मोरबी हादसा: फ़्लोरिंग के भार से गिरा था ब्रिज, केबल नहीं झेल पाए वज़न

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गुजरात के मोरबी में सस्पेंशन ब्रिज के गिरने के मामले की अदालती सुनवाई के दौरान कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.
शहर की पहचान कहे जाने वाले सस्पेंशन ब्रिज को कई सालों के बाद आम लोगों के लिए खोला गया था. रविवार को पर्यटकों से भरा ये पुल गिर गया. इस भयानक दुर्घटना में अब तक मरने वालों की 135 हो गई है.
मच्छु नदी पर बना ये पुल स्थानीय लोगों के बीच एक आर्कषक पर्यटन स्थल था. आस-पास के इलाक़ों से कई लोग इसे देखने के लिए जमा हुए थे.
इस मामले के अभियोजन पक्ष ने अदालत को एक फ़ोरेंसिक रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि ब्रिज की फ़्लोरिंग तो बदली गई थी पर जिन केबलों पर वो टिका था उन्हें नहीं बदला गया था.
इसके बाद कोर्ट ने चार अभियुक्तों को आगामी शनिवार तक पुलिस कस्टडी में भेज दिया. इनमें ओरेवा कंपनी के दो मैनेजर और सब-कॉन्ट्रेक्टर शामिल हैं.
सरकारी वकील एचएस पंचाल ने कहा कि चीफ़ ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट एमजे ख़ान ने बाक़ी पांच अभियुक्तों को न्यायिक हिरासत में भेजा है. इनमें टिकट बुकिंग क्लर्क और सिक्योरिटी गार्ड शामिल हैं.
जिन चार लोगों को पुलिस हिरासत में भेजा गया है, वे हैं - ओरेवा के मैनेजर दीपक पारेख और दिनेश दवे, ठेकेदार प्रकाश परमार और देवांग परमार.
क्या कहा सरकारी वकील ने?

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फ़ोरेसिंक साइंस लैब की रिपोर्ट के हवाले से सरकारी वकील पंचाल ने अदालत को पुल गिरने की वजह बताई.
उन्होंने कहा कि फ़ोरेसिंक एक्सपर्ट के मुताबिक पुल नई फ़्लोरिंग का भार नहीं सह सका और उसके केबल टूट गए.
पंचाल ने अदालत के बाहर पत्रकारों को बताया, "हालांकि फ़ोरेंसिक रिपोर्ट बंद लिफ़ाफ़े में अदालत को सौंपी गई है लेकिन रिमांड की अर्ज़ी में ये लिखा गया है कि ब्रिज की केबलों को नहीं बदला गया था. सिर्फ़ फ़्लोरिंग ही बदली गई थी."
"चार लेयर वाली एल्युमिनियम की चादरों से फ़्लोर को बनाया गया था. इसका वज़न इतना बढ़ गया कि पुल को थामे रखने वाली केबल इस का भार नहीं सह पाई और पुल गिर गया."
अदालत को ये भी बताया गया कि जिन ठेकेदारों को रिपेयर का काम दिया गया था वे इसे करने के लिए योग्य नहीं थे.
समझौते में क्या था?

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मोरबी के ऐतिहासिक सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत और रखरखाव का काम मोरबी के औद्योगिक घराने ओरेवा ग्रुप को सौंपा गया था. यह समूह अजंता ब्रांड की घड़ियों का निर्माण करता है. इसके अलावा बल्ब, लाइटें और घरेलू इस्तेमाल के अन्य उपकरण भी बनाता है.
इस समूह और मोरबी नगरपालिका के बीच 300 रुपये के स्टांप पेपर पर अनुबंध हुआ है.
इस चार पेज के अनुबंध समझौते में टिकट दरों के लिए जितना विवरण दिया है, उतनी स्पष्टता पुल के रख-रखाव की शर्तों के लिए नहीं मिलती है. बीबीसी के पास इस कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेन्ट की एक कॉपी है.
समझौते के मुताबिक़, दोनों पक्षों में, "पुल के प्रबंधन जैसे कि ओ एंड एम (ऑपरेशन और मेंटेनेंस), सिक्योरिटी, सफ़ाई, रख-रखाव, भुगतान संग्रह, स्टाफ़िंग आदि का अनुबंध हुआ है."
एग्रीमेन्ट में कलक्टर, नगर पालिका और ओरेवा समूह द्वारा पुल पर जाने की दर और 2027-28 तक उस दरों मे वार्षिक कितनी बढ़ोतरी की जाएगी, उसका विवरण भी दिया गया है.
इसके अनुसार, वर्तमान टिकट दर 15 रुपए है जो वर्ष 2027-28 तक 25 रुपये तक बढ़ाया जाना है. इस समझौते में यह भी लिखा गया है कि वर्ष 2027-28 के बाद प्रवेश शुल्क में हर साल दो रुपये की वृद्धि होगी.
अनुबंध में कुल नौ बिंदु हैं जिसमें टिकट की यह दर भी शामिल है. हालांकि अनुबंध में टिकट के अलावा किसी भी मुद्दे को विस्तार से नहीं बताया गया है और न ही कोई शर्त रखी गई है.
क्या होता है झूला पुल?

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केबल की तारों से लटके इस तरह के पुलों को झूला पुल भी कहा जाता है. इंजीनियरिंग की भाषा में इन्हें सस्पेंशन ब्रिज कहा जाता है.
इस तरह के पुल किसी आधार पर टिके होने के बजाए केबल के सहारे तोनों तरफ़ मज़बूत आधार से लटके होते हैं.
राजकोट के स्ट्रक्चरल इंजीनियर जयंतभाई लखलानी बताते हैं, "इस तरह के केबल ब्रिज में दोनों तरफ़ दो मज़बूत सहारे खड़े किए जाते हैं. ये सीमेंट, लोहे या लकड़ी के ऊंचे खंभे होते हैं. केबल इसी मज़बूत आधार से बंधे होते हैं."
राजकोट के आर्किटेक्ट सुरेश सांघवी के मुताबिक़, सस्पेंशन के लिए इस्तेमाल केबल या रस्सी की भार उठाने की क्षमता को भी जांचा-परखा जाता है.
इस तरह के निर्माण की गुणवत्ता को हर स्तर पर जांचा जाता है. जयंतभाई लखलानी के मुताबिक़, समूचे निर्माण को ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड के हिसाब से पूरा किया जाता है.
ऐसी जगहों के निर्माण पर ख़ास ध्यान दिया जाता है जहां से बड़ी तादाद में लोग गुज़र सकते हैं और जहां किसी हादसे की आशंका हो सकती है.
ऋषिकेश के लक्ष्मणझूला और रामझूला पुल सस्पेंशन ब्रिज के चर्चित उदाहरण हैं. रोज़ाना हज़ारों पर्यटक यहां से गुज़रते हैं.
कॉपी - पवन सिंह अतुल
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