बिहार: 5जी के ज़माने में मोबाइल नेटवर्क के लिए तरस रहे यहां के लोग - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार प्रांत का एक ज़िला है कैमूर. उसी ज़िले का एक प्रखंड है अधौरा. आदिवासी बहुल. कैमूर की पहाड़ियों के बीच बसा हुआ.
इस प्रखंड के अंतर्गत कुल 11 ग्राम पंचायत हैं. गांवों की संख्या गिनेंगे तो लगभग 100 से ऊपर गांव हैं, लेकिन अब इसे विडंबना न कहें तो क्या कहें कि एक तरफ जहां देश में 5G नेटवर्क की लॉन्चिंग हो रही. वहीं बिहार के 534 प्रखंडों में से एक अधौरा प्रखंड के अंतर्गत पड़ने वाले तमाम गांवों तक अभी मोबाइल का बेसिक नेटवर्क भी नहीं पहुंच सका है.
लोग इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए कहीं उत्तर प्रदेश के नेटवर्क के सहारे हैं तो कहीं झारखंड के सहारे.
अधौरा प्रखंड पर ही सालों से मिठाई की दुकान चला रहे देव नेटवर्क और इंटरनेट के सवाल पर हमसे कहते हैं, "देखिए अधौरा में केवल नेताओं का प्रोग्राम होता है, और हमलोग नेटवर्क के मामले में एकदम ज़ीरो हैं. भारत सरकार कह रही है कि डिजिटल इंडिया, और हमारे यहां कुछ भी इंडिया नहीं है."
"यदि हमारे यहां से उत्तर प्रदेश का बॉर्डर नजदीक नहीं होता तो हमलोग व्हाट्सऐप का एक मैसेज तक नहीं देख पाते. बहुत बुरा हाल है. किससे कहें? हमारी बात सरकार तक पहुंचाइए."

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प्रखंड हेडक्वार्टर पर ही हमारी मुलाकात मनीष कुमार से हुई. मनीष उत्तर प्रदेश के आगरा ज़िले के रहने वाले हैं और बीते 3 सालों से अधौरा के दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक में कार्यरत हैं. जब हमने उनसे नेटवर्क और बैंकिंग के दौरान होने वाली दिक्कतों को लेकर सवाल किए तो उन्होंने कहा, "यहां से काम करने में भी हमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. अपने अफसरों से हम समय पर संपर्क नहीं कर पाते. थोड़ा बहुत मेल का काम किसी तरह हो जाता है. उसी से लोगों से संपर्क करते हैं."
"हम अपने घरवालों से भी समय पर बात नहीं कर पाते. व्हाट्सऐप भी चलता है तो सुबह का मैसेज शाम में आता है. एक-दो दिन बाद आता है. उसका भी पता नहीं. यहां एकदम डिप्रेशन जैसा माहौल है. पहले तो रात में कभी कभार 3G चल जाता था, अब तो स्थिति और भी खराब हो गई है."
ज़ाहिर तौर पर इस इलाके में इंटरनेट और नेटवर्क की दिक्कतें न सिर्फ बैंककर्मियों को परेशान करती हैं, बल्कि इसका सीधा असर आम जनता पर भी पड़ता है. जैसे लगभग 40 किलोमीटर की यात्रा करके अपना पैसा निकलवाने प्रखंड हेडक्वार्टर तक पहुंचने वाली हीरावती देवी बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि उन्हें बैंक वाले बहुत दौड़ाते हैं. कभी पैसा न होने का हवाला देते हैं, तो कभी लिंक फेल होने की बात कहकर वापस लौटा देते हैं. गरीब आदमी अपना ही पैसा निकलवाने के लिए कितना दौड़े?

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मार्च 2021 तक बिहार के सभी गांवों तक पहुंचना था इंटरनेट

साल 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान सूबे में राजधानी पटना से लेकर कई जगहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए. इन होर्डिंगों पर लिखी बातों का आशय था कि मार्च 2021 तक बिहार के 45,945 गांवों तक इंटरनेट की सुविधा पहुंच जाएगी. बिहार डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ रहा है. घर-घर तक फाइबर की पहुंच होगी, लेकिन घर-घर की बात तो दूर कैमूर ज़िले के अधौरा प्रखंड और उससे सटे ज़िले रोहतास के नौहट्टा प्रखंड के अधिकांश गांवों में बेसिक नेटवर्क की भी दिक्कतें हैं.
बात अगर प्रभावित लोगों की संख्या की करें तो आंकड़ा लाख लोगों से ऊपर तक चला जाएगा. लोगों को कई बार दसियों किलोमीटर तक पैदल या मोटरसाइकिल के सहारे आना-जाना पड़ता है, तो कई बार इमरजेंसी सिचुएशन में जान तक पर बन आती है.

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उत्तर प्रदेश के नेटवर्क का सहारा

चूंकि इस प्रखंड में रहने वाले लोग इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए उत्तर प्रदेश के नेटवर्क के सहारे हैं, तो हम भी इस बात को देखने के लिए स्पॉट तक पहुंचे. वहां पहुंचने पर स्थानीय जनों के साथ ही इलाके में कार्यरत अलग-अलग विभागों के कई कर्मी इंटरनेट के लिए जद्दोजहद करते दिखे.
कोई अपने दोस्तों से वीडियो कॉल पर बात करता दिखा तो कोई फिल्में व गाने डाउनलोड करता हुआ. हालांकि इन जगहों पर भी इंटरनेट की स्पीड बहुत तेज़ के बजाय कामचलाऊ ही है. मौके पर हमारी मुलाकात अधौरा के रहने वाले हारून से हुई.
हारून हमसे बातचीत में कहते हैं, "देखिए हम अपना सारा काम छोड़कर इंटरनेट के लिए यहां आए हैं. दस मिनट का काम होने में एक घंटा लगता है. एक जगह चुपचाप खड़ा रहिए तो थोड़ा बहुत काम होगा नहीं तो और भी दिक्कत होगी. सारा काम छोड़कर यहां जंगल के बीच खड़े हैं. मजबूरी है क्या करें?"

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वहीं मौके पर हमारी मुलाकात वैशाली ज़िले के रहने वाले छोटू कुमार से हुई. छोटू वन विभाग के सिपाही हैं, और यह उनकी पहली पोस्टिंग है.
नेटवर्क और इंटरनेट के सवाल पर छोटू बीबीसी से बीतचीत में कहते हैं, "यहां काम करने में बहुत दिक्कत है. हम तो वैशाली ज़िले के रहने वाले हैं. वहां तो बढ़िया इंटरनेट था, लेकिन जहां चारों तरफ 4G इंटरनेट का दौर है वहां अधौरा में किसी से फोन पर बात भी संभव नहीं. मुश्किल से वीडियो कॉल लगता है. वॉयस कॉल तक में दिक्कत आती है. सप्ताह में एक-दो बार यहां आ जाते हैं कि घरवालों और दोस्तों से बात कर लें. ये इलाका अभी बहुत पीछे है. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए."

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नेटवर्क के सवाल पर क्या कहते हैं मंत्री?

गौरतलब है कि कैमूर ज़िले के अंतर्गत पड़ने वाला अधौरा प्रखंड और उसके अधिकांश गांव चैनपुर विधानसभा का हिस्सा हैं. इस विधानसभा से निर्वाचित विधायक मोहम्मद ज़मां खान इन दिनों सूबे के कैबिनेट मंत्री हैं. उन्हें अल्पसंख्यक विभाग की ज़िम्मेदारी मिली है. उन्होंने इस प्रखंड और विधानसभा की जनता से इस आशय के वादे किए थे कि विधायक बनने के 3 महीने के भीतर वे अधौरा प्रखंड के अंतर्गत पड़ने वाले तमाम गांवों तक इंटरनेट पहुंचा देंगे.
बीबीसी ने मोहम्मद ज़मां खान को इलाके के लोगों से किए गए वादे की याद दिलाई. बीबीसी के सवाल पर वे कहते हैं, "देखिए मैं पहली बार इस इलाके का विधायक बना हूँ. मंत्री बनने के बाद मैंने विभाग के डायरेक्टर के साथ दो-दो बैठकें की हैं. मैंने नेटवर्क की दिक्कत को लेकर मुख्यमंत्री से भी गुहार लगाई."
"नेटवर्किंग में हम काफी हद तक आगे भी बढ़े हैं, लेकिन अभी 15 किलोमीटर तक का मामला ज़रा अटका है. वो नेटवर्किंग वन विभाग की वजह से फंसा हुआ है. मैं वन विभाग से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेने की पहल कर रहा हूँ. सारे ग्राम पंचायतों में पोल गड़ने की औपचारिकता पूरी हो चुकी है. एकाध महीने में मेरी कोशिश है कि अधौरा प्रखंड के सारे ग्राम पंचायतों तक बीएसएनएल का नेटवर्क पहुंच जाए."
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