सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से सिक्किम में नेपाली समुदाय के लोग ग़ुस्से में, क्या है मामला

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से

पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम के नेपाली समुदाय को अप्रवासी बताने वाली सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर नाराज़गी जताते हुए वहां स्थानीय समुदाय के लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को सिक्किम के निवासियों के लिए इनकम टैक्स छूट से संबंधित एक याचिका पर अपने आदेश में सिक्किम के नेपालियों को "विदेशी मूल" के लोगों के रूप में संदर्भित किया था, जो "सिक्किम में आकर बस गए थे."

इस आदेश की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद एक तरफ़ जहां प्रदेश की राजनीति में खलबली मच गई वहीं राज्य सरकार के सामने क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखने को लेकर नई चिंता उत्पन्न हो गई है.

इस बीच सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग ने गुरुवार को ट्विटर पर घोषणा की कि सिक्किम के नेपालियों पर अदालत के अवलोकन में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दायर की गई है.

हालांकि सरकार के इस आश्वासन के बाद भी राजधानी शहर गंगटोक के अलावा अब ग्रामीण इलाकों में रहने वाले सिक्किम के नेपाली लोग भी विरोध प्रदर्शन पर उतर आए हैं.

इससे पहले गंगटोक में देवराली से भानु पथ तक की प्रमुख विरोध रैली में विभिन्न संगठनों के साथ राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था क्योंकि इस आदेश से नागरिक समाज के सभी वर्गों में पार्टी लाइनों को लेकर भारी असंतोष देखने को मिल रहा है.

सत्तारूढ़ पार्टी ने भी निकाला विरोध प्रदर्शन, मंत्री का इस्तीफ़ा

लोगों में पनपे आक्रोश को इस बात से समझा जा सकता है कि कोर्ट की टिप्पणी के विरोध में प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम) ने भी शांति मार्च निकाला.

मुख्यमंत्री तमांग ने भी "विदेशियों के रूप में सिक्किम नेपाली समुदाय के उल्लेख पर गहरी चिंता" व्यक्त की है. इसके अलावा प्रदर्शनकारियों की मांगों और इस पूरे मुद्दे पर चर्चा करने के लिए 9 फ़रवरी को राज्य विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाया गया है.

इन विरोध प्रदर्शनों के परिणामस्वरूप राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता सुदेश जोशी ने इस्तीफ़ा दे दिया है, जो कभी याचिकाकर्ताओं के वकील रह चुके हैं. इसके अलावा सिक्किम के स्वास्थ्य मंत्री एमके शर्मा ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है.

सिक्किम के नागरिकों द्वारा गठित की गई गैर राजनीतिक मंच जॉइंट एक्शन कमिटी की विरोध रैली में भाग लेने के बाद बीजेपी विधायक डीआर थापा ने कहा, "यह रैली सिक्किम के लोगों की है. जो कुछ हुआ वह नहीं होना चाहिए था. अब लड़ाई सभी सिक्किम के लोगों की है, सभी को एकजुट होकर हर जगह लड़ने की ज़रूरत है."

कौन हैं सिक्किमी लोग?

आमतौर पर सिक्किम के मूल निवासियों को सिक्किमी के तौर पर जाना जाता है जिसमें नेपाली समुदाय के साथ भूटिया और लेप्चा शामिल हैं. इसके साथ ही ऐसे दावे किए जाते हैं कि सिक्किम के भारत में विलय होने से पहले वहां सालों से बसे कुछ परिवारों को चोग्याल (राजा) ने वहां की नागरिकता प्रमाण पत्र सौंपे थे. उन लोगों को भी सिक्किमी माना जाता है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस अवलोकन ने सिक्किम में तीन मुख्य समूहों: लेप्चा, भूटिया और नेपालियों की जातीयता के बारे में पहचान के एक संघर्ष को जन्म दे दिया है.

सिक्किम के नेपालियों ने शुरुआत में इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड से बाहर करने के लिए विरोध जताया था लेकिन अब उनका कहना है कि बाहरी लोगों के कारण उनके अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया है.

'हमारे अस्तित्व पर संकट'

सिक्किम में आम नागरिकों के इस विरोध का नेतृत्व कर रही जॉइंट एक्शन कमिटी के अध्यक्ष शांता प्रधान ने बीबीसी से कहा, "सिक्किम के नेपाली लोगों को 'विदेशी मूल' के रूप में संदर्भित करना एक मुद्दा है लेकिन जो अब हमारे लिए अहम मुद्दा है वो हमारे जातीय समुदाय के अस्तित्व पर संकट का है क्योंकि 26 अप्रैल 1975 को जब सिक्किम ने भारतीय संघ का पूर्ण विकसित राज्य बनने का विकल्प चुना. उस दौरान हमको 371 एफ़ के तहत हमारे पुराने क़ानून को सुरक्षित करने का आश्वासन दिया गया. लेकिन कोर्ट के इस आदेश से सिक्किमियों की परिभाषा को कमज़ोर किया है. लोग बेहद नाराज़ हैं और चारों तरफ़ विरोध हो रहा है."

किन लोगों को सिक्किमियों की परिभाषा में रखा गया से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए शांता प्रधान कहते हैं, "हम केवल उन लोगों को सिक्किमी मानते है जिनको हमारे स्वर्गीय राजा चोग्याल ने 1961 में सिक्किम प्रजा नागरिक प्रमाण पत्र दिया था लेकिन इसमें भी कुछ शर्तें थीं."

वो कहते हैं, "जिन लोगों ने यह नागरिक प्रमाण पत्र लेना था उन लोगों को यह साबित करना था कि वे 1946 से सिक्किम में स्थायी तौर पर रह रहे हैं. लेकिन अब अगर 1975 से यहां रहने वाले लोगों को सिक्किमी मान लिया जाएगा तो इससे हमारे अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है."

"सिक्किमी नेपाली को विदेशी मूल का बोलने से हमारी पहचान पर संकट खड़ा हो गया है. यह आंदोलन हमारे पहचान और अस्तित्व की लड़ाई है. अभी तक यहां केवल सिक्किमी लोगों को ही ज़मीन ख़रीदने और सरकारी नौकरी का अधिकार है, वो जिनके पास प्रजा नागरिक प्रमाण पत्र है. लेकिन सिक्किमी की परिभाषा को बदली गई तो हमारे सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा."

शांता प्रधान कहते हैं, "हमने सरकार के सामने इस सभी मांगों को रखा है और 9 फ़रवरी को बुलाए गए विधानसभा के सत्र में इस पर चर्चा होनी है."

कैसे शुरू हुआ यह विवाद?

दरअसल एसोसिएशन ऑफ़ ओल्ड सेटलर्स ऑफ़ सिक्किम और अन्य लोगों ने 1975 से पहले सिक्किम में रहने वाले नागरिकों को इनकम टैक्स में दी जाने वाली छूट को चुनौती देते हुए 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी.

जिन लोगों ने यह याचिका दायर की थी वे मुख्य रूप से मारवाड़ी व्यापारी समुदाय से हैं.

2008 में पेश की गई इस इनकम टैक्स छूट में 1975 के बाद सिक्किम में रहने वाले भारतीय नागरिकों को शामिल नहीं किया गया था और उन सिक्किमी महिलाओं को भी शामिल नहीं किया गया था जो ग़ैर-सिक्किम पुरुष से शादी करती हैं.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इन दोनों को शामिल नहीं किया जाना भेदभावपूर्ण था. ये संविधान से हासिल समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

इस पर अदालत ने कहा कि कर छूट का लाभ सिक्किम में रहने वाले सभी भारतीय नागरिकों को दिया जाना चाहिए.

इस फ़ैसले में न्यायाधीशों ने सिक्किम के इतिहास के बारे में बात करते हुए कहा कि सिक्किम आयकर नियमावली, 1948 के तहत, "व्यवसाय में लगे सभी व्यक्तियों को उनके मूल के बावजूद कर के अधीन किया गया था. इसलिए सिक्किम के मूल निवासियों अर्थात् भूटिया-लेप्चा, और सिक्किम में पीढ़ियों पहले बसे विदेशी मूल के व्यक्तियों जैसे नेपालियों या भारतीय मूल के व्यक्तियों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया था.''

फ़ैसले में याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी दर्ज किया गया कि अन्य देशों या "नेपाली प्रवासियों" जो "एक समय सिक्किम में चले गए और वहां बस गए या भारतीय मूल के प्रवासी वे सभी आईटी अधिनियम, 1961 की धारा 10 (26AAA) से लाभान्वित हो रहे थे. लेकिन अन्य भारतीय मूल के बसने वालों को मनमाने ढंग से बाहर कर दिया गया. इसके बाद 13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 10 (26एएए) में प्रदान की गई कर छूट का लाभ सिक्किम के सभी लोगों तक बढ़ाया जाएगा.

जानकारों का क्या कहना है?

सिक्किम में लोगों की नाराज़गी और चल रहे विरोध पर वरिष्ठ पत्रकार पूरन तमांग कहते हैं, "शुरू में यह केवल सिक्किमी नेपाली को अप्रवासी बताने का मुद्दा था लेकिन अब यहां के मूल निवासी इसे अपनी पहचान की लड़ाई के तौर पर ले रहे हैं इसलिए अब सभी लोग चारों तरफ़ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं."

वे बताते हैं, "नागरिकों ने जॉइंट एक्शन कमिटी का गठन किया है जिसमें यहां के ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं. विपक्षी दल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं क्योंकि कोर्ट के आदेश से पहले राज्य के एडवोकेट जनरल और एडिशनल एडवोकेट जनरल ने सिक्किमी नेपाली को आप्रवासी बताने वाले बिंदु पर ग़ौर नहीं किया."

वरिष्ठ पत्रकार पूरन तमांग बताते हैं, "सिक्किम की 6 लाख 10 हज़ार से अधिक जनसंख्या में सबसे ज़्यादा आबादी नेपाली लोगों की है और उन्हीं को आप्रवासी बताया गया. राज्य सरकार अगर फ़ैसला आने से पहले इस मुद्दे को सही तरीके से हैंडल कर लेती तो इतना बड़ा विवाद खड़ा नहीं होता."

साथ ही वे ये भी कहते हैं, "इसके अलावा जो याचिकाकर्ता हैं वो मारवाड़ी और बिहारी लोग है इसलिए यहां अब लड़ाई मूल निवासी और बाहरी के बीच शुरू हो गई है."

वे ये भी आगाह करते हैं,"चूंकि आज समय सोशल मीडिया का है तो विरोध लंबा चल सकता है. ख़ासकर अंदरूनी ग्रामीण इलाकों में सरकार को पैनी नज़र रखने की ज़रूरत है ताकि किसी भी तरह की हिंसक घटना को रोका जा सके."

असुरक्षा की भावना

इसके साथ ही सत्तारूढ़ पार्टी पर "सिक्किम के लोगों की भावनाओं को गंभीरता से नहीं लेने" के आरोप भी लग रहे हैं.

सिक्किम प्रोग्रेसिव यूथ फोरम के महासचिव रूपेन कार्की ने मीडिया से कहा "हाल के फ़ैसले ने सिक्किम के अधिकतर लोगों में डर पैदा कर दिया है. जो लोग युगों से यहां रह रहे हैं, उन्हें विदेशी मूल के होने के रूप में चिह्नित किया गया है. इसने लोगों में असुरक्षा पैदा कर दी है."

साल 2011 की जनगणना के हिसाब से सिक्किम की 6 लाख 10 हज़ार आबादी में लेप्चा और भूटिया आबादी का 27 फीसदी है और वे मुख्य रूप से बौद्ध हैं.

वहीं सिक्किम के नेपाली यहां अपनी क़रीब 70 फ़ीसदी आबादी के साथ बहुसंख्यक हैं और ये समुदाय मुख्य रूप से हिंदू है.

जिन लोगों ने आयकर में छूट को लेकर याचिका दायर की थी वो कुल आबादी के क़रीब छह फीसदी है और एक तरह से व्यापारी समुदाय होने के कारण सिक्किम के अधिकतर कारोबार पर उनका दबदबा है.

सिक्किम की कुल 32 विधानसभा सीटों में क़रीब सात सीटों पर ये लोग निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

फिलहाल गंगटोक के एमजी रोड में तनाव का माहौल है क्योंकि यहां इस व्यापारी समुदाय की अच्छी खासी आबादी बसी हुई है.

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