सतलुज-यमुना लिंक नहर: अमरिंदर सिंह ने क्यों कहा 'जल उठेगा पंजाब'

कैप्टन अमरिंदर सिंह

इमेज स्रोत, NARINDER NANU

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

क्या सतलुज-यमुना लिंक नहर से भारत की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है? क्या नहर बनने से पंजाब जल उठेगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो पंजाब और हरियाणा के बीच हमेशा से ही विवाद का हिस्सा रहे हैं.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने पंजाब और हरियाणा के बीच इस विवाद को लेकर मध्यस्ता करने की कोशिश की. बैठक में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर भी शामिल थे.

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने सतलुज-यमुना नहर योजना को लेकर एक न्यायाधिकरण यानी ट्रिब्यूनल की मांग की है जो समयबद्ध तरीक़े से दोनों नदियों में पानी की उपलब्धता का पुनः आंकलन करे.

अमरिंदर सिंह ने दोनों राज्यों के बीच हुई बैठक को सार्थक बताया हालांकि उन्होंने इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा का ख़तरा भी जताया.

उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की तरफ़ से माहौल बिगड़ने की कोशिश की जा रही है और वो 'सिख्स फ़ॉर जस्टिस' नाम के अलगाववादी संगठन को पुनर्जीवित करने का भरसक प्रयास कर रहा है.

जानकार मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद इस परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर अब भी बहुत सारे पेंच फंसे हुए हैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री का कहना था कि उनका राज्य पंजाब के साथ इस मुद्दे को लेकर वार्ता के लिए हमेशा तैयार है मगर उन्होंने शर्त रखी कि नहर के निर्माण में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए क्योंकि उनके प्रदेश के किसान पानी की कमी की वजह से पहले से ही त्रस्त हैं.

दोनों ही प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने इस मुद्दे को लेकर अपने अपने राज्यों के आला अधिकारियों के साथ बैठक भी की.

212 किलोमीटर लंबी नहर

यमुना

इमेज स्रोत, Hindustan Times

जल शक्ति मंत्री के अनुसार यमुना के पानी के बंटवारे को लेकर कोई विवाद इसलिए भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इसको लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के बीच सहमति वर्ष 1994 में ही बन गयी थी और अब सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश आ गया है.

212 किलोमीटर लंबी इस नहर की परियोजना का 90 किलोमीटर का हिस्सा हरियाणा से गुज़रने के लिए प्रस्तावित है. जबकि हरियाणा ने 90 किलोमीटर का काम पूरा कर लिया है, पंजाब में इसका काम अब भी अधूरा पड़ा हुआ है.

वरिष्ठ पत्रकार विपिन पब्बी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ये परियोजना इसलिए भी खटाई में जाती नज़र आ रही है क्योंकि इसके लिए पंजाब की सरकार ने जिन किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया था, अब वो ज़मीन उन किसानों को वापस कर दी गई है.

वो कहते हैं कि कुछ इलाक़ों में इस परियोजना पर काम शुरू भी हुआ था, मगर वहां बुलडोज़र के ज़रिये ज़मीन को समतल कर दिया गया है.

सतलुज-यमुना लिंक नहर के सवाल पर वर्ष 2016 में पंजाब के सभी कांग्रेस के विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया था. अमरिंदर सिंह ने भी अपनी लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी थी.

सोमवार को जल शक्ति मंत्रालय की पहल पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के दौरान हरियाणा के मुख्यमंत्री ने रावी और ब्यास का मामला उठाया और कहा कि इन दोनों नदियों का बचा पानी सीधा पकिस्तान को चला जा रहा है. बैठक में इन नदियों के पानी का इस्तेमाल पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों के लिए कैसे किया जाना चाहिए, इस पर भी योजना बनायी जानी चाहिए.

पंजाब-हरियाणा में सभी दल एकसाथ

प्रदर्शनकारी

इमेज स्रोत, Hindustan Times

विपिन पब्बी के अनुसार इन दोनों नदियों का पानी बेकार ही बह रहा है जिसका उपयोग नहीं किया जा रहा है.

दूसरे जानकार कहते हैं कि अमरिंदर सिंह सही कहते हैं कि ये काफ़ी ज्वलंत मुद्दा है जिसमें उल्लेखनीय बात ये है कि दोनों राज्यों के राजनीतिक दल एक साथ हैं.

जहां पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी नहर नहीं बनने के पक्ष में हैं, वहीँ हरियाणा में भी पानी और नहर के समर्थन में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोक दल के अलावा दूसरे राजनीतिक संगठन एक साथ हैं.

पंजाब में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में ये मुद्दा वोटरों के बीच गर्माएगा.

प्रदर्शनकारी

इमेज स्रोत, Hindustan Times

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कोई किसी की सड़क, बिजली और पानी नहीं रोक सकता. उनका कहना था कि जब वो मुख्यमंत्री थे तब केन्द्रीय गृह मंत्री की पहल पर सभी राजनीतिक दलों की बैठाक हुई थी और सब इस बात से सहमत थे कि नहर बननी चाहिए.

वो कहते हैं, "अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट आदेश दे दिया है तो इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नहीं है. सतलुज-यमुना लिंक तो बनकर ही रहेगी."

लेकिन इस मुद्दे को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल यानी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दुविधा में हैं. एक राज्य में वो इसके पक्ष में हैं तो दूसरे राज्य में विरोध में हैं.

पानी सबके लिए ज़रूरी है और दोनों ही राज्यों में भूमिगत जल का स्तर दिन ओ दिन नीचे जाता जा रहा है. केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बावाजूद भी इस मुद्दे के सुलझने के आसार कम ही नज़र आ रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)