माहवारी के दौरान दर्द, इन देशों में है छुट्टियों का प्रावधान

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हर साल 28 मई को मैंस्ट्रुएशन हाइजीन डे मनाया जाता है.
माहवारी के दौरान दर्द को देखते हुए स्पेन में महिलाओं को हर महीने में तीन दिन की छुट्टी लेने का अधिकार है.
वहीं महिलाओं को तीन दिन की छुट्टी को पाँच दिन करने का विकल्प भी दिया गया है.
देश की संसद में इसी साल 16 फरवरी को इस संबंध में विधेयक को मंज़ूरी दी गई.
स्पेन में यौन और प्रजनन अधिकारों से जुड़े कई अधिकारों की स्वीकृति दी गई है, जिसमें ये एक महत्वपूर्ण फ़ैसला है.
स्पेन यूरोप का पहला देश है, जहाँ महिलाओं को माहवारी के दौरान पेड लीव दी जाएँगी.
स्पेन की मंत्री आयरीन मोंटेरो ने संसद में कहा कि इन अधिकारों के बिना महिलाएँ पूर्ण रूप से नागरिक नहीं हैं और सरकार महिलाओं को माहवारी के दौरान मिलने वाली इन छुट्टियों का ख़र्च वहन करेगी.
डॉक्टरों और अमेरिकन कॉलेज ऑफ़ ओबस्ट्रेशियन एंड गायनाकॉलोजिस्ट के मुताबिक़ जिन महिलाओं को माहवारी होती है, उनमें से आधी से ज़्यादा को हर महीने एक या दो दिन दर्द होता है और कुछ के लिए दर्द इतना अधिक होता है कि वो अपने नियमित काम को भी ठीक से नहीं कर पाती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

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स्पेन के इस फ़ैसले को काफ़ी अहम और प्रगतिशील माना जा रहा है.
वहीं इस बात को लेकर फिर बहस तेज़ हो गई है कि क्या भारत में इस तरह का प्रावधान किया जा सकता है?
एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं की भागीदारी लगभग 18 फ़ीसदी है और अगर ऐसे में माहवारी के दौरान उन्हें छुट्टी दिए जाने का प्रावधान किया जाता है, तो उस पर भी असर पड़ेगा.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महिला कर्मचारियों और छात्राओं के लिए माहवारी के दौरान छुट्टी की मांग को लेकर दायर की गई जनहित याचिका को ख़ारिज किया है.
चीफ़ जस्टिस डॉ. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इसे नीतिगत मामला बताया.
इसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट में वकील सत्या मित्रा के ज़रिए एक क़ानून पढ़ने वाली छात्रा ने कोर्ट में कहा था कि ऐसे फ़ैसलों से महिला कर्मचारियों के रोज़गार पर असर पड़ सकता है.
बीबीसी से बातचीत में सत्या मित्रा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, "अगर किसी प्राइवेट कंपनी में महिलाएँ छुट्टी मांगेंगी, तो शायद कंपनियाँ महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचाएँ और ये महिलाओं के लिए ही नुक़सानदेह होगा."
हालाँकि कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने वाले वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी इससे असमहति जताते हुए कहते हैं कि मैटरनिटी के कठिन समय में महिलाओं की देखभाल के लिए क़ानून में सभी प्रावधान किए जाने के बावजूद, मैटरनिटी के पहले चरण यानी पीरियड्स को समाज ने जाने-अनजाने में नज़रअंदाज़ किया है.
उन्होंने कहा- हमने कोर्ट के सामने कहा कि ऐसे कई देश हैं, जहाँ ये प्रावधान महिलाओं के लिए किया गया है. वहीं बिहार राज्य में महिलाओं की माहवारी के दौरान छुट्टी देने का प्रावधान 1992 में ही किया गया था.
उन्होंने कहा कि कोर्ट ने उन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का रुख़ करने को कहा है.
इस मुद्दे पर अलग-अलग राय

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हैदराबाद में शाहीन वीमेन रिसोर्स एंड वेल्फ़ेयर एसोसिएशन में एक्टिविस्ट जमीला निशत कहती है, "निजी क्षेत्र में कंपनियाँ महिलाओं को मैटरनिटी लीव देने के ख़्याल से उन्हें नौकरी देने में पीछे हट जाती हैं. वहीं महिलाओं को लेकर ये भी भ्रांति हैं कि वो केवल सुबह नौ से शाम पाँच बजे की नौकरी ही पसंद करती हैं."
"लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि आजकल महिलाएँ हर क्षेत्र और हर शिफ़्ट में काम कर रही हैं. लेकिन हर महीने तीन से पाँच दिन छुट्टी को लेकर मैं सहमत नहीं हूँ."
सेंटर फ़ॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली रंजना कुमारी मानती हैं कि महिलाएँ किसी से कम नहीं हैं लेकिन सामनता के पायदान पर अभी भी वे पुरुषों से पीछे हैं.
वे सवाल उठाती हैं कि जेंडर इक्वलिटी या लैंगिक समानता की बातें तो होती हैं, लेकिन क्या वो समाज में है?
उनके अनुसार, "पहले महिलाओं को नौकरी, संसद में सामनता दो, एक बच्चे की परवरिश में माता-पिता बराबर भूमिका निभाएँ. जब समाज में बराबरी आ जाएगी, तो महिलाओं के अधिकारों की कोई बात ही नहीं करेगा. लेकिन पहले महिला-पुरुष को एक स्तर पर तो लाया जाए."
वहीं पंजाबी यूनिवर्सिटी में वीमेन स्टडीज़ विभाग में अध्यक्ष मानवेंद्र कौर एक दूसरा पक्ष उठाती हैं.
वो कहती हैं, "असंगठित क्षेत्र में क़रीब 90 फ़ीसदी महिलाएँ काम करती हैं. क्या उन्हें इसका लाभ मिल पाएगा. इन औरतों को न मैटरनिटी बेनिफ़िट मिलते हैं, न समान वेतन मिलता है और न ही कोई और लाभ मिलता है."
वे आगे कहती हैं कि यहाँ ये भी देखा जाना चाहिए कि माहवारी के दौरान हर महिला को ही परेशानी होती है. ऐसा नहीं है इसलिए हर महिला को इसकी ज़रूरत है. ये भी देखा जाना चाहिए.
उनके अनुसार- क्या छुट्टी की बजाए महिलाओं को वर्क फ़्रॉम होम का विकल्प दिया जा सकता है.
लेकिन यहाँ ये भी सोचना होगा कि अंसगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं और कॉट्रेक्ट पर काम करने वाली महिलाओं को कैसे इस दायरे में लाएँगे.
किन राज्यों ने की है पहल?

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भारत में बिहार पहला राज्य है, जहाँ माहवारी में छुट्टी देने का प्रावधान लागू हुआ.
वर्ष 1992 में राज्य में राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव की सरकार थी और उन्होंने महिला कर्मचारियों को माहवारी के दौरान हर महीने दो दिन की छुट्टी लेने को मंज़ूरी दी थी.
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने हाल ही में ये घोषणा की थी कि राज्य के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाली सभी विश्वविद्यालयों में लड़कियों को माहवारी के दौरान छुट्टी दी जाएगी.
इस बीच कांग्रेस के केरल से सांसद हिबी ईदन ने कहा था कि वे एक प्राइवेट मेंबर बिल लेकर आएँगे ताकि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दौरान पेड लीव मिल सके.
इससे पहले अरुणाचल प्रदेश से आने वाले सांसद, निनांग एरिंग ने एक प्राइवेट मेंबर बिल, मेन्सटूरेशन बेनिफ़िट 2017 में लोकसभा में पेश किया था.
इस बिल में सरकारी और निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान दो दिन की छुट्टी देने का प्रस्ताव दिया गया था.
इस बारे में वे कहते हैं कि वो बिल तो रद्द हो गया है, लेकिन राज्य में वे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संपर्क में हैं और राज्य में जल्द ही इस पर फ़ैसला हो सकता है.
वे कहते हैं, "कुछ महिला संगठनों ने मुझसे कहा कि महिलाओं को ऐसे प्रावधान देकर उन्हें कम आँका जा रहा है जबकि ऐसा नहीं है. अगर उन दिनों में दो नहीं अगर एक दिन भी छुट्टी दी जाती है, तो ऐसी महिलाएँ जब काम पर आएँगी, तो ज़्यादा जोश से काम करेंगी."
रंजना कुमारी कहती हैं- अगर ये लगता है कि लड़कियाँ बेवजह छुट्टी ले रही है, तो जिन महिलाओं को ज़्यादा परेशानी होती है, वो मेडिकल सर्टिफ़िकेट दे कर ऐसी छुट्टी ले सकती हैं, जैसा स्पेन में किया गया है.
किन-किन देशों में है महिलाओं के लिए ये प्रावधान

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एशिया की बात की जाए, तो जापान एक ऐसा देश है, जहाँ माहवारी के दौरान दी जाने वाली छुट्टी को श्रम क़ानून में शामिल किया गया.
वहाँ महिलाओं को साल 1947 से ऐसी छुट्टी दिए जाने का प्रावधान है. इंडोनेशिया, साल 1948 में महिलाओं के लिए ऐसी नीति लेकर आया था.
इन देशों में कहा गया है कि अगर किसी महिला को माहवारी के दौरान परेशानी होती है, तो उससे काम नहीं करवाया जा सकता है और यहाँ दो दिन की छुट्टी दिए जाने का प्रावधान किया गया है.
इसके अलावा फिलीपींस, अफ़्रीका देशों जैसे ज़ाम्बिया में भी महिलाएँ माहवारी के दौरान एक दिन की छुट्टी ले सकती हैं.
वहीं दक्षिण कोरिया की सरकार 1953 में ऐसे प्रावधान लेकर आई थी.
भारत में कई ऐसी कंपनियाँ हैं, जो माहवारी के दौरान महिलाओं को पेड लीव दे रही हैं.
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि जब नारी विकसित होगी, तभी देश भी विकसित होगा और वो बाल एवं महिला विकास मंत्री से भी इस बारे में अपील करेंगी कि वो संसद में इस बारे में बिल लाएँ.

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