बिहार में डूबने से हो रही मौतों में तेज़ बढ़ोतरी का क्या है राज़

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"गड्ढे ने हमारा नाश कर दिया. 50 साल से हमने किसी बच्चे को बरनार (नदी) में डूबते नहीं देखा. बालू उठाव के बाद नदी गहरी हो गई और मेरा प्रत्यूष डूब गया. प्रत्यूष के गम में उसका बाप भी चला गया. मेरा बेटा - पोता दोनों चले गए और मैं ये सब देखने के लिए ज़िंदा बच गया हूं."
इकहरे बदन के दुबले-पतले अशोक मिश्रा बेचैनी में अपने घर में टहल-टहल कर यही दोहरा रहे थे. पूजा-पाठ करके अपना गुजर-बसर करने वाले अशोक की आंखें डबडबाई थीं.
वो अपने घर आए हर शख़्स को मृतक प्रत्यूष यानी अपने पोते की बनाई ड्राइंग दिखाते हुए ये बताना नहीं भूलते कि वो पढ़ने में बहुत तेज़ था और आईएएस बनाना चाहता था.
बिहार के जमुई ज़िले के सोनो प्रखंड के सोनो गांव के प्रत्यूष की मौत छह महीने पहले 15 मई, 2022 को नदी में डूबने से हुई थी. वो इस दिन दोपहर को अपने दोस्तों के साथ नहाने गया था. लेकिन बालू उठाव के चलते नदी गहरी हो गई थी, जिसका अंदाज़ा उसे नहीं था.
प्रत्यूष की मौत के कुछ दिनों बाद ही उसके बीमार पिता विवेक मिश्रा की भी मौत हो गई. प्रत्यूष की मां सुधा मिश्रा अपने सास - ससुर के सामने, सब्र का दामन थामे हुए हैं, लेकिन वो मुझे गले लगाकर धीमी आवाज़ में कहती हैं, "मैं बर्बाद हो गई. मेरा पति और बेटा दोनों चला गया."
तीन साल में छह गुना लोग डूबे

बिहार में रोज़ाना तीन से ज़्यादा लोगों की मौत डूबने से हो जाती है. बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक जून से दिसंबर 2018 में डूबने से राज्य भर में 205 लोगों की जान चली गई.
साल 2019 में डूबने वालों की मौत का आंकड़ा बढ़कर 630, साल 2020 में 1060 और साल 2021 में 18 नवंबर तक ये आंकड़ा 1206 का था. यानी 2018 की तुलना में 2021 में डूबने से हुई मौतों का आंकड़ा तकरीबन छह गुना बढ़ चुका था.
आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, "डूबना एक बड़ी आपदा के रूप में उभर रहा है."
बिहार आपदा प्रबंधन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, बिहार बाढ़, भूकंप, सुखाड़, चक्रवाती तूफ़ान, आगजनी, ओलावृष्टि और वज्रपात जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित है.
'वज्रपात' का उल्लेख आपदा प्रबंधन विभाग ने आपदा के तौर पर किया है. साल 2020 में वज्रपात से 379 लोगों की मौत हुई थी, वहीं इसी साल डूबने से 1060 मौत हुई.
प्राधिकरण के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "गांव घर में जलस्रोत बहुत तेज़ी से ख़त्म हुए है जिससे लोगों में तैराकी सीखने की प्रवृत्ति कम हुई है. वहीं दूसरी तरफ विकास कार्यों के लिए जगह जगह गड्ढे खोदे हो रहे हैं. इनमें बरसात में पानी भर जाता है और डूबने की घटनाएं बहुत ज़्यादा होती हैं."

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मिट्टी की खुदाई और मौतों का संबंध
प्राधिकरण के अध्ययन में साफ़ लिखा है, "बाढ़ के पानी में डूबने से लोगों की मृत्यु की घटना तो होती ही है, लेकिन तालाब, गड्ढों और जलग्रहण क्षेत्रों में सामान्य रूप से डूबने की घटना में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि दर्ज की जा रही है."
"बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम मृत्यु दर से स्पष्ट होता है कि बड़ी नदियों से ज़्यादा छोटी - छोटी नदियों, तालाब, पोखर, नहर, गड्ढे जैसे जल निकायों में मृत्यु अधिक हो रही है."
12 साल के आयुष राज की मौत भी अपने घर के पीछे खुदे गड्ढे में डूबने से हुई थी. वो बिहार के मधेपुरा ज़िले के रामनगर महेश गांव का रहने वाले थे.
छठी कक्षा के छात्र आयुष की मां रूपम देवी बताती हैं, "मेरे घर के पीछे ज़मीन खाली पड़ी है. इस जमीन का मालिक मिट्टी बेचते हैं. मिट्टी खोदते खोदते 10 फीट से भी ज़्यादा गहरा गड्ढा हो गया था. 23 जुलाई 2020 को उस गड्ढे में पानी जमा था. आयुष दोस्तों के साथ खेलते खेलते गड्ढे में फिसल गया. बाद में मछुआरे आए तब बच्चे का शरीर निकाला गया. मेरा बच्चा गड्ढे में डूब कर चला गया लेकिन अभी भी गड्ढा है. हम लोग कुछ नहीं कर सकते."
सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के स्थानीय पत्रकार ब्रजेश भारती कहते हैं, "जेसीबी के गड्ढों में डूबने वाली मौतें लगातार बढ़ रही हैं. हम खुद बीते दो सालों में इस तरह की आधा दर्जन मौत रिपोर्ट कर चुके हैं."

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सूखाग्रस्त ज़िलों में भी डूबने से मौत
आपदाओं को लेकर बने बिहार रोडमैप 2015 -30 में आपदाओं की संवेदनशीलता के आधार पर राज्य के जिलों को ए, बी और सी श्रेणी में रखा गया है.
ए श्रेणी में 10 ज़िले हैं जहां बाढ़ और भूकंप ज़ोन-5 है, बी श्रेणी में 18 ज़िले जो बाढ़ और भूकंप जोन-4 में है और सी श्रेणी के ज़िले सुखाड़ और भूकंप ज़ोन-3 में हैं.
बिहार भारत का सबसे अधिक बाढ़ग्रस्त राज्य है और यहां देश का 17.2 प्रतिशत बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है.
ऐसे में ये अनुमान लगाया जाता है कि डूबने की घटनाएं ए और बी श्रेणी में ही हो रहीं होंगी. लेकिन ग्रुप ए में डूबने से 803, ग्रुप बी में 1594 और ग्रुप सी (सूखे वाले ज़िले) में 704 मौतें हुईं, जिसमें अकेले गया में 167 और जहानाबाद में 141 मौत हुई.
अगर प्रखंड की संख्या के आधार पर राज्य के ज़िलों में डूबने की घटनाएं देखें जहानाबाद में प्रति प्रखंड सबसे ज़्यादा यानी 20.14 का औसत है.
इसके बाद ही 'नदियों का मायका' कहे जाने वाले खगड़िया का 18.57, पूर्वी चंपारण का 15.81 और अरवल का 13.60 औसत है. यदि संख्या के लिहाज से देखें तो पूर्वी चंपारण में डूबने से सबसे ज़्यादा 427, सारण में 228, पटना में 222 और नालंदा में 188 मौतें हुईं.

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'समाज तैरना भूल गया'
"मगध जल जमात" संस्था के संयोजक रवीन्द्र कुमार पाठक कहते हैं, "निर्माण कार्यों में लाल बालू का चलन जबसे बढ़ा है, व्यापक अवैध खनन से नदियां गहरी होती जा रही हैं. डूबने के बढ़ते हादसों के पीछे ये भी एक बड़ा कारण है."
साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर एंड पीपुल संस्था की ओर से दिसंबर 2020 से मार्च 2022 तक रेत खनन गतिविधियों से जुड़ी मौतों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़, बिहार में सैंड पिट्स में डूबने से एक महिला समेत सात बच्चों की मौत हुई.
जनवरी 2019 से 15 नवंबर 2020 के बीच अवैध खनन के चलते नदी में डूबने से बिहार के 25 लोगों की मौत हुई जो कि पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे ज़्यादा है. इन 25 लोगों में से 11 बच्चों की मौत दक्षिण बिहार में बहने वाली सोन नदी में डूब कर हुई.

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बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, "डूबना दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी 'अनइंटेन्शनल इंज्युरी डेथ' है और इसमें बच्चों की तादाद सबसे ज़्यादा है."
बिहार में भी डूबने से हुई मृत्यु का आंकड़ा अगर उम्र के लिहाज से देखें तो जून 2018 से 18 नवंबर 2021 तक कुल 3,101 मौत में से 10 साल तक के 951 बच्चों की, 11 से 20 साल के आयुवर्ग में 1,178 और 21 से ज़्यादा उम्र के 972 लोगों की डूबने से मौत हुई.
इन डूबने से हुई मौतों में पुरुषों की मौत महिलाओं से तकरीबन तीन गुना ज़्यादा है.
साल 2018 में 126 पुरुष और 79 महिलाओं की डूबने से मौत हुई, वहीं साल 2019 में 464 पुरुष और 166 महिलाएं, साल 2020 में 797 पुरुष और 263 महिलाएं और साल 2021 में 891 पुरुषों की तो 315 महिलाओं की डूबने से मौत हुई.
अगर महीनों के लिहाज से देखें तो जनवरी से मई तक 356, जून से सितंबर तक 2013 और अक्टूबर से दिसंबर तक 732 लोगों की मौत डूबने से हुई.
साफ़ है कि मानसून के दौरान बिहार में डूबने से सबसे ज़्यादा मौतें होती है. 2018 के बीच 2021 तक सबसे ज़्यादा छठ पर्व में 496 लोगों की डूबने से मौत हुई.

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स्कूलों में तैराकी का प्रशिक्षण
राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2021' की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश भर में डूबने से कुल 36,362 मौतें हुईं जिनमें सबसे ज़्यादा मौत महाराष्ट्र, दूसरे नंबर पर मध्यप्रदेश और फिर बिहार राज्य में हुई.
नाव दुर्घटना के मामले में भी बिहार राज्य ओडिशा के बाद दूसरे नंबर पर रहा.
डूबने की इन बढ़ती घटनाओं से निपटने के लिए बिहार सरकार ने बच्चों के बीच दो कार्यक्रम चला रही है.
राज्य के 80,000 स्कूलों में मुख्यमंत्री विद्यालय सुरक्षा योजना चलाई जा रही है जिसमें शिक्षक छात्र -छात्राओं को बाढ़, भूकंप, डूबने, अगलगी, सर्पदंश, ठनका, लू से बचने की ट्रेनिंग दी जाती है.

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साथ ही सरकार 'सुरक्षित तैराकी कार्यक्रम' चला रही है. बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व उपाध्यक्ष व्यास जी जिनके कार्यकाल में ये शुरू हुआ बताते हैं, "राज्य में 19 ज़िले ऐसे पड़ते हैं जो सदाबहार नदियों के किनारे हैं. इसमें डूबने की घटनाएं होती रहती थीं.
''ऐसे में हमें बांग्लादेश के एक मॉडल के बारे में पता चला कि जिसमें बच्चों को तैराकी सिखाई जाती है. इस कार्यक्रम में छात्र - छात्राओं को 12 दिन की तैराकी की ट्रेनिंग दी जाती है."
रिया राय, बिहार सरकार की एक ऐसी ही ट्रेनर हैं जो छात्राओं को पटना से सटे दानापुर में तैराकी सिखाती है.
वो बताती है, हम लोग मार्च से मई महीने तक छात्राओं को तैराकी की ट्रेनिंग देते हैं. कई ऐसे मामले आए हैं जब बच्चियां बताती हैं कि उन्होंने अपनी इस हुनर से किसी की जान बचा ली. तैरना अब एक ज़रूरी और जीवन रक्षक हुनर बनता जा रहा है."
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