शशि थरूर: कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कितनी तगड़ी है दावेदारी

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
वो अपनी बातों और हरकतों से चौंकाने में पीछे नहीं हटते - अपने दोस्तों को, प्रशंसकों को और राजनीतिक विरोधियों को. कुछ नहीं तो अंग्रेज़ी का कोई ऐसा शब्द ही बोल देते हैं जिसकी चर्चा हर जगह होने लगती है.
एक बार फिर, जब कई लोग मान रहे थे कि शायद कांग्रेस के अध्यक्ष पद के नामांकन के लिए वो आगे नहीं आएंगे, उन्होंने अपने दोस्तों और आलोचकों को ग़लत साबित कर दिया है.
शशि थरूर के बारे में एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने कहा कि वो अपने बॉलीवुड हीरो जैसे लुक से किसी को भी प्रभावित कर सकते हैं और वही थरूर कांग्रेस नेताओं की बड़ी लीग में शुमार होने की महत्वाकांक्षी कोशिश कर रहे हैं, भले ही वो चुनाव जीतें या हार जाएं.

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लोग इस बात से हैरत में हैं कि कांग्रेस नेतृत्व का विरोध करने वाले जी-23 का हिस्सा रहे थरूर, जो कि राहुल गांधी के राजनीति के तरीक़े से इत्तेफ़ाक नहीं रखते, वो पहले राहुल के साथ 'भारत जोड़ो यात्रा' में दिखते हैं और फिर सोनिया गांधी से मिलकर कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए चुनाव लड़ने की मंशा ज़ाहिर करते हैं.
लेकिन जो लोग उन्हें जानते हैं और उनके साथ काम कर चुके हैं, उनका कहना है कि थरूर ऐसे ही हैं, उनका काम करने का यही तरीका है.
सोनिया गांधी से बात कर उन्होंने वो सारी शंकाएं दूर कर दी हैं जो उनके जी-23 से जुड़ने से पैदा हुई थीं. ये मुलाक़ात क्या सिर्फ़ औपचारिकता थी, ये कोई नहीं जानता. कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च नेता उनके साथ हैं या नहीं, इसका भी अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता.
राजनीतिक टिप्पणीकार एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, "उनकी एक अलग राजनीतिक शैली है. वो बिना घमंड वाले व्यक्ति हैं. वो दुनिया के बड़े नेताओं, बिज़नेसमैन, बुद्धिजीवियों के साथ-साथ पार्टी के लोगों से भी बिना किसी घमंड के बात करते हैं."
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केरल यूनिट से समर्थन की कमी

लोगों से संवाद के इसी तरीके ने थरूर को 2009 के लोकसभा चुनाव में तिरुवनंतपुरम सीट से जीत दिलाई. एक ऐसे समय में जब उन्हें मज़बूत उम्मीदवार नहीं माना जा रहा था और अब वो इसी सीट से जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि स्थानीय कांग्रेस यूनिट का उन्हें बहुत समर्थन हासिल है.
इसलिए पार्टी की केरल यूनिट ने एक प्रस्ताव पास किया है कि वो उस उम्मीदवार का समर्थन करेंगे जिसे पार्टी का हाई कमांन समर्थन दे रहा हो.

सांसद के मुरलीधरन ने बीबीसी से कहा, "उन्हें सिर्फ़ एक वोट मिलेगा, जो वो ख़ुद को देंगे. पीसीसी ने फ़ैसला किया है कि वो उनका समर्थन करेंगे जिसके साथ नेहरू परिवार है."
एक और सांसद बेनी बेहनान ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मुझे नहीं लगता कि वो ख़ुद इसे लेकर गंभीर हैं. उन्होंने इस बारे में अपने दोस्तों से भी बात नहीं की है. मैं उनका दोस्त हूं, उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा है. कोई भी राज्य यूनिट के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ नहीं जाएगा."
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थरूर के टैलेंट को कितना समझती हैं सोनिया गांधी

वो पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए राज्य इकाई उनका साथ नहीं दे रही है, ऐसा नहीं है. कई मौकों पर पिनराई विजयन की सरकार की उन्होंने तारीफ़ की है जिसका पार्टी ने विरोध किया है.
हाल के दिनों में उन्हें शिवरलाइन रेल प्रोजेक्ट पर दिए अपने बयान को वापस लेना पड़ा था, इसे मुख्यमंत्री का ख़ास प्रोजेक्ट माना जाता है. एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ़ के प्रतिस्पर्धा वाले माहौल में इस तरह के बयान पार्टी को नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
राजनीतिक टिप्पणीकार राधिका रामाशेषण कहती हैं, "सोनिया गांधी उनके टैलेंट को समझती हैं, लेकिन सोनिया से कनेक्शन के बावजूद कभी भी वो एक पूर्ण कैबिनेट मंत्री नहीं बने या फिर कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य नहीं बन पाए. वो विवादों में रहे और मनमोहन सिंह के मंत्रालय से इस्तीफ़ा देना पड़ा."

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आसान नहीं रहा सफ़र

सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज से पढ़े थरूर देश के कुछ चुनिंदा बुद्धिजीवियों में गिने जाते हैं. उन्होंने विदेश में भी पढ़ाई की है और काफ़ी कम उम्र में वो संयुक्त राष्ट्र से जुड़ गए थे. वो यूएन के अंडर-सेक्रेटरी जनरल बने. भारत ने सेक्रेटरी जनरल के पद के लिए उनका समर्थन किया, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए.
डिप्लोमेसी के शानदार करियर के दौरान उन्होंने किताब लिखने की अपनी आदत जारी रखी, जो उन्हें 10 साल की उम्र से थी. उन्होंने दो दर्जन से ज़्यादा किताबें लिखी हैं और कई पुरस्कार जीते हैं. फ़िक्शन, नॉन फ़िक्शन, राजनीति यहां तक धर्म पर भी किताब लिखी है.

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थरूर बनाम विवाद

यूएन के सर्वोच्च पद पर नहीं पहुंच पाने के बाद थरूर ने कई नामी पब्लिकेशन के लिए लिखा. कांग्रेस की विचारधारा से इत्तेफ़ाक रखते थे इसलिए उन्होंने इस पार्टी से जुड़ने का फ़ैसला किया. सोनिया गांधी ने उन्हें तिरुवनंतपुरम से पार्टी का टिकट दिया.
उन्हें विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद दिया गया, लेकिन उनका आईपीएल में कोच्चि टीम को बढ़ावा देने को हितों का टकराव बताया गया. इस टीम से उनकी दोस्त सुनंदा पुष्कर जुड़ी हुई थी, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं. उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें "पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड" बताया था.
लेकिन थरूर जो बेबाकी से बोलने के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा, "मेरी पत्नी अमूल्य है, किसी भी काल्पनिक 50 करोड़ से ज़्यादा, लेकिन इसे समझने के लिए आपको किसी से प्यार करने में सक्षम होना पड़ेगा."
काफ़ी समय के बाद थरूर की मानव संसाधन मंत्रालय में राज्य मंत्री के तौर पर वापसी हुई.
थरूर का वो भाषण आज भी इंटरनेट पर शेयर किया जा रहा है जिसमें वो ब्रिटेन से सबसे अमीर देश पर क़ब्ज़े के लिए मुआवज़ा मांग रहे हैं, उन्होंने भाषण में ज़िक्र किया है कि 1700 में जीडीपी की दर 27 प्रतिशत थी और ब्रिटेन ने 'भारत का शोषण कर सारी दौलत लूटी' और सबसे ग़रीब देशों में एक बनाकर छोड़ा.
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उनके इस भाषण को सोशल मीडिया पर बहुत तारीफ़ मिली थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी तारीफ़ की थी. हालांकि ये तब हुआ जब एक दिन पहले ही सोनिया गांधी ने घोटाले को लेकर संसद ठप होने के बाद उनकी सार्वजनिक टिप्पणी की आलोचना की थी.
थरूर ने स्वच्छ भारत मिशन का समर्थन किया था जिसपर कांग्रेस ने नाराज़गी जताई थी.
थरूर इसके बाद फिर ख़बरों में आए जब उनकी पत्नी की संदिग्ध हालत में मौत हो गई. उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा था, लेकिन बाद में इस मामले में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.

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युवाओं के बीच प्रसिद्ध

विवादों के बावजूद थरूर हमेशा से ही युवाओं के चहेते रहे हैं, ख़ासतौर पर उनके जो शहरों में रहते हैं और अंग्रेज़ी बोलते हैं. उनका कोई भी पब्लिक लेक्चर ऐसा नहीं होता, जहां युवाओं की भीड़ इकट्ठा न हो.
थरूर का सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सहमत नहीं होना कई लोगों के लिए हैरानी की बात थी.
कोर्ट ने उन लड़कियों को मंदिर मे जाने की इजाज़त दी थी जिनके पीरियड्स आते हैं. लेकिन उनकी पार्टी ने 50 साल से कम की महिलाओं को मंदिर में नहीं जाने देने की परंपरा का समर्थन किया था.
लेकिन ख़ुद को हिंदू बताने वाले थरूर, जिन्हें चर्च का भी समर्थन मिलता है, उनके निर्वाचन क्षेत्र की महिलाओं ने उनका साथ दिया था.
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राधाकृष्णन कहते हैं, "वो लोगों से उन्हीं की तरह मिलते हैं. मिडिल क्लास उनसे प्यार करता है. वो इस समय के व्यक्ति के हैं. मैं निराश हूं कि उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए कुछ बड़ा नहीं किया."
"लेकिन अभी भी चुनाव हुए तो वे जीत जाएंगे क्योंकि उनकी संवाद शैली कमाल की है. हालांकि उत्तर प्रदेश और उत्तर के राज्यों में उनका प्रभाव कम है."
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आख़िर चाहते क्या हैं थरूर

राधिका रामाशेषण कहती हैं, "उनके फ़ैन पूरे देश में हैं. वो हिंदी में बात करते हैं ताकि इस इलाके के लोग भी उन्हें वोट करें, लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं लगता. ये भी समझना होगा कि के कामराज, एस निजलिंगप्पा और पीवी नरसिंह राव, कांग्रेस ने दक्षिण भारत के किसी व्यक्ति को कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनाया."
"गहलोत जब क़रीब-क़रीब प्रत्याशी बन गए हैं, तो इस बात के आसार कम हैं कि गांधी परिवार के वफ़ादार पीसीसी प्रमुख थरूर के साथ आएंगे."
लेकिन दिल्ली के एक कांग्रेस नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि थरूर के चुनाव लड़ने का कोई निगेटिव परिणाम नहीं होगा.
उनके मुताबिक़, 'वो गांधी परिवार को चैलेंज नहीं कर रहे हैं. उनके चुनाव में खड़े होने से ये संदेश जाता है कि कांग्रेस में कोई भी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ सकता है. ये एक बड़ा मैसेज है जो बाहर जा रहा है. जितने G-23 के उम्मीदवार होंगे, ये संदेश उतना ही मज़बूत होगा."
उन नेता के मुताबिक, 'माना जा रहा है कि उन्हें बहुत वोट नहीं मिलेंगे. वो समझदार हैं और ये जानते हैं. इसका मतलब है कि वो अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे शीर्ष नेताओं के गुट में शामिल होना चाहते हैं."
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