चंडीगढ़ को लेकर हरियाणा-पंजाब क्यों लड़ रहे हैं, क्या हैं इसके सियासी मायने

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- Author, अवतार सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
केंद्र सरकार के दखल देने से केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को लेकर मामला एक बार फिर गरम हो गया है.
पंजाब का पानी और पंजाबी भाषी इलाकों को राज्य को देने सहित चंडीगढ़ पर लंबे समय से पंजाब के अधिकार का दावा करने वाला शिरोमणि अकाली दल सत्ता से बाहर है. इस बार पंजाब में आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने चंडीगढ़ पर अपना अधिकार जताया है.
चंडीगढ़ मुद्दा फिर चर्चा में क्यों है?
गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में चंडीगढ़ में कर्मचारियों पर केंद्र के सेवा नियम को लागू करने की घोषणा की थी.
केंद्र के फैसले के बाद, पंजाब के राजनीतिक दलों और राज्य के अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करने वालों ने इसे पंजाब के अधिकारों पर हमला करार दिया.
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इसके खिलाफ प्रस्ताव पेश किया जिसमें पंजाब को चंडीगढ़ देने की मांग की गई.

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मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ट्वीट किया, "आज केंद्र की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध पंजाब विधान सभा में प्रस्ताव पारित किया गया. चंडीगढ़ पर पंजाब के हक़ के लिए हर स्तर पर आवाज़ उठाई जाएगी. देश के लिए गोली खाने के लिए सबसे पहले अपना सीना आगे करने वाले शूरवीरों की धरती पंजाब के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा."
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क्या 'आप' को मिलेगा इसका राजनीतिक फायदा?
दिल्ली के बाद पंजाब में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी विशेष सत्र बुलाया.
राजनीतिक विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इतिहासकारों का मानना है कि इस मुद्दे को उठाना आम आदमी पार्टी की राजनीतिक मजबूरी है लेकिन चंडीगढ़ पर पंजाब का दावा बहुत मजबूत है.

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पंजाबी यूनिवर्सिटी में पंजाब हिस्टोरिकल स्टडीज विभाग के पूर्व हेड और प्रोफेसर सुखदयाल सिंह का कहना है, "केंद्र सरकार हरियाणा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के लिए मुद्दे खड़े कर रही है जिसके कारण चंडीगढ़ का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक मकसद से उठाया जा रहा है."
उन्होंने कहा, "पंजाब से उसकी राजधानी लाहौर छिने जाने के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी मानना था कि पंजाब को दिल्ली से दूर एक राजधानी की जरूरत है जो दिल्ली के प्रभाव से आजाद होकर काम कर सके."
"अब जब भाजपा सरकार आम आदमी पार्टी के लिए मुद्दे उठा रही है, अन्य दलों को चुप नहीं रहना चाहिए."
"पंजाब का जितना हक चंडीगढ़ के ऊपर है उससे ज्यादा पानी के ऊपर है क्योंकि पानी की नदियां पंजाब की हैं."
पानी पर पंजाब के पास चंडीगढ़ से ज्यादा अधिकार हैं क्योंकि नदियां पंजाब की हैं."
बाबा फरीद विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. प्यारे लाल गर्ग कहते हैं, "1981 के बाद से किसी भी पार्टी ने पंजाब के अधिकारों के लिए बात नहीं उठाई. सिर्फ प्रस्ताव पास करना ही सब कुछ नहीं होता. ये आप पार्टी का उठाया हुआ सिर्फ एक कदम है. इसके बाद वो प्रधानमंत्री से भी मिल सकते हैं लेकिन सरकार को आगे बढ़कर फैसले लेने होंगे जिससे हर रोज होने वाले झगड़े खत्म हो जाएं."

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वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, "जो पार्टी सत्ता में होगी उसके लिए चंडीगढ़ का मुद्दा उठाना मजबूरी है. अभी तो सरकार ने सिर्फ प्रस्ताव ही पास किया है, ये देखने वाली बात होगी कि आगे क्या होता है?"
उन्होंने कहा, "भाजपा हमेशा से पंजाब की जायज मांगों के खिलाफ रही है. भाजपा ने अकाली दल के धर्म युद्ध मोर्चा शुरू करने का भी विरोध किया था."
पंजाब को चंडीगढ़ देने के पक्ष में कांग्रेस और अकाली, बीजेपी का रुख अलग
पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने सोमवार को अपने ही अंदाज में ट्वीट कर चंडीगढ़ पर पंजाब राज्य का हक जताया है.
सिद्धू ने लिखा, "पंजाब के 27 गाँव उजाड़ के बनाया हुआ चंडीगढ़, पंजाब का था, है और रहेगा… कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना …चंडीगढ़ तो बहाना है, पंजाब के दरियाई पानी पे निशाना है."
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पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने भी ट्वीट कर कहा कि चंडीगढ़ पर बढ़ते गुस्से का पहला नुकसान पंजाब और हरियाणा के लोगों के बीच बढ़ते भाईचारे को होगा जिसे सिंघु और टिकरी बॉर्डर ने मजबूत किया है. हरियाणा भी एक विशेष सत्र बुला रहा है जिसके जरिए पंजाब को जवाब दिया जाएगा.
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विधानसभा में बोलते हुए अकाली दल विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने भी पंजाब सरकार के प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार ने पंजाब के हितों की रक्षा नहीं की. उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ के मुद्दे पर अकाली दल राज्य सरकार के साथ खड़ा होकर लड़ाई लड़ेगा.
भारतीय किसान यूनियन (एकता- उगराहां) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां का कहना है कि चंडीगढ़, भाषा और एसवाईएल मुद्दे जनता का ध्यान खींचने के लिए उठाए जाते हैं. इन मुद्दों को न तो केंद्र सरकार निपटाना चाहती है और न ही राज्य सरकार
भाजपा विधायक अश्विनी शर्मा ने पंजाब सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए प्रस्ताव का विधानसभा में विरोध किया था. उन्होंने कहा, "अपनी कमजोरियां और नाकामयाबियां छिपाने के लिए लोगों में भ्रम पैदा करने की राज्य में परंपरा चल रही है. ये प्रस्ताव उसी का हिस्सा है. सदन को बताना चाहिए कि केंद्र ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम की किस धारा का दुरुपयोग किया है."
हरियाणा ने भी बुलाया विशेष सत्र
पंजाब विधानसभा के चंडीगढ़ पर एक प्रस्ताव पारित करने के बाद हरियाणा में भी इसी तरह की मांग उठाई गई थी. इसके बाद हरियाणा की बीजेपी-जेजेपी सरकार ने भी चंडीगढ़ पर अपना हक जताने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया. हरियाणा की विधानसभा ने सर्वसम्मति से चंडीगढ़ और एसवाईएल पानी के लिए प्रस्ताव पारित किया.
प्रस्ताव पर बोलते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा, "नदी परियोजना पंजाब और हरियाणा की संयुक्त संपत्ति है."
"सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, पंजाब और हरियाणा सरकारों को बार-बार बैठकर समाधान निकालने को कहा है. मुझे नहीं पता कि सुप्रीम कोर्ट ऐसा क्यों कह रहा है. लेकिन हम एक बार भी नहीं बैठे हैं. पंजाब हरियाणा से बात नहीं करना चाहता. हम इसे कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहते लेकिन अब जब ये नई सरकार आ गई है, तो सवाल यह है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया."
एएनआई के अनुसार, मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा, "चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी थी, है और रहेगी."
प्रस्ताव से पहले मनोहर लाल खट्टर ने कहा था, "बड़े भाई का सम्मान तभी तक है जब छोटे भाई के हित की चिंता करे लेकिन छोटे भाई को आंख दिखाने लग जाए तो उसकी भी लिमिट नहीं है. इसके बदले वो क्या करेगा ये भूलना नहीं चाहिए."
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कैसे बना चंडीगढ़
चंडीगढ़ को पंजाब के करीब 27 गांवों को तोड़कर बनाया गया था जिसकी वजह से पंजाब के लोग और राजनीतिक दल इस पर अपना अधिकार समझते हैं

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डॉ. प्यारे लाल गर्ग कहते हैं, "चंडीगढ़ पंजाब का है क्योंकि यह पंजाब के गांवों की धरती के ऊपर बसी है. आज सरकार चंडीगढ़ को केंद्र के अधीन लाना चाहती है. कल को वे पंजाब को केंद्र शासित प्रदेश में शामिल करने की बात कह सकते हैं."
"चंडीगढ़ को राजधानी शहर अधिनियम के तहत बनाया गया था जो आज भी मौजूद है. उस समय चंडीगढ़ के कर्मचारियों को भी प्रतिनियुक्ति पर माना जाता था."
पंजाब का पुनर्गठन कब हुआ था?
विभाजन के बाद, वर्तमान पंजाब और हरियाणा नवंबर 1966 में पंजाब पुनर्गठन अधिनियम (1966) के माध्यम से अस्तित्व में आया. पंजाब के कुछ हिस्से हिमाचल प्रदेश को दे दिए गए थे. वर्तमान में चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश है. चंडीगढ़ इस समय हरियाणा और पंजाब दोनों राज्यों की राजधानी है. कर्मचारियों के लिए 60-40 का अनुपात रखा गया है.
1982 में शिरोमणि अकाली दल ने धर्म युद्ध की घोषणा की जिसमें चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की मांग भी शामिल थी.

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पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, "पंजाब में संघर्ष के बाद दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1970 में चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की घोषणा की. इस घोषणा के साथ ये भी था कि फाजिल्का का इलाका हरियाणा को दिया जाएगा. पंजाब ने ये फैसला मानने से मना कर दिया."
पंजाब को चंडीगढ़ देने के लिए संत फतेह सिंह ने संघर्ष किया था. इसके अलावा, 1969 में जेल में भूख हड़ताल के 74वें दिन दर्शन सिंह फेरूमान की मृत्यु हो गई थी.
दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच 'राजीव लोंगोवाल समझौता' 24 जुलाई 1985 को हुआ था. जिसमें चंडीगढ़ पंजाब को देने का फैसला लिया गया था.
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