दिल्ली की रोहिंग्या बस्ती की आंखों देखी: डर और तनाव के साये में गुज़रती जिंदगी

मदनपुर खादर की रोहिंग्या बस्ती
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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कच्ची उबड़-खाबड़ धूल-धुसरित सड़क के किनारे बनी झुग्गियां. खेलते रोते अधनंगे बच्चे, उदास बैठी बुज़ुर्ग महिलाएं, सवालों पर चुप्पी साधे चेहरे और उनके चेहरों पर भिनभिनाती मक्खियां.

ये दिल्ली के मदनपुर खादर इलाक़े में म्यांमार से भागकर आए रोहिंग्या लोगों की बस्ती है. रोहिंग्या अपने आप को भारत में शरणार्थी मानते हैं, लेकिन भारत सरकार उन्हें 'रोहिंग्या अवैध विदेशी' कहती है.

बीते तीन दिन से रोहिंग्या चर्चा में हैं. केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक ट्वीट कर भारत सरकार के रोहिंग्या लोगों को दिल्ली में फ़्लैट देने की घोषणा की.

हिंदूवादी संगठनों ने इसका विरोध किया तो गृह मंत्रालय ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि 'रोहिंग्या अवैध विदेशियों' को फ़्लैट नहीं दिए जा रहे हैं.

दो अलग-अलग मंत्रालयों के अलग-अलग बयानों ने रोहिंग्या लोगों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है.

रोहिंग्या बस्ती में लोग बेहद अमानवीय हालात में रहते हैं
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अमानवीय हालात में रहते रोहिंग्या

दिल्ली की इस बस्ती में वो अमानवीय हालात में रह रहे हैं. दस बाइ दस फ़ीट की झुग्गी में 6-7 लोगों का परिवार रहने को मजबूर है. यहां कोई मूलभूत सुविधा नहीं है. ये लोग जहां नहाते हैं वहीं खाते और सोते भी हैं.

मदनपुर खादर की रोहिंग्या बस्ती में अब रिपोर्टरों का तांता लगा है और उनके सवाल इन लोगों की परेशानी को और बढ़ा रहे हैं.

अब्दुल करीम का परिवार भी रोहिंग्या बस्ती की एक झुग्गी में रह रहा है. अब्दुल करीम ओपन यूनिवर्सिटी से दसवीं की पढ़ाई कर रहे हैं.

करीम कहते हैं, "मैं बहुत छोटा था जब हम म्यांमार से अपनी जान बचाकर भागे थे. कोई भी इंसान ये नहीं चाहता कि उसे अपने देश को छोड़ना पड़े. हमने बहुत मुश्किल हालात में अपना देश छोड़ा."

करीम अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं
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करीम कहते हैं, "अपना देश होना बहुत गर्व की बात होती है. आज हम दर-दर भटक रहे हैं. हमारी बस जान बची, हमारे पास कुछ नहीं बचा. यहां हम जितने भी रोहिंग्या लोग हैं, वो सब अपने देश वापस लौटना चाहते हैं. हम शरणार्थी की तरह रह रहे हैं, जिस दिन हमारे देश में माहौल ठीक होगा, हम ख़ुशी-ख़ुशी वहां लौट जाएंगे."

करीम की छोटी बहन आठवीं में पढ़ती हैं और डॉक्टर बनने का ख़्वाब देखती हैं. करीम ख़ुद पढ़ना चाहते हैं ताकि वो एक सुरक्षित भविष्य बना सकें.

करीम कहते हैं, "मैं पढ़ना चाहता हूं, आगे बढ़ना चाहता हूं, एक सामान्य ज़िंदगी जीना चाहता हूं, लेकिन मुझे अपना कोई भविष्य दिखाई नहीं देता क्योंकि मेरा कोई देश नहीं हैं."

रोहिंग्या

मदनपुर खादर की इस झुग्गी में क़रीब ढाई सौ रोहिंग्या लोग रहते हैं. यहीं रहने वाले सलीम बताते हैं, "यहां ढाई सौ लोग बहुत मुश्किल में रहते हैं. यहां ना पानी आता है, ना शौचालय हैं. दस बाइ दस फ़ुट की झुग्गी है, उसी में खाना है उसी में नहाना है. बारिश आती है तो ऊपर से पानी टपकता है और नीचे से पानी भर जाता है."

सलीम कहते हैं, "सरकार हमें हिरासत केंद्र में रखने की बात कर रही है. हम जिन हालात में रह रहे हैं वो क़ैद से कम नहीं हैं. हम यहां डेढ़ साल से रह रहे हैं. यहां एक दिन रहना भी मुश्किल है. बीमारियां फैल रही हैं. गंदा पानी पीने से महिलाओं को पथरी हो रही है. बच्चे बीमार हैं."

यहां रहने वाले रोहिंग्या पुरुष आसपास मज़दूरी करते हैं और महिलाएं घरों में साफ़-सफ़ाई का काम करती हैं.

मरियम के लिए अपने बच्चों का पेट भरना मुश्किल हो रहा है
इमेज कैप्शन, मरियम के लिए अपने बच्चों का पेट भरना मुश्किल हो रहा है

'हमारे पास कुछ नहीं है'

मरियम 36 साल की हैं और तीन बच्चों की मां हैं. वो म्यांमार से जान बचाकर बांग्लादेश आई थीं जहां एक स्थानीय व्यक्ति से उन्होंने शादी की. मरियम के बांग्लादेशी पति ने कुछ साल बाद उन्हें छोड़ दिया. वो अपनी बेटी को लेकर अवैध तरीके से भारत आ गईं.

मरियम कहती हैं, "यहां रोहिंग्या कैंप में मेरी फिर शादी हुई. अब तीन बच्चे हैं, लेकिन हमारे पास कुछ नहीं है."

मरियम पहले सिलाई करती थीं, लेकिन ख़र्च चलाने के लिए उन्हें अपनी सिलाई मशीन बेचनी पड़ी.

मरियम कहती हैं, "भारत में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थी रह रहे हैं तो फिर रोहिंग्या अलग क्यों हैं? जब तक हमें हमारा देश वापस नहीं मिलता सरकार हमें यहां रहने दे."

रोहिंग्या बच्चे
इमेज कैप्शन, रोहिंग्या बच्चे स्थानीय स्कूलों में शिक्षा ले रहे हैं

'हमें अब यहां डर लग रहा है'

इसी कैंप में रहने वाले अनवर इन दिनों डरे हुए हैं. अनवर कहते हैं, "हम जान बचाकर यहां आए थे और सोचा था कि भारत में हमें कुछ सुकून मिलेगा. लेकिन अब यहां हालात हमारे लिए ख़राब होते जा रहे हैं. हम रोहिंग्या लोगों को बहुत बुरे नज़रिए से देखा जा रहा है. रोहिंग्या लोगों को लेकर इंडिया में बहुत तरह की बातें हो रही हैं. अब हमें यहां भी डर लग रहा है."

रोहिंग्या शरणार्थी और रोहिंग्या लोगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता अली जौहर कहते हैं कि भारत में क़रीब 18 हजार रोहिंग्या लोग यूएनएचआरसी का कार्ड लेकर रहते हैं.

अली जौहर कहते हैं, "शरणार्थियों के अपने अधिकार होते हैं और रोहिंग्या लोगों को भारत में सुरक्षा और सम्मान का हक़ है, लेकिन यहां उन्हें दयाभाव से देखा जाता है."

अली जौहर के मुताबिक़, बीते दो-तीन साल से भारत में रोहिंग्या लोगों के प्रति जो नज़रिया बदला है उसे लेकर रोहिंग्या शरणार्थियों में डर और दहशत है.

मदनपुर खादर की बस्ती में रोहिंग्या लोग
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लौट कर बांग्लादेश जा रहे 'रोहिंग्या'

अली जौहर कहते हैं, "भारत सरकार के दो रोहिंग्या लोगों को उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ निर्वासित करने के बाद से भारत में रह रहे रोहिंग्या यहां से वापस बांग्लादेश जा रहे हैं. पिछले एक साल में क़रीब दो हजार रोहिंग्या शरणार्थी वापस लौटे हैं."

म्यांमार में 25 अगस्त 2017 को रोहिंग्या लोगों के ख़िलाफ़ सुनियोजित हमले शुरू हुए थे और देश की बड़ी रोहिंग्या आबादी को देश छोड़कर भागना पड़ा था.

दुनियाभर में रह रहे रोहिंग्या लोग इस दिन रोहिंग्या नरसंहार दिवस मनाते हैं और कार्यक्रम करते हैं.

अली जौहर कहते हैं, "हम भारत में इस दिन प्रेस वार्ता करते रहे हैं. लेकिन इस साल हमें आयोजन के लिए कोई जगह नहीं मिल रही है. सभी संस्थाएं इतनी डरी हुई हैं कि कोई रोहिंग्या लोगों को एक हॉल तक नहीं देना चाहता."

रोहिंग्या बस्ती

म्यांमार में क्या दशा है रोहिंग्या की

क़रीब 5.4 करोड़ की आबादी वाले म्यांमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या उत्पीड़न का शिकार रहे हैं.

साल 2012 और 2017-18 में रोहिंग्या लोगों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और म्यांमार के रखाइन प्रांत में रहने वाली रोहिंग्या आबादी को देश छोड़कर भागना पड़ा.

फ़िलहाल रोहिंग्या शरणार्थी दुनियाभर में फैले हैं और इनकी सबसे बड़ी आबादी बांग्लादेश में है.

रोहिंग्या शरणार्थी

भारत में कितने रोहिंग्या

भारत के कई शहरों में भी रोहिंग्या शरणार्थी हैं. भारत में कितने रोहिंग्या हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है.

भारत में यूएनएचसीआर ने रोहिंग्या लोगों को क़रीब 18 हज़ार पहचान पत्र जारी किए हैं.

वहीं हिंदूवादी समूहों का आरोप है कि भारत में बड़ी तादाद में अवैध रोहिंग्या प्रवासी अपनी पहचान छुपाकर रहते हैं.

केंद्र सरकार का रवैया भी रोहिंग्या लोगों के प्रति सख़्त रहा है. केंद्रीय गृहमंत्री अपने बयानों में कह चुके हैं कि वो भारत के किसी भी हिस्से में रोहिंग्या लोगों को नहीं रहने देंगे.

क्या है ताज़ा विवाद?

रोहिंग्या बस्ती

भारत ने रोहिंग्या लोगों को शरणार्थी का दर्जा भी नहीं दिया है. जम्मू में रोहिंग्या लोगों के एक समूह को हिरासत केंद्र में रखा गया है.

दिल्ली में भी अवैध विदेशियों को रखने के लिए दो हिरासत केंद्र हैं. एक सेवा सदन लामपुर दिल्ली में है और दूसरा शहज़ादा बाग़ सराय रोहिल्ला में.

मार्च 2021 में दिल्ली सरकार के गृह विभाग ने नई दिल्ली नगर निगम के चेयरमैन को पत्र लिखकर बक्करवाला गांव में बने ईडब्ल्यूएस फ्लैट को रेस्ट्रिक्शन सेंटर (हिरासत केंद्र) बनाने की मांग करते हुए पत्र लिखा था.

बुधवार को भारत के केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री और पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ट्विटर कर घोषणा की थी कि रोहिंग्या शरणार्थियों को बक्करवाला गांव में आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग के लिए बनाए गए फ़्लैट दिए जाएंगे.

वीडियो कैप्शन, इस समय इन पर सबसे बड़ा ख़तरा कोरोना वायरस है.

हरदीप सिंह पुरी ने ये भी कहा था कि रोहिंग्या शरणार्थियों को पानी-बिजली के अलावा सभी मूलभूत सुविधाएं और चौबीस घंटे दिल्ली पुलिस की सुरक्षा दी जाएगी.

हालांकि बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि रोहिंग्या लोगों को फ़्लैट नहीं दिए जा रहे हैं. उन्हें हिरासत केंद्र में ही रखा जाएगा.

अली जौहर कहते हैं, "सरकार ने हमें फ़्लैट देने के बारे में सोचा, ये अच्छी बात है. लेकिन अगर हमें हिरासत केंद्रों में रखने पर विचार किया जा रहा है तो इससे बुरा रोहिंग्या लोगों के लिए कुछ नहीं होगा."

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