जड़ी-बूटियों के सहारे धाक जमाने की कोशिश में नए ज़माने की चाय कंपनियां

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इमेज कैप्शन, बीना नोंगथोम्बम ने अपना सारा जीवन जंगल जड़ी-बूटियां बटोरने में लगाया है.
    • Author, प्रीति गुप्ता और बेन मॉरिस
    • पदनाम, मुंबई

पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर की रहनेवाली बीना नोंगथोम्बम जंगली फल-फूल चुनकर स्थानीय बाजार में बेचती थीं और इससे बमुश्किल ही उनका गुजारा चल पाता था. वह इस बारे में बताती हैं, ''मेरा पूरा दिन बाज़ार में बीतता था लेकिन इसके बाद भी मुश्किल से ही बेहतर जीवन जीने लायक आमदनी होती थी.''

नोंगथोम्बम के परिवार में जंगली फल-फूल चुनने और जमा करने का काम कई पीढ़ियों से लोग करते आए हैं, लेकिन 2018 में एक ग्राहक को उनका उत्पाद और व्यवहार इतना पसंद आया कि उसने उन्हें नौकरी की पेशकश कर दी.

नोंगथोम्बम के लिए यह जीवन बदलने वाला क्षण था. इसके बाद से वह 'ड्वेलर टीज़' के लिए उत्पाद मुहैया कराने का स्रोत बनी हुई हैं. यह स्टार्ट-अप कंपनी अनोखे और भूला दिए गए भारतीय पौधों और फूलों को केंद्र में रखकर काम कर रही है, जिसका इस्तेमाल चाय या मिश्रित पेय पदार्थ में किया जाता है.

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इमेज कैप्शन, बीना नोंगथोम्बम और एली यामबेम (दाएं) जंगली फलों और फूलों के बारे में स्थानीय ज्ञान को सहेजने की कोशिश कर रही हैं.

हालांकि, अब भी नोंगथोम्बम को काफी काम करना पड़ता है. वह सुबह-सुबह अपना काम शुरू कर देती हैं और भारतीय जैतून, रोसेल और सुमेक बेरी जैसी सामग्रियों की तलाश में गांव-गांव जाती हैं. इनमें से कुछ तो किसान उपजाते हैं और कुछ की तलाश में जंगलों तक जाना पड़ता है.

उन्हें जिस उत्पाद की तलाश होती है उसके लिए वह दूरदराज़ के गांवों में बस से जाती हैं और बाद में फिर ऑटो से खरीदारी करके लौटती हैं.

उन्होंने बताया, '' मुझे जंगली फल-फूल जमा करने का काम अच्छा लगता है. बचपन से हम इन फलों को चुनते आए हैं लेकिन पूर्वोत्तर भारत के अलावा शायद ही लोग इनके बारे में जानते हैं.''

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इमेज कैप्शन, चाय में सुगंध के लिए मिलाए जाने वाला ये रोज़ेल नाम का पौधा सारे पूर्वोत्तर भारत में मिलता है.

एली याम्बेम ने 2016 में ड्वेलर टीज की स्थापना करीब 18 लाख रुपये (25,000 डॉलर) से की. मणिपुर की राजधानी इम्फाल में अभी उनके पास तीन कैफे हैं. उनका कहना है कि चाय इस इलाके की पहचान का एक मजबूत पहलू है.

उन्होंने कहा, ''हमारे पास स्थानीय पौधों की भरमार है, जिन्हें अभी दुनिया के साथ साझा किया जाना है. पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय पौधों के साथ जुड़ी यादें हर पीढ़ी के साथ धूमिल होती जा रही हैं. मैं मूल परंपरा को संरक्षित करना चाहती थी और मौलिक स्वाद को लोगों के साथ साझा करना चाहती थी.''

याम्बेम नोगमान्गाखा या फ्लोगोकान्थुस नाम के एक पारंपरिक औषधीय गुण वाले पौधे को याद करती हैं. वह बताती हैं कि मणिपुर के लोग इसका इस्तेमाल सर्दी-बुखार ठीक करने में करते हैं. वह कहती हैं कि उन्हें याद है कि बचपन में उनकी दादी इस पौधे की पत्तियों को पानी में उबालती थीं जिससे उन्हें सर्दी, खांसी और बुखार में राहत मिलती थी.

अगर आप चाय के बारे में सोच रहे हैं तो यहां स्पष्ट कर दूं कि 'टी बोर्ड भारत' का कहना है कि अगर उत्पाद में न्यूनतम 70 फीसदी चाय पत्ती है तभी वास्तव में उसे चाय कहा जा सकता है.

हालांकि, इस गणना से ग्राहकों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि बाजार में ग्राहक आकर्षक और औषधीय मिलन वाली चाय को पसंद कर रहे हैं. टी बोर्ड के चेयरमैन प्रभात बेजबरुआ ने कहा, '' चाय के कारोबार का ये ऐसा क्षेत्र है जिसमें ख़ूब चहल-पहल है.''

बेज़बरुआ कहते हैं इस व्यवसाय में काफी प्रतिस्पर्धा है, ''यह सच्चाई है कि इनमें से ज्यादातर स्टार्टअप शुरू होने के शीघ्र बाद बंद हो जाएंगे लेकिन जो कुछ भी इससे आगे निकल पाएंगे उनमें चाय की लोकप्रियता और स्वीकार्यता को देखते हुए अगला यूनिकॉर्न कंपनी बनने की जबरदस्त क्षमता है.''

यूनिकॉर्न ऐसे स्टार्ट-अप को कहते हैं जिसका मूल्यांकन एक अरब अमेरिकी डॉलर वाली कंपनी के रूप में किया जाता है.

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इमेज कैप्शन, अरोमिका के संस्थापक रंजीत बरुआ 'वेलनेस मार्केट' में एक मुकाम हासिल करा चाहते हैं.

तो इस क्षेत्र में सफलता की चाभी क्या है?

बेज़बरुआ कहते हैं कि ग्राहकों को इस पारंपरिक पेय को एक नए तरह से पेश किए जाने की तलाश है. ग्राहकों के मन-मस्तिष्क में उपजी महत्वाकांक्षा को जो परोस पाएंगे, उसी से ब्रांड की सफलता का रास्ता तय होगा.

इसी तरह की उम्मीद में रंजीत और डॉली शर्मा बरुआ हैं.

इस दंपति ने 2018 'अरोमिका' नाम से एक टी फर्म की शुरुआत की. ये छोटे बागानों से चाय खरीदते थे और पेय पदार्थ को ऐसे अनोखे पौधे और फूलों के साथ मिलाकर तैयार करते थे, जिन्हें स्वास्थ्य के लिहाज से लाभदायक बताया जाता है.

इस कंपनी की मिश्रित सामग्री में भूत झोलकिया (तीखी मिर्च) और काली चाय भी शामिल है, जिसे सर्दी और खांसी में अमूमन पीने की सलाह दी जाती है. उन्होंने बताया कि यह पेय पदार्थ कोविड महामारी के दौरान अच्छा बिक रहा है.

ये पेय पदार्थ उन ग्राहकों को आकर्षित करते हैं जो किसी उत्पाद को स्वास्थ्य परक होने की नजर से देखते और खरीदते हैं. ऐसे खरीदार तथाकथित 'वेलनेस इंडस्ट्री' की धाक जमा रहे हैं. रंजीत बरुआ कहते हैं, '' यह सेक्टर आगे बढ़ रहा है और स्वास्थ्य परक पेय का इस कारोबार में बेहद महत्व है.''

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इमेज कैप्शन, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है.

बड़ी कंपनियां भी हैं इस मैदान में

हालांकि, यह सेक्टर एकदम नया नहीं है और भारत का दूसरा सबसे बड़ा चाय ब्रांड 'टाटा टी' समेत चाय के कारोबार में स्थापित अन्य कंपनिया भी इस क्षेत्र में आ चुकी हैं.

टाटा ने कहा कि उपभोक्ता नए मिश्रण और स्वाद के अनुभव को आजमाने की कोशिश में हैं और प्रीमियम उत्पादों को चुन रहे हैं. टाटा अपने गुड अर्थ और टीपिग्स ब्रांडों में निवेश कर रहा है. बड़ी कंपनियों के इस आकर्षक पेय पदार्थ के कारोबार में आने के बाद छोटे स्टार्टअप को पता है कि उन्हें अपने प्रतिभागियों से आगे रहने के लिए कुछ अलग परोसना है.

नोंगथोम्बम को उम्मीद है कि इस पेय पदार्थ के बाजार को देखते हुए उन्होंने जंगली उत्पादों को जमा करने में अपना जीवन जो लगाया है, वह आने वाले वर्षों में उपयोगी होगा.

वे कहती हैं, '' जिस दिन बाजार में मैं एलिजाबेथ से मिली वह दिन मेरे लिए काफी भाग्यशाली रहा. उन्हें तत्काल मेरी क्षमता समझ में आ गई और इसे देखते हुए उन्होंने मुझे नौकरी पर रख लिया. अब मुझे वेतन मिलता है और मेरे कठिन मेहनत की सराहना भी की जाती है. यह मेरे जीवन को बदलने वाला रहा है.''

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