आर्यन ख़ान को क्लीनचिट मिली, पर क्या न्याय मिला?

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- Author, सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
क्रूज़ पर ड्रग्स पार्टी करने के आरोप में गिरफ़्तार किए गए आर्यन ख़ान को नेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की ओर से क्लीन चिट मिलने के कुछ दिनों बाद समीर वानखेड़े का ट्रांसफर चेन्नई कर दिया गया. एनसीबी की टीम ने वानखेड़े के नेतृत्व में ही क्रूज़ पर छापेमारी की थी और कई लोगों को गिरफ़्तार किया था.
समीर वानखेड़े के ट्रांसफ़र को इस मामले से ही जोड़कर देखा जा रहा है. उन्होंने फ़िल्म स्टार शाहरुख़ ख़ान के बड़े बेटे आर्यन ख़ान पर भले ड्रग्स लेने के आरोप लगाए, लेकिन एनसीबी ने अपने आरोप पत्र में उन्हें क्लीन चिट दे दी. हालांकि वानखेड़े की कार्रवाई के चलते उन्हें 26 दिन जेल में बिताना पड़ा.
इस बारे में पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केसी कौशिक का मानना है, "हो सकता है झूठे आरोप लगाने के कारण उनका ट्रांसफ़र किया गया हो. आपको अभियुक्त के ख़िलाफ़ केवल केस बनाने की ज़रूरत होती है. इस कारण आर्यन ख़ान को बिना मामले में शामिल हुए 26 दिनों तक जेल में रहना पड़ा. मेरी राय में इस कारण से ही वानखेड़े का ट्रांसफ़र किया गया होगा."
जम्मू-कश्मीर के मॉडल तारिक़ अहमद डार को भी ऐसे ही आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. आरोप है कि क़रीब तीन महीने तक उन्हें अवैध हिरासत में रखा गया था.
उनके वकील नौशाद अहमद ख़ान बीबीसी को बताते हैं, "आर्यन ख़ान निर्दोष थे और उन्होंने कोई अपराध नहीं किया. अब जब उन्हें क्लीन चिट मिल गई है, तो समीर या उनकी गिरफ़्तारी के लिए जो भी ज़िम्मेदार रहा हो, उन्हें पकड़ना चाहिए."

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क्या क्लीन चिट देने से हो जाएगी नुक़सान की भरपाई?
वकील नौशाद अहमद ख़ान कहते हैं, "पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी किसी इंसान को किसी अपराध में शामिल हुए बिना एक महीने तक गिरफ़्तार नहीं रख सकती. और बाद में एजेंसी कहे कि वो व्यक्ति किसी अपराध में शामिल नहीं था. ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी है. ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारियों को क़ानून के मुताबिक़ सज़ा देनी चाहिए."
"24 साल के एक युवक को 26 दिनों तक जेल में बंद रखा गया. यह ख़बर पूरे देश में फैली, जिससे न केवल उनकी छवि ख़राब हुई बल्कि उन पर इसका बहुत बुरा असर हुआ होगा.''
ख़ान पूछते हैं कि इससे यह सवाल तो पैदा ही होगा कि क्या क्लीन चिट देने के बाद आर्यन ख़ान को हुए नुक़सान की भरपाई हो जाएगी?
वे कहते हैं, ''ज़ाहिर है इसका उत्तर 'न' में होगा. कम उम्र में हुई घटना का उन पर गंभीर असर पड़ा है. इससे उनकी सामाजिक छवि पर एक दाग़ लग गया."
मॉडल तारिक़ अहमद डार - ग़लती से किया गया गिरफ़्तार
ख़ान कश्मीरी मॉडल तारिक़ अहमद डार के साथ हुई घटना का ज़िक्र करते हैं. डार को क़रीब तीन महीने तक पुलिस हिरासत और तिहाड़ जेल में रखा गया. उन्हें दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने लश्कर-ए-तैयबा से संबंध रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.
उन्हें जाली यात्रा दस्तावेज़ रखने के आरोप में बांग्लादेश रैपिड एक्शन बटालियन ने सितंबर 2007 में गिरफ़्तार किया था. वहीं दिल्ली में स्पेशल सेल ने कथित आतंकी जुड़ाव रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया था.
हालांकि बाद में पता चला कि पुलिस ने ग़लत आदमी को पकड़ लिया था, क्योंकि कई बड़े ब्रांडों के विज्ञापनों के वे जाने-माने चेहरा थे और ढाका की विज्ञापन दुनिया के बड़े स्टार थे.
वे कहते हैं, "26 दिनों तक जेल में रहना कोई मज़ाक नहीं है और वो भी बिना किसी अपराध के."
उन्होंने बीबीसी को बताया, "डार का मामला साफ़ तौर पर ग़लत भावना से प्रेरित और ग़लत पहचान का था. डार चूंकि शांति से जीना चाहते थे, इसलिए उन्होंने किसी भी अदालत में कोई आपराधिक और न्याय मांगने का मामला चलाने को तवज्जो नहीं दी."
ढाका में डार एक प्रमुख और अहम चेहरा थे. वे मिस्टर बांग्लादेश भी बने थे. इसलिए प्रिंट मीडिया में वे बहुत मशहूर थे. लेकिन ग़लत पहचान के कारण मुक़दमा चलने पर निश्चित तौर पर उनके करियर, उनकी छवि और प्रसिद्धि को कभी न भरपाई होने वाला नुक़सान हुआ.
बेक़सूर साबित होने के बाद क्या हैं विकल्प?
आर्यन मामले की तुलना डार के मामले से करते हुए उन्होंने कहा कि आर्यन ख़ान के पास लगाए गए झूठे आरोपों से निपटने के कई उपाय हैं. उनके पास आपराधिक और सिविल क़ानूनों के साथ एनडीपीएस एक्ट के तहत उपाय मौजूद हैं.
वे कहते हैं कि आर्यन ख़ान भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का आपराधिक मामला दर्ज़ करवा सकते हैं.
वहीं सिविल प्रोसीजर कोड के आदेश 7 नियम 1 के तहत झूठे सबूत गढ़ने के लिए वे हर्जाना मांगने वाला सिविल केस भी बना सकते हैं. उनके पास एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धारा 58 के तहत भी मामला चलाने की मांग कर सकते हैं.
ख़ान कहते हैं, "आईपीसी की धारा 499/500 के तहत संबंधित व्यक्ति के ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज कराने वाला यह बड़ा उपयुक्त मामला है. यह तो सब जानते हैं कि ख़ान के ख़िलाफ़ चारों ओर ख़बरें प्रसारित और प्रकाशित हुईं, जिससे उनकी छवि को नुक़सान पहुंचा."
"सुपरस्टार का बेटा होने के कारण हो सकता है कि वो हुए नुक़सान की भरपाई करने के लिए मुआवज़े की मांग न करें. लेकिन मेरा मानना है कि उन्हें इस मामले से जुड़े लोगों और पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराना चाहिए."

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आर्यन ख़ान के मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहे जस्टिस (रिटायर्ड) सखा राम सिंह का कहना है कि यह मामला काफ़ी दुर्भाग्यपूर्ण है, जहां 24 साल के युवक को बिना किसी अपराध के 26 दिनों तक जेल में रहना पड़ा.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "एक सुपरस्टार के बेटे होने के नाते आर्यन ख़ान की प्रतिष्ठा को इससे नुक़सान पहुंचा है. इसलिए उन्हें हर्जाने के लिए सिविल मामला दायर करना चाहिए. ऐसी कार्रवाई बिल्कुल बरदाश्त नहीं की जा सकती. पहले गिरफ़्तार करना और फिर कहना कि उनके ख़िलाफ़ इस मामले में शामिल होने के सुबूत नहीं है. क्या आप उसके साथ खेल रहे हैं."
जस्टिस (रिटायर्ड) सिंह ज़ोर देकर कहते हैं कि अभियोजन पक्ष को शुरुआती छानबीन के बाद मामला बनाना और संदिग्धों को गिरफ़्तार करना चाहिए.
वे कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश ऐसा ही कहते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि पुलिस ने इन नियमों का पालन नहीं किया. संबंधित पुलिस अधिकारी को अपने ग़ैरक़ानूनी काम के नतीज़े भुगतने चाहिए."
'हर्जाना मिलना चाहिए'
वहीं दिल्ली हाईकोर्ट से रिटायर्ड जज जस्टिस आरएस सोढ़ी ने बीबीसी को बताया कि सरकार को ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखने के लिए आर्यन ख़ान को क्षतिपूर्ति देनी चाहिए.
जस्टिस सोढ़ी ने कहा कि ग़लत काम करने वाले किसी भी शख़्स को मज़ा चखना चाहिए. वे कहते हैं, ''ग़लती करने वालों से न सिर्फ़ सख़्ती से निपटना चाहिए, बल्कि ऐसे काम के लिए उन्हें ज़रूरी सज़ा भी देनी चाहिए. अब इसका फ़ैसला अदालत ही करेगी.''
जस्टिस (रिटायर्ड) सोढ़ी कहते हैं, "सरकार को ऐसे मामलों में क्षतिपूर्ति देनी चाहिए. आर्यन ख़ान को भी मिलनी चाहिए. उन पर ऐसी कार्रवाई का विनाशकारी प्रभाव हो सकता है."
उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी तरह सरकार ज़िम्मेदार है. चूंकि यह मामला एक सुपरस्टार के बेटे का था, इसलिए उन्हें ज़मानत मिल गई. लेकिन यदि ऐसा किसी आम आदमी के साथ हो, तो उन्हें ट्रायल का सामना करना पड़ेगा या अदालत उन्हें दोषी ठहरा देगी. इसलिए सरकार का यह कर्तव्य है कि वह तय करे कि उनके स्टाफ ईमानदार, भरोसेमंद, सक्षम और कुशल हों, ताकि वे किसी 24 साल के व्यक्ति की आज़ादी छीनने का ऐसा ग़लत काम न कर सकें.

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क़ानून की जानकार और देश की शीर्ष क्रिमिनल वकील कामिनी जायसवाल का भी मानना है कि आर्यन ख़ान को समीर वानखेड़े और इस मामले से जुड़े अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर कर हर्ज़ाने की मांग करनी चाहिए.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "क़ानून में मुक़दमा करने का नियम है. आख़िर बिना किसी भूमिका के उन्हें 26 दिनों तक ग़ैरक़ानूनी रूप से जेल में रहना पड़ा. उनके आज़ादी के दिन कौन लौटा सकता है?."
वे कहती हैं, "आर्यन ख़ान को एनसीबी और उसके अधिकारियों के ख़िलाफ़ ग़लत भावना से प्रेरित होकर मामला बनाने का मुक़दमा दर्ज़ कर सकते हैं. हमें ऐसे मामलों को रोकना होगा."
समीर वानखेड़े के नेतृत्व में एनसीबी की एक टीम ने आर्यन ख़ान सहित कई लोगों को पिछले साल 3 अक्टूबर को गिरफ़्तार किया था. उन पर एनडीपीएस एक्ट के तहत आरोप लगाए गए. ज़मानत मिलने से पहले उन्हें 26 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा.
एनसीबी ने पिछले हफ़्ते क़रीब 6,000 पन्नों का जो आरोप पत्र जमा किया है, उसमें अरबाज़ मर्चेंट, मुनमुन धमेचा और 12 अन्य लोगों के नाम हैं. हालांकि इसमें आर्यन ख़ान और पांच अन्य का नाम नहीं है.
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