असम में चाय बागान के मज़दूर 167 रुपये दिहाड़ी में कैसे करते हैं गुज़ारा?

चाय बाग़ान के कामगार

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, असम के मुरमुरिया चाय बागान से
अपनी पसंदीदा इंडियन स्पोर्ट्सवुमन को चुनने के लिए CLICK HERE

"चाय बागान में पूरे 6 दिन काम करने पर हमें 880 रुपये मिलते हैं. इतनी महंगाई है और केवल 167 रुपये दिहाड़ी मिलती है. हमें राशन नहीं मिलता. तेल का पैसा नहीं मिलता. लकड़ियों के पैसे नहीं मिलते. मच्छरदानी के पैसे नहीं मिलते. दवाइयां तक नहीं मिलतीं. इतने कम पैसे में बहुत मुश्किल से गुज़ारा होता है."

असम के मुरमुरिया चाय बागान में काम करने वाली 38 साल की रूमी कर्मकार बड़ी उदासी के साथ ये बातें कहती हैं.

जोरहाट ज़िले में मौजूद मुरमुरिया चाय बागान असम चाय निगम लिमिटेड का बागान है जहां करीब 1080 मज़दूर काम करते हैं. अपने साथी मज़दूरों के साथ ड्यूटी खत्म कर घर लौटने के दौरान रूमी ने अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों पर बीबीसी से बात की.

रूमी कर्मकार, चाय श्रमिक, मुरमुरिया चाय बागान, जोरहाट

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

इमेज कैप्शन, रूमी कर्मकार

वह कहती हैं, "सुबह 6 बजे काम पर जाने के लिए रात के 3 बजे उठना पड़ता है. बच्चों के लिए दिन का खाना बनाकर सुबह घर से निकलती हूं. एक दिन काम पर नहीं जाऊंगी तो चूल्हा नहीं जलेगा."

"घर पर खाने वाले हम आठ लोग हैं और बागान में केवल मेरा काम ही स्थायी है. पति मज़दूरी करने बाहर जाते हैं. कई बार उन्हें काम नहीं मिलता. पांच बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाना पड़ता है. हम बहुत मुश्किल में चल रहे हैं. सरकार हमारी दिहाड़ी 351 रुपये कर दे और बागान में राशन-पानी देने की भी व्यवस्था करे."

वीडियो कैप्शन, इस बार टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

असम के ढेकियाजुली में बीते रविवार (7 फरवरी) को एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चाय मज़दूरों की सुविधाओं को बढ़ाने और उनके जीवन को आसान बनाने की बात कही थी.

केंद्र सरकार ने इस बार देश के बजट में चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूरों के लिए एक हज़ार करोड़ रुपये की विशेष योजना की घोषणा की है. लेकिन सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद असम के कई चाय बागानों में मज़दूर खतरनाक और भयावह स्थितियों में काम करने को मजबूर हैं.

असम में अगले तीन महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं और चाय जनजाति समुदाय के प्रमुख संगठन मौजूदा बीजेपी सरकार पर श्रमिकों की दिहाड़ी को लेकर वादा-खिलाफी का आरोप लगाते हैं. पिछले रविवार को जब प्रधानमंत्री मोदी ढेकियाजुली की जनसभा में टी वर्कर्स के लिए उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई विशेष योजनाओं को गिनवा रहे थे, उस समय आस-पास के चाय बागानों में असम टी ट्राइबस स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

चाय बाग़ान के कामगार

इमेज स्रोत, dilip Sharma

चाय जनजाति समुदाय के एक और प्रमुख संगठन ऑल असम आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने चाय श्रमिकों की दिहाड़ी बढ़ाने समेत अपनी तीन प्रमुख मांगों को लेकर कई जगह बड़े पोस्टर लगाए हैं.

दरअसल इस समय चाय जनजाति समुदाय के संगठन अपनी तीन प्रमुख मांगों को लेकर बीजेपी सरकार के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इनकी मांग है कि सरकार तत्काल प्रभाव से चाय मज़दूरों की न्यूनतम दैनिक मज़दूरी को 351 रुपये करे. इसके साथ ही चाय जनजाति समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दें और चाय जनजाति के लोगों को ज़मीन का पट्टा आवंटित करवाए.

टंकेश्वर राजपूत, नेता, असम टी ट्राइबस स्टूडेंट्स एसोसिएशन - बीच में काला कोट पहने

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

इमेज कैप्शन, टंकेश्वर राजपूत (बीच में काला कोट पहने)

अपने कार्यकर्ताओं के साथ जोरहाट राजस्व मंडल कार्यालय के सामने शुक्रवार को धरना-प्रदर्शन करने के बाद असम टी ट्राइबस स्टूडेंट्स एसोसिएशन के नेता टंकेश्वर राजपूत ने बीबीसी से कहा, "असम में 2016 में मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में जब बीजेपी सरकार बनी थी उस समय चाय श्रमिकों की दिहाड़ी 351 रुपये करने, ज़मीन का पट्टा देने और एसटी दर्जा दिलवाने का आश्वासन दिया गया था. अब इस सरकार का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है. चुनावी आचार संहिता लागू होने में एक महीने से भी कम का समय बचा है लेकिन अब तक सरकार ने कोई वादा पूरा नहीं किया."

टी ट्राइबस स्टूडेंट्स नेता आगे कहते हैं, "असम में हमारी जनजाति की जनसंख्या लगभग एक करोड़ 20 लाख है और 42 विधानसभा सीटों पर हमारे लोगों की निर्णायक भूमिका होती है. कांग्रेस सरकार ने 70 साल शासन किया लेकिन चाय जनजाति समुदाय की प्रमुख मांगें पूरी नहीं कीं, इसलिए 2016 में हमारे समुदाय ने परिवर्तन के लिए बीजेपी को समर्थन दिया था. लेकिन अब तक हमारे लोगों को कुछ हासिल नहीं हुआ."

प्रधानमंत्री मोदी की असम यात्रा और चाय जनाजति समुदाय की प्रगति पर कही गई बातों का जवाब देते हुए टंकेश्वर कहते हैं, "प्रधानमंत्री पहले भी यहां आए थे और हमारी जनजाति को कई बार आश्वासन दिया. लेकिन एक भी वादा आजतक पूरा नहीं किया. जिन चाय मज़दूरों की मेहनत के कारण असम की चाय पूरे विश्व में जानी जाती है उन्हीं श्रमिकों को न्यूनतम दिहाड़ी तक नहीं मिलती. हमारे श्रमिक के घर जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि वे किस बदहाली में जीवन बीता रहे हैं. कई श्रमिक ऐसे भी है जिन्हें एक टाइम खाना नसीब होता है. इतनी महंगाई में 167 रुपये में क्या मिलेगा?"

चाय बाग़ान के कामगार

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

चाय बागान में काम करने के दौरान मिलने वाली सुविधाओं पर रूमी कर्मकार कहती हैं, "पहले काम करने के लिए चप्पल मिलती थी. तिरपाल मिलता था लेकिन अब इनके बिना ही काम करना पड़ता है. पीने के पानी के लिए भी सप्ताह में 20 रुपये देने पड़ते हैं. जो मज़दूर पैसे नहीं दे पाता उसका पानी बंद कर दिया जाता है. बागान में रहने के लिए हमारा जो क्वार्टर है वो आंधी-तूफान में कई बार टूट चुका है. तीन-चार बार पत्र लिखकर मरम्मत के लिए निवेदन कर चुके हैं लेकिन आजतक कोई नहीं आया."

राज्य में असम चाय निगम लिमिटेड के 15 चाय बागान हैं और वहां लगभग 16,748 श्रमिक काम करते हैं. लेकिन बात जहां तक मज़दूरों की सुविधाओं की है तो हर जगह स्थिति कमोबेश एक जैसी ही देखने को मिलती है.

दरअसल, असम चाय निगम लिमिटेड के 'बीमार घोषित' किए गए चाय बागानों को 2006 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने पुनर्जीवित किया था. हालांकि इसके बाद भी यहां काम करने वाले मज़दूरों के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया.

असम सरकार ने इसी महीने चाय बगीचा धन पुरस्कार मेला स्कीम के तहत सात लाख से अधिक चाय श्रमिकों के बैंक खातों में प्रत्येक को 3000 रुपये ट्रांसफर किए हैं. इससे पहले भी बीजेपी सरकार ने 2,500 रुपये की दो नकद किश्त इन चाय श्रमिकों के खाते में ट्रांसफर की थी.

चाय श्रमिक रूमी स्वीकारती हैं कि - उसके बैंक खाते में भी सरकार द्वारा डाले गए रुपये आए हैं लेकिन वह इस तरह की वित्तीय मदद को पर्याप्त नहीं मानतीं.

वह कहती हैं, "सरकार इस तरह पैसे से मदद करने के बदले हमारी दिहाड़ी 351 रुपये कर दे. साथ ही हमारे चाय बागान की व्यवस्था को ठीक करे ताकि वहां हमें राशन-पानी की सुविधाएँ मिल सकें."

संजय कृष्णा तांती

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

इमेज कैप्शन, संजय कृष्णा तांती

हालांकि बीजेपी टी मोर्चा जोरहाट ज़िले के अध्यक्ष संजय कृष्णा तांती दावा करते हैं कि - 2016 में उनकी पार्टी की सरकार बनने के बाद चाय जनजाति समुदाय की प्रगति के लिए बहुत काम किया गया है.

वह कहते हैं, "चाय श्रमिकों की दिहाड़ी 351 रुपये करने का जो मुद्दा है उस पर हमारी सरकार चर्चा कर रही है और अगले करीब 10 दिन के अंदर इस मामले का समाधान हो जाएगा. 2016 में यहां हमारी सरकार आने के बाद चाय बागान इलाकों में जो विकास की अवधारणा है वो दिखाई देने लगी है."

"चाय बागान तक जाने वाली सड़कें, अंदर की गलियाँ पक्की बनाई जा रही हैं. हमारी सरकार ने करीब 8 लाख चाय श्रमिकों के बैंक अकांउट खुलवाए हैं. हमारी सरकार चाय जनजाति के लोगों की ज़मीन और घर उनके नाम करने की व्यवस्था कर रही है. शिक्षा को बेहतर करने के लिए चाय बागानों में हाई स्कूल बनवाए जा रहे हैं. ऐसा पहले किसी सरकार के समय नही हुआ था."

अगर आपकी सरकार ने इतना काम किया है तो फिर चाय जनजाति के लोग विरोध क्यों कर रहे हैं?

इस सवाल का जवाब देते हुए संजय कृष्णा तांती कहते हैं, "चाय श्रमिकों की दिहाड़ी बागान मालिक बढ़ाते हैं. श्रमिकों की मज़दूरी बढ़ाने के लिए असम चाय मज़दूर संघ को बात करनी चाहिए थी. लेकिन वो कुछ नहीं कर पा रहा है. चाय बागान मालिक इस मुद्दे को कोर्ट ले गए हैं. फिर भी हमारी सरकार बागान मालिकों के साथ बात कर रही है और 10 दिन के भीतर चाय श्रमिकों के लिए एक अच्छी खबर आएगी."

चाय बाग़ान के कामगार

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

हाल ही में असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक जनसभा में चाय श्रमिकों के लिए कहा था कि 10 दिनों तक और प्रतीक्षा करें. हम आपकी मज़दूरी बढ़ाने के लिए एक अधिसूचना जारी करेंगे. अगली कैबिनेट बैठक के बाद आप अच्छी खबर सुनेंगे.

असम में करीब 850 पंजीकृत चाय बागान हैं जिनमें से 555 चाय बागान ऊपरी असम इलाके में हैं. असम सरकार के श्रम विभाग द्वारा पिछले साल 26 अगस्त को जारी की गई मज़दूरी की न्यूनतम दरों के अनुसार अर्ध-कुशल श्रमिक की मज़दूरी 352 रुपये 29 पैसे निर्धारित की गई थी जबकि अकुशल श्रमिक की मज़दूरी 303 रुपये 76 पैसे तय की गई.

हालांकि इसकी तुलना में चाय श्रमिकों की प्रतिदिन न्यूनतम मज़दूरी काफी कम है. देश के अन्य कई राज्यों में काम करने वाले चाय मज़दूरों की तुलना में भी असम के चाय श्रमिकों की दिहाड़ी सबसे कम है. साल 2017 में असम के चाय मज़दूरों की दिहाड़ी को केवल 30 रुपए बढ़ाया गया था, इसके बाद इन मज़दूरों को 167 रुपए दिहाड़ी मिलती है.

चा

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

असम के चाय बागानों में श्रमिकों की न्यूनतम मज़दूरी के अलावा भी कई सारी समस्याएं देखने को मिलती हैं. चाय श्रमिकों के संगठनों की शिकायत है कि राज्य के करीब 155 चाय बागान अस्पतालों में डॉक्टर उपलब्ध नहीं है.

मज़दूरों के रहने की जगह अव्यवस्थित है जहां उनके मकान टूट गए हैं और शौचालय, बिजली, पानी की सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं. जबकि भारत में कानून है कि बागान मालिक मज़दूरों को रहने के लिए घर और टॉयलेट सुविधा देंगे और उनकी मरम्मत की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही होगी.

असम में चाय जनजाति के लोगों का इतिहास डेढ़ सौ साल पुराना है लेकिन आज भी यह समुदाय राज्य के सबसे पिछड़े समुदायों में से एक माना जाता है.

BBC ISWOTY

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)