उत्तर प्रदेश: दिनेश खटीक का इस्तीफ़ा प्रकरण और योगी सरकार से मंत्रियों की नाराज़गी का सवाल

दिनेश खटीक

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    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से

उत्तर प्रदेश के जल शक्ति मंत्री दिनेश खटिक के कथित इस्तीफ़े के वायरल होने से उत्तर प्रदेश की सियासत में योगी सरकार के 100 दिन पूरे के बाद मंत्रियों की नाराज़गी से जुड़े नए सवाल खड़े हो रहे हैं.

हालांकि इस कथित इस्तीफे की कहीं से भी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन उसकी आड़ में भाजपा की प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को लेकर चर्चा छिड़ गई.

हालाँकि दिनेश खटीक गुरुवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने उनके आवास पहुंचे, और मीडिया से कहा, "सीएम योगी से मिलकर उन्होंने अपनी बातों से अवगत करा दिया है."

उन्होंने वैसे मीडिया के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया और सिर्फ इतना कहा, "मुख्यमंत्री ने उनकी बातें सुनीं. सीएम काम कर रहे हैं. जो मेरे विषय हैं, उनको मैंने सीएम के सामने रखा है. सीएम ने कहा है कि कार्रवाई होगी, समाधान हो गया है."

दिनेश खटीक समाधान की बात कर रहे हों लेकिन उनके कथित इस्तीफे की चर्चा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उनकी सरकार की अफसरशाही और भाजपा के प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व के बारे में क्या अंदाज़ा लगाया जा सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "मुख्यमंत्री योगी का स्वभाव ऐसा है कि वह किसी पर भरोसा नहीं करते हैं. पावर शेयरिंग नहीं करते हैं. यहां तक कि गोरखनाथ मंदिर का भी सारा कामकाज हर चीज़ और पूरी डिटेल वो अभी भी देखते हैं. तो शेयर करना उनकी आदत में नहीं है. वैसे ही उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में भी ज़्यादातर अधिकार और कामकाज अपने पास रखे हुए हैं."

योगी आदित्यनाथ

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योगी आदित्यनाथ और अफ़सरशाही

मीडिया में अक्सर योगी आदित्यनाथ को टीम 11 (या टीम 9) के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बैठक लेते हुए देखा जाता है. यह सरकारी उच्चाधिकारियों की टीम है, जो मुख्यमंत्री के दिशानिर्देशों और आदेशों को लागू करवाने का काम करती है.

लेकिन क्या यह सिस्टम सरकार के मंत्रियों को नज़रअंदाज़ करता है?

इस बारे में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "उनकी (योगी की) आदत पड़ गई है टीम-11 और टीम-9 की. तो सीधे विभाग के प्रमुख सचिवों को आदेश देने की आदत पड़ गई है. फिर उनकी (योगी के) ओर से सचिवालय से भी आदेश जाने लगते हैं."

"परंपरा ये थी कि कैबिनेट मिनिस्टर अपने विभाग का बॉस होता है और चीफ़-मिनिस्टर आमतौर पर दखल नहीं करता है. कुछ कहना भी होता था तो वो पहले कैबिनेट मिनिस्टर को सम्बोधित करते थे. लेटर या एप्लीकेशन डायरेक्ट नहीं जाता था. लेकिन वो परंपरा टूट चुकी है."

योगी आदित्यनाथ और पीएम नरेंद्र मोदी

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योगी और बीजेपी आलाकमान के रिश्ते

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान लखनऊ के राजभवन में चलते-चलते बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की वायरल हुई तस्वीर सभी ने देखी थी, और उसमें केंद्रीय नेतृत्व का योगी में भरोसा भी साफ़ नज़र आ रहा था.

लेकिन मंत्री दिनेश खटीक का कथित इस्तीफ़ा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सम्बोधित था, ना कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को.

हालांकि इस इस्तीफ़े की न तो पुष्टि अभी हो पाई है और न ही खंडन ही हुआ है, लेकिन इसका गृहमंत्री अमित शाह को सम्बोधित किया जाना सुर्ख़ियों में शामिल रहा.

दिनेश खटीक के इस्तीफ़े की न तो पुष्टि अभी हो पाई है और न ही खंडन ही हुआ है

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इस बारे में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "दिनेश खटीक ने जो अमित शाह को कथित पत्र लिखा इस सबके बावजूद अमित शाह की तरफ़ से और हाईकमान की तरफ़ से उनको कोई डिस्करेज करने का सार्वजनिक संकेत नहीं है."

तो मीडिया में कथित इस्तीफ़े की यह सुर्खियां क्या बीजेपी के अंदर चलती आ रही रस्साकशी को दर्शाती हैं?

पश्चिम उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं, "कहीं न कहीं पावर गेम का खेल तो है. 2017 तक एक टीम थी मोदी-शाह. लेकिन पिछले कुछ समय से मोदी-योगी टीम का नाम चलता है. हालाँकि, कौन किसको क्या करने जा रहा है, यह पार्टी के अंदरूनी मामले हैं."

योगी आदित्यनाथ के साथ केपी मौर्या

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कैसे हैं योगी के उनके उप-मुख्यमंत्रियों से कामकाजी सम्बन्ध?

हाल ही में एक मामला लखनऊ के अख़बारों की सुर्ख़ियों में छाया कि प्रदेश के नए दूसरे उपमुख्यमंत्री और पार्टी का प्रदेश में कद्दावर ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले नेता ब्रजेश पाठक भी उनको सौंपे गए स्वास्थ्य विभाग के तबादलों से नाराज़ बताए जाते हैं.

प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री होने की वजह से ब्रजेश पाठक अस्पतालों का औचक निरीक्षण भी कर रहे हैं. उनकी तस्वीरें, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहे हैं.

तो क्या योगी आदित्यनाथ और उनके नए उप-मुख्यमंत्री के बीच में तालमेल में कोई कमी है?

उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक

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केंद्रीय नेतृत्व

इस बारे में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "केंद्रीय नेतृत्व ने तीनों... योगी, केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक को आपस में मिलकर काम करने की हिदायत दी थी. उसका असर यह है कि योगी जी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में दोनों (उप मुख्यमंत्रियों) को बुलाते हैं."

लेकिन विधानसभा चुनावों के ठीक पहले प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के यहाँ जब संघ के कद्दावर पदाधिकारी कृष्णा गोपाल और सर-कार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मौर्या के घर पर उनके नवविवाहित बेटे और बहू को आशीर्वाद देने पहुंचे तो मीडिया में इसे संघ की मौर्या और योगी को चुनाव के पहले क़रीब लाने की कोशिश के रूप में रिपोर्ट किया गया था.

तो क्या दिनेश खटीक के कथित इस्तीफ़े का लम्बा असर देखने को मिलेगा?

इस बारे में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "देखिए यह केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर करता है. अगर सेंट्रल लीडरशिप इसे हवा नहीं देगा तो फिर ये नहीं बढ़ेगा."

केशव प्रसाद मौर्या, योगी आदित्यनाथ

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क्या इस विवाद से भाजपा में खटीक का कद बढ़ेगा?

दिनेश खटीक संघ और विश्व हिंदू परिषद के मूवमेंट से पैदा हुए दलित नेता हैं. बाद में उन्हें भाजपा में शामिल किया गया और चुनाव लड़ कर वे दो बार विधायक बने.

योगी सरकार के पहले कार्यकाल के ख़त्म होने के चंद महीने पहले ही उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया.

चुनाव के पहले किसी भी मंत्रिमंडल में शामिल होने का एक सांकेतिक पहलू भी होता है. ख़ास तौर पर जब वो विधायक अनुसूचित जाति से हो, जिसे मायावती की राजनीतिक कमज़ोरी के बाद भाजपा अपनी उत्तर प्रदेश की रणनीति में काफ़ी एहमियत दे रही है.

पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं, "दलित चेहरा होने की वजह से इनका कोई नुकसान तो नहीं हो पाएगा. और इनकी उपेक्षा भी नहीं हो पाएगी. सिर्फ़ इनको मैनेज किया जाएगा. और ऐसा नहीं है कि यह बहुत बड़ा दलित चेहरा बन पाएंगे. हाँ, इतना है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश से युवा नेता होने के कारण इनको थोड़ी तवज्जो मिली लेकिन ये बड़ा चेहरा बनने की स्थिति में नहीं हैं."

शादाब रिज़वी इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं, "इस कथित इस्तीफ़े में 14 बार दलित शब्द का इस्तेमाल हुआ है लेकिन दलितों के नाम पर इन्होंने ऐसा बहुत बड़ा अभियान चलाया हो, या दलितों को पार्टी के पक्ष में जोड़ने का बहुत बड़ा काम किया हो ये नज़र नहीं आता. बस ये दलित हैं इसलिए भाजपा में इनका महत्व है."

दिनेश खटीक

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तबादलों में भ्रष्टाचार के आरोप

शादाब रिज़वी 2021 के उस दौर की याद दिलाते हैं जब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले विपक्ष आरोप लगाने लगा कि ब्राह्मण भाजपा से 'ठाकुरवाद' की वजह से नाराज़ हैं.

वे कहते हैं, "इस चुनाव के पहले ब्राह्मण समाज की नाराज़गी की बात आई और ठाकुरों को ज़्यादा तवज्जो मिलने की बात आई. उसके बाद पिछड़ों को लेकर ऐसी बात आई, और अब दलितों को लेकर आई है. तो कहीं ऐसा न हो कि ये एक बड़ा मामला बन जाए. इसलिए पार्टी इसे भी इशू नहीं बनने देना चाहती है."

एक तरफ दिनेश खटीक का कथित इस्तीफ़ा और दूसरी ओर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री जितिन प्रसाद के पीडब्लूडी विभाग में हुए तबादलों में भ्रष्टाचार के आरोप और उनसे जुड़ी जांच और कार्रवाई का मुद्दा.

हालांकि दोनों में फर्क समझाते हुए शादाब रिज़वी कहते हैं, "जितिन प्रसाद के मंत्रालय से जुड़ा मामला भी सामने आया. लेकिन पार्टी जितिन प्रसाद को वो महत्व देने की स्थिति में नहीं है. उन्हें मालूम है कि ब्राह्मण एक होने से फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला. दलित के नाराज़ होने से दिक्कत हो जाएगी. "

हालाँकि, रिज़वी कहते हैं, "मुझे लगता नहीं है कि दिनेश खटीक इससे बहुत बड़ा हासिल करेंगे, या बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा. लेकिन इसके बाद हो सकता है कि राज्य मंत्रियों को कार्य बंट जाएगा."

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