1971 की भारत-पाकिस्तान जंग और 'गाज़ी अटैक'- विशाखापट्टनम में उस वक्त क्या चल रहा था?

1971 की जंग का गवाह विशाखापट्टनम का तटीय इलाका

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    • Author, लाक्कोजु श्रीनिवास
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

(यह ख़बर चार दिसंबर 2022 को बीबीसी हिंदी के पेज पर प्रकाशित हुई थी जिसे यहां पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है.)

"51 साल पहले दिसंबर महीने के पहले सप्ताह की बात है. विशाखापट्टनम में सर्दियों का मौसम था. शाम ढलते ही शहर घने अंधेरे में ऐसे डूब जाता जैसे दूर-दूर तक रोशनी का नामोनिशान ही न हो. सख़्त पाबंदी ऐसी कि कोई एक मोमबत्ती तक नहीं जला सकता. कब-क्या हो जाए, एक-एक पल इसी आशंका में गुज़रता था. उस वक्त विशाखापट्टनम में रह रहे चार लाख लोगों की यही हालत थी."

51 साल पहले के इस मंज़र के बारे में बताते हुए शांताराम भावुक हो जाते हैं. पांच दशकों का वो डर, वो तमाम आशंकाएं उनकी बूढ़ी आंखों में तैर जाती हैं. लेकिन चार दिसंबर की तारीख़ के ज़िक्र के साथ एक राहत भी मिलती है, उस दिन विशाखापट्टनम के लोगों को लगा कि वो सुरक्षित हैं.

ये भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 की जंग के दिनों की बात है.

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भारतीय नौसेना के मुताबिक़, वो भारतीय नौसेना की भूमिका के सम्मान में और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' में नौसेना की उपलब्धियों को मनाने के लिए 4 दिसंबर को नौसेना दिवस के तौर पर मनाता है.

बीबीसी से बातचीत में नौसेना में कमांडर रह चुके जीपी राजू में कहते हैं कि चार दिसंबर वो तारीख़ है जब भारतीय नौसेना ने पाकिस्तानी नौसेना पर हमला किया था और उसे काफ़ी नुक़सान पहुंचाया था इसलिए इसी दिन नौसेना दिवस मनाया जाता है. नौसेना दिवस का जश्न विशाखापट्टनम में ज्यादा ज़ोर-शोर से मनाया जाता है, क्योंकि ये नौसेना की पूर्वी कमान का बड़ा केन्द्र है.

नौसेना की इसी पूर्वी कमान ने पाकिस्तान की नौसेना पर निर्णायक हमले को अंजाम दिया था, जिसमें भारत की जीत हुई थी. उस जीत की याद में विशाखापट्टनम के समुद्री तट पर एक मेमोरियल भी बनाया गया है, जिसका नाम है विक्ट्री एट सी यानी समुद्र में विजय.

सवाल है, कि आख़िर विशाखापट्टनम में जीत के इस जश्न और चार दिसंबर की लड़ाई में पाकिस्तान पर जीत के बीच क्या संबंध है? क्योंकि पाकिस्तान पर भारत को निर्णायक जीत तो 16 दिसंबर को उस वक्त मिली थी, जब पाकिस्तानी सेना ने जंग के पूर्वी मोर्चे पर अपने 90 हज़ार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया था. ऐसे में विशाखापट्टनम में हर साल होने वाले जश्न के पीछे ज़रूर कोई दिलचस्प कहानी होगी.

4 दिसंबर की जीत की आंखोंदेखी

विशाखापट्टनम में बना नौसेना का वॉर मेमेरियल 'समुद्र में विजय'

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1971 की जंग का ऐलान हुए अभी एक-दो दिन ही हुए थे. तब टी. शांताराम विशाखापट्टनम के ए.वी.एन कॉलेज में इंटरमीडियट की पढ़ाई कर रहे थे.

शांताराम उसी कोस्टल बैटरी इलाक़े में रहते थे, जहां आज नौसेना दिवस का जश्न मनाया जाता है. शांताराम वही शख़्स हैं जिन्होंने खुद चार दिसंबर की जंग और उससे पहले के तनावभरे माहौल को देखा और महसूस किया.

बीबीसी से बातचीत में शांताराम ने बताते हैं, "शुरुआत के दो-तीन दिन तो हमें कुछ समझ में ही नहीं आया. इसके बाद जब पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू होने की ख़बर छपी, तो दो हफ्तों तक पूरे विशाखापट्टनम में कोई लाइट नहीं जलाई गई. अगर हम किसी ज़रूरी काम के लिए एक मोमबत्ती भी जला लेते तो फ़ौरन सैनिक आ जाते और उसे बुझाने को कहते."

"जब हम उनसे पूछते कि ऐसे क्यों, तो बताते थे- एक हल्की-सी रोशनी का मतलब दुश्मन को ये बताना कि यहां आबादी रहती है. सैनिक हमें बताते थे पाकिस्तान की सेना विशाखापट्टनम के वाइज़ैग बंदरगाह और कैल्टेक्स कंपनी (आज की HPCL) को निशाना बनाने के लिए आगे बढ़ रही है."

जीपी राजू, नौसेना में पूर्व कमांडर

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पाकिस्तानी सेना के संभावित हमले और उसकी आशंका में डर को याद करते हुए शांताराम बताते हैं

"कैल्टेक्स को उड़ाए जाने का मतलब पूरे विशाखापट्टनम की बर्बादी होता. शहर का एक हिस्सा तक साबुत नहीं बचता. हमारे ज़ेहन में हमेशा ये डरावना ख़याल मंडराता रहता कि हम लोग अगली सुबह का सूरज देखने के लिए जिंदा बचेंगे भी या नहीं."

"हमने सुना था कि पाकिस्तान ने अपनी सबसे ताकतवर पनडुब्बी पीएनएस गाज़ी को विशाखापट्टनम पर हमले के लिए भेजा है. लेकिन भारतीय नौसेना ने उसे चार दिसंबर के हमले में समुद्र में ही नेस्तनाबूद कर दिया और विशाखापट्टनम में जंग ख़त्म हो गई. लेकिन पाकिस्तान की तरफ से जवाबी हमले की आशंका कई दिनों तक बनी रही. हमें अब भी एक मोमबत्ती तक जलाने की इजाज़त नहीं थी. इस तरह दो हफ़्ते तक विशाखापट्टनम के चार लाख लोगों ने अपनी रात अंधेरे में ही गुज़ारी थीं."

शांताराम बताते हैं कि विशाखापट्टनम के ज़मीनी क्षेत्र में कोई लड़ाई नहीं हुई. इस दौरान सैनिकों की परेड, मूवमेंट और हमले से आगाह करने वाले सायरन की आवाज़ गूंजती रहती थी. इसकी वजह से लोगों का डर और बढ़ता जाता था. इसी वजह से जीत की खुशी भी विशाखापट्टनम के लोगों को ज़्यादा हुई.

शांताराम बताते हैं, "जब रेडियो पर हमने पाकिस्तान पर भारत की जीत की ख़बर सुनी तो हम खुशी से झूम उठे. हम सभी दोस्त और परिवारवाले सड़कों पर निकल पड़े, हमने मिठाइयां बांटी और जश्न मनाया."

4 दिसंबर 1971 को क्या हुआ था?

इतिहासकार एडवर्ड पॉल के अलबम में जश्न की एक यादगार तस्वीर

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पाकिस्तान के साथ जंग के बादल, उसके पूर्वी हिस्से में बग़ावत के साथ मंडराने लगे थे. तब पाकिस्तान के दो हिस्से हुआ करते थे- पश्चिमी पाकिस्तान, जो मौजूदा पाकिस्तान है और पूर्वी पाकिस्तान जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है.

ये वो दौर था जब पूर्वी पाकिस्तान के लोग पश्चिमी पाकिस्तान की सैनिक तानाशाही से तंग आकर अलग देश की मांग करने लगे थे. इसके लिए पूरे पूर्वी पाकिस्तान में व्यापक संघर्ष शुरु हो गया.

उस वक्त के हालातों को देखते हुए तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे संघर्ष को समर्थन देने का फ़ैसला किया.

बीबीसी से बातचीत में पूर्व कमांडर जीपी राजू बताते हैं, "भारत और पाकिस्तान के बीच जंग इसी मोड़ के बाद शुरु हुई. नवंबर के दूसरे हफ्ते में पाकिस्तान ने अपनी आवाम को बता दिया कि वो भारत के साथ बड़ी लड़ाई के लिए तैयार रहें."

51 साल पहले का विशाखापट्टनम

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जीपी राजू नौसेना की पनडुब्बियों पर काम किया करते थे. 15 साल की सेवा के बाद अब वो कुरसुरा पनडुब्बी के क्यूरेटर के तौर काम करते हैं.

वो बताते हैं, "30 नवंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया. 3 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना ने भारत के नौसैनिक ठिकानों और बंदरगाहों को निशाना बनाया. इसके बाद भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान ने मोर्चा संभाला और तीन दिसंबर की रात से लेकर चार दिसंबर की सुबह के बीच पाकिस्तानी नौसेना के आधे से अधिक ठिकानों को तबाह कर दिया."

"इसके बाद भारत की थलसेना और वायुसेना मैदान में उतरी और पाकिस्तानी को बड़ा नुक़सान पहुंचाया. ये सब कुछ चार दिसंबर को हुआ था. इसलिए हम इस दिन की खुशी हर साल मनाते हैं. उस जंग में चुंकि नौसेना की पूर्वी कमान की भूमिका अहम थी इसलिए विशाखापट्टनम में चार दिसंबर को ही नौसेना दिवस मनाया जाता है."

'गाज़ी' को विशाखापट्टनम भेजने का मकसद क्या था?

भारतीय नेवी

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पूर्व कमांडर जीपी राजू कहते हैं,'' दरअसल पाकिस्तान की तरफ से जंग छिड़ने के बाद भारत ने अपने युद्धपोत आईएनएस विक्रांत को जंग में उतार दिया. इसे विशाखापट्टनम के पास समुद्र में तैनात किया गया. यहां से भारतीय सेना के फाइटर जेट्स उड़ान भरकर पाकिस्तान पर आसानी से हमला कर सकते थे. इसकी भनक पाकिस्तान को लग गई.''

उनके अनुसार, "पाकिस्तानी सेना का प्लान आईएनएस विक्रांत को तबाह करने का था ताकि यहां से लड़ाकू विमान हमले के लिए उड़ान न भर सकें. इसके साथ वाइज़ैग बंदरगाह पर हमले का मक़सद था युद्धपोतों के मूवमेंट को रोकना और कैल्टेक्स को बम से उड़ा देना."

पाकिस्तान की उस ख़ुफ़िया योजना के बारे में बताते हुए राजू बताते हैं "पीएनएस गाज़ी श्रीलंका की तरफ से भारत की समुद्री सीमा में घुसा था. इस पर पाकिस्तान के 80 नौसैनिक और 10 अफ़सर तैनात थे. इनकी कमान संभाल रहे थे ज़फ़र मोहम्मद."

"लेकिन इससे पहले कि पीएनएस गाज़ी अपने मिशन में क़ामयाब होता भारत के युद्धपोत आईएनएस राजपूत ने उसपर हमला कर दिया. वहीं समुद्र में ही पीएनएस गाज़ी के परखच्चे उड़ गए. उसके टुकड़े आज भी समुद्र में उसी जगह पर पड़े हुए हैं."

16 दिसंबर 1971 को क़रीब 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल ने भारत के आगे आत्मसमर्पण कर दिया जिसके बाद युद्ध ख़त्म हो गया. इसी युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान का वजूद एक अलग देश के रूप में बना, जिसका नाम आज बांग्लादेश है.

वे बताते हैं कि पाकिस्तान पर उसी जीत और उसमें शामिल सैनिकों के साहस और बलिदान को याद करते हुए नौसेना की पूर्वी कमान 'विक्ट्री एट सी' यानी समुद्र में विजय नाम से 1996 में एक वॉर मेमोरियल बनाया.

विक्रांत आ रहा है, कृपया हर कोई मदद करे

गाज़ी

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साल 2017 में एक फ़िल्म आई थी, 'गाज़ी'. ये फ़िल्म तमिल के साथ हिंदी में भी रिलीज़ हुई थी. इसमें राहुल सिंह ने पीएनस गाज़ी के कमांडर रज़्ज़ाक की भूमिका निभाई है. जबकि राणा दुग्गुबती ने भारतीय पनडुब्बी के कमांडर का किरदार निभाया है.

फ़िल्म के क्लाइमेक्स में राहुल सिंह, राणा दुग्गुबती की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "ये नेवी कमांडर है या कोई लिफ्ट ऑपरेटर? ये जंग है या कोई गेम, ये कर क्या रहा है?"

दरअसल भारतीय नौसेना की तरफ से वो एक गेम ही था. उस वक्त विशाखापट्टनम में मौजूद इतिहासकार एडवर्ड पॉल बताते हैं कि फ़िल्म के दृश्य में भले ही कुछ 'सिनेमैटिक लिबर्टी' ली गई, लेकिन विशाखापट्टनम में इंडियन नेवी की 'गेम' वाली बात सही है.

वो कहते हैं, "आईएनएस विक्रांत पर हमला करने के लिए पीएनएस गाज़ी भारतीय समुद्री सीमा में जैसे ही घुसा भारतीय नौसेना ने इसे अपने जाल में फंसा लिया. इसके लिए नौसेना ने एक 'डिकॉय ऑपरेशन' चलाया था. इसके तहत चलाए गए अभियान में ये बात फैला दी गई कि आईएनएस विक्रांत विशाखापट्टनम के पास तैनात है."

"ये अभियान नौसेना के वाइस एडमिरल कृष्णन के नेतृत्व में चलाया गया था. इस अभियान के तहत ये बात फैलाई गई कि 'विक्रांत आ रहा है, हर कोई खाने और ज़रूरत के दूसरे सामनों के साथ नौसैनिकों की मदद के लिए आगे आए'. माना जाता है पाकिस्तान भारतीय नौसेना के इसी 'प्रचार' से झांसे में आ गया और उसने पीएनएस गाज़ी को विशाखापट्टनम की तरफ रवाना कर दिया."

एडवर्ड पॉल के मुताबिक़ भारतीय नौसेना ने विशाखापट्टनम में जीत की पहली सालगिरह यानी चार दिसंबर 1972 को एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था. इसमें पीएनएस गाज़ी के टुकड़ों के साथ अभियान में शामिल भारतीय नौसैनिकों के हथियार और गोलाबारूद की तस्वीरें प्रदर्शित की गईं.

एडवर्ड पॉल भी उस प्रदर्शनी में शामिल हुए थे.

वो कहते हैं, "नौसेना की तरफ से वो पहला आधिकारिक जश्न था. उसके बाद से हर साल चार दिसंबर को नौसेना वॉर ड्रिल के साथ नेवी डे मनाती है. जंग ख़त्म होने के बाद 2 जुलाई 1972 को भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समौझता हुआ. उसी समझैते के तहत भारत ने आत्मसमर्पण किए हुए 90 हज़ार सैनिक पाकिस्तान को लौटा दिए. इसी समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच 'लाइन ऑफ़ कंट्रोल' का भी निर्धारण हुआ था."

'नेवी डे' को क्या होता है?

इतिहासकार एडवर्ड पॉल

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चार दिसंबर की सुबह ही नौसेना की पूर्वी कमान के अफ़सर 'विक्ट्री एट सी' मेमोरियल पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं. ये सिलसिला शाम के चार बजे तक चलता है.

इसके बाद शुरु होती है वॉर ड्रिल जिसमें भारतीय नौसेना के साथ भारतीय थलसेना और भारतीय वायुसेना के अधिकारी और जवान शामिल होते हैं.

ईस्टर्न कमांड के अधिकारी कहते हैं "इस ड्रिल का मकसद होता है अपनी सैनिक क्षमताओं को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने के साथ युवाओं को सेना के प्रति आकर्षण पैदा करना."

विशाखापट्टनम में 'विक्ट्री एट सी' मेमोरियल आज एक जाना-माना पर्यटन स्थल भी है. जो भी सैलानी विशाखापट्टनम के समुद्र की तरफ़ जाते हैं वो इस मेमोरियल पर ज़रूर जाते हैं.

हालांकि इसके अंदर जाने की इजाज़त अभी किसी नागरिक को नहीं, लेकिन ये मेमोरियल दूर से ही हमारी सेना की ऐतिहासिक वीरगाथा सुनाता है.

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