जोधपुर: मूर्ति और झंडे को लेकर हुए हंगामे ने कैसे बदल दी शहर की सूरत: ग्राउंड रिपोर्ट

जालौरी चौक
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    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जोधपुर से

1992 में जब देश के तमाम क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई थी तब भी जोधपुर के लोगों के बीच ऐसा कुछ नहीं हुआ. नीली दीवारों और संकरी गलियों वाले जोधपुर शहर ने दो धर्मों के बीच विवाद कभी देखा ही नहीं.

लेकिन इस साल ईद की एक रात पहले यहां हालात तेज़ी से बदले. दो मई की रात 11 बजे जो विवाद यहां शुरू हुआ और जिस तरह वो फैलता गया वो कुछ ऐसा था जैसा जोधपुर के इतिहास में आज़ादी के बाद कभी नहीं हुआ.

इसके बाद शहर में आठ मई तक कर्फ़्यू बढ़ा दिया गया है.

यहां लोग अपने घरों के दरवाज़ों और छत पर ये देखने के लिए बाहर निकल रहे हैं कि आखिर कर्फ़्यू होता कैसा है?

लेकिन सवाल यही है कि आख़िर दो दिन में ऐसा क्या हुआ जिसने जोधपुर जैसे शांत शहर को सांप्रदायिक हिंसा की आग में धकेल दिया.

कैसे शुरू हुआ विवाद?

अब तक इस विवाद की शुरुआत झंडा बताया जा रहा था लेकिन दरअसल मामला झंडे से शुरू ही नहीं हुआ, वो केवल इस विवाद का दूसरा अध्याय है.

असल में ये मामला जालौरी गेट चौराहे पर लगी बालमुकुंद बिस्सा नाम के स्वंतत्रता सेनानी की प्रतिमा को लेकर शुरू हुआ. शहर के बीचोंबीच बने इस चौराहे पर हर धर्म के लोग अपने-अपने त्यौहारों पर सजावट करते हैं, चाहे वो महावीर जयंती हो, अंबेडकर जयंती हो या फिर रामनवमी.

इसी तरह परशुराम जयंती पर ब्राह्मण समाज ने यहां भगवा झंडे लगाए जिसे 2 मई की दोपहर ढाई बजे प्रशासन ने समुदाय की सहमति के बाद हटा दिया.

इसके बाद शाम को कथित तौर पर कुछ मुसलमान लड़कों ने ईद के लिए सजावट करने के इरादे से यहां हरे रंग के झंडे लगाए. इन झंडों को इस्लामिक इंडे माना जाता है. झंडे को प्रतिमा पर टिकाने के लिए काले टेप का इस्तेमाल किया गया जिस पर हिंदू समुदाय के लोगों ने आपत्ति जताई. देखते ही देखते सोमवार की देर रात इस मामले को लेकर दोनों गुटों में भयंकर झड़प हुई.

झंडा लगाते युवक

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जब झड़प हुई तो हिंदू समुदाय के लोगों ने हरे झंडों की पूरी सजावट हटाकर वहां भगवा झंडा लगा दिए.

नमाज़ की तैयारियों के लिए लगाए गए लाउडस्पीकर भी तोड़ दिए गए और यहां से जो हिंसा बढ़ी उसने जोधपुर के इतिहास में हिंसा के कारण लगे कर्फ़्यू का एक अध्याय जोड़ दिया.

जोधपुर के रहने वाले कहते हैं कि इस तरह की घटना इससे पहले कभी नहीं हुई थी.

जोधपुर हिंसा

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क्या बाहर से आए थे लोग?

देर रात पुलिस ने लाठीचार्ज करके माहौल पर नियंत्रण पाया लेकिन जब अगले दिन सुबह ईद की नमाज़ अदा की गई तो मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने इस चौक पर लगे भगवा झंडों पर आपत्ति जताई और यहां नारेबाज़ी होने लगी.

इसके बाद जो हुआ उसकी आग शहर के भीतरी इलाकों में फैल गई. शहर के अंदर जिन इलाकों में मिली-जुली हिंदू - मुसलमान आबादी रहती है वहां जमकर पत्थरबाज़ी हुई. गुस्साए लोगों ने सड़कों पर खड़ी गाड़ियां तोड़ दीं.

जोधपुर के ईदगाह रोड इलाके में रहने वाले देवेंद्र
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देवेंद्र के परिवार की चार पीढ़ियां पुराने जोधपुर के ईदगाह रोड इलाके में रह रही हैं. वह कहते हैं कि जिस तरह का शोर और उग्र भीड़ उन्होंने बीते दिनों देखी वो 'हमारे बीच के लोग' ही नहीं थे.

देवेंद्र कहते हैं, "बहुत शोर हुआ, भीड़ में शामिल कुछ लोगों के हाथों में हरे झंडे भी थे. सौ-डेढ़ सौ लोगों में से एक भी आदमी हमारी ईदगाह का नहीं था. हमारी यहां तीसरी-चौथी पीढ़ी है और मैं बता रहा हूं कि यहां का माहौल इतना अच्छा रहता है. उस दिन हमें पहली बार डर लगा, हमने खुद को घरों में बंद कर लिया. ये डर मुझे अपने पड़ोसी मुसलमानों का नहीं था. ये लोग कभी कुछ नहीं करेंगे लेकिन बाहर के लोगों का क्या ठिकाना? आज भी मैं बाहर जाऊं तो हम 'जय राम जी की' ही कहकर मिलेंगे लेकिन उस दिन कौन आया, कैसे हुआ कुछ समझ में नहीं आ रहा."

ऐसा कहने वाले अकेले देवेंद्र नहीं थे. एक बात जो हर कोई कहता दिखा वो था, हिंसा के सुनियोजित होने का दावा और ये भी कि इसे करने वाले लोग बाहर से आए थे.

ये बात आम लोगों के साथ-साथ प्रशासन भी कह रहा है लेकिन इसे साबित करने के लिए फिलहाल कोई पक्का सबूत अब तक नहीं मिला है. जिन लोगों को पुलिस ने अब तक गिरफ़्तार किया है उनमें से कोई ऐसा नहीं है जो शहर के बाहर का रहने वाला हो.

जावेद
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जालौरी गेट को हमेशा से अलग-अलग धर्म के लोग अपने-अपने पर्व त्यौहारों पर सजाते रहते हैं लेकिन इससे पहले कभी ईद पर कोई यहां देखी नहीं गई थी. ये पहली बार था जब इस चौराहे को मुसलमानों ने अपने त्यौहार के लिए सजाया लेकिन वो सजावट त्यौहार तक भी नहीं टिक सकी.

जावेद कहते हैं, "हमारे भी त्यौहार हैं, अगर हमने चौक को सजाने के लिए सोचा तो इसमें क्या ग़लत कर दिया. एक सिंगल डंडा था जो बीच में लगाया जाना था. झंडा टिक नहीं पा रहा था तो उन लड़कों ने ऊपर से बांधने की कोशिश की. मैं मानता हूं कि ऐसा करते हुए काली पट्टी बिस्सा जी के मुंह पर और गले पर जा रही थी जो ठीक नहीं था. लेकिन इससे कुछ लोगों को मारपीट करने का मौक़ा मिल गया और इन लोगों ने चौराहे पर जो लोग सजावट कर रहे थे उनके साथ मारपीट शुरू कर दी. अगर उन्हें पट्टी से दिक्कत थी तो वो पट्टी हटाते, पूरी सजावट क्यों हटा दी."

अगले दिन सुबह जब नमाज के बाद लोगों ने भगवा झंडे का विरोध किया तो यहां हिंसा और बढ़ी. तब जाकर पुलिस ने भगवा इंडा हटाकर यहां तिरंगा लगाया.

जोधपुर

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क्या पुलिस की लापरवाही से बिगड़ी बात?

अब तक इस मामले में 200 लोगों को सीआरपीसी की धारा 151 (कर्फ़्यू का उल्लंघन) के तहत गिरफ़्तार किया गया है और 20 लोगों को दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है. लेकिन ये लोग कौन हैं? क्या ये बाहर से आए थे? बीबीसी को पुलिस से अब तक ये जानकारी नहीं मिल पाई है.

लेकिन ये मामला सिर्फ दो गुटों के भिड़ जाने भर का नहीं है. हालात के बद से बदतर होने में प्रशासन की ओर से एक्शन में देरी को भी एक बड़ा कारण बताया जा रहा है... स्थानीय लोगों का आरोप है कि आग को पहले फैलने दिया गया और फिर प्रशासनिक अमला हरकत में आया.

लोगों का कहना है कि आमतौर पर हर त्यौहार के दौरान पुराने जोधपुर की तंग गलियों में पुलिस की तैनात की जाती है लेकिन इस बात एक रात पहले अंदर के इलाकों में पुलिस तैनात ही नहीं की गई. और एक चौराहे से शहर के अंदर तक हिंसा फैलने की ये अहम वजह बन गई.

नवज्योति गोगोई
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लोगों का कहना है कि नमाज़ के बाद चौराहे से तो पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज कर उसे भगा दिया लेकिन शहर के भीतर जमकर पत्थरबाज़ी की गई जिसके लिए पुलिस की कोई तैयारी नहीं थी.

बीबीसी से बात करते हुए जोधपुर के कमिश्नर नवज्योति गोगोई कहते हैं, "ये बात सही है कि दिन में 11 बजे से 1 बजे तक माहौल तनावपूर्ण था और कर्फ़्यू को लागू करते-करते दो बज गए थे. रात में हमने वक्त रहते लाठीचार्ज किया और अब पुलिस के मौजूद होने पर वहां टकराव की स्थिति नहीं है. हमने दोनों समुदाय के लोगों से बात भी की. नमाज़ के बाद स्थिति बिगड़ी और हमने स्थिति को काबू में किया. फिर शहरों में मामला बढ़ा तो हमने कर्फ़्यू लगा दिया. हमारी ओर से देरी तो नहीं हुई."

"हमने हिंदू और मुसलमानों के गुटों से बात की और दोनों से बातचीत के बाद मामला शांत हुआ. लेकिन ये बात सच है बीजेपी के विधायक और उनके समर्थक सुबह तक वहां रहे. वो लोग हमारी नेगोशियन में शामिल थे लेकिन सबके जाने के बाद भी वो वहां बने रहे. हम लोगों ने जिन लोगों पर भी एक्शन लिया है वो बेहद ऑब्जेक्टिव है और उसमें हमने वीडियो और हमारे इंटेलिजेंस के इनपुट को ध्यान में रखकर लिया है."

लेकिन शहर के अंदर आख़िर पुलिस क्यों नहीं तैनात की गई इसका कोई जवाब नवज्योति गोगोई ने नहीं दिया.

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हिंसा, राजनीति और मूर्ति

जोधपुर में हुए सांप्रदायिक मामले की कई परतें हैं, सिर्फ प्रशासनिक देरी ही नहीं, पार्टियों की राजनीति ने भी इस मामले को हवा दी है.

राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीजेपी पर दंगे भड़काने की कोशिश का आरोप लगाया है.

बीजेपी विधायक सूर्यकांता व्यास
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देर रात जब हिंसा भड़की तो बीजेपी विधायक सूर्यकांता व्यास अपने समर्थकों के साथ देर रात जालौरी गेट पर पहुंची और सुबह 6 बजे तक चौराहे पर ही रहीं.

लेकिन जब पुलिस ने देर रात हालात पर काबू कर लिया था जो बीजेपी के नेता चौराहे पर क्यों बने रहे?

बीजेपी विधायक सूर्यकांता व्यास बीबीसी के इस सवाल पर तल्ख़ होकर कहती हैं, "हम नहीं खड़े होंगे तो कौन होगा? इतना कुछ हो गया. जोधपर में वो हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ और हम कुछ न बोलें."

वह कहती है कि "कैसे किसी ने बिस्सा जी की प्रतिमा पर टेप लगाया. हम अपने लोगों के साथ खड़े थे. प्रशासन बताए कि वो कौन लोग थे और ये सब कैसे हुआ. हमारी गली में तो एक तरफ़ मस्जिद है तो दूसरी तरफ मंदिर. लेकिन जब नमाज़ होती है तो आरती रुक जाती है और जब आरती होती है तो नमाज़. हमारे यहां ऐसा क्यों हुआ."

सीएम अशोक गहलोत के बयान का हवाला देते हुए वह सवाल करती हैं, "अगर उन्हें लगता है कि ये सब बीजेपी करवा रही है तो सरकार उनकी है और प्रशासन भी उनका है वह कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते."

बीजेपी कार्यकर्ता कमलेश पुरोहित
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लेकिन सूर्यकांता इस बात का साफ़ जवाब नहीं देतीं कि रातभर चौक पर रुके रहना उन्होंने क्यों ज़रूरी समझा.

इस बात का जवाब उनके साथ वहां मौजूद बीजेपी कार्यकर्ता कमलेश पुरोहित देते हैं.

पुरोहित कहते हैं, "हमारे हिंदू लड़के काफ़ी उग्र हो रहे थे और हम उन्हें शांत करके भेजना चाह रहे थे. अगर हम चले जाएं तो कुछ और ना हो जाए. इस कारण हम सुबह होने तक वहीं बैठे रहे. लड़के चाह रहे थे कि जिन्होंने झंडा लगाया, उन्हें गिरफ़्तार किया जाए, लेकिन ऐसा ना होने पर वे आक्रोशित थे."

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दोनों समुदायों के लोग जख़्मी हुए

हिंसा का शिकार किसी एक धर्म विशेष के ही लोग नहीं हुए.

सोनोरोकाबास इलाक़े के रहने वाले शाकिर ईद की नमाज़ पढ़ने अपने दोस्त के साथ गए थे.

शाकिर पहले से बीमार हैं. उनकी दोनों किडनियां खराब हैं और उन्हें हर हफ़्ते डायलिसिस के लिए जाना पड़ता है.

लेकिन ईद की नमाज़ के बाद वापस आते समय उन पर लोहे के सरिये से हमला हुआ. अपना सिर बचाने के लिए उन्होंने हाथ बढ़ाया और उनका हाथ टूट गया.

वह कहते हैं, "वो लोग मेरे सिर पर हमला कर रहे थे, लेकिन शुक्र है कि हाथ के ज़ख्म ने बचा लिया. अभी तो गनीमत है कि बस हाथ ही टूटा है."

शाकिर
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सोनारोकाबास इलाक़े में रहने वाले दीपक नाम के एक शख़्स ने भी कहा है कि उन पर भी चाकू से हमला हुआ है.

हिंसा के बाद दोनों ही गुटों के नेताओं से प्रशासन ने बात की है ताकि हालात को बेहतर किया जा सके. लेकिन इस सांप्रदायिक हिंसा को राजनीतिक चश्मे को हटाए बिना नहीं देखा जा सकता. ये बात यहां के लोग भी खुद कह रहे हैं. कुछ लोग मानते हैं कि राज्य में अगले साल चुनाव हैं और करौली और जोधपुर को इनसे अलग करके देखना सही नहीं होगा.

मुफ़्ती शेर मुहम्मद ख़ान रिज़वी
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मुफ़्ती शेर मोहम्मद ख़ान रिज़वी इस शांतिवार्ता में मुसलमानों के नेता के तौर पर शामिल थे.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैंने बैठक में भी वही कहा है जो आपसे कहूंगा. अगर किसी मुसलमान लड़के से कोई ग़लती हुई है तो मैं अपनी कौम की ओर से माफ़ी मांगता हूं और अगर हिंदू भाईयों ने कुछ ग़लत किया है तो मैं अपनी बिरादरी की ओर से माफ़ भी करता हूं. हमें अपने शहर को शांत बनाना है. लेकिन ये ज़रूर कहूंगा कि कुछ लड़के इस बात से गुस्से में आए कि हमारे त्यौहार में झंडे भी निकाले और भगवा झंडा भी लगा दिया."

"वो यही मांग रहे थे कि हमारा नहीं लगाया ना सही, लेकिन तिरंगा लगाइए. वो काम बाद में पुलिस ने किया. मैं किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा रहा लेकिन राजस्थान में अगले साल चुनाव हैं तो लोग चाह रहे हैं कि ऐसा कुछ हो कि दो धर्म के लोग आपस में लड़ें और हमारी रोटी सिक जाए. वो कौन हैं आप जानते हैं. करौली से जोधपुर तक यही हो रहा है."

बीजेपी कार्यकर्ता कमलेश पुरोहित भी आशंका जताते हुए कहते हैं "देखिए ऐसा होना एक बार भी ठीक नहीं है, इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं होने के मौक़े खुलने लगते है."

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