समीर वानखेड़े की आर्यन ख़ान मामले में भूमिका पर एनसीबी ने अपने नोट में क्या कहा - प्रेस रिव्यू

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शाहरुख़ ख़ान के बेटे आर्यन ख़ान सहित पांच लोगों को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की ओर से शुक्रवार को दाख़िल आरोप पत्र में क्लीन चिट दे दी गई है. वहीं एनसीबी के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपने एक विभागीय नोट में समीर वानखेड़े के नेतृत्व वाली जांच टीम की भूमिका पर उंगली उठाई है.
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एसआईटी की आतंरिक नोट में लिखा गया है कि भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी वानखेड़े की टीम ने आर्यन ख़ान को 'किसी तरह फंसाने' की कोशिश की थी.
नोट के अनुसार, "बड़ी हैरत की बात है कि आर्यन ख़ान के दोस्त अरबाज़ मर्चेंट, जिनके पास से थोड़ी चरस बरामद हुई थी, ने इस मामले में आर्यन की किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ़ इनकार किया था. इसके बाद भी इन जांच अधिकारी ने बिना मोबाइल ज़ब्त किए आर्यन ख़ान के व्हाट्सऐप चैट देखे."
इस नोट में आगे लिखा गया है कि इससे ज़ाहिर होता है कि वो इस मामले में किसी भी तरह आर्यन ख़ान को फंसाना चाहते थे.
सूत्रों के हवाले से अख़बार लिखता है कि इस मामले की जांच के लिए समीर वानखेड़े जैसा चाहते थे, उसी तरह की खुली छूट उन्हें दी गई थी. मुंबई में जिस दिन यानी 2 अक्टूबर को ये छापे पड़े उसी दिन वानखेड़े के ठीक ऊपर के अधिकारी डिप्टी डायरेक्टर जनरल मुथा अशोक जैन छुट्टी पर चले गए.
रिपोर्ट कहती है कि हक़ीक़त में दिल्ली में एनसीबी के मुख्यालय को अगले दिन तक नहीं पता था कि वानखेड़े की टीम ने इस मामले में क्या सुबूत जुटाए हैं. लेकिन ड्रग्स के बड़े कांड में आर्यन ख़ान के शामिल होने का दावा करते हुए मीडिया में छाए हुए थे.

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर क़ानून बनाने के लिए उत्तराखंड ने बनाई समिति
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर क़ानून बनाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का एलान शुक्रवार को किया है.
पांच सदस्यों वाली इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई करेंगी. वो अभी जम्मू और कश्मीर परिसीमन आयोग की अध्यक्ष भी हैं. समिति के अन्य सदस्यों में रिटायर्ड जज जस्टिस प्रमोद कोहली, समाजसेवी मनोज गौर, रिटायर्ड आईएएस शत्रुघ्न सिंह और दून यूनिवर्सिटी, देहरादून की कुलपति सुरेखा डंगवाल होंगी.
अंग्रेज़ी दैनिक 'द हिंदू' के अनुसार, यह समिति इस क़ानून को लागू करने के तरीक़े की जांच करने के साथ विवाह, तलाक़, गुज़ारा-भत्ता, गोद लेने, संपत्ति का हस्तांतरण और अन्य पर्सनल क़ानूनों की जांच करेगी.
राज्य सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में बताया गया है कि यह समिति सभी समुदायों के पर्सनल क़ानूनों और उनके मसलों की जांच करके एक यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाएगी.
हालांकि इस समिति के कार्यकाल के बारे में जारी अधिसूचना में कुछ नहीं बताया गया है. अख़बार के अनुसार, राज्य में इस क़ानून को लागू करने की कोई पुरज़ोर मांग नहीं है, फिर भी सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है.
इससे पहले फरवरी में चुनाव के ऐन पहले सीएम धामी ने एलान किया था कि यदि वो फिर से चुनकर आए तो राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने की पूरी कोशिश करेंगे. यहां तक कि मार्च में शपथ लेने के बाद उन्होंने जब दोबारा सीएम का कार्यभार संभाला तो कैबिनेट की पहली बैठक में ही समिति बनाने के प्रस्ताव को पारित किया गया था.
वैसे देश में अभी तक समान नागरिक संहिता लागू करने वाला एकमात्र राज्य गोवा है, लेकिन वहां यह क़ानून आज़ादी के भी बहुत पहले 1870 के दशक से लागू है.

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दो साल बाद भारतीय सेना में जवानों का भर्ती अभियान फिर से शुरू होगा
कोरोना के चलते क़रीब दो साल तक ठप रहने के बाद भारतीय सेना अपना भर्ती अभियान फिर से शुरू करने की तैयारी में है.
इस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर शुक्रवार को यह भी बताया है कि सेना में शॉर्ट-टर्म सर्विस के लिए जवानों की भर्ती नीति को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है.
द हिंदुस्तान टाइम्स ने अधिकारियों के हवाले से बताया है कि भर्ती प्रक्रिया पर अभी काम चल रहा है और उम्मीद है कि अगस्त से दिसंबर तक देश में भर्ती रैलियां आयोजित होंगी.
पिछले दो सालों से नई भर्ती पर रोक के चलते भारतीय सेना को जवानों की कमी से जूझना पड़ रहा था. हालांकि सैन्य अधिकारियों का दावा है कि इससे सेना का कामकाज प्रभावित नहीं हुआ और सभी इकाइयां बेहतर प्रदर्शन कर रही थीं.
अख़बार के अनुसार, सेना के एक अधिकारी ने बताया है कि नई भर्ती नीति की घोषणा जल्द होने की उम्मीद है और उसे देखते हुए भर्ती अभियान के लिए ज़रूरी तैयारी की जा रही है.
आरबीआई का ख़र्च बढ़ने से एक तिहाई से भी कम रह गया सरकार का लाभांश
वित्त वर्ष 2021-22 में ख़र्च में 280 फ़ीसदी की बढ़ोतरी होने से भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से सरकार को दिए जाने वाले 'सरप्लस' राशि में तेज़ गिरावट आई है. साल भर पहले की तुलना में यह राशि घटकर एक तिहाई से भी कम रह गई है.
बिजनेस अख़बार द इकोनॉमिक टाइम्स ने आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के हवाले से यह ख़बर दी है.
अख़बार के अनुसार, मार्च में ख़त्म हुए पिछले वित्त वर्ष में आरबीआई से सरकार को मिलने वाली सरप्लस राशि घटकर केवल 30,307 करोड़ रुपए रह गई है. वहीं ठीक एक साल पहले यह राशि 99,122 करोड़ रुपए थी.
पिछले साल आरबीआई के पास जमा बैंकों के पैसे पर ब्याज देने के चलते उसका ख़र्च काफ़ी बढ़ गया, जबकि आमदनी में महज़ 20 फ़ीसदी की ही वृद्धि हो सकती.
आरबीआई का केवल ब्याज पर ही ख़र्च 17,958 करोड़ रुपए से बढ़कर 35,601 करोड़ रुपए हो गया. वहीं उसका कुल ख़र्च 34,147 करोड़ रुपए से बढ़कर 1.29 लाख करोड़ रुपए हो गया.
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