गुजरात: क्या यहां भी कांग्रेस को पंजाब वाला झटका लगने वाला है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल इन दिनों स्टेट लीडरशिप से नाराज़ चल रहे हैं. उनका दावा है कि इस बारे में उन्होंने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को भी बताया, लेकिन अभी तक समाधान नहीं निकला है.
हार्दिक पटेल ने इसके बाद मीडिया का रुख़ किया, जहाँ इंटरव्यू के दौरान वो कहते सुने गए, 'गुजरात कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष का मतलब होता है शादी के बाद नसबंदी'.
माना जा रहा है कि हार्दिक पटेल दो बातों के चलते परेशान हैं.
उन्हें लगता है कि कम उम्र के चलते पार्टी में वो साइडलाइन हैं. उनके पास पद तो है, लेकिन पद के मुताबिक़ पूछ नहीं है. भले ही गुजरात कांग्रेस में वो कार्यकारी अध्यक्ष हैं, लेकिन उनके मुताबिक़ प्रदेश के किसी फ़ैसले में उनसे सलाह नहीं ली जाती.

हार्दिक पटेल की दूसरी परेशानी नरेश पटेल हैं. गुजरात में नरेश पटेल के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें लंबे समय से चल रही है.
नरेश पटेल, गुजरात के बड़े व्यापारी हैं, जिनकी पाटीदार समाज में अच्छी पकड़ है. वैसे हर चुनाव के पहले राजनीति में आने की उनकी चर्चा आम है.
गुजरात में पाटीदारों में दो समुदाय अहम माने जाते हैं, जिसमें लेउवा पटेल और कड़वा पटेल हैं. पाटीदार समुदाय में लेउवा पटेल 60 प्रतिशत हैं, जबकि कड़वा पाटीदार 40 प्रतिशत हैं.
नरेश पटेल लेउवा पटेल समाज से आते हैं. वो लेउवा पाटीदार समुदाय की कुलदेवी खोडलधाम ट्रस्ट के ट्रस्टी भी हैं.
नरेश पटेल के कांग्रेस ज्वाइन करने के बारे में जब बीबीसी गुजराती के पत्रकार सागर पटेल ने हार्दिक पटेल से पूछा तो उन्होंने साफ़ कहा, "ये सवाल आपको उनसे पूछना चाहिए, जो कांग्रेस में प्रमुख स्थान पर बैठे हैं."
ये कहने पर कि आप भी तो प्रमुख स्थान पर हैं, आपको प्रदेश में कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है, उन्होंने 'नसबंदी' वाला बयान ही दोहराया.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हार्दिक पटेल की दिक़्क़त केवल हार्दिक की है या गुजरात कांग्रेस की भी है?
और अगर ये दिक़्क़त गुजरात कांग्रेस की है, तो क्या गुजरात में कांग्रेस का भी हाल पंजाब वाला ही होगा?

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गुजरात कांग्रेस की दिक़्क़तें?
गुजरात विधानसभा का कार्यकाल इस साल दिसंबर में ख़त्म होने वाला है और चुनाव प्रस्तावित है. बीजेपी और आम आदमी पार्टी इस चुनाव के लिए अभी से तैयारी में जुट गई हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाँच राज्यों के चुनावी नतीजों के अगले दिन गुजरात दौरे पर थे. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को भी गुजरात ले गए. इसके अलावा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी हाल में गुजरात दौरे पर थे.
दूसरी तरफ़ आम आदमी पार्टी के दो बड़े नेता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया दोनों ने अलग-अलग समय पर राज्य का दौरा किया है.
लेकिन कांग्रेस खेमे में चुनाव को लेकर वो सरगर्मी या तैयारी नहीं दिख रही. ऊपर से अंदरूनी कलह की ख़बरें हार्दिक पटेल की वजह से सामने आने लगी है. नरेश पटेल पर फैसला अटका हुआ है. उम्मीद की किरण कुछ नेताओं को प्रशांत किशोर की जॉइनिंग से थी. लेकिन उस पर बात नहीं बनी.

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गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार राज गोस्वामी कहते हैं, " कांग्रेस की दिक़्क़तें तो सब जानते हैं. केंद्रीय नेतृत्व में तो है ही, स्थानीय नेतृत्व में तो सालों से हैं. वरना 25 साल तक गुजरात में बीजेपी सत्ता में नहीं होती.
जहाँ तक बात हार्दिक पटेल की है, तो उनके बयानों में कुछ विरोधाभास भी है. एक तरफ़ तो कहते हैं कि बीजेपी सरकार शिक्षित, बेरोज़गार के सपने तोड़ रही है और दूसरी तरफ़ कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने उनकी 'नसबंदी' कर दी है.
उनके इन बयानों का एक मतलब हो सकता है कि वो चुनाव से पहले बार्गेनिंग पॉवर तलाश रहे हैं. ठीक चुनाव से पहले ऐसे बयानों का और कोई मतलब नहीं निकाला जा सकता. मुझे नहीं लगता है कि विचारधारा के स्तर पर कोई परिवर्तन की बात हो रही है."
दरअसल हार्दिक पटेल ने हाल में बीजेपी की तारीफ़ की थी जिसके बाद चर्चा थी कि वो बीजेपी में जा सकते हैं. हालांकि ख़ुद हार्दिक पटेल इन अटकलों को ख़ारिज कर चुके हैं.
गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार में अजय उमट कहते हैं, "हार्दिक को इतनी कम उम्र में पार्टी ने कार्यकारी अध्यक्ष बनाया तो ये बड़ा रोल है. लेकिन इस उम्र में अगर वो ये सोचें कि पद मिल गया है तो बाक़ी नेता उन्हें रिपोर्ट करें, ये नहीं हो सकता. कांग्रेस में कई नेता 26-27 साल गुजार देते हैं और उन्हें कुछ नहीं मिलता.
ये भी सच है कि पार्टी के भीतर गुटबाजी बहुत है. गुजरात कांग्रेस में कई गुट हैं- शक्ति सिंह ग्रुप, भरत सोलंकी ग्रुप, जगदीश ठाकोर ग्रुप, हार्दिक ग्रुप.
गुजरात कांग्रेस की दूसरी समस्या लीडरशिप क्राइसिस की है. जगदीश ठाकोर पार्टी अध्यक्ष हैं और सुखराम राठवा विधानसभा में नेता विपक्ष.
पार्टी में कोई व्यक्ति नहीं है जो हार्दिक पटेल को समझाए या हार्दिक किसी की लीडरशिप को स्वीकार करने को तैयार हों. वो व्हाट्सएप पर अपना प्रोफाइल बदलते हैं, लेकिन कांग्रेस में उनको ये कहने वाला कोई नहीं कि ये क्या कर रहे हो? ये सही नहीं है?

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नरेश पटेल के कांग्रेस में आने का डर
हार्दिक का दूसरा दर्द नरेश पटेल को लेकर है. नरेश पटेल के कांग्रेस में आने से हार्दिक पटेल को आख़िर क्या दिक़्क़त हो सकती है?
इस पर दोनों जानकार कहते हैं कि हार्दिक को लगता है कि वो कांग्रेस के पाटीदार समाज के चेहरा है. नरेश पटेल के आने से उनको लगता है कि वो उस समीकरण में हाशिए पर चले जाएंगे. इस वजह से वो थोड़े असुरक्षित महसूस कर रहें है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई में हार्दिक और नरेश पटेल की तुलना सही है.
राज गोस्वामी कहते हैं, "मैं दोनों की तुलना नहीं करना चाहता. दोनों के पास ऐसा राजनीतिक समर्थन भी नहीं है कि दोनों के काडर एक दूसरे से भीड़ जाएं. दस साल पहले तक हार्दिक पटेल को कोई भी नहीं जानता था. पाटीदार आरक्षण के आंदोलन के पहले हार्दिक पटेल को कोई नहीं जानता था. पर नरेश पटेल तो सालों से सामाजिक रूप में खोडलधाम ट्रस्ट के ट्रस्टी के तौर पर काफ़ी एक्टिव रहे हैं."
अजय उमट दोनों के बारे बात करते हुए कहते हैं कि हार्दिक पटेल कडवा पाटीदार हैं जबकि नरेश पटेल लेउवा पाटीदार.
हार्दिक पटेल पाटीदार आंदोलन से नेता बने, उसके पहले उनका कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं रहा है. पाटीदार आंदोलन के बाद हुए 2017 के चुनाव में पटेल समुदाय का कांग्रेस को अच्छा सपोर्ट मिला था. जानकारों की राय में इस वजह से ही कांग्रेस का सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में अच्छा प्रदर्शन भी रहा. इन इलाकों मे पटेल समुदाय के लोगों की तादाद तुलनात्मक रूप से ज़्यादा है.
राज गोस्वामी आगे कहते हैं, "पाटीदार आंदोलन तो अब ख़त्म हो चुका है अब इस चुनाव में वो मुद्दा नहीं है, ऐसे में हार्दिक पटेल इस चुनाव में कांग्रेस के लिए कितने प्रभावी होंगे, ये देखने वाली बात होगी."

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तो क्या आम आदमी पार्टी को फ़ायदा होगा?
ऐसे में अगला सवाल उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी को कांग्रेस के इस अंदरूनी कलह का फायदा होगा ?
आम आदमी पार्टी ने हाल में हुए सूरत नगर निगम चुनाव में 27 सीटें जीतीं थी. उसके बाद से स्थानीय नेतृत्व और अरविंद केजरीवाल दोनों को लगता है राज्य में उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है.
आम आदमी पार्टी गुजरात में बेहतर करेगी, ऐसा कहने वालों में वरिष्ठ चुनाव विश्लेषक और सीएसडीएस के प्रोफ़ेसर संजय कुमार भी हैं. उनके मुताबिक आम आदमी पार्टी को गुजरात में 7-8 फ़ीसदी का वोट शेयर मिल सकता है.
लेकिन वो साथ ही ये भी कहते हैं कि 2022 में नहीं लेकिन 2027 में आम आदमी पार्टी बीजेपी के लिए गुजरात में चुनौती साबित हो सकती है. क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस का ग्राफ़ गिर रहा है, वहाँ आम आदमी पार्टी उभर कर सामने आ रही है.

पिछले चुनाव के आँकड़ों के आधार पर उनका विश्लेषण कहता है कि आज की स्थिति कांग्रेस इस बार गुजरात चुनाव नहीं जीत रही. किंतु और परंतु केवल इस बात पर है कि कांग्रेस का हाल गुजरात में पंजाब वाला होगा या कुछ सीटों के साथ सर्वाइव करेगी?
वो आगे कहते हैं कि आम आदमी पार्टी 2-3 फीसदी वोट शेयर वाली पार्टी उभर कर आती है या 12-14 फीसदी वाली पार्टी बनती है. इसी पर अगले छह महीने में फैसला होना है. बाक़ी जीत हार की स्थिति में ज़्यादा परिवर्तन नहीं होगा.
वो इसके पीछे दलील देते हैं कि कांग्रेस का 2017 का प्रदर्शन 25 सालों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा. तब उन्हें 41 फ़ीसदी वोट शेयर था. लेकिन 77 सीटों के साथ भी बहुमत के आँकड़े से वो काफ़ी पीछे थी और बीजेपी की 99 सीटों से भी पीछे थी. इस चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच लगभग 8 फ़ीसदी वोट शेयर का फासला था. 2002 से अब तक के चुनाव देखें तो अब तक हर चुनाव में कमोबेश यही फासला बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर में रहा.
संजय कुमार एक दूसरी दलील भी देते हैं. जिन राज्यों में बीजेपी सत्ता में होते हुए चुनाव में गई उनमें से कई जगह चुनाव हारी है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान इसके उदाहरण हैं. लेकिन वहाँ उनका वोट शेयर अगर गिरा भी तो 8 फ़ीसदी नहीं गिरा. छत्तीसगढ़ एक अपवाद है, जहाँ 8 प्रतिशत की वोट शेयर में गिरावट दर्ज की गई थी.

संजय कुमार याद भी दिलाते हैं कि गुजरात नरेंद्र मोदी और अमित शाह का होम स्टेट भी है.
राज गोस्वामी भी मानते हैं कि आने वाले गुजरात चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होगा, लेकिन कांग्रेस से भी बेहतर होगा वो ये मैं नहीं मानते.
वहीं अजय उमट कहते हैं कि आम आदमी पार्टी के पास राज्य में नेता और संगठन नहीं है. कुछ एक इलाके में कार्यकर्ता ज़रूर हैं, लेकिन वोटरों को बूथ तक ले जाने में संगठन और कार्यकर्ता की भूमिका सबसे बड़ी भूमिका होती है.
अजय उमट के मुताबिक आम आदमी पार्टी बहुत हुआ तो कांग्रेस को नुक़सान पहुँचा कर बीजेपी की मदद कर सकती है, जैसा गोवा और उत्तराखंड में किया.

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कांग्रेस किसके भरोसे?
25 साल से सत्ता में रहने के बाद बीजेपी के लिए सत्ता विरोधी लहर होगी. वैसे तो ये बात कांग्रेस के पक्ष में जाती दिख रही है.
लेकिन लगता है कि बीजेपी को भी इसका एहसास पहले ही हो गया था. तभी पिछले साल सितंबर में बीजेपी ने गुजरात कैबिनेट का पूरा चेहरा ही बदल दिया.
ये भी एक वजह है कि कांग्रेस के लिए इस बार के चुनाव थोड़े मुश्किल हो सकते हैं.
अजय उमट कहते हैं, "आने वाले चुनाव के लिए कांग्रेस भी हाथ पर हाथ धरे बैठी नहीं है. वो भी KHAM थ्योरी के साथ अपना वोट बैंक का विस्तार कर रही है. अब वो K- क्षत्रिय, H- हरिजन यानी दलित, A-आदिवासी और M- मुस्लिम को साथ ले कर आना चाहते हैं."
इस फॉर्मूले को विस्तार से समझाते हुए अजय उमट आगे कहते हैं, " 2019 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने इसी फॉर्मूले के तहत प्रदेश अध्यक्ष जगदीश ठाकोर को बनाया, जो ओबीसी नेता हैं.
विधानसभा में कांग्रेस दल का नेता सुखराम राठवा को बनाया जो आदिवासी नेता माने जाते हैं. गुजरात में 15 फ़ीसदी से ज़्यादा ट्राइबल आबादी है.
जिग्नेश मेवानी दलित समाज से आते हैं, इस वजह से उनकी गिरफ़्तारी का मुद्दा भी कांग्रेस ने इतनी ज़ोर शोर से उठाया. कांग्रेस को मालूम है कि राज्य के मुसलमान उनके साथ ही है.
वहीं माना जा रहा है कि रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को गुजरात चुनाव में PODAM का मंत्र दिया था, जिसमें P- पटेल, O- ओबीसी, D- दलित, A - आदिवासी और M - मुसलमानों के लिए था.
इसी फॉर्मूले की वजह से नरेश पटेल को कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा थी. लेकिन प्रशांत किशोर का चैप्टर फिलहाल कांग्रेस के लिए बंद हो गया है.
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