिका में इस अधिनियम की धारा 5(4) को बच्चा गोद लेने वाली माँ और तीन महीने से ऊपर के अनाथ बच्चों के लिए भेदभावपूर्ण बताया गया है.

इसमें कहा गया है कि 12 हफ़्ते की मैटरनिटी लीव सिर्फ़ 'लिप सर्विस' यानी केवल कहने भर के लिए है.

इस याचिका में कहा गया है कि एक महिला बच्चे को जन्म देती है, तो उसे 26 हफ़्ते की मैटरनिटी लीव मिलती है. ऐसे में अगर गोद लेने वाली माँ की बात की जाए, तो ये उनके लिए संविधान में दिए गए मूलभूत अधिकारों का हनन करता है.

दरअसल हमसानंदिनी नंदूरी ने साल 2017 में भाई और बहन को गोद लिया था. उस समय बेटी की उम्र साढ़े चार साल और बेटे की उम्र एक साल नौ महीने थी.

नंदूरी बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, ''उन्हें कंपनी की तरफ़ से केवल छह हफ़्ते की छुट्टी दी गई, जो काफ़ी नहीं थी. उन्होंने इसके बाद अपनी वार्षिक छुट्टियों का इस्तेमाल किया.''

वे बताती हैं कि हालाँकि उन्होंने साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन ये मुद्दा उनके दिमाग़ में हमेशा घूमता रहता था.

उन्हें ख़ुद पर ग़ुस्सा आता था कि वो वकील होने के बावजूद इस मुद्दे को नहीं उठा पाईं.

वे बताती हैं, ''इस मुद्दे ने मुझे सोने नहीं दिया.''

उनका कहना था, ''मौजूदा क़ानून जन्म देने वाली माँ और बच्चा गोद लेने वाली माँ में विभाजन को और गहरा कर देता है. कोई कैसे अभिभावक बनना चाहता है उसके आधार पर उससे भेदभाव नहीं होना चाहिए, चाहे वो ख़ुद बच्चा पैदा करना चाहे, गोद लेना चाहे या फिर सरोगेसी से बच्चा चाहे.''

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वे कहती हैं, ''सरकारी नौकरियों में काम करने वाली महिलाओं के लिए अलग बेनिफ़िट्स हैं और निजी नौकरियों के लिए अलग. यहाँ ये देखा जाना चाहिए कि माँ तो माँ होती है तो क्या उनकी ज़िम्मेदारियों को अलग करके कैसे देखा जा सकता है?''

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मातृत्व लाभ(संशोधन) अधिनियम, 2017

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अगर आसान भाषा में समझें, तो पहले मूल रूप में मैटरनिटी बेनिफिट्स एक्ट 1961 था. लेकिन इसमें संशोधन किए गए.

ये एक्ट नौकरी करने वाली महिलाओं को माँ बनने के दौरान और उसके बाद छुट्टियों का प्रावधान देता है. लेकिन मूल एक्ट में बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं के लिए प्रावधान नहीं थे. इसमें संशोधन कर मैटरनिटी बेनिफिट्स (संशोधन) एक्ट, 2017 लाया गया.

इस एक्ट में संशोधन के बाद न केवल माँ बनने वाली नौकरीपेशा महिलाओं के लिए 12 हफ़्ते की मैटरनिटी लीव को बढ़ाकर 26 हफ़्ते के लिए किया गया, बल्कि पहली बार गोद लेने वाली महिलाओं को भी इसमें अधिकार दिए गए.

इसकी धारा 5(4) में सरोगेट और बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को तीन महीने से छोटे बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं और सरोगेसी के ज़रिए बच्चे की माँ बनने वाली महिलाओं के लिए 12 हफ़्ते की छुट्टी का प्रावधान किया गया.

जिस दिन इन महिलाओं को बच्चा सौंप दिया जाएगा, उसी दिन से ये महिलाएँ मैटरनिटी लीव ले सकती है, लेकिन यहाँ क़ानून में ये भी कहा गया कि अगर बच्चा तीन महीने से ऊपर है, तो किसी प्रकार की मैटरनिटी लीव का प्रावधान नहीं किया गया है.

मैटरनिटी लीव को लेकर क़ानून में जो प्रावधान किए गए हैं, वो आप इस वीडियो में देख सकते हैं-

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सरकारी नौकरियों में महिलाओं के अधिकार

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सरकारी नौकरी करने वाली महिलाएँ जब बच्चा गोद लेती हैं, तो उनके लिए 135 दिन की छुट्टी का प्रावधान किया गया है.

एसोसिएशन ऑफ़ एडोप्टिव पैरेंट्स, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास विभाग की सलाह लेने के बाद ये फ़ैसला हुआ कि एक साल की उम्र तक के बच्चे को गोद लेने के बाद 135 दिन की छुट्टी दी जाएगी.

इस ज्ञापन में ये कहा गया है कि जिस महिला के दो से कम बच्चे हैं, वो बच्चा गोद ले सकती हैं.

लेकिन अगर किसी महिला के दो बच्चे हैं और उसके बाद अगर वो बच्चा गोद लेती है, तो उसे ये अधिकार नहीं दिया जाएगा.

वहीं गोद लेने वाली महिलाएँ 135 छुट्टियों के अलावा अन्य छुट्टियाँ भी ले सकती है, जिनकी वो हक़दार है लेकिन वो 60 छुट्टियों से ज़्यादा नहीं हो सकता.

अगर उन्हें ये छुट्टियाँ चाहिए, तो उसके लिए आवेदन देना होगा.

बच्चा गोद लेने का अधिकार

जुवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन एक्ट, 2015(JJ Act) में निर्धारित नियमों के अनुसार तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद नहीं लिया जा सकता.

वकील सोनाली कड़वासरा बताती है कि भारत में बच्चा गोद लेने के दो क़ानून हैं. इसमें एक है हामा यानी हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम 1956. वहीं दूसरा है जेजे एक्ट और इसी के अंतर्गत सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथोरिटी (CARA) आता है.

हामा हिंदुओं के अलावा सिख, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों पर लागू होता है यानी वे इसी क़ानून के आधार पर बच्चा गोद ले सकते हैं.

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वहीं सिंगल महिला या पुरूष बच्चा गोद ले रहे हैं, तो ऐसे में बच्चा और उनकी उम्र में 21 साल का फ़र्क होना अनिवार्य है.

और सिंगल पैरेंट की उम्र 30 से कम और 45 से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.

अगर दंपती बच्चा गोद लेना चाहता है, तो वो आपसी सहमति के बाद और शादी के दो साल होने पर बच्चा गोद ले सकते हैं.

ऐसे बच्चे को ही गोद लिया जा सकता है.....

  • बच्चा हिंदू होना चाहिए
  • बच्चा पहली बार गोद लिया जा रहा हो
  • उसकी उम्र 15 साल से कम हो
  • बच्चा शादीशुदा न हो
  • जो दंपती बच्चा गोद ले रहे हैं, उनकी कुल उम्र का जोड़ 90 से ज़्यादा नहीं होना चाहिए.

वहीं जेजे एक्ट में किसी धर्म के बच्चों को गोद लेने का अधिकार दिया गया है. इसके तहत बच्चा गोद लेने के लिए CARA पर जाकर अर्ज़ी डाली जा सकती है.

ऐसे में गोद लेने वाले इच्छुक दंपती की काउंसलिंग होती है, फिर जाँच परख होती है. जैसे अगर बच्चा दिया जाता है, तो सभी सुविधाएँ, माहौल आदि हैं या नहीं. इसके बाद एक रिपोर्ट बनाई जाती है.

CARA ये देखता है कि दंपती ने जिस तरह के बच्चे (चाइल्ड प्रोफ़ाइल) यानी उम्र, लड़का, लड़की की ज़रूरतें डाली हैं, वो पूरी होने के बाद आगे प्रक्रिया बढ़ाई जाए.

इसके बाद ऐसे दंपती को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया जाता है.

वहीं अगर कोई इच्छुक दंपती पहली बार बच्चा गोद ले रहा है, तो गोद दिए जाने वाले बच्चों के ग्रुप से बच्चे दिए जाते हैं.

लेकिन अगर उनका पहला बच्चा है, तो उससे विपरित लिंग का बच्चा ही गोद लेने के लिए दिया जाता है.

सोनाली बताती है जैसे ही ये फ़ैसला हो जाता है कि ये बच्चा गोद लिया जाएगा, उसके बाद कुछ राज्यों में फ़ैमिली कोर्ट या कुछ में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास याचिका डाली जाती है.

कोर्ट जब सहमति दे देता है, उसके बाद गोद लेने की प्रक्रिया का रजिस्ट्रेशन होता है.

वहीं हामा के तहत भी कोर्ट की स्वीकृति के बाद रजिस्ट्रेशन करवाना होता है.

CARA पर छपी जानकारी के मुताबिक़ साल 2021-2022 में 2991 बच्चे देश में गोद लिए गए.

जानकारों का मानना है कि गोद लेने की प्रक्रिया के दौरान बच्चे के वेलफ़ेयर को सबसे अहम बताया गया है और इतने नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि बच्चों का शोषण न हो.

हालाँकि गोद लेने की प्रक्रिया काफ़ी लंबी होती है, ऐसे में इच्छुक माता-पिता को इंतज़ार करना पड़ता है.

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