कांग्रेस अध्यक्ष बने तो मोदी-शाह को कितनी चुनौती दे पाएंगे सरल स्वभाव के खड़गे?

अध्यक्ष पद के लिए नामांकन करते मल्लिकार्जुन खड़गे

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

"दिल मिले ना मिले, हाथ मिला के चलो."

बीती देर रात जब मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष पद की भारी ज़िम्मेदारी संभालने का प्रस्ताव दिया गया होगा तो बहुत मुमकिन है कि उनके दिमाग़ में ये मुहावरा आया होगा. जानकार मानते हैं कि संभवत: खड़गे को ये ज़िम्मेदारी गांधी परिवार के आशीर्वाद से मिल रही हो.

खड़गे ने यही मुहावरा मुझे 24 मई 2004 को अपने सबसे क़रीबी दोस्तों में से एक, दिवंगत धरम सिंह के कांग्रेस विधानसभा दल का अध्यक्ष बनने का संकेत देते हुए सुनाया था. धर्म सिंह ने कांग्रेस-जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) की पहली गठबंधन सरकार में कांग्रेस विधायक दल का नेतृत्व किया था.

उस समय धरम सिंह, खड़गे और एचके पाटिल, जो फ़िलहाल कंग्रेस कार्यसमिति (सीडब्लयूसी) के सदस्य हैं, बेंगलुरू में तत्कालीन मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा के चैंबर से कांफ्रेंस हॉल के पास बने दूसरे कमरे में आईसीसी के ऑब्ज़र्वर दिवंगत विलासराव देशमुख से अंतिम बात करने के लिए जा रहे थे.

सीधा सरल संदेश ये था कि जेडीएस नेता एचडी देवगौड़ा कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का समर्थन करेंगे यदि इसका नेतृत्व खड़गे की जगह अजातशत्रु के नाम से चर्चित नेता धरम सिंह करें.

इस मुहावरे के कई मायने हैं जो खड़गे के व्यक्तित्व को भी परिभाषित करते हैं. इसका मतलब ये भी है कि भले ही आपका दिल निर्णय को स्वीकार न कर रहा हो, आप उसे स्वीकार करें और आगे बढ़ें.

खड़गे जानते हैं कि ऐसे समय में जब पार्टी अपने सबसे बुरे संकट का सामना कर रही है जो सिर्फ़ संस्थागत या ढांचागत स्तर तक ही सीमित नहीं है बल्कि वैचारिक नेतृत्व का भी संकट है, गांधी परिवार के पास उनके जैसे वफ़ादार पर भरोसा करने के अलावा संभवत: और कोई विकल्प नहीं है.

खड़गे मूलत: एक ऐसे व्यावहारिक व्यक्ति हैं जो अपनी ताक़त और कमज़ोरी दोनों को भलीभांति जानते हैं. राज्य की राजनीति से निकलकर लोकसभा और फिर राज्यसभा तक जाने वाले खड़गे अपने सामने पेश चुनौतियों को जानते हैं, ख़ासकर बीजेपी की मज़बूत पार्टी मशीनरी को जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह कर रहे हैं.

अस्सी साल के खड़गे अगर अध्यक्ष चुने जाते हैं तो 1969 में अध्यक्ष बने जगजीवन राम के बाद वो कांग्रेस पार्टी के पहले पूर्णकालिक दलित अध्यक्ष होंगे.

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कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस

मल्लिकार्जुन खड़गे, शशि थरूर और केएन त्रिपाठी

30 सितंबर नामांकन की आख़िरी तारीख़

नामांकन वापस लेने की आख़िरी तारीख़ - 8 अक्टूबर

चुनाव की तारीख़ - 17 अक्टूबर

मतगणना की तारीख़ - 19 अक्टूबर

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ज़मीन से अध्यक्ष पद की दावेदारी तक

मल्लिकार्जुन खड़गे

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खड़गे कर्नाटक के कलबुर्गी ज़िले के एक सामान्य पार्टी कार्यकर्ता थे. वहां से उठकर उन्हें अध्यक्ष पद की दावेदारी तक पहुंचने को 'एक साधारण कार्यकर्ता के सम्मान' के रूप में भी देखा जा रहा है. पार्टी से जुड़े बहुत से लोग मानते हैं कि ये मज़बूत संदेश देशभर में पार्टी के कार्यकर्ताओं तक भी पहुंचेगा.

कर्नाटक विधानसभा के पूर्व स्पीकर रमेश कुमार ने बीबीसी से कहा, "वो पार्टी के रैंक के आदमी हैं और निश्चित तौर पर पार्टी के सम्मानजनक अस्तित्व को बचाने में भूमिका निभा सकते हैं. उनकी विचारधारा बहुत मज़बूत है और वो मोदी-अमित शाह की पार्टी मशीनरी को चुनौती दे सकते हैं."

रमेश कुमार और खड़गे की पहचान 1970 के दशक से है जब दोनों को ही देवराज अर्स ने कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए चुना था. उस समय अपना पहला बंटवारा देखने के बाद पार्टी इंदिरा कांग्रेस के नाम से भी चर्चित थी.

खड़गे कलबुर्गी में आकर बसे थे और यहां एक मिल की ट्रेड यूनियन से जुड़े थे. देवराज अर्स ने उन्हें गुरमितकाल से टिकट दिया था जिस पर ऊंची जाति के वोटों का दबदबा था. लेकिन खड़गे ने इस विधानसभा सीट पर 1972 से शुरू करके लगातार नौ बार चुनाव जीता. उन्होंने कुल दस बार विधानसभा चुनाव जीता और उन्हें कन्नड़ भाषा में 'सोल इलादे सरदार' के नाम से भी जाना जाने लगा. इसका मतलब था वो सरदार जो कभी नहीं हारता है.

एक शीर्ष रिटायर्ड अधिकारी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "वो एक चतुर प्रशासक थे जिन्होंने देवराज अर्स से लेकर एसएम कृष्णा तक की सरकारों में अलग-अलग मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाली. वो अधिकारियों से हमेशा विनम्रता से बात करते थे, लेकिन उनका अपना दिमाग़ भी था. वो अपनी प्राथमिकताओं को हमेशा स्पष्ट करते थे. कोई अधिकारी उन्हें बेवकूफ़ नहीं बना सकता था. वो वास्तव में मुख्यमंत्री पद के हक़दार थे, लेकिन उन्हें तीन बार ये मौका गंवाना पड़ा."

2009 में वो पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की केंद्र सरकार में मंत्री बने थे. अपने इस कार्यकाल के दौरान ही उन्होंने संविधान (371 (जे)) संशोधन के लिए अभियान चलाया. इससे हैदराबाद और कर्नाटक क्षेत्र के लोगों को शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण मिला. 2014 में वो लोकसभा में विपक्ष के नेता थे, लेकिन 2019 में वो स्वयं लोकसभा चुनाव हार गए.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता केएच रंगनाथन ने कई दशक पहले खड़गे के बारे में मुझसे कहा था, "शोषित वर्ग के नेताओं में आगे बढ़ने की क्षमता के मामले में खड़गे कर्नाटक के समूचे राजनीतिक क्षेत्र में सबसे चतुर और अग्रणी हैं."

क्या वो मोदी-शाह की जोड़ी को चुनौती दे पाएंगे?

मल्लिकार्जुन खड़गे

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राजनीतिक विश्लेषक इंदुधारा होन्नापुरा बीबीसी से कहते हैं, "वो एक दलित नेता के रूप में उभरे हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपने नाम का फ़ायदा नहीं उठाया. वो सभी समुदायों के लिए निष्पक्ष बने रहे हैं. लेकिन देश के मौजूदा हालात को देखते हुए कोई ये नहीं कह सकता है कि सभी गुण होने के बावजूद वो पार्टी के अध्यक्ष के रूप में काम कर पाएंगे या नहीं."

विश्लेषक ये मानते हैं कि कांग्रेस संभवत: खड़गे को पार्टी अध्यक्ष चुनकर पूरे देश को एक संदेश देना चाहती है. राजनीतिक टिप्पणीकार के बेनेडिक्ट बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "वो आहत लोगों को राहत देने और पार्टी के सभी धड़ों के बीच तनाव कम करने के मामले में काफ़ी दक्ष हैं. वो ऐसे नेता नहीं है जो दूसरे से किसी भी तरह की लड़ाई करेंगे."

बेनेडिक्ट की टिप्पणी की झलक कांग्रेस के असंतुष्ट समूह जी-23 से जुड़े नेताओं के उनके नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर करने में दिखती है. आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, भूपिंदर सिंह हुड्डा. ये तीनों ही जी-23 का हिस्सा थे. वहीं एके एंटनी, अशोक गहलोत, तारिक़ अनवर और दिग्जविजय सिंह गांधी परिवारा के पक्के वफ़ादार हैं.

अगर खड़गे जीतते हैं तो पार्टी के सामने एक चुनौती भी होगी. खड़गे विंध्य पर्वतमाला के दक्षिण से आते हैं. उनके दलित होने का फ़ायदा मिल सकता है, लेकिन दक्षिण भारत की राजनीति उत्तर भारत की राजनीति से अलग है, ख़ासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां पार्टी बेहद कमज़ोर स्थिति में है.

राहुल गांधी के साथ मल्लिकार्जुन खड़गे

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राजनीतिक टिप्पणीकार पूर्णिमा जोशी कहती हैं, "वो ओल्ड गार्ड हैं, सभ्य हैं और ज़मीन से जुड़े राजनेता हैं. कोई भी उन्हें हल्के में नहीं ले सकता है. लेकिन जहां तक कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का सवाल है, खड़गे उस खालीपन को नहीं भर पायेंगे जिससे पार्टी जूझ रही हैं. कोई और भी इस खालीपन को नहीं भर सकता है, लेकिन उनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में ताज़गी भर सके."

जोशी रमेश कुमार के इस आंकलन से इत्तेफाक़ नहीं रखतीं कि खड़गे मोदी और शाह की चुनावी मशीनरी को चुनौती दे पाएंगे. वो कहती हैं, "वो किसी भी तरह से मोदी और शाह के लिए चुनौती नहीं होंगे. कांग्रेस को ऐसे नेता कि ज़रूरत है जो मोदी-शाह की भाषा बोल सके, कोई जो चतुर हो, ऐसा कोई जो बीजेपी को उसके ही खेल में हरा सके. वो बहुत ही सभ्य व्यक्ति हैं."

बेनेडिक्ट भी ये बात मानते हैं कि खड़गे मोदी और शाह की जोड़ी का मुक़ाबला नहीं कर सकेत. सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस की प्रकृति ही अलग है.

बेनेडिक्ट कहते हैं, "खड़गे बहुत नर्म व्यक्ति हैं. थरूर प्रधानमंत्री पद के लिए अच्छे उम्मीदवार हो सकते हैं, लेकिन वो कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अच्छे उम्मीदवार नहीं हैं. समस्या ये है कि कांग्रेस को फिर से जोश भरने और पार्टी की मरम्मत करने की ज़रूरत है हालांकि खड़गे बीजेपी का मुक़ाबला नहीं कर पाएँगे."

जोशी कहती हैं, "लेकिन फिर आप नहीं जानते कि क्या हो सकता है. हो सकता है कि लोग उन्हें सकारात्मक रूप में ले क्योंकि वो दोनों पक्षों की तुलना करेंगे. ये ऐसा कारक है जिसे देखा जाना अभी बाक़ी है."

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