यूनिवर्सिटी का नाम आंबेडकर पर रखने को लेकर जब जलने लगा था मराठावाड़ा

आंबेडकर

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इमेज कैप्शन, अपने शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों का राजनैतिक ज्ञान परिपक्व हो, इस सिलसिले में आम्बेडकर ने मुम्बई के सिद्धार्थ महाविद्यालय की 'विद्यार्थी संसद' में 11 जून, 1950 को हिन्दू कोड बिल के समर्थन में भाषण दिया.
    • Author, मयूरेश कोण्णूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले सप्ताह आंध्र प्रदेश के अमलापुरम शहर में हाल के समय के भीषण दंगे हुए. एक मंत्री का घर जला दिया गया. पांच बसों को आग लगा दी गई, कई वाहन तोड़ दिए गए और जमकर पत्थरबाज़ी हुई.

हिंसक प्रदर्शनकारियों को काबू में करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और इलाक़े में धारा 144 लगानी पड़ी.

कारण, प्रदर्शनकारी नहीं चाहते थे कि उनके ज़िले का नाम भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर रखा जाए. डॉ. आंबेडकर ने भारत में शोषित जाति समूहों को न्याय दिलाने के लिए लंबा आंदोलन भी चलाया जिसके नतीजे में पिछड़ी जाति के लोगों को बराबरी का संवैधानिक अधिकार मिल सका.

दरअसल वाईएसआर जगनमोहन रेड्डी की सरकार ने कोनासीमा ज़िले का नाम बीआर आंबेडकर के नाम पर करने का फ़ैसला लिया था. लोग सरकार के इसी फ़ैसले का विरोध कर रहे थे.

हिंसा की इन घटनाओं ने पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में 44 साल पहले हुए नामांतर (नाम बदलना) विवाद की याद दिला दी है. इस दौरान महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाक़े में भीषण दंगे हुए थे. तब भी विवाद की जड़ में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम ही था. तब महाराष्ट्र की सरकार यूनिवर्सिटी का नाम बदलना चाह रही थी.

मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी को डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर करने के फ़ैसले के बाद हुए दंगे आज भी महाराष्ट्र के सामाजिक इतिहास पर एक घाव की तरह है. बीआर आंबेडकर ने इसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी, यहीं से स्नातक किया, अपना राजनीतिक करियार बनाया, सामाजिक आंदोलन चलाए और यही उनका अंतिम ठिकाना बनीं.

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 7 नवंबर 1900 को सतारा के सरकारी स्कूल मे दाख़िला लिया था. यह दिन महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्कूल प्रवेश दिन के रूप में मनाया जाता है. इसी दिन पर बीबीसी द्वारा फोटो फ़ीचर की ख़ास पेशकश. आज ये स्कूल प्रताप सिंह हाई स्कूल नाम से जाना जाता है. उस वक्त यह स्कूल पहली से चौथी तक था. चौथी कक्षा तक आंबेडकर इसी स्कूल में पढ़े.

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इमेज कैप्शन, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 7 नवंबर 1900 को सतारा के सरकारी स्कूल मे दाख़िला लिया था. यह दिन महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्कूल प्रवेश दिन के रूप में मनाया जाता है. आज ये स्कूल प्रताप सिंह हाई स्कूल नाम से जाना जाता है. उस वक्त यह स्कूल पहली से चौथी तक था. चौथी कक्षा तक आंबेडकर इसी स्कूल में पढ़े.

1978 में लिए गए इस फ़ैसले को लागू होने में 16 साल और लगे और अंततः ये 1994 में प्रभावी हो सका. यूनिवर्सिटी का पूरा नाम तो नहीं बदला जा सका लेकिन इसमें बीआर आंबेडकर का नाम जोड़ दिया गया और अब इसे 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी' कहा जाता है.

आख़िरकार समाज के सभी वर्गों ने इस नाम को स्वीकार कर लिया. लेकिन इसके पीछे हिंसा की कहानी भी दर्ज हो गई. 1978 में मराठवाड़ा के ऊंची जाति के लोगों ने दलितों पर हमले किए जिनमें कई लोग मारे गए, कई बेघर हो गए और सैकड़ों लोगों के रोज़गार छूट गए.

27 जुलाई 1978 को क्या हुआ था?

ये सब तब हुआ था जब राज्य की विधानसभा ने सर्वसम्मति से मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यूनिवर्सिटी करने का फ़ैसला लिया. 27 जुलाई 1978 को लिए गए इस फ़ैसले के बाद राज्य में दंगे भड़क गए. शाम को जब नाम बदले जाने की ख़बर लोगों तक पहुंची, मराठवाड़ा के कई इलाक़ों में हिंसा शुरू हो गई. नांदेड़ और परभानी के ग्रामीण इलाक़ों में सबसे ज़्यादा असर हुआ.

हालांकि ये दंगे नाम बदलने के बाद शुरू हुए थे लेकिन इनका चरित्र जातीय था. इलाक़े में तथाकथित ऊंची जातियों और पिछड़ी जातियों के लोग आमने-सामने आ गए थे. दंगों का शुरुआती दौर क़रीब दो महीनों तक चला जिसमें भीषण नुक़सान हुआ. लेकिन छोटी-मोटी घटनाएं अगले साल-डेढ़ साल तक होती रहीं और जो घाव इन्होंने दिए उन्हें भरने में कई साल और लग गए.

वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत बालेराव उस दौर को याद करते हुए बताते हैं, "विधानसभा ने शाम क़रीब चार बजे प्रस्ताव पारित किया था और सबसे पहले ख़बर 7 बजे क्षेत्रीय बुलेटिन से लोगों को मिली. तुरंत ही प्रदर्शन शुरू हो गए थे. औरंगाबाद में नाम बदलने का विरोध कर रहे छात्रों ने डेली मराठवाड़ा के दफ़्तर के बाहर भी मोर्चा निकाला था."

आबेंडकर की मूर्ति

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निशिकांत भालेराव उस समय एक युवा पत्रकार थे जो राजनीतिक घटनाओं और जातिगत उत्पीड़न पर रिपोर्टें लिख रहे थे. वो डेली मराठवाड़ा के संपादक अनंतराव भालेराव के बेटे हैं. इस क्षेत्र में इस अख़बार का काफ़ी प्रभाव रहा है. निशिकांत के पिता नाम बदलने का विरोध कर रहे थे लेकिन वो स्वयं सरकार के इस फ़ैसले के साथ थे और उन्होंने आंदोलन में भी हिस्सा लिया था.

'मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम' ने इस क्षेत्रीय पहचान को और गहरा कर दिया था और यूनिवर्सिटी के नाम में ये पहचान झलकती थी. कहने के लिए भले ही ये तर्क हो लेकिन जातिगत और सामाजिक विभाजन का एक मज़बूत अंडरकरंट था जिसने इस विरोध को हिंसक बना दिया.

मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी को आंबेडकर के नाम पर करने की मांग कई सालों से उठती रही थी. मराठवाड़ा और औरंगाबाद का आंबेडकर के साथ ख़ास रिश्ता है. आंबेडकर ने सामाजिक बदलाव लाने के लिए सबसे पहले साल 1950 में मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में पीपुल्ज़ एजुकेशन सोसायटी की नींव डाली थी और फिर 1952 में उन्होंने औरंगाबाद में मिलिंद कॉलेज की स्थापना की थी. मराठवाड़ा और पास के विदर्भ क्षेत्र के हज़ारों दलित छात्रों ने मिलिंद कॉलेज में दाख़िला लिया था.

उस दौर में औरंगाबाद और मराठवाड़ा दलित छात्रों के आंदोलन की ज़मीन बन गए थे. मराठवाड़ा के सामाजिक, राजनीतिक और शिक्षा जगत में आंबेडकर आंदोलन एक शक्तिशाली बल बन गया था. प्रदेश के बाक़ी हिस्सों में भी हालात ऐसे ही थे. इन वर्गों से मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की मांग उठने लगी थी.

शरद पवार के कांग्रेस से अलग होकर 1978 में प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ़) की सरकार बनाने तक इस मांग पर कोई क़दम नहीं उठाया गया था. पीडीएफ़ की सरकार ने एकमत से ये प्रस्ताव पारित करने का निर्णय लिया और 27 जुलाई को ये प्रस्ताव पारित हो गया.

वीडियो कैप्शन, दलितों के गीतों में ज़िंदा हैं अंबेडकर

सरकार के निर्णय की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही मराठवाड़ा क्षेत्र में हालात तनावपूर्ण हो गए. समूचे क्षेत्र में जातिगत दंगे शुरू हो गए और दलित परिवारों को निशाना बनाया जाने लगा. शरद पवार ने मराठी में लिखी अपनी जीवनी 'लोक माझे संगति' में इस बारे में विस्तार से लिखा है.

27 जुलाई 1978 के घटनाक्रम के बारे में पवार ने अपनी किताब में लिखा-

"जब कैबिनेट प्रस्ताव को अंतिम अनुमति देने के लिए बैठक कर रही थी तब ही मराठवाड़ा क्षेत्र में तनाव की ख़बरें आने लगीं थीं. दलितों पर हमले शुरू हो गए थे. उनके घर जलाए जा रहे थे."

पवार लिखते हैं, "पोचीराम कांबले नाम के एक दलित युवा की हत्या कर दी गई. नामांतर आंदोलन और उसके बाद के दिनों में 27 लोगों की ऐसी घटनाओं में जान गई. पोचीराम मतंग समुदाय से था. वो गांव का उप-प्रधान था. संसद में प्रस्ताव पारित होने के बाद दलित परिवारों ने दिवाली की तरह जश्न मनाया था. इससे आक्रोशित होकर उच्च जाति के लोगों ने हिंसक रास्ता चुन लिया और आग लगानी शुरू कर दी. ऐसी ही एक घटना में भीड़ ने पोचीराम के हाथ-पैर काटकर उसे ज़िंदा जला दिया था."

आबेंडकर

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जानें गईं, घर जल गए

हिंसा कई दिनों तक चलती रही. हिंसक भीड़ आमने-सामने थी. जहां हिंसक प्रतिक्रियाएं हो रही थीं पुलिस लाठीचार्ज कर रही थी और आंसू गैस के गोले दाग रही थी. दलितों पर हुए ज़ुल्म और उनके नुक़सान के दस्तावेज़ी सबूत हैं. कई समितियां गठित की गई थीं और फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीमें (तथ्यों की पड़ताल करने वाले दल) क्षेत्र में भेजे गए थे. केंद्र सरकार ने भी ज़मीनी हालात की रिपोर्ट देने के लिए एक दल को भेजा था.

छात्रों, शिक्षक संगठनों और ट्रेड यूनियनों के संगठन 'अत्याचार विरोधी मंच' ने भी ऐसी ही एक रिपोर्ट तैयार की थी. ये रिपोर्ट इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के मई 1979 के अंक में प्रकाशित हुई थी. मराठा क्षेत्र के दौरे के बाद तैयार की गई ये रिपोर्ट उस समय की ज़मीनी हक़ीक़त बयान करती है.

रिपोर्ट में कहा गया है, "गांवों में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा कई रूप में हुई. लोगों की हत्याएं हुईं, हरिजनों की औरतों के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ हुई. घर और झोपड़ियां जला दी गईं और सामान लूट लिया गया. बेघर दलितों को गांव से पलायन करना पड़ा. उनके कुएं प्रदूषित कर दिए गए थे, जानवरों को मार दिया गया था और उन्हें काम देना भी बंद कर दिया गया था. ये सब 67 दिनों तक चलता रहा. पीड़ितों को नागरिक अधिकारों के तहत प्राप्त सुरक्षा नहीं मिली."

इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि मराठवाड़ा के 9 हज़ार गांवों में से 1200 गांव इस हिंसा में प्रभावित हुए. नांदेड़, परभानी और बीड ज़िले हिंसा से प्रभावित थे. इन दंगों में क़रीब पांच हज़ार लोग बेघर हुए और 2500 दलित परिवारों का मनोबल टूट गया और वो बेहद मुश्किल परिस्थिति में आ गए. दो हज़ार लोगों को घर छोड़कर जंगलों में या शहर की तरफ़ भागना पड़ा. भूखमरी के बावजूद दहशत की वजह से दलित परिवार अपने गांवों में नहीं लौट पा रहे थे.

निशिकांत भालेराव कहते हैं, "निज़ाम के समय से ही मराठवाड़ा में सामंती व्यवस्था चली आ रही थी. दलित इस व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर थे. यदि वो ऊपर उठते तो समूचे क्षेत्र की राजनीति ही बदल जाती. कुछ लोगों को इसी बात का डर था."

आंबेडकर पर किताब

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मराठवाड़ा क्यों? दलित क्यों?

जब भी मराठवाड़ा दंगों की बात होती है ये सवाल उठता है. उस दौर में रहने वाले लोग, आंदलोनों में हिस्सा लेने वाले लोग और इस काले अध्याय का अध्ययन करने वाले लोग मानते हैं कि हिंसा इसलिए नहीं हुई थी क्योंकि नाम बदलकर आंबेडकर हो गया था बल्कि इसलिए हुई थी क्योंकि इससे दलित समुदाय का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.

उस समय मराठवाड़ा की आबादी क़रीब अस्सी लाख थी जिसमें से क़रीब 16.25 प्रतिशत अनुसूचित जातियां थीं.

पत्रकार और लेखक श्रीकांत भराडे ने 2018 में बीबीसी में लिखे लेख में कहा था, "आज़ादी से पहले ही बहुत से दलित परिवार जीवनयापन के लिए पलायन कर रहे थे. एक बार डॉ. आंबेडकर का नेतृत्व खड़ा हुआ तो ये प्रक्रिया और तेज़ हो गई. शहरों में शिक्षा और रोज़गार के मौके होते हैं और इससे गांव का पारंपरिक ढांचा हमेशा के लिए बर्बाद हो गया."

"कृषि अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गई. ज़मीदारों को खेतों के लिए मज़दूर नहीं मिल पा रहे थे. 1956 में आंबेडकर के साथ बहुत से दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था. पहले दलितों ने पारंपरिक काम छोड़े थे, अब धर्म भी छोड़ दिया था. अब तक झुककर चलने वाले दलित अब अपना सम्मान करने लगे थे. उच्च वर्ग को लग रहा था कि दलित अपनी पहचान भूल रहे हैं और अहंकारी हो गए हैं."

सवर्णों बनाम दलितों का तनाव स्पष्ट नज़र आ रहा था. मराठवाड़ा में दोनों ही पक्षों के छात्र ख़ास रूप से आंदोलित थे. इस आक्रोश की वजह से ही सरकार को नाम बदलने का फ़ैसला रोकना पड़ा ताकि इलाक़े में हालात सामान्य किए जा सकें.

अपनी जीवनी में शरद पवार लिखते हैं, "निर्णय का विरोध कर रहे आक्रोशित युवाओं के सामने ज़िला स्तर और क्षेत्रीय स्तर के सभी नेताओं ने समर्पण कर दिया था. हमारे लिए व्यवहारिक रूप से भी हर दलित परिवार को सुरक्षा मुहैया करा पाना असंभव हो रहा था. हम नहीं चाहते थे कि यूनिवर्सिटी का नाम बदलने को लेकर लोगों की जानें जाएं. हम युवाओं को समझाने में और उनका ग़ुस्सा शांत करने में नाकाम रहे. और आख़िरकार हमें नाम बदलने का अपना फ़ैसला वापस लेना पड़ा."

बाला साहब ठाकरे

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नामांतर का राजनीतिक परिणाम और मराठवाड़ा में शिवसेना का उदय

नामांतर आंदोलन और उसके बाद के जातिगत विभाजन ने मराठवाड़ा के राजनीतिक चरित्र को बदल दिया. इस दौरान पैदा हुईं दरारें दशकों बाद भी नज़र आती रहीं. लेकिन इसका एक अहम नतीजा इस क्षेत्र में शिवसेना का आना और राजनीतिक रूप से मज़बूत होना रहा. शिवसेना यहां इतनी मज़बूत हुई कि मराठवाड़ा को अब शिवसेना का गढ़ कहा जाता है.

शिवसेना और उसके नेता बाला साहेब ठाकरे ने खुलकर नामांतर का विरोध किया और इससे वो मराठवाड़ा की ग़ैर दलित आबादी में लोकप्रिय हो गए.

अपनी किताब जय महाराष्ट्र में वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर लिखते हैं, "1978 के बाद पहले सात-आठ साल तक शिवसेना ने नाम बदलने के मुद्दे की परवाह नहीं की. लेकिन जब शिवसेना ने मराठवाड़ा में अपना आधार मज़बूत करना शुरू किया तो बहुसंख्यक हिंदुओं ने प्रतिक्रिया देनी शुरू की. क्षेत्र के अमीर और उच्च मध्यम वर्ग के अधिकतर किसान बहुसंख्यक हिंदू वर्ग से थे और इन परिवारों के युवा छात्र नाम बदलने का विरोध कर रहे थे."

"1974 में वर्ली में हुए दंगों ने शिवसेना की दलित विरोधी स्थिति को पहले ही साफ़ कर दिया था. यही वजह थी कि मराठवाड़ा के किसान और छात्र आसानी से शिवसेना के साथ जुड़ रहे थे. ठाकरे को भी ये अहसास हो गया था कि यूनिवर्सिटी का नाम बदलने का विरोध करके वो आसानी से मराठवाड़ा में अपना आधार मज़बूत कर सकते हैं. इसके बाद उन्होंने नामांतर और दलितों का विरोध और उग्र कर दिया."

प्रकाश आकोलकर अपनी किताब में लिखते हैं कि शिवसेना ने क्षेत्र के अमीर किसानों का कई और मुद्दों पर भी समर्थन किया था. 1985-86 में जब बेरोज़गारी ज्वलंत मुद्दा बन गई और दलितों के मालिकाना हक वाली बंजर ज़मीन का मुद्दा उठा तो सेना ने ऐसी ज़मीन पर हमलों का समर्थन किया और दलितों के खेत बर्बाद कर दिए. इस दौरान दलितों का घर जलाए जाने की भी कई घटनाएं हुईं.

1985 के बाद से हिंदुत्व का एजेंडा भी मज़बूत हो रहा था, इसके साथ दलित विरोधी एजेंडे ने शिवसेना को मराठवाड़ा में तेज़ी से उभार दिया. शिवसेना के लिए राजनीतिक रूप से ये इतना फ़ायदेमंद रहा कि साल 1995 में जब सेना ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई तो शिवसेना के 15 विधायक सिर्फ़ मराठवाड़ा क्षेत्र से ही जीते थे. माना जाता है कि ठाकरे का लगातार नाम बदलने का विरोध करना भी इसकी एक वजह थी.

आख़िरकार जब साल 1994 में यूनिवर्सिटी का नाम फिर से बदला गया तब बाला साहेब ठाकरे ने नांदेड़ में कहा था, "जब तुम्हारे घर में खाने को भोजन नहीं है तो तुम्हें यूनिवर्सिटी की क्या ज़रूरत है."

यूनिवर्सिटी

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अंत में नाम का विस्तार हुआ

राजनीतिक हालात की वजह से भले ही नाम बदलने की मांग पीछे हट गई लेकिन ये कभी ठंडी नहीं पड़ी थी.

1992 के दंगों के बाद शरद पवार के फिर से कांग्रेस में लौटने और महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने के बाद 1994 में यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की मांग फिर से उठने लगी.

पवार ने इस मुद्दे पर फिर से राजनीतिक सहयोग जुटाना शुरू कर दिया. नाम बदलने के विरोध के पीछे एक बड़ी वजह मराठवाड़ा शब्द से नस्लीय लगाव था. तब सुझाव आया कि नाम बदलने के बजाए नाम का विस्तार कर दिया जाए.

फिर नया नाम 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी' प्रस्तावित किया गया जो दोनों ही वर्गों की भावना का सम्मान करता था. इसके साथ ही मराठवाड़ा के नांदेड़ में एक और यूनिवर्सिटी 'स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी' स्थापित की गई.

इन निर्णयों के बारे में अंतिम घोषणा 14 जनवरी 1994 को की गई. इस बार कोई विरोध नहीं हुआ.

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