रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के इस द्वीप को बता रहे हैं ‘एक बड़ी जेल’

- Author, मौज़्ज़म हुसैन और स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
दिलारा जब बांग्लादेशी तट से निकली थीं, तब उन्होंने मलेशिया में एक नई ज़िंदगी के ख़्वाब देखे थे.
वो जिस नाव पर सवार थीं, उस पर सैकड़ों लोग भेड़ बकरियों की तरह भरे हुए थे. कई दिन के सफ़र के बाद इन लोगों को जहाँ ले जाया गया, वो एक अलग ही दुनिया निकली.
ये वो जगह नहीं थी जहाँ इन लोगों ने अपने परिवारों को छोड़ा था.
बल्कि इन्हें लेकर आये लोगों ने इस पूरे समूह को एक ऐसे द्वीप पर लाकर छोड़ दिया जो बंगाल की खाड़ी में कहीं स्थित है और जहाँ से भाग पाना नामुमकिन है.
दिलारा जो एक अविवाहित युवती हैं और जिन्हें शाम होने के बाद अपने कमरे से निकलने में डर लगता है, उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मुझे नहीं पता कि मुझे यहाँ कब तक रहना होगा. मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं बचा है. मुझे यहीं बूढ़ा होना होगा और मैं शायद अब यहीं मरूंगी."

एक लाख रोहिंग्या शरणार्थियों में दिलारा उन कुछ पहले लोगों में थीं, जो भासन चार पहुँचे.
भासन चार समंदर के बीच, ज़मीन का एक टुकड़ा है जिसका आकार 40 वर्ग किलोमीटर बताया जाता है. इस जगह को अभी तक केवल मछुआरे ही थोड़ी देर रुककर आराम करने के लिए इस्तेमाल करते थे.

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बांग्लादेश प्रशासन ने कॉक्सेस बाज़ार में ज़रूरत से ज़्यादा भरे हुए शरणार्थी कैंपों की समस्या का यह समाधान निकाला है.
कॉक्सेस बाज़ार लगभग दस लाख रोहिंग्या शरणार्थियों का घर है. इनमें से ज़्यादातर लोग म्यांमार (बर्मा) में हुए नस्लीय हमलों से जान बचाकर साल 2017 में यहाँ आये थे. संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमार की सेना द्वारा कराये गए इन हमलों को 'नस्लीय नरसंहार का स्पष्ट उदाहरण' घोषित किया था.
मगर ये शरणार्थी कैंप, जिन्हें रोहिंग्या मुसलमानों ने कुछ वर्ष पहले अपना घर बनाया, बांग्लादेश प्रशासन के अनुसार अब अपराध का गढ़ बन चुके हैं.
भासन चार जिसे 350 मिलियन डॉलर ख़र्च करके बांग्लादेश ने शरणार्थियों के लिए तैयार किया है, उसे एक नई शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है. यह एक द्वीप है जो समुद्र से 15 साल पहले ऊपर आया है.
जिन शरणार्थियों की बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत हुई, वो एक अलग ही कहानी बताते हैं.
उन्होंने बताया कि यह एक ऐसी जगह है जहाँ कोई काम नहीं है. बहुत कम सुविधाएं हैं और एक अच्छे भविष्य की उम्मीद भी ना के बराबर है.
वो कहते हैं कि जो लोग इस जगह से भागने की कोशिश करते हैं, उन्हें पकड़कर पीटा जाता है. साथ ही यहाँ रहने वाले शरणार्थी मानसिक तनाव बढ़ने की वजह से एक-दूसरे के साथ झगड़ने लगे हैं. स
बसे भयावह बात ये है कि यह द्वीप समुद्र से सिर्फ़ दो मीटर यानी सिर्फ़ छह फ़ीट की ऊंचाई पर है और लोगों में डर है कि कोई भी बड़ा तूफ़ान उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है.

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बीबीसी को पिछले साल इस द्वीप का दौरा करने का मौक़ा मिला था. हालांकि, इस समय ये बताना मुश्किल है कि वहाँ क्या हो रहा होगा.
भासन चार द्वीप बांग्लादेश की मुख्यभूमि से 60 किलोमीटर दूर है और यहाँ किसी भी पत्रकार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और मानवाधिकार संगठनों को स्वतंत्र रूप से जाने की अनुमति नहीं है.
इस रिपोर्ट में लोगों की गोपनीयता बनाये रखने के लिए उनके नाम बदल दिये गए हैं.
'बहुत वीरान जगह'
हलीमा जब अपने परिवार के साथ दिसंबर में भासन चार पहुँची, तो वो गर्भावस्था के अंतिम चरण में थीं.
जिस रात वो यहाँ पहुँचीं, उसे याद करते हुए वे बताती हैं कि "मैं सोच रही थी कि हम यहाँ ज़िंदा कैसे रहेंगे. यह एक बिल्कुल वीरान जगह है, जहाँ हमारे अलावा कोई नहीं है."
"इस अकेलेपन का अहसास तब और भी बढ़ गया, जब दूसरे ही दिन मुझे लेबर-पेन होने लगा और वहाँ डॉक्टर या नर्स के मिल पाने की कोई संभावना नहीं थी. मैं इससे पहले भी बच्चों को जन्म दे चुकी हूँ, पर इस बार यह बहुत भयानक था. मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती कि मुझे कितना दर्द हुआ."
उनके पति इनायत ने उसी ब्लॉक में रह रही एक रोहिंग्या महिला से मदद माँगी जिन्हें आया के तौर पर काम करने का थोड़ा अनुभव था.
हलीमा बताती हैं कि मेरी मदद ऊपरवाले ने की. उनकी एक बेटी हुई जिसका नाम उन्होंने फ़ातिमा रखा.
इनायत ने एक नई ज़िंदगी की उम्मीद में अपने परिवार को बिना बताये इस द्वीप पर आने की सहमति दे दी थी.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने हमें वादा किया था कि हर परिवार को ज़मीन का टुकड़ा (प्लॉट) मिलेगा. गाय-भैंसें मिलेंगी और व्यापार शुरू करने के लिए एक लोन भी मिलेगा.
हालांकि, हक़ीक़त इससे बहुत अलग थी. फिर भी हलीमा ख़ुश हैं कि उनके पास साफ़ पानी, बिस्तर, गैस-चूल्हा और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं हैं.

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सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि यहाँ रहने वाले लोग बुनियादी खान-पान की चीज़ों के अलावा कुछ और नहीं ख़रीद सकते.
भासन चार में रहने वाले परिवारों को चावल, दाल और तेल जैसी चीज़ें तो दी जाती हैं, पर खाने का दूसरा सामान जैसे सब्ज़ियाँ, मछली और मीट उन्हें ख़रीदना पड़ता है.
भासन चार में कोई बाज़ार नहीं है, पर कुछ बांग्लादेशियों ने यहाँ दुकानें खोली हैं.
मुख्य भूमि तक वापस जाना नामुमकिन है क्योंकि यहाँ फेरी (नाव से आने जाने) की कोई सुविधा नहीं है और नौसेना शरणार्थियों को सिर्फ़ लाने का काम करती है.
हलीमा कहती हैं कि हम ग़रीब लोग हैं और हमारे पास खाना या दूसरी चीज़ें ख़रीदने का कोई ज़रिया नहीं है.


विरोध प्रदर्शन भी हुए
इस द्वीप पर फ़रवरी में हुए पहले विरोध-प्रदर्शन का कारण भोजन ही था.
बीबीसी को मिले कुछ वीडियो में रोहिंग्या महिलाओं और पुरुषों को डंडा लेकर चिल्लाते हुए, दौड़ते हुए देखा जा सकता है. हालांकि, बांग्लादेशी अधिकारियों ने इस घटना को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी.
बांग्लादेश में शरणार्थी कैंपों का प्रबंधन देखने वाले कमीशन (आरआरआरसी) के प्रमुख शाह रिज़वान हयात कहते हैं कि "यह प्रदर्शन नहीं था."
पर शरणार्थियों के अनुसार, भासन चार में रह रहे लोगों में बेचैनी बढ़ रही है और कुछ लोग यहाँ से जाने के लिए अपनी जान भी दाँव पर लगा रहे हैं.
भासन चार में रहने वाले शरणार्थी सलाम ने बताया कि "बहुत सारे लोग इस द्वीप से भागने की कोशिश कर चुके हैं. मेरी जानकारी में कम से कम तीस लोग अब तक यह द्वीप छोड़कर जा चुके हैं. मैंने एक घटना के बारे में सुना है, जिसमें पाँच लोग इस द्वीप से भागने की कोशिश करते हुए पकड़े गए और उन्हें पुलिस कैंप ले जाया गया जहाँ उनकी पिटाई हुई."

शरणार्थियों के ख़िलाफ़ बांग्लादेशी पुलिस द्वारा की गई हिंसा का यह एकमात्र आरोप नहीं है.
ह्यूमन राइट्स वॉच ने बताया है कि भासन चार में बच्चों को अपनी तयशुदा जगह से बाहर निकलने के लिए सज़ाएं दी गईं.
12 अप्रैल को एक बांग्लादेशी नाविक ने कथित तौर पर चार बच्चों को पीवीसी पाइप से पीटा क्योंकि वो अपने कमरे को छोड़कर किसी दूसरे कमरे में रह रहे बच्चों के साथ खेलने के लिए चले गए थे.
इनायत बताते हैं कि उन्होंने इस घटना के बारे में कैंप में रहने वाले दूसरे लोगों से सुना था.

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सलाम कहते हैं कि "शरणार्थियों में तनाव की वजह से गुस्सा बढ़ रहा है. शरणार्थी कैंपों में रोज़ लड़ाई होती है. अगर आप मुर्गियों को दड़बों में बंद कर दें और उन्हें खाना ना दें, तो क्या होगा? वो आपस में लड़ाई करने लगेंगी."
नौसेना जो इस कैंप में शेल्टर बनाने के लिए ज़िम्मेदार है, वो किसी भी तरह के अत्याचार और उत्पीड़न से इनकार करती है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि वो इन आरोपों की पुष्टि नहीं कर पाये हैं. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र चाहता है कि इस कैंप का प्रबंधन नौसेना की जगह नागरिकों को दे दिया जाये ताकि यहाँ सब कुछ सौहार्द और सुचारू रूप से हो.
उधर बांग्लादेश की सरकार ने यह वादा किया है कि भासन चार में रहनेवाले 18,400 शरणार्थियों और दूसरे शरणार्थी जो यहाँ जल्दी आकर बसने वाले हैं, उन्हें कमाई करने का ज़रिया देंगे.
सरकार ने कहा है कि वो 40 से भी ज़्यादा स्थानीय ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के आवेदन पर विचार कर रही है.

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'एक बड़ी जेल'
हलीमा बताती हैं कि वे चीज़ों के बेहतर होने का इंतज़ार करते करते थक गई हैं.
उन्होंने बर्मा वापस लौटने का विचार तो छोड़ ही दिया है, जहाँ रोहिंग्या मुसलमानों के साथ दशकों से भेदभाव होता रहा है, पर वे भासन चार में भी रहना नहीं चाहतीं.
वो कहती हैं, "मैं कभी ऐसी जगह पर नहीं रही. यहाँ चारों तरफ समंदर है और हम यहाँ फंसे हुए हैं. हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है."
वो युवा शरणार्थी महिला दिलारा जो मलेशिया जाने का प्रयास कर रही थीं, बताती हैं कि वो डरी हुई हैं और अकेली हैं, पर वो कॉक्सेस बाज़ार के शरणार्थी कैंप में रह रहे अपने माता-पिता से संपर्क नहीं करना चाहतीं. वो नहीं चाहतीं कि उनके माता-पिता भी उनकी ही तरह परेशान रहें.
बीबीसी से जितने भी शरणार्थियों की बात हुई, उन सभी ने बताया कि अगर मौक़ा मिले तो वो मुख्य भूमि पर वापस जाना चाहेंगे.
इनायत ने एक ही वाक्य में अपनी परिस्थिति बयां की.
उन्होंने कहा, "अगर आप अपने परिवार के साथ एक बड़ी जेल में रहना चाहते हैं, तो यह द्वीप आपके लिए ही बना है."
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