गुजरात चुनाव इस बार बीजेपी के लिए क्या वाक़ई मुश्किल है?

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गुजरात में चुनाव का मैदान सज चुका है. चुनाव आयोग अगले कुछ दिनों में मतदान की तारीख़ों की घोषणा कर सकता है.

लेकिन पिछले एक महीने से ही बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने राज्य में अपना चुनावी अभियान बेहद तेज़ कर रखा है.

2017 में राज्य में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुक़ाबला था. कांग्रेस ने यहाँ बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी और उसे 99 सीटों से संतुष्ट होने पर मजबूर कर दिया था.

लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी ने नए जोश के साथ एंट्री की है. इससे कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए मुक़ाबला मुश्किल हो गया है. लेकिन बीजेपी के लिए यहाँ दांव ज़्यादा बड़ा है.

2012 में बीजेपी ने यहां 115 सीटें जीती थीं लेकिन 2017 में कांग्रेस की ओर से मिली टक्कर की वजह से इसकी सीटें घट कर 99 पर पहुंच गईं.

हालांकि ये अलग बात है कि अब कांग्रेस के कई विधायक बीजेपी में शामिल हो गए हैं. 2001 में नरेंद्र मोदी के गुजरात का सीएम बनने के बाद ये बीजेपी का सबसे ख़राब प्रदर्शन था.

2017 के चुनाव में सीटें घटने के दर्द से बीजेपी उबर नहीं पाई है. लिहाजा बीजेपी की टॉप लीडरशिप ने इस बार गुजरात में पूरा जोर लगा दिया है. पीएम नरेंद्र मोदी पिछले एक महीने में तीन बार राज्य का दौरा कर चुके हैं.

इसके अलावा गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी राज्य के दौरे पर हैं. गुजरात मोदी और शाह का गृह राज्य है.

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आम आदमी की एंट्री से मुक़ाबला कड़ा

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस बार गुजरात में पूरा ज़ोर लगा रहे हैं. केजरीवाल यहाँ बीजेपी को चुनौती देते नज़र आ रहे हैं.

राहुल गांधी भले ही 'भारत जोड़ो यात्रा' की वजह से राज्य का ज़्यादा दौरा नहीं कर पा रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी ने भी सुनियोजित तरीक़े से यहाँ अपना अभियान शुरू कर दिया है.

यही वजह है कि बीजेपी यहाँ पहले से थोड़ा ज़्यादा सतर्क नज़र आ रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहाँ 10 अक्टूबर को बीजेपी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के 'साइलेंट कैंपेनिंग' के बारे में आगाह किया.

पीएम मोदी ने कहा, ''पहले के चुनावों में कांग्रेस काफ़ी शोर-शराबा किया करती थी और बीजेपी का सफ़ाया करने की शेखी बघारती थी. लेकिन 20 वर्षों में हम नहीं हारे, इसलिए उसने कुछ नया किया है. इसी कारण हमें सतर्क रहने की ज़रूरत है.''

विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी के सामने इस बार कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी की भी चुनौती है. कांग्रेस वोटरों को बीजेपी और आम आदमी पार्टी की हिंदुत्व की राजनीति के प्रति सावधान करने में लगी है.

वहीं आम आदमी दिल्ली मॉडल पर चुनाव जीतने का मंसूबा बांधे हुए है.

आम आदमी पार्टी सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने से लेकर दिल्ली की दर्ज पर मोहल्ला क्लीनिक, फ्री स्कूलिंग और ज़्यादा से ज़्यादा सरकारी स्कूल खोलने की बात कर रही है.

इसके साथ ही वह बीजेपी की तरह हिंदू पहचान की भी बात कर रही है.

अरविंद केजरीवाल

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क्या बीजेपी नर्वस है?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक घनश्याम शाह बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''बीजेपी कांग्रेस से ज़्यादा आम आदमी पार्टी को चैलेंज के तौर पर देख रही है क्योंकि यह उसी की भाषा में बात कर रही है. यानी आम आदमी पार्टी भी अब हिंदुत्व की भाषा बोल रही है.''

शाह कहते हैं, ''आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रमुख गोपाल इटालिया ने बीजेपी के ख़िलाफ़ काफ़ी आक्रामक रुख़ अपनाया हुआ है. वह राज्य में प्रभावशाली पाटीदार समुदाय से हैं इसलिए उनकी अपील भी है.''

शाह के मुताबिक़, ''पार्टी गुजरात के लोअर मिडिल क्लास पर फोकस कर रही है. इस वर्ग के सामने जिस तरह के आर्थिक संकट उभरे हैं और नौकरी और शिक्षा को लेकर इनके सामने जो दिक्क़तें आ रही हैं, उसमें आम आदमी के पार्टी के वादे उन्हें लुभा रहे हैं. लिहाजा अब बीजेपी को आम आदमी पार्टी से ज़्यादा चुनौती महूसस हो रही है. ''

अरविंद केजरीवाल

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बीजेपी का ये आक्रामक रवैया क्यों?

कुछ और विश्लेषकों की नज़रों में भी बीजेपी को कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी से ज़्यादा चुनौती नजर आ रही है. कुछ लोगों का कहना है कि बीजेपी इस बार नर्वस दिख रही है इसलिए वह कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ काफ़ी आक्रामक हैं.

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के नेता इसुदान गढवी के ख़िलाफ़ राज्य सरकार की कार्रवाई को लोग उसकी घबराहट से जोड़ कर देख रहे हैं.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और 'वाइब्स ऑफ इंडिया' की एडिटर दीपल त्रिवेदी ऐसा नहीं मानती हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''बीजेपी नर्वस नहीं है. वह ऐसा जताती है लेकिन ऐसा है नहीं. 2007 से ही मैंने बीजेपी को बेहद आक्रामक होकर चुनाव लड़ते देखा हो चाहे वह नगर निगम, पंचायत, विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का.''

वह कहती हैं, '' बीजेपी काफ़ी फ़ोकस कर चुनाव लड़ती है और माइक्रो मैनेजमेंट पर पूरा ध्यान देती है. पहले ये काम मोदी जी करते थे अब अमित शाह करते हैं बीजेपी के तेवर उसकी घबराहट को नहीं बल्कि उसके बढ़ते फोकस को दिखा रहे हैं. इस बार वह पहले से ज़्यादा ध्यान देकर चुनाव लड़ रही है.''

त्रिवेदी इसकी वजह भी बताती हैं. वह कहती हैं, ''भले ही शहरी क्षेत्र में कांग्रेस का असर नहीं दिख रहा है लेकिन कुछ ग्रामीण क्षेत्रों के दौरे के दौरान मैंने पाया कि यहाँ कांग्रेस को ख़ारिज करना आसान नहीं. बीजेपी के सामने इन इलाक़ों में कांग्रेस की मज़बूती एक चुनौती है. लेकिन आम आदमी पार्टी की एंट्री ने इस चुनाव को दिलचस्प बना दिया है.''

नरेंद्र मोदी

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मोदी के लिए गुजरात का ये चुनाव बेहद अहम

दीपल त्रिवेदी कहती हैं,''लोगों में पहले ये धारणा थी कि आम आदमी पार्टी बीजेपी की बी टीम है. लेकिन राज्य में अपने नेता इशुदान गढवी के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बाद यह काफ़ी आक्रामक हो गई है और गंभीर होकर मैदान में उतर आई है. वह बीजेपी के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर कर लड़ रही है. ''

त्रिवेदी कहती हैं, ''गुजरात के चुनाव मोदी और बीजेपी के लिए काफ़ी अहम हैं क्योंकि इसे उनके लिए 2024 के लोकसभा चुनाव का रिहर्सल माना जा रहा है.''

बीजेपी के लिए गुजरात की लोकसभा सीटें भी चुनौती बनी हुई हैं. 2019 में गुजरात में बीजेपी ने लोकसभा की सभी 26 सीटें जीत ली थीं. लेकिन दीपल त्रिवेदी का मानना है कि 2024 में ऐसा होना मुश्किल लगता है.

वह कहती हैं, ''गुजरात में 1995 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 121 सीटें जीती थीं. ये जादुई आंकड़ा मोदी जी के नेतृत्व में गुजरात में बीजेपी ने अभी तक नहीं छुआ है. इसलिए मोदी चाहेंगे कि गुजरात में वो एक बार फिर बीजेपी को ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीत कर दिखाएं. यह पीएम मोदी की देश भर में बनी छवि के लिए भी ज़रूरी है. यही वजह कि मोदी के नेतृत्व में गुजरात में बीजेपी पूरा जोर लगाती दिख रही है.''

गुजरात

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इमेज कैप्शन, गुजरात में 2019 में जीत का जश्न मनाते बीजेपी कार्यकर्ता

'बीजेपी हर चुनाव दिलोजान से लड़ती है'

बीजेपी यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ समेत कई बड़े नेताओं को प्रचार में उतारने जा रही है.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि यह बीजेपी की रणनीति है. बीजेपी पूरे दिलोजान से चुनाव लड़ती है. चाहे वह पार्षद का चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव का.

वह कहते हैं, ''बीजेपी की हैदराबाद नगर निगम चुनाव में भी पूरी ताकत झोंकने की रणनीति की काफ़ी आलोचना हुई थी. लेकिन बीजेपी ने जी जान लगा कर यह चुनाव लड़ा था. इसलिए यह सवाल ही बेमानी है कि कि बीजेपी गुजरात में इतना ज़ोर क्यों लगा रही है''.

''गुजरात और हिमाचल चुनाव को फ़िलहाल केंद्र में सत्ता का सेमी फ़ाइनल भी माना जा रहा है. इसके बाद 2024 में लोकसभा के चुनाव भी होंगे. लिहाजा मोदी ये साबित करना चाहेंगे कि बीजेपी चुनाव जीतने के मामले में अभी भी सब पर भारी हैं.''

विजय त्रिवेदी कहते हैं, ''बीजेपी के लिए गुजरात के चुनाव महत्वपूर्ण हैं. लेकिन यह भी ज़रूरी है कि वह वहाँ कांग्रेस और दमखम के साथ मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी को हरा कर ये साबित करे कि मोदी की रणनीति और उनकी पार्टी को चुनौती देना अभी इनके बूते की बात नहीं हैं. इन चुनावों का 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़ा मैसैज जाएगा. ''

शाह-मोदी

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क्या है गुजरात विधानसभा की मौजूदा स्थिति?

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस का सीधा मुक़ाबला था. बीजेपी ने इस चुनाव 99 सीटें जीती थीं और उसे 49.05 फ़ीसदी वोट मिले थे. कांग्रेस ने 77 सीटें जीती थीं. गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें सुरक्षित हैं. 27 सीटें अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों और 13 सीटें अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं.

गुजरात में कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद इसके कई विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे. अब गुजरात विधानसभा में बीजेपी के 111 सदस्य हैं. कांग्रेस के सदस्यों की संख्या घट कर 62 रह गई है. एक-एक सदस्य एनसीपी, भारतीय ट्राइबल पार्टी के हैं. एक निर्दलीय सदस्य हैं.

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