म्यांमार की सेना के अत्याचार से बचने के लिए भारत के मिज़ोरम में शरणार्थियों की बाढ़ -ग्राउंड रिपोर्ट

शिविरों में म्यांमार के बच्चे

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    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मिज़ोरम से लौटकर

म्यांमार और मिज़ोरम के बीच एक पहाड़ी नदी टिआऊ ही अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखांकित करती है.

फिलहाल बरसात के मौजूदा मौसम में यह पानी से लबालब भरी हुई है. लेकिन साल के बाकी समय इसे पैदल ही पार किया जा सकता है. यहां दोनों देशों की सीमाएं स्वाभाविक स्थिति में एकदम शिथिल रहती है.

दोनों ओर से लोग अमूमन निर्बाध तरीके से सीमा पार कर एक-दूसरी ओर आवाजाही कर सकते हैं.

म्यांमार का सॉफ्ट ड्रिंक या बीयर सीमा से सटे भारतीय बाजार में आसानी से मिल जाता है. यहां तक कि म्यांमार में बनी मोटरसाइकिल भी सीमा के दूसरी ओर यानी भारतीय इलाके में काफी लोकप्रिय है.

लेकिन बीते डेढ़ साल से भी ज्यादा समय से इस सीमा चेकपोस्ट पर काफी कड़ा पहरा है. सीमा चौकी पार कर एक देश से दूसरे देश में आवाजाही कागज पर तो लगभग बंद ही है. लेकिन इसके बावजूद म्यांमार के हजारों नागरिक लगातार भारतीय सीमा में प्रवेश कर रहे हैं.

वीडियो कैप्शन, छह पूर्व सैनिकों ने कबूल किया है कि उन्होंने सेना के आदेशों पर मानवाधिकारों का हनन किया.

शरणार्थी का दर्जा नहीं...

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दरअसल, बीते साल पहली फरवरी में म्यांमार में सेना के सत्ता पर कब्जे़ के बाद से ही आतंकित लोग समूहों में टिआऊ नदी को पार कर गोपनीय रूप से मिजोरम पहुंच रहें हैं और यह सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है.

ये शरणार्थी मूल रूप से म्यांमार के चिन प्रांत के रहने वाले हैं. उनका दावा है कि सेना और सुरक्षाबलों के अत्याचार से बचने के लिए ही वे मजबूरन सीमा पार कर मिज़ोरम पहुंच रहे हैं.

सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे शरणार्थियों की तादाद करीब 31 हजार हैं. हालांकि विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि असली आंकड़ा इससे बहुत ज़्यादा है. यहां आने वाले में ऐसे कम से कम 14 सांसद भी हैं जो म्यांमार में वर्ष 2020 में हुए आम चुनाव में जीते थे.

केंद्र सरकार ने सीमा पार से आने वालों को शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया है. बावजूद इसके मिज़ोरम सरकार और स्थानीय लोगों ने उनकी ओर मदद का हाथ बढ़ाया है.

बीते डेढ़ साल से ज़्यादा समय से मिज़ोरम प्रशासन, विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और चर्चों की सक्रियता से राज्य भर में ऐसे लोगों को लिए कई आश्रय शिविर खोले गए हैं.

लेकिन म्यांमार के यह तमाम नागरिक क्यों और कैसे भाग कर यहां पहुंचे हैं और मिजोरम में उनके दिन कैसे गुजर रहे हैं? मौके पर जाकर इन सवालों के जवाब की तलाश में मैंने मिज़ोरम के सुदूर दुर्गम चम्फई हिल्स इलाक़े के ऐसे कई शिविरों का दौरा किया.

लोग समूहों में टिआऊ नदी को पार कर गोपनीय रूप से मिजोरम पहुंच रहें हैं

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शरणार्थियों की कहानी

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मोएत एलो सोए सिन म्यांमार के एक प्राइमरी स्कूल में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते थे. लेकिन सेना जब उनके पिता समेत परिवार के कई सदस्यों को पकड़ कर ले गई तो वे मजबूरन पांच महीने पहले भारत आ गए.

उन्होंने जोखाउथर शरणार्थी शिविर के अहाते में बीबीसी से कहा, "परिवार के बाकी लोगों को छोड़ कर इस तरह यहां आना बिल्कुल आसान नहीं था. घने जंगल और पहाड़ से गुजरते हुए यहां तक पहुंचने में दस दिन लगे. कभी दो दिन चलने के बाद कहीं हिंसा या उपद्रव के कारण छिपना पड़ा तो कभी लगातार चौबीस घंटे पैदल चलना पड़ता था. मैंने इसी तरीके से किसी तरह सीमा पार की."

अब एस्थार की बात करते हैं. वो चिन स्टेट में एक खेतिहर परिवार से हैं. म्यांमार के सिपाहियों ने जब उनके खेत और घर-बार जला दिए तो उनके पास भी भारत आने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था.

एस्थार तीन छोटी बेटियों और अपने सबसे छोटे दो साल के बेटे के साथ गांव के दूसरे लोगों के साथ भारत की ओर रवाना हो गईं थीं.

म्यांमार

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उनके पति उस समूह के साथ नहीं आ सके थे. वे अब भी म्यांमार में ही छिप कर रह रहे हैं. एस्थार को मिजोरम में बैठे-बैठे बीच-बीच में पति के बारे में खबरें मिलती रहती हैं, कभी दो-तीन दिनों के अंतराल पर तो कभी दो-तीन सप्ताह के बाद.

चिन स्टेट में कम से कम दो विद्रोही गुट हैं- चिन डिफेंस फोर्स और चिन नेशनल आर्मी. दोनों लंबे समय से वहां की सेना और प्रशासन के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन कर रहे हैं. बीते साल से म्यांमार के लोकतंत्र समर्थक भी नियमित रूप से सेना और सैन्य शासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके साथ सेना का अत्याचार भी तेज हो रहा है.

चम्फई के पास जोटे शरणार्थी शिविर में रहने वाले तीस साल के युवक कोह बताते हैं कि म्यांमार की सेना के साथ लड़ने वाले चिन विद्रोहियों के साथ उनका कोई संबंध नहीं था.

लेकिन इसके बावजूद सेना के जवानो ने एक दिन उनके पूरे गांव को आग के हवाले कर दिया. वो मोबाइल में मिट्टी से बने अपने उस दो-मंजिले मकान की तस्वीर दिखाते हैं जो अब पूरी तरह जल कर राख का ढेर बन चुका है.

कोह की पत्नी मेरेम ने अपने दो महीने के बच्चे को लेकर सीमा पार की थी, अब वह एक साल का हो गया है. मेरेम ने सपने में भी नहीं सोचा था कि म्यांमार में सिपाहियों के अत्याचार के कारण पलायन करने के बाद उनको एक नए देश में नया जीवन मिलेगा.

कोह कोह

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ये हमारा पारिवारिक मामला है...

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मिजोरम सरकार ने सीमा पार से आने वाले हजारों लोगों का स्वागत करते हुए उनको आश्रय और भोजन मुहैया कराया है. बीते दस-बीस वर्षों में म्यांमार से ही कई हज़ार रोहिंग्या शरणार्थी भी भारत आए हैं.

ऐसे लोग लंबे अरसे से विभिन्न शहरों में अस्थायी झोपड़पट्टी या कॉलोनी बना कर वहां रह रहे हैं. जम्मू, हैदराबाद और दिल्ली में इन रोहिंग्या शरणार्थियों के प्रति स्थानीय लोगों की आंखों में भले हिकारत का भाव नजर आता है, लेकिन मिज़ोरम में चिन स्टेट से आने वाले शरणार्थियों के मामले में तस्वीर एकदम अलग है.

मिज़ोरम के मुख्यमंत्री जोरमथांगा ने राजधानी आइजॉल में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा, "आपको यह समझना होगा कि इन लोगों के साथ हमारा खून का संबंध है. ऐतिहासिक वजहों से शायद हमारे बीच सीमा की दीवार खड़ी हो गई है, लेकिन मिज़ो और चिन के लोग दरअसल एक ही जातीय समूह के हैं."

मिज़ो राष्ट्रवाद के नायक और कभी गोरिल्ला आंदोलन की कमान संभालने वाले जोरमथांगा ने बताया, "मेरी मां और मौसी का जन्म भारतीय सीमा में ही हुआ था और अब उनका निधन हो चुका है. लेकिन उनके दोनों भाइयों यानी मेरे दोनों मामा का जन्म और निधन म्यांमार में ही हुआ. हमारा परिवार एक है, बस हम सीमा के आर-पार बिखरे हैं. आज अगर सीमा पार हमारे परिवार के कुछ सदस्य अगर संकट में हैं तो हमें ही उनकी मदद करनी होगी. है ना. यह पूरी तरह हमारा फैमिली मैटर (पारिवारिक मामला) है."

मिज़ोरम

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राज्य में सत्तारूढ़ मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के उपाध्यक्ष और पूर्व सांसद वैन लालजाओमा बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "मिजोरम ने इन शरणार्थियों को शरण दी है क्योंकि हम एक ही क्लैन के हैं. मिज़ो और चिन के लोगों की जातीयता एक ही है. ब्रिटिश शासकों की ओर से देश के विभाजन से पहले हम लोग एक ही भूखंड में रहते थे. हम लोग भारत के मौजूदा मिज़ोरम, म्यांमार के चिन हिल्स और बांग्लादेश के मौजूदा पर्वतीय चटगांव इलाकों में रहते थे."

वे पलट कर सवाल करते हैं, "यह सब लोग तो हमारे ही भाई-बहन हैं. इस समय वो संकट में हैं, अपने देश में रहना उनके लिए बहुत बड़ी समस्या है. आप ही बताएं हम उनको शरण क्यों नहीं देंगे?"

उनके पास बैठी मिजो नेशनल फ्रंट की महिला शाखा की अध्यक्ष के. लालरेंग्पुई का जन्म भी म्यांमार के एक गांव में हुआ था.

वह बताती हैं, "पैतृक गांव और नदी के उस पार से भी बीते कुछ महीनों के दौरान सैकड़ों लोग मिजोरम आए हैं. हमारे संगठन ने उन तमाम लोगों के रहने और खाने का इंतजाम किया है."

म्यांमार

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मिजो नेशनल फ्रंट के मुख्यालय मिज़ो नाम रून के जिस कक्ष में वैन लालजाओमा के साथ हमारी बातचीत हो रही थी, उसी कमरे में दो दिन पहले उन्होंने म्यांमार के चार सांसदों के साथ बैठक की थी. यह बात खुद लालजाओमा ने भी बताई.

उस बैठक में इन तमाम सवालों पर विस्तार से चर्चा हुई थी कि म्यांमार से अब भी कितने लोग आ रहे हैं. किस रूट से आ रहे हैं और उनको किन शरणार्थी शिविरों में रखा जाएगा?

असल में मिज़ोरम सरकार म्यांमार से आने वाले किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं कर रही है.

मुख्यमंत्री जोरमथांगा का भी कहना था, "सिर्फ हमारे अपने होने के कारण ही नहीं, बल्कि मानवीय कारणों से भी मिज़ोरम सीमा पार से आने वालों को वापस नहीं भेजेंगे. मैं तो यहां तक कहूंगा कि भारत के लिए रोहिंग्या लोगों को भी वापस भेजना उचित नहीं है."

बीबीसी के शुभज्योति घोष से बातचीत करते मुख्यमंत्री जोरमथांगा

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शरणार्थी शिविर का जीवन

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इंडो-म्यांमार सीमा के करीब चम्फई शहर के पास ही जोटे गांव में इन शरणार्थियों के लिए एक शिविर खोला गया है. पूरे राज्य में ऐसे करीब डेढ़ सौ शिविर चल रहे हैं.

जोटे शिविर में म्यांमार से आने वाले करीब पांच सौ लोग रहते हैं. वहां पहाड़ों से घिरी हरी घाटी में एक टेक्निकल स्कूल बन रहा था. उस अधूरी बनी इमारत और उसके छात्रावासों में ही अब इन शरणार्थियों को शरण मिली है.

इन शरणार्थी शिविरों में रोजाना हजारों लोगों का भोजन तैयार हो रहा है. साथ ही चौथी कक्षा तक के बच्चों के लिए पढ़ने-लिखने का भी इंतजाम किया गया है. कई बच्चे सरकारी स्कूलों में भी जा रहे हैं.

जोटे शिविर में प्रवेश करते ही सामने स्कूल की अस्थाई इमारत से म्यांमार के बच्चों की समवेत स्वरों में ए बी सी डी पढ़ने की आवाज सुनाई देती है. उनको शरणार्थी शिक्षक ही पढ़ा रहे हैं, साथ ही स्थानीय मिजो शिक्षक भी हैं.

म्यांमार सीमांत स्थित जोखाउथार सीनियर सेकेंडरी स्कूल के शिक्षक रॉबर्ट जोरेमेलुएंगा कहते हैं, "फिलहाल यहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं में आधे से ज्यादा म्यांमार के हैं. वो इस देश की शिक्षा प्रणाली से अभ्यस्त नहीं हैं, हिंदी तो एकदम नहीं जानते. लेकिन हम लोग पूरी कोशिश कर रहे हैं कि वे इस प्रणाली में एडजस्ट हो सकें."

जोटे शिविर

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शरणार्थी किशोरों और युवाओं के दिन का अधिकांश समय सेपाक-टाकरो खेलने में बिताते हैं. यह अनूठा खेल कुछ हद तक वॉलीबॉल और कुछ हद तक फ़ुटबॉल का मिला-जुला रूप है. म्यांमार में लोकप्रिय इस खेल को मिजोरम में ज्यादा लोग नहीं जानते थे. लेकिन अब इन शरणार्थियों के कारण सेपाक-टाकरो के प्रति स्थानीय युवाओं में भी आकर्षण बढ़ रहा है.

शाम ढलते ही जोटे शिविर की सामुदायिक रसोई (कम्युनिटी किचन) में बड़ी-बड़ी देगचियों में चावल और दाल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो जाता है. इसके साथ ही हर परिवार की महिलाएं भी अलग से कुछ खाना पकाने में जुट जाती हैं. जंगल से चुनी गई लकड़ियों और खर-पतवार के जरिए आग जला कर कोई आलू भुन रही है तो कोई अंडा.

कुछ महिलाएं शाक-सब्जियों से ही एक वेजिटेबल सूप बना लेती हैं जिसे मिजोरम में बाई कहा जाता है. इसके साथ ही सिर की मालिश, बेंत से टोकरियां बनाने या फिर पास के छोटे से बगीचे में लगे टमाटर के पौधों की देखरेख का काम भी चलता रहता है. अलग देश में भी रोजमर्रा की दिनचर्या में खास अंतर नहीं आया है.

चम्फई हिल्स की हरी घाटी में नए ठिकाने पर इसी तरह शरणार्थियों के एक समूह का नया जीवन संग्राम शुरू हुआ है और स्थानीय मिज़ो लोगो की मदद से ही ऐसा संभव हुआ है.

म्यांमार

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ऐसा कब तक चलेगा?

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ईसाई-बहुल मिज़ोरम में चर्चों का संगठन बेहद ताकतवर है. इन शरणार्थियों को दो जून की रोटी मुहैया कराने में यह संगठन काफी मदद कर रहे हैं. साल्वेशन आर्मी या मेडिसिन्स सैन्स फ्रंटियर्स जैसे कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इन शिविरों में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं.

आइजॉल के चानमारी चर्च में प्रार्थना की रिहर्सल में जुटे युवक-युवतियों के एक समूह ने एक स्वर में कहा, "इन शरणार्थियों का मिज़ोरम में हमेशा स्वागत है, मिज़ो लोगों में उनके प्रति हमेशा सहानुभूति रहेगी."

चर्च क्वायर के लीड सिंगर डेविड का तो स्पष्ट कहना था, "आप यह जान लें कि मिजो लोग इन शरणार्थियों को खिलाने में कभी दुविधा नहीं महसूस करेंगे. डेढ़ साल तो बीत गए, जब तक ज़रूरत होगी तब तक हम उनके भोजन पहुंचाते रहेंगे."

वहीं खड़ी एमिली और उनकी मित्र एलिज़ाबेथ ने कहा, "आखिर यह सब तो मनुष्य हैं और ईश्वर की निगाह में हर मनुष्य समान है."

मिज़ोरम

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मिज़ोरम के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठन यंग मिजो एसोसिएशन यानी वाईएमए इन शरणार्थी शिविरों के संचालन में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है. हजारों लोगों के लिए इतने शिविरों के संचालन के लिए काफी तादाद में लोगों की जरूरत पड़ती है. इनका बड़ा हिस्सा वाईएमए ही मुहैया करा रहा है.

लेकिन इस तरह कब तक चलाया जा सकेगा, यह सवाल उसे भी चिंता में डाल रहा है. चम्फई जिले में वाईएमए के मुख्य संयोजक लालछुआनोमा ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास शरणार्थियों की मदद करने लायक अपना कोई धन नहीं है. हम इसके लिए पूरी तरह आम लोगों से मिलने वाले दान पर निर्भर हैं."

उनका कहना था कि मिज़ो लोग पैसे, कपड़े औऱ खाद्य सामग्री देकर जिस तरह मदद कर रहे हैं, उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. उनकी मदद से ही अब तक इन शिविरों को चलाना संभव हो सका है. लेकिन हमें सच में यह नहीं पता कि आगे क्या होगा. उनकी आवाज़ से अनिश्चितता साफ झलक रही थी.

कम्युनिटी किचन में खाना बनाते लोग

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शरणार्थी के तौर पर मान्यता क्यों नहीं

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एक और बड़ी समस्या यह है कि केंद्र सरकार म्यांमार से आने वाले इन लोगों को अब तक शरणार्थी के तौर पर मान्यता नहीं दे रही है. नतीजतन उनकी पूरी जिम्मेदारी मिजोरम के कंधों पर आ गई है.

मुख्यमंत्री जोरमथांगा कहते हैं, "मैंने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से एकाधिक बार कहा है कि इन लोगों को मानवीय सहायता देना ज़रूरी है. मैं हर केंद्रीय मंत्री से मुलाकात होने पर उसे यही बात कहता हूं."

हालांकि मुख्यमंत्री यह भी मानते हैं कि औपचारिक तौर पर म्यांमार के इन नागरिक को शरणार्थी का दर्जा देने में केंद्र के समक्ष कुछ समस्या या मजबूरियां हैं.

लेकिन उनका सवाल है कि क्या इस वजह से हम उनके सिर पर एक छत और खाने के लिए थोड़ा सामान नहीं मुहैया करा सकते?

दिल्ली की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए जोरमथांगा कहते हैं, "किसी भी सभ्यता से इतना मानवीय आचरण तो प्रत्याशित ही है. हम संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर करें या नहीं, इतना तो कर ही सकते हैं, है ना?"

एनजीओ कार्यकर्ता लालचुआनोमा

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लेकिन हकीकत यह है कि सीमा पार से आने वाले इन 30-32 हजार शरणार्थियों के लिए केंद्र सरकार ने आज तक एक पैसा भी खर्च नहीं किया है. इन शरणार्थी शिविरों के आस-पास संयुक्त राष्ट्र के कार्यकर्ताओं को भी फटकने की अनुमति नहीं दी गई है. यही वजह है कि इन लोगों को अब तक केंद्र सरकार या संयुक्त राष्ट्र की ओर से कोई शरणार्थी पहचान पत्र भी नहीं मिला है.

मिज़ोरम सरकार ने इन लोगों को एक सामयिक पहचान पत्र दिया है. हालांकि उसमें किसी सरकारी सहायता की गारंटी नहीं है. उसमें फ़ोटो और संबंधित व्यक्ति के नाम के साथ लिखा गया है कि म्यांमार का अमुक नागरिक अस्थाई तौर पर मिजोरम में रह रहा है.

आइजॉल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले जे. डाउंगेल ने बीबीसी से कहा कि असम में इन लोगों को शरणार्थी का दर्जा देने में दिल्ली को बेहद कूटनीतिक और आर्थिक दिक्कत है.

उनका कहना था, "भारत को अब यह महसूस हो गया है कि म्यांमार को बायकॉट करने से उसे कोई कूटनीतिक या आर्थिक फायदा नहीं होगा. उल्टे म्यांमार के भीतर कालादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट या कालादान पनबिजली परियोजना जैसी जिन परियोजनाओं में भारत ने करोड़ों रुपये का निवेश किया है, वो और अनिश्चित हो जाएंगी."

डाउंगेल ने कहा, "उधर, चीन चूंकि म्यांमार के रखाइन प्रांत तक घुस आया है, म्यांमार में लोकतंत्र रहे या सैन्य शासन, सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत म्यांमार को नाराज करने का ख़तरा नहीं मोल ले सकता."

शर्णार्थी

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बर्मा की घास ज्यादा हरी है...

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म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों में से ज्यादातर ने रखाइन लौटने की उम्मीद लगभग छोड़ दी है, लेकिन चिन स्टेट के ये बाशिंदे फ़िलहाल उम्मीद का दामन छोड़ने को तैयार नहीं है. उल्टे यह लोग रोज अपने देश लौटने का सपना देखते हैं.

मुख्यमंत्री जोरमथांगा कहते हैं कि यह सोचने की कोई वजह नहीं है कि ऊवर्र और संपदा से भरपूर म्यांमार छोड़ कर यह शरणार्थी स्थाई तौर पर मिज़ोरम में रहना चाहेंगे.

उनका कहना था, "वहां की घास ज्यादा हरी है. बर्मा के खेतों में काफी धान उपजता है. मिट्टी खोदने पर कभी सोना मिलता है तो कभी दूसरी बेशकीमती रत्न. वहां इन शरणार्थियों की काफी संपत्ति, जमीन और मकान भी हैं."

मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने चिन स्टेट के ग्रामीण इलाको में कई जगह गहरे गड्ढे देखे हैं. पूछने पर पता चला कि गांव के लोग वहां खुदाई कर पेट्रोल निकालते हैं. तो आप यह सोचें कि सोने के उस देश को छोड़ कर यह लोग यहां आने पर क्यों मजबूर हो रहे हैं?

म्यांमार

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जोरमथांगा को भरोसा है कि म्यांमार में परिस्थिति कुछ शांत होने या सेना का अभियान सिथिल पड़ते ही इन शरणार्थियों में से ज्यादातर अपने देश लौटना शुरू करेंगे. लेकिन उनको इस बात का कोई अनुमान नहीं है कि ऐसा कब तक हो सकता है.

जोखाउथर शिविर में एक शरणार्थी सेए सिन ने कह ही दिया, "फिलहाल लौटने में डर जरूर लग रहा है. लेकिन म्यांमार में लोकतंत्र बहाल होते ही मैं अपने देश लौट जाऊंगा. आप देख लेना."

उनको म्यांमार याद आ रहा है. मिज़ोरम के लोगों के स्वागत और प्यार से अभिभूत होने के बावजूद वे म्यांमार को भला कहां भूल सके हैं?

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