मोदी सरकार ने असम, मणिपुर और नगालैंड के कुछ इलाकों से अफ़स्पा क़ानून क्यों हटाया

अफ़्सपा

इमेज स्रोत, Dilip Sharma/BBC

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए

पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों असम, मणिपुर और नगालैंड के 'अशांत क्षेत्रों' में कटौती को सालों से हो रहे विरोध को शांत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.

इन राज्यों में अशांत क्षेत्रों को सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम (अफ़स्पा) 1958 के तहत अधिसूचित किया गया था. एक राय रही है कि अफ़स्पा क़ानून के तहत "सुरक्षाबलों को मिली सर्वव्यापी सुरक्षा" इस अशांत इलाक़े के लिए "न्याय की राह की प्रमुख बाधा" है.

अफ़स्पा को हटाना इलाक़े में एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा और राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा भी रहा है. लिहाज़ा लोग केंद्र सरकार द्वारा तीन राज्यों के कुछ क्षेत्रों से इस क़ानून को निरस्त करने के क़दम का स्वागत कर रहे हैं.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि नगालैंड, असम और मणिपुर राज्यों में अफ़स्पा के तहत आने वाले क्षेत्रों को शुक्रवार (1 अप्रेल) से कम कर दिया जाएगा.

असम के 23 ज़िलों से क़ानून को पूरे तौर पर और एक ज़िले से आंशिक रूप से हटाया दिया गया है.

राज्य के कुल 33 ज़िलों में से यह क़ानून डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट, कार्बी आंगलोंग, पश्चिम कार्बी आंगलोंग, डीमा हसाउ समेत कछार के लखीपुर उप-मंडल में प्रभावी रहेगा. असम में यह क़ानून 1990 से प्रभावी है.

अफ़्सपा

इमेज स्रोत, Dilip Sharma/BBC

सबसे ज़्यादा विरोध मणिपुर में

पूर्वोत्तर राज्यों में अफ़स्पा का सबसे ज्यादा विरोध मणिपुर में देखने को मिला है. मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मिला 16 साल तक भूख हड़ताल पर रहीं.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में सूबे के छह ज़िलों के 15 पुलिस थाना क्षेत्रों को अशांत क्षेत्र की अधिसूचना से बाहर रखा है, लेकिन 16 ज़िलों के 82 पुलिस थानों में लागू रहेगा.

जिन छह ज़िलों के 15 पुलिस स्टेशनों से अफ़स्पा को हटाया गया है उनमें इम्फाल वेस्ट (इम्फाल, लाम्फेल, सिटी, सिंगजामेई, सेकमाई, लमसांग, पटसोई), इम्फाल ईस्ट (पोरोमपत, हेइंगांग, लामलाई इरिलबंग), थौबल, विष्णुपुर, काकचिंग और जिरीबाम शामिल है.

वहीं, नगालैंड के सात ज़िलों के 15 पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र से अफ़स्पा को हटाया गया है. लेकिन 13 जिलों के 57 पुलिस स्टेशनों में यह क़ानून लागू रहेगा. अशांत क्षेत्र की अधिसूचना 1995 से पूरे नगालैंड में लागू है.

गृह मंत्रालय ने पिछले साल 26 दिसंबर को नगालैंड समेत कुछ इलाक़ों से चरणबद्ध तरीके से अफ़स्पा क़ानून हटाने को लेकर अध्ययन करने के लिए एक कमेटी का गठन किया था. उसी कमेटी की सिफारिशों के आधार पर यह निर्णय लिया गया है.

गृह मंत्रालय का यह आदेश 1 अप्रैल से प्रभावी होगा और अगले छह महीने तक लागू रहेगा. मंत्रालय के अनुसार इन तीन राज्यों में अफ़स्पा के तहत क्षेत्र काफ़ी कम कर दिए गए हैं लेकिन इसे पूरी तरह से हटाया नहीं गया है.

सुरक्षाकर्मी

इमेज स्रोत, AFP

अरुणाचल में स्थिति जस की तस रहेगी

हालांकि, इस क़ानून को लेकर अरुणाचल प्रदेश में यथास्थिति बनी रहेगी. अर्थात राज्य के नामसाई और महादेवपुर के दो पुलिस स्टेशनों और तिरप, चांगलांग, लैंगडिंग के तीन ज़िलों में अफ़स्पा लागू रहेगा.

असम में सालों से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते है, 'अफ़स्पा बहुत विवादास्पद क़ानून है और इसको लेकर यहां के लोगों में भारी नाराज़गी रही है. ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा पूर्वोत्तर के कुछ इलाक़ों से इस क़ानून को हटाने का फैसला दरअसल इस क्षेत्र के लोगों के ग़ुस्से को कम करने का एक प्रयास है. वैसे तो इस क़ानून का सालों से विरोध हो रहा है लेकिन पिछले साल 4 दिसंबर को भारतीय सेना की गोलियों से नगालैंड के मोन ज़िले के ओटिंग गाँव के 14 नागरिकों की मौत के बाद पूर्वोत्तर में जिस व्यापक स्तर पर विरोध सामने आया उससे केंद्र सरकार पर दवाब बना. हालांकि सरकार ने मोन ज़िले से इस क़ानून को नहीं हटाया है.'

वो कहते हैं, असम में भी 68 बार इस क़ानून की अवधि को बढ़ाया गया और अब जाकर 23 ज़िलों से इसे पूरी तरह हटाया है. लेकिन सरकार ने केवल छह महीने के लिए ही इस क़ानून को हटाया है. अब आगे सब कुछ यहां की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.'

वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी

इमेज स्रोत, Dilip Sharma/BBC

इमेज कैप्शन, वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी

एक सवाल का जवाब देते हुए पत्रकार गोस्वामी कहते हैं, 'ऐसे कई मामलों में निर्दोष नागरिकों को कार्रवाई का सामना करना पड़ा जिससे इस क़ानून के ख़िलाफ विरोध बढ़ता गया. अब जिन इलाक़ों से इस क़ानून को हटा लिया गया है वहां से सेना को भी वापस बुला लिया जाएगा. दरअसल सरकार का यह निर्णय इरोम शर्मिला जैसे कार्यकर्ताओं के आंदोलन का नतीजा है.'

ये भी पढ़ें -

नागा होहो के प्रमुख एचके झीमोमी

इमेज स्रोत, Dilip Sharma/BBC

इमेज कैप्शन, नागा होहो के प्रमुख एचके झीमोमी

फ़ैसले पर क्या बोलीं इरोम शर्मिला

नगालैंड में नागा समुदाय के सर्वोच्च जनजातीय संगठन नागा होहो के प्रमुख एचके झीमोमी ने कहा, हम आंशिक रूप से नहीं बल्कि पूरे पूर्वोत्तर से अफ़स्पा हटाने की मांग कर रहे हैं और यह मांग लगातार जारी रहेगी. सरकार की यह घोषणा एक और संदेश है कि भारत सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता, भले ही वह ब्लैक एंड व्हाइट में आश्वासन दे. यही कारण है कि 24 साल बाद भी भारत-नागा शांति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है.

इरोम शर्मिला

इमेज स्रोत, Hindustan Times

केंद्र सरकार के इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इरोम चानू शर्मिला ने मीडिया में कहा है कि मेरे जैसे कार्यकर्ता के लिए यह वास्तव में एक अच्छा क्षण है. दरअसल यह एक नई शुरुआत है और दशकों से चली आ रही लड़ाई का परिणाम है. एक पुराने और औपनिवेशिक क़ानून को निरस्त करने का निर्णय मुझे लोकतंत्र का वास्तविक संकेत लगता है. इस दिशा में यह पहला कदम उठाया गया है और मैं चाहती हूं कि अफ़स्पा को पूरे उत्तर-पूर्व से स्थायी रूप से समाप्त कर दिया जाए.

अफ़स्पा को अलगाववाद से प्रभावित पूर्वोत्तर भारत में सेना को कार्रवाई में मदद के लिए 11 सितंबर 1958 को पारित किया गया था. बाद में जब 1989 में जम्मू-कश्मीर में चरमपंथ ने सिर उठाया तब 1990 में इसे वहां भी लागू कर दिया गया था.

उत्तर-पूर्वी भारत में जातीय समूहों ने लंबे समय से इस कठोर क़ानून का विरोध किया है. दरअसल अफ़स्पा क़ानून भारतीय सुरक्षा बलों को कहीं भी अभियान चलाने और बिना किसी पूर्व वारंट के किसी को भी गिरफ़्तार करने का अधिकार देता है. ये क़ानून किसी कार्रवाई के दौरान ग़लती से या अपरिहार्य परिस्थितियों में किसी नागरिक को मार देने वाले सैनिकों को भी बचाता है.

ये भी पढ़ें -

अफ़्सपा

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या कहते हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के कुछ इलाक़ों से अफ़स्पा को निरस्त करने के सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइटोंगबम ने बीबीसी से कहा," यह सही दिशा में उठाया गया एक कदम है क्योंकि लंबे समय से इस क़ानून को लेकर कुछ नहीं किया गया था. लेकिन अफ़स्पा को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए हमारा आंदोलन जारी रहेगा."

इरोम चानू शर्मिला के आंदोलन से लंबे समय तक जुड़े रहे बबलू ने आगे बताया," अफ़स्पा की आड़ में मणिपुर में जो फ़र्ज़ी मुठभेड़ों की घटनाएं हुई थी उसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई 39 मामलों की जांच कर रही और अब तक 21 मामलों में आरोप पत्र दाखिल हो चुके हैं. लेकिन गृह मंत्रालय अभियोजन की मंजूरी देने से मना कर रहा है. जबकि सात मामलों में भारतीय सशस्त्र बल के लोग संलिप्त हैं. सीबीआई ने मजिस्ट्रेट के समक्ष सारे सबूत दाखिल किए हैं. लिहाज़ा हम चाहते हैं कि गृह मंत्रालय अगला कदम फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में लिप्त लोगों के ख़िलाफ़ अभियोजन को मंजूरी दे."

दरअसल मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि साल 1979 से 2012 तक मणिपुर में कई लोग फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गए हैं. इनमें नाबलिग़ और औरतें भी शामिल हैं.

वीडियो कैप्शन, त्रिपुरा दंगों का सच: बीबीसी पड़ताल

साल 2010-12 में मानवाधिकार संगठन "एक्स्ट्रा ज्युडिशियल विक्टिम फैमिली एसोसिएशन" ने क़रीब 1528 ऐसे मामलों में सेना और पुलिस द्वारा फ़र्ज़ी मुठभेड़ की बात उठाई थी और इस संदर्भ में इन सभी घटनाओं की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी. मानव अधिकार के लिए काम करने वाले कई लोगों का यह आरोप है कि अफ़स्पा की आड़ में सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारियों ने निर्दोष लोगों की जान ली है.

इस बीच असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने केंद्र सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए एक ट्वीट के ज़रिए कहा, "आंशिक वापसी के साथ ही असम के सभी निचले [पश्चिमी], मध्य और उत्तरी ज़िले अब अफ़स्पा से मुक्त हो गए हैं. सेना ने पहले ही विभिन्न क्षेत्रों से अपने शिविर हटा लिए हैं. हालांकि, सेना को आतंकवाद रोधी के लिए तैनात नहीं किया जाएगा. लेकिन वो ख़ुफिया जानकारी जुटाने और अन्य गतिविधियों में सक्रिय रहेगी."

नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने भी एक ट्वीट कर कहा, "यह पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थिरता, सुरक्षा और समृद्धि लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है."

जबकि मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने दावा करते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मणिपुर में पिछले पांच वर्षों में शांति की स्थिति में सुधार के आधार पर यह निर्णय लिया है.

ये भी पढ़ें -

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)