चौधरी हरमोहन सिंह यादव कौन हैं जिनकी पुण्यतिथि पर दिया प्रधानमंत्री मोदी ने संबोधन?

डॉ हरमोहन सिंह यादव
    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से

सोमवार सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर जानकारी दी कि वो "शाम 4.30 बजे देश के सम्मानित नेता और पूर्व सांसद हरमोहन सिंह यादव जी की 10वीं पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भाग लेंगे."

उन्होंने कहा कि "हरमोहन जी ने अपना जीवन देश सेवा में समर्पित कर दिया और हमेशा किसानों, गरीबों, पिछड़ों और वंचितों के लिए कार्य किया."

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शाम को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "उन्होंने ग्राम प्रधान से लेकर राज्यसभा तक का सफर तय किया और राजनीति के शिखर तक का सफर तय किया. एक समय मेहरबान सिंह का पुरवा से यूपी की राजनीति को दिशा मिलती थी. हरमोहन सिंह की जी की प्राथमिकता समाज ही रहा. उन्होंने समाज के लिए और कुशल नेतृत्व तैयार करने के लिए काम किया."

गौरतलब है कि पीआईबी में छोटी से प्रेस विज्ञप्ति में इस बात का भी ज़िक्र है कि "1984 के सिख-विरोधी दंगों के दौरान कई सिखों के जीवन की रक्षा करने में वीरता का प्रदर्शन के लिए श्री हरमोहन सिंह यादव को 1991 में शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था."

इसका ज़िक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करते हुए कहा, "उनका फौलादी व्यक्तित्व हमने 1984 में भी देखा. हरमोहन सिंह यादव जी ने ना केवल सिख संहार के खिलाफ राजनीतिक स्टैंड लिया. बल्कि सिख भाई बहनों की रक्षा के लिए वो सामने आकर के लड़े. और अपनी जान पर खेलकर ना जाने कितने सिख परिवारों की जान बचाई. देश ने भी उनके नेतृत्व को पहचाना और उन्हें शौर्य चक्र दिया गया."

आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इन दिनों कानपुर में हुए 1984 के सिख-विरोधी दंगों की जांच में जुटी हुई है और सरकार द्वारा बनाई गयी एसआईटी ने हाल ही के दिनों में 36 साल बाद दो दर्जन से अधिक अभियुक्तों की गिरफ्तारियां की है.

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इमेज स्रोत, Ch Sukhram singh Yadav Facebook

समाजवाद के लिए क्या था चौधरी हरमोहन सिंह यादव का योगदान?

चौधरी हरमोहन सिंह यादव (18 अक्टूबर, 1921 - 25 जुलाई, 2012) यादव समुदाय के कद्दावर नेता थे. उनका जन्म कानपुर के 'मेहरबन सिंह का पूर्वा' गांव में हुआ था और 31 साल की उम्र में उन्होंने राजनीति में कदम रखा.

पीआईबी की प्रेस रिलीज़ में संक्षिप्त में लिखा गया कि, "हरमोहन सिंह यादव लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और उन्होंने एमएलसी, विधायक, राज्यसभा सदस्य और 'अखिल भारतीय यादव महासभा' के अध्यक्ष के रूप में विभिन्न पदों पर कार्य किया. उन्होंने अपने बेटे सुखराम सिंह की मदद से कानपुर और इसके आसपास कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी."

कानपुर की बिठूर विधानसभा क्षेत्र से 2012 से 2017 तक समाजवादी पार्टी के विधायक रहे मुनींद्र शुक्ला हरमोहन सिंह यादव के करीबी रहे हैं. उनके बारे में बताते हैं कि "चौधरी साहब शुरू से ही समाजवादी रहे हैं. और पहले चौधरी चरण सिंह जी के साथ थे. चौधरी चरण सिंह जी जब लोकदल से लेकर जनता पार्टी के साथ रहे तो चौधरी चरण सिंह जी के साथ रहे."

मुनींद्र शुक्ला कहते हैं कि "हरमोहन सिंह जी ने अपने राजनीतिक करियर ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ने से किया था. और फिर ज़िला पंचायत के सदस्य रहे, पार्षद रहे, और उसके बाद तीन बार एमएलसी रहे. उसके बाद मुलायम सिंह के साथ समाजवादी पार्टी को बनाने में हरमोहन सिंह ने पूरे प्रदेश में जाकर सहयोग किया. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गठन में उनका अहम सहयोग था. इसी के बाद दो बार मुलयाम सिंह नेता जी ने उनको राज्यसभा भेजा. एक बार मुलायम सिंह ने भेजा और एक बार राष्ट्रपति द्वारा नामित होने पर राज्यसभा पहुंचे. क्योंकि 1984 के सिख दंगों में हरमोहन सिंह ने सिखों की बहुत मदद की थी जिसके लिए उनको शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था."

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क्यों दे रहे हैं प्रधानमंत्री चौधरी हरमोहन सिंह को सम्मान?

भाजपा हाल ही में चौधरी हरमोहन सिंह यादव के परिवार को अपने करीब लाने में कामयाब हुई है. कुछ दिन पहले ही उनके पोते मोहित यादव को पार्टी ने सदस्य बनाया.

लेकिन इसे बेहतर समझाते हए कानपुर से दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार अंजनी निगम कहते हैं, "चौधरी हरमोहन सिंह यादव का परिवार है. इनका यादव बेल्ट में दबदबा शुरू से कायम है. दूसरी चीज़ ये है कि चौधरी हरमोहन सिंह के बड़े भाई चौधरी रामगोपाल यादव का यादव बिरादरी पर असर ऐसा था कि वो जो कह दें वही सही है, ये माना जाता था. और वही (रामगोपाल यादव) ही चौधरी हरमोहन सिंह को राजनीति में लाए और उनको ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ाया."

तो क्या जिस दिन द्रौपदी मुर्मू देश की राष्ट्रपति की शपथ ले रही हैं, उस दिन चौधरी हरमोहन सिंह का सम्मान करने का कोई सांकेतिक महत्व है?

इस बारे में अंजनी निगम तुलना करते हैं, "जैसे द्रौपदी मुर्मू पार्षद से राष्ट्रपति के पद पर पहुंची हैं. वैसे ही चौधरी हरमोहन सिंह भी ग्राम प्रधान से सर्वोच्च सदन राज्यसभा तक पहुंचे. बीजेपी ने जैसे द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया, क्योंकि वह आदिवासी महिला हैं, आदिवासी वोट बैंक को मजबूत किया. वैसे ही ओबीसी वोट बैंक खासकर यादव वोटों को मजबूत करने के लिए कर रहे हैं."

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क्या हाल ही में शिवपाल यादव का द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देना साथ ही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का भी भाजपा के साथ जाना, क्या इसी का असर हमें चौधरी हरमोहन यादव के परिवार वालों पर भी दिख रहा है?

इस सवाल का जवाब देते हुए पत्रकार अंजनी निगम कहते हैं, "बीजेपी पिछले दो दशकों से चाहती ही थी कि चौधरी हरपाल सिंह का परिवार उनसे जुड़ जाए जो किसी कारणों से नहीं जुड़ पा रहा था. लेकिन अब जो स्थिति है, ये परिवार भी बीजेपी के साथ है. क्योंकि समाजवादी पार्टी में उन्हें कोई भविष्य दिखाई नहीं पड़ रहा है. और चौधरी हरपाल सिंह के बेटे सुखराम सिंह यादव का रूझान शिवपाल सिंह यादव के साथ ज्यादा था. सुखराम सिंह यादव को भी समझ में आ गया है कि जब शिवपाल खुद भाजपा की तरफ आंख उठाकर देख रहे हैं तो सीधे वो लोग क्यों न बात करें. और इसलिए पिछले चरण में मोहित यादव को भाजपा ज्वाइन करवाई. और अब वो लोग भी बीजेपी में जा रहे हैं."

इस बारे में सपा के पूर्व विधायक मुनींद्र शुक्ल कहते हैं, "भाजपा तो फसल को कैद करना चाहती है. लेकिन चौधरी हरमोहन सिंह जी सबके थे, और सब लोग उनका सम्मान करें सब लोग उनका जन्मदिन और परिनिर्वाण दिवस मनाएं उसमें कोई बुराई नहीं है. जिस उद्देश्य को लेकर वो (बीजेपी) के लोग यह कर रहे हैं उससे उनको कोई फायदा नहीं है. क्योंकि चौधरी हरमोहन सिंह की मंशा हमेशा गरीब, किसान, मजदूर खेत खलिहान से जुड़ी थी. और वह उनकी मंशा समाजवादी पार्टी से जुड़ी थी तो उनके जो अनुयायी है या उनके जो समर्थक हैं वह सबके-सब समाजवादी पार्टी में हैं. उसका बीजेपी को कोई फायदा नहीं मिलेगा."

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क्या कहता है चौधरी हरमोहन सिंह यादव का परिवार?

चौधरी हरमोहन सिंह का परिवार भी सक्रिय राजनीति में है. उनके बेटे सुखराम सिंह यादव सपा से राज्य सभा के सांसद रह चुके हैं और उनका कार्यकाल इसी महीन ख़त्म हुआ है. समाजवादी पार्टी ने उन्हें फिर से राज्य सभा नहीं भेजा.

उनके पोते मोहित यादव ने कुछ ही दिनों पहले भाजपा की सदस्यता ली है. भाजपा से मिलने वाले सम्मान के बारे में बीबीसी से बात करते हुए मोहित यादव कहते हैं, "चौधरी हरमोहन सिंह जी की दसवीं पुण्यतिथि का ये कार्यक्रम है माननीय प्रधानमंत्री जी का संबोधन होगा. मैं समझता हूं कि जिस तरह से चौधरी हरमोहन सिंह जी ने अपने जीवन भर यदुवंशी समाज के लिए, पिछड़ों के लिए, किसानों के लिए आवाज उठाई. तो आज को जो संबोधन होगा माननीय प्रधानमंत्री जी का वह यदुवंश समाज के लिए खास तौर पर और पूरे देश के लिए एक नई दिशा तय करेगा".

लेकिन आखिरकार मोहित यादव ने समाजवादी पार्टी छोड़ भाजपा की सदस्यता क्यों ली? इस बारे में वो कहते हैं, "हमारा परिवार राममनोहर लोहिया के आदर्शों पर चलता रहा है. राम मनोहर लोहिया जी के बाद चौधरी चरण सिंह जी को हम लोगों ने नेता माना हमारे परिवार ने हमारे बाबा ने नेता माना. फिर पिता जी ने माननीय मुलायम सिंह जी को नेता माना. पर जो असली समाजवाद था, वह कहीं न कहीं समाजवादी पार्टी में खो गया. और जो असल समाजवाद है वह आज बीजेपी में दिखाई पड़ता है. तभी मैंने बीजेपी सदस्यता ग्रहण करी. माननीय मोदी जी को अपना नेता माना."

अखिलेश यादव के नेतृत्व के बारे में मोहित यादव क्या राय रखते हैं? उनका कहना है कि, "यादवों के नेता पहले मुलायम सिंह जी थे उसके बाद यादव बिरादरी में कोई नेता पनप नहीं पाया है और जिस तरह माननीय मोदी ने कार्यक्रम दिया है. संबोधन रहेगा. आगे चल के देखेंगे किस तरफ जो यादव वोट बैंक है. प्रधानमंत्री मोदी जी कर रहे हैं, वह सब बीजेपी की तरफ मुंह कर जाएगा."

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इस बारे में क्या है यादव महासभा का कहना?

खुद हरमोहन सिंह यादव और उनके के बड़े भाई रामगोपाल यादव 1924 में स्थापित अखिल भारतवर्षीय यादव समाज ने अध्यक्ष रह चुके हैं.

यादव महासभा के अस्तित्व के बारे में चौधरी हरमोहन सिंह यादव के पोते मोहित यादव कहते हैं कि, "यादव महासभा की स्थापना जो हुई थी वह हमारे बड़े दादा रामगोपाल जी ने की थी. चौधरी हरमोहन सिंह की पुण्यतिथि पर होने वाले कार्यक्रम को लखनऊ में ही नहीं देश के कोने-कोने में जो लोग हैं वो वर्चुअली इस कार्यक्रम को देखेंगे."

लेकिन सोमवार सुबह समाजवादी पार्टी के मीडिया विंग से सन्देश आया कि लखनऊ में अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा लखनऊ में चौधरी हरमोहन सिंह यादव की स्मृति में एक सम्मान समारोह का आयोजन कर रही है.

तो सवाल यह उठता है कि क्या अब उनकी राजनीतिक और सामाजिक विरासत के लिए क्या सपा और भाजपा में रस्साकशी देखने को मिलेगी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के बारे में अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा के अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने कहा कि, "यादव महासभा गैर राजनीतिक संस्था है, प्रधानमंत्री मोदी आज कार्यक्रम कर रहे हैं. अच्छी बात है लेकिन सौ सालों से यादव महासभा गैर राजनीतिक संस्था है."

उन्होंने लखनऊ में अपनी प्रेस वार्ता में कहा कि, "आज यादव वोटों के लिए एक खास वर्ग कार्यक्रम कर रहा है जिससे यादव महासभा खुद को अलग करती है."

अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा द्वारा जारी की गयी प्रेस विज्ञप्ति में यह भी लिखा है कि, "इसमें सभी राजनीतिक दलों के यादव समाज के लोग पूर्व में भी सदस्य पदाधिकारी और अध्यक्ष रहे हैं और आज भी हैं. चौधरी हरमोहन सिंह जी ने सारे देश के यादव समाज के उन्नयन हेतु लोगों लोगों को गोत्रों और उपजाति से उठाकर एकता एक सूत्र में पिरोने का महान काम किया है."

किसी पार्टी का नाम लिए बिना प्रेस रिलीज़ में लिखा गया है कि, "लेकिन कुछ लोगों द्वारा उनके नाम का राजनीतिक लाभ लेने हेतु यादवों को फिर से गोत्रों में बांटने की निंदा करते हैं. यह चौधरी साहब की विचारधारा के प्रतिकूल है और उनके किए गए महान कार्यों का अपमान है."

अब देखना यह है कि 2024 के लोक सभा चुनावों के पहले यादव बिरादरी को जोड़ने के लिए चौधरी हरमोहन सिंह यादव की राजनीतिक विरासत का इस्तेमाल भाजपा या सपा दोनों में से कौनसा दल बेहतर कर पाता है.

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