योगी सरकार के दलित मंत्री का कथित इस्तीफ़ा हुआ वायरल, क्या हैं वो सरकार से नाराज़?

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के जल शक्ति राज्य मंत्री दिनेश खटीक का कथित इस्तीफ़ा सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है.
बीबीसी ने उनसे फ़ोन पर इस्तीफ़े को सत्यापित करने की कोशिश की लेकिन उनका नंबर बंद था. पार्टी के पदाधिकारियों और सरकार के अधिकारियों से भी इस वायरल इस्तीफ़े की औपचारिक पुष्टि नहीं हो सकी.
यह वायरल इस्तीफ़ा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को संबोधित है. लेकिन उनके ऑफ़िस से भी न तो कोई इस बारे में औपचारिक प्रेस रिलीज़ या कोई बयान जारी हुआ है और न ही योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कोई प्रतिक्रिया दी है.
सोशल मीडिया पर बुधवार सुबह वायरल हुए एक वीडियो में दिनेश खटीक इस्तीफ़े से जुड़े सवालों से बचते नज़र आ रहे हैं. इस वीडियो में जब पत्रकारों ने इस्तीफ़े के बारे में पूछा तो मंत्री ने, "कोई विषय नहीं हैं यार" कहते हुए सवाल को टाल दिया और गाड़ी में बैठ कर रवाना हो गए.
लेकिन एक वायरल इस्तीफ़े, स्थानीय मीडिया में उस पर चर्चा और कवरेज़ से लखनऊ में अफ़वाहों का बाज़ार गर्म है कि क्या योगी सरकार के कुछ मंत्री नाराज़ चल रहे हैं.
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कौन हैं दिनेश खटीक और कितना बड़ा है उनका राजनीतिक कद?
वरिष्ठ पत्रकार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार शादाब रिज़वी ने दिनेश खटीक के राजनीतिक सफ़र को काफ़ी करीब से देखा है.
शादाब रिज़वी बताते हैं, "दिनेश खटीक को बीजेपी ने ही दलित चेहरे के रूप में पेश किया था. क्योंकि पश्चिमी यूपी में भाजपा कई चीजों से परेशान थी, जैसे किसान आंदोलन और चंद्रशेखर आज़ाद का दलित चेहरे के रूप में उदय, तो पार्टी ने कोशिश की कि इन्हें दलित चेहरे रूप में पेश किया जाए. इसलिए इन्हें 2021 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले राज्य सरकार में मंत्री बनाया गया."
दिनेश खटीक की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में शादाब रिज़वी कहते हैं, "एक बड़ी वजह ये भी थी कि वो आरएसएस की पृष्ठभूमि से रहे हैं. 1994 में जब इनका राजनीतिक सफ़र शुरू हुआ, तो ये मेरठ में आरएसएस के खंड कार्यवाहक थे. उसके बाद 2006 में विश्व हिन्दू परिषद में और बजरंग दल में काम करते हुए आगे बढ़ गए. फिर 2007 में दिनेश खटीक को बीजेपी में ले लिया गया और मुख्य विंग में इनको मंत्री बना दिया गया."
"बाद में 2010 में उन्हें ज़िला उपाध्यक्ष बनाया गया. और 2013 में इन्हें भाजपा में और बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई और ज़िले का महामंत्री बना दिया गया. और 2017 में पहली बार चुनाव के लिए इनको हस्तिनापुर सीट से विधायक का टिकट दे दिया. एक महत्वाकांक्षा थी कि मंत्रिमंडल में जगह मिल जाए, तब तो जगह नहीं मिली. लेकिन जब पश्चिम उत्तर प्रदेश ने किसान आंदोलन और बाक़ी चीज़ें देखी तो उनको 2021 में सीएम ने जल शक्ति मंत्रालय का राज्य मंत्री बना दिया था. और 2022 में दोबारा से टिकट दिया और विधायक बनाने के बाद दोबारा से वही मंत्रालय दिया."
वे प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के क़रीबी माने जाते हैं और दूसरी बार जल शक्ति मंत्रालय का राज्य मंत्री बनाए गए हैं.
योगी सरकार के पहले कार्यकाल में भी उन्हें यही पोर्टफोलियो मिला था लेकिन उस वक्त योगी के क़रीबी माने जाने वाले और पार्टी के ठाकुर बिरादरी के नेता महेंद्र सिंह जल शक्ति कैबिनेट मंत्री थे.
इस बार योगी के क़रीबी माने जाने वाले स्वतंत्र देव सिंह को इस मंत्रालय का कैबिनेट मंत्री बनाया गया है.

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क्या हो सकती है दिनेश खटीक की नाराज़गी की वजह?
बीबीसी इस बात की औपचारिक पुष्टि नहीं कर पाया है कि क्या हस्तिनापुर से विधायक और मंत्री दिनेश खटीक ने आख़िरकार इस्तीफ़ा दिया भी है कि नहीं और दिया है तो किसे.
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी हाल की कुछ घटनाओं का ज़िक्र करते हुए इस बारे में बताते हैं कि दिनेश खटीक की नाराज़गी के कई कारण हो सकते हैं.
वो कहते है, "ऐसे कई विवाद सामने आए हैं जहां उनकी कम चली है. हो सकता है कि एक तरह से इनके पीछे अफसरशाही हावी है. शुरुआत में ट्रांसफर को लेकर एक आईपीएस अफसर से उनका विवाद हो गया था. कहासुनी हुई थी, हॉट-टॉक हुई थी. मामला हाईकमान तक पहुंचा था. मंत्री जी ने कहा था कि अब तुम अफ़सर रहोगे या मैं विधायक. लेकिन उसके बावजूद वो सब मैनेज हुआ."
हाल ही में हुए एक घटना के बारे में बताते हुए शादाब रिज़वी कहते हैं, "अभी पिछले महीने मंत्री के करीबी टेंट व्यापारी का पुलिस से विवाद हो गया था. उसकी लूट की एफ़आईआर नहीं लिखी गई थी. तहरीर दी गई थी. बाद में आधी रात को थाने में मंत्री दिनेश खटीक ने डेरा डाल के बकायदा पूरा हंगामा किया था. डीएम और एसपी को बुलाया गया था, फिर वो एफ़आईआर पुलिस वालों के ख़िलाफ़ हुई थी. लेकिन बाद में मंत्री के ख़ास समर्थक के ख़िलाफ़ क्रॉस एफ़आईआर कर दी गयी गई और कई धाराओं में मुक़दमा लिख दिया और उससे भी ये खफ़ा थे."
इस वायरल इस्तीफ़े में कुछ भ्रष्टाचार के आरोपों का ज़िक्र भी है लेकिन फ़िलहाल बीबीसी इस इस्तीफ़े को दिनेश खटीक या कोई अन्य अधिकृत सूत्र से सत्यापति नहीं कर पाया है.

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क्या जितिन प्रसाद भी हैं नाराज़?
जितिन प्रसाद कांग्रेस का दामन छोड़ने के बाद योगी सरकार में दूसरी बार कैबिनेट मंत्री बने हैं और इस बार उन्हें पीडब्लूडी विभाग मिला है जो सरकार के कामकाज से जुड़े सबसे अहम विभागों में से एक है.
लखनऊ के अख़बारों में भी आज इस बात की खबरें छपी थीं कि जितिन प्रसाद के विभाग में पांच अधिकारियों को एक उच्च स्तरीय जांच के बाद हटा दिया गया है.
उत्तर प्रदेश के आला अधिकारी ने बीबीसी से बात करते हुए इस बात की पुष्टि की कि विभाग में लगभग 500 इंजीनियरों के तबादलों को लेकर अनियमितताओं की जांच के लिए मुख्यमंत्री ऑफिस से आदेश आया था.
उन्होंने इस बात की पुष्टि भी की कि मंत्री जितिन प्रसाद के ओएसडी एके पांडेय को भी उनके पद से हटाकर वापस केंद्रीय सचिवालय सर्विसेज के कैडर में भेज दिया गया है.
सरकार की ट्रांसफर नीति और पीडब्लूडी विभाग में उससे जुड़ी पाई गई अनियमितताओं को समझाते हुए उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त चीफ़ सेक्रेटरी (एसीएस) मनोज कुमार सिंह ने बीबीसी से कहा कि, "जांच में पाया गया कि ट्रांसफर नीति का सही से पालन नहीं हुआ है. सरकार के मुताबिक़ जिन लोगों की एक पद पर 3 साल से ज़्यादा तैनाती है उनका तबादला किया जाना चाहिए. लेकिन पाया गया कि कुछ ऐसे तबादले किए गए जिसमें अधिकारियों ने उस पद पर एक साल भी पूरा नहीं किया था. निर्धारित सीमा से अधिक तबादले किए गए और वो भी बिना गाइडलाइन और पॉलिसी का पालन किए. तो अनियमितताएं पायी गईं और इसमें कार्रवाई की गई."
इस कार्रवाई से जुड़ा पत्र और प्रेस विज्ञप्ति खुद उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग ने मीडिया से शेयर किया था.
प्रेस नोट में पीडब्ल्यूडी के चीफ़ इंजीनियर (विकास) मनोज कुमार गुप्ता, चीफ़ इंजीनियर राकेश कुमार सक्सेना, वरिष्ठ स्टाफ अधिकारी शैलेन्द्र कुमार यादव को भी सस्पेंड कर दिया गया.
प्रेस नोट में अनियमितताओं को गंभीर बताते हुए कहा गया है कि यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश सरकार की भ्रष्टाचार के विरुद्ध ज़ीरो टॉलरेंस नीति के तहत की जा रही है.
बीबीसी ने इस कार्रवाई के बारे में मंत्री जितिन प्रसाद से बात करनी चाही और उनसे उनका पक्ष जानना चाहा लेकिन उनसे फ़ोन पर संपर्क नहीं हो सका.
हालांकि, जितिन प्रसाद ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा है कि "पीएम मोदी और सीएम योगी की जीरो टॉलरेंस की नीति है. अगर विभाग में कोई अनियमितताएं हैं तो सरकार ठोस कदम उठाएगी. एक निष्पक्ष जांच होगी और जहां गड़बड़ी है, वहां कार्रवाई होगी और बदलाव भी होगा... नाराज़गी की कोई बात नही है."

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क्या है विपक्ष का कहना?
योगी सरकार के मंत्री के कथित वायरल इस्तीफ़े को लेकर विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा है.
बसपा प्रमुख मायावती ने बिना दिनेश खटीक नाम लिए एक दलित मंत्री के साथ भाजपा के व्यवहार का ज़िक्र करते हुए ट्वीट किया कि, "उत्तर प्रदेश भाजपा मंत्रिमण्डल के भीतर भी दलित मंत्री की उपेक्षा अति-निन्दनीय व दुर्भाग्यपूर्ण. ऐसी ख़बरें राष्ट्रीय चर्चाओं में. सरकार अपनी जातिवादी मानसिकता व दलितों के प्रति उपेक्षा, तिरस्कार, शोषण व अन्याय को त्याग कर उनकी सुरक्षा व सम्मान का ध्यान रखने का दायित्व ज़रूर निभाए."
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इस उभरते माहौल में विपक्ष भी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा, "जहाँ मंत्री होने का सम्मान तो नहीं परंतु दलित होने का अपमान मिले… ऐसी भेदभावपूर्ण भाजपा सरकार से त्यागपत्र देना ही अपने समाज का मान रखने के लिए यथोचित उपाय है. कभी-कभी बुलडोज़र उल्टा भी चलता है."
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आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सांसद और उत्तर प्रदेश प्रभारी संजय सिंह ने भी ट्वीट कर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा, "स्वास्थ्य विभाग में तबादला घोटाला. PWD में तबादला घोटाला. पशुपालन विभाग में घोटाला. अब जल शक्ति विभाग में तबादला घोटाले से आहत होकर दलित समाज के मंत्री दिनेश खटीक ने इस्तीफ़ा दे दिया. घोटाला योगी सरकार का तो इस्तीफ़ा @AmitShah को क्यों?"
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