पश्चिम बंगाल की बीरभूम हिंसा ने क्यों याद दिलाया 22 साल पुराना नानूर कांड

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, सूचपुर (नानूर) से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में नानूर ब्लॉक का सूचपुर गांव भी 27 जुलाई 2000 से पहले तक उतना ही अनाम था जितना बीते सोमवार को सूरज ढलने तक इसी ज़िले में रामपुरहाट का बोगटुई गांव.
बोगटुई में पहले तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की हत्या और उसके बाद आगज़नी में गांव के कम से कम आठ लोगों की मौत ने करीब दो दशकों से गुमनामी में रहे इस गांव को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है.
वो घटना भले सूचपुर गांव में हुई थी. लेकिन उसे नानूर कांड के नाम से ही जाना गया.
दरअसल, इस गांव में करीब 22 साल पहले कथित सीपीएम कार्यकर्ताओं ने तृणमूल कांग्रेस समर्थक 11 खेतिहर मजदूरों की गला रेत कर हत्या कर दी थी. उसके बाद अब बोगटुई में ही सामूहिक हत्या हुई है. ऐसे में बोगटुई की घटना का ज़िक्र होते ही नानूर के इस गांव का नाम अनायास ही सामने आ जाता है.
विश्वभारती विश्वविद्यालय के लिए मशहूर शांतिनिकेतन से कोई 30 किमी दूर मुख्य सड़क पर बने ईंट भट्ठे के बगल से एक पतली लेकिन पक्की सड़क दो गांवों को पार कर इस गांव तक पहुंचती है.
ज़मीन पर कब्ज़े के लिए हिंसा
शनिवार को बीबीसी हिंदी की टीम जब इस गांव में पहुंची तो सब कुछ सामान्य था. कोई अपने खेतों में काम कर रहा था तो कोई अपने पशुओं को चारा खिला रहा था. युवा पीढ़ी ने उस सामूहिक हत्याकांड के बारे में अपने बुज़ुर्गों से जाना था.
कई लोगों से पूछने के बाद हम पहुंचे उस जगह जहां सुबह पांच बजे सूरज की पहली फूटते ही ज़मीन पर कब्ज़े के लिए बड़े पैमाने पर हुई एकतरफा हिंसा में 11 बेकसूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. अब वो जगह काफी बदल गई है.
एक स्थानीय महिला कैमरे पर बात करने को तो तैयार नहीं हुई. लेकिन उस खेत के पास ही उसका मकान बना है. वो बताती हैं, "मेरी तब नई-नई शादी हुई थी और गर्भवती होने के कारण मैं बर्दवान में अपने मायके में थी. लेकिन उस घटना के बाद गांव में इतना आतंक था कि मैं कई महीनो बाद अपनी नवजात बच्ची के साथ ससुराल लौट सकी."
जिस खेत में हत्या हुई थी उसके आसपास अब कई मकान बन गए हैं. जिस जामुन के पेड़ के नीचे गला रेत कर 11 लोगों की हत्या की गई थी, वो भी शायद इस हिंसा को नहीं सह पाने के कारण सूख गया. अब वहां धान के पौधे लहलहा रहे थे.
बाबू स्थानीय हाट में अस्थायी दुकान लगाते हैं. वो बताते हैं, "उस दिन गांव में हत्या हुई थी. मैं तो कारोबार के सिलसिले में स्थानीय हाट में गया था. वहां खबर मिलने पर पुलिस के डर से मैं घर ही नहीं लौटा. मैं अपने रिश्तेदारों के घर छिपा रहा और कई दिनों बाद गांव लौटा."
"बम की आवाज़ों से होती थी सुबह"
इसी गांव के एक अन्य बुजुर्ग अपना नाम तो नहीं बताते लेकिन घटना का ब्योरा देते हैं. वो बताते हैं, "मैं घटना के दिन बहन के घर गया था. वहां सुना कि सुबह पांच बजे ही गला रेत कर 11 लोगों की हत्या कर दी गई है. गुंडे बम और हथियारों के साथ गांव में घुसे थे.
उसके बाद गांव को घेर लिया था और तोड़-फोड़ की, दुकानें लूट लीं और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया. हमारे गांव के तमाम लोग जान बचा कर भाग गए थे. परिस्थिति कुछ शांत होने के बाद मैं वापस आया."
गांव के युवा मनोज खान बताते हैं, "मैंने इन हत्याओं के बारे में अपने पिता से सुना था. सीपीएम के गुंडों ने 11 किसानों, जो तृणमूल कांग्रेस समर्थक थे, की हत्या कर दी थी. पहले बम की आवाज से ही सुबह होती थी. लेकिन अब यह इलाका शांत है. 22 साल पहले हुई उन हत्याओं के आरोप में कई लोगों को आजीवन कारावास की सजा मिली थी. कुछ लोग अब तक जेल में हैं. उनमें सीपीएम के कई नेता भी शामिल थे."
एक अन्य युवा प्रदीप शेख बताते हैं, "मैं तो बहुत छोटा था. मैंने अपने मां-बाप से उस घटना के बारे में सुना था. सीपीएम और तृणमूल की लड़ाई के कारण हुई उन हत्याओं के बाद गांव के तमाम लोग भाग गए ते. यह इलाका कभी सीपीएम का गढ़ था. उस मामले में कई लोगों को सज़ा हुई, कई आरोपियों की मौत भी हो चुकी है."

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ताजिया बीबी को तो उस दिन की घटना ऐसे याद है मानो कल की ही बात हो. उसका ज़िक्र करते हुए उनकी आंखों के सामने वो भयावह मंज़र घूमने लगता है. बढ़ती उम्र के बावजूद उनको तारीख़ और समय तक याद है.
वो बताती हैं, "वर्ष 2000 में 27 जुलाई की सुबह करीब छह बजे सीपीएम समर्थकों की हिंसा में 11 लोग मारे गए थे. वो हिंसा ज़मीन पर कब्ज़ की लड़ाई के कारण हुई थी. बेहद दुखद घटना थी. उसके बाद पूरा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था. हमलोग जानबचाने के लिए गांव चोड़ कर भाग गए थे. इस कांड के कई आरोपी अब तक जेल में हैं."
लेकिन आखिर उस दिन हुआ क्या था?
वाममोर्चा के शासनकाल में भी बीरभूम ज़िला राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा अशांत इलाके के तौर पर कुख्यात था. जिले में नानूर के सूचपुर गांव में सीपीएम समर्थकों की एक भीड़ ने 11 भूमिहीन किसानों की बेरहमी से गला काट कर हत्या कर दी थी.
तब इसे इलाके पर वर्चस्व दोबारा कायम करने के उसके अभियान के तौर पर देखा गया था. उस समय इलाके में तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे मज़बूत हो रही थी. इस हत्याकांड के बाद ममता बनर्जी, जो तब रेल मंत्री थीं, ने घटनास्थल का दौरा किया और मृतकों के परिजनों को रेलवे में नौकरी देने का भरोसा दिया था.
सभी मरने वाले टीएमसी के समर्थक और अल्पसंख्यक और अनुसूचित जनजाति तबके के थे. उस भयावह घटना के दस साल बाद सीपीएम के 44 नेताओं और कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. उनमें ज़िला स्तर के कई प्रमुख नेता शामिल थे.
इस कांड के एक प्रमुख गवाह अब्दुल खालेक पर मई 2005 में जानलेवा हमला हुआ था जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इसके अलावा मृतकों के परिवारों को भी लगातार धमकियां दी गई ताकि वे इस मामले की पैरवी से पीछे हट जाएं.
इस सामूहिक कांड के ठोस सबूत होने के बावजूद सीपीएम लंबे समय तक इसकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार करती रही. यही नहीं, उसने इसका दोष तृणमूल कांग्रेस के माथे पर मढ़ने की भी नाकाम कोशिश की. इस तथ्य के बावजूद कि तमाम मृतक तृणमूल के समर्थक थे.
केशपुर में सीपीएम ज़ोनल समिति के तत्कालीन सदस्य इम्तियाज़ अली ने दावा किया कि नानूर हत्याकांड समेत ग्रामीण इलाकों में होने वाली तमाम हिंसक झड़पें भूमिहीन किसानों और ज़मींदारों के बीच टकराव का नतीजा हैं.

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उनका दावा था कि इन ज़मींदारों को तृणमूल कांग्रेस का समर्थन हासिल है. इम्तियाज़ अली की दलील थी कि वाममोर्चा सरकार ने बरसों पहले भूमिहीनों में जमीन के पट्टे बांटे थे. भूमि सुधार के दौरान ज़मींदारों ने इसके लिए अपनी ज़मीन दी थी. अब वही लोग तृणमूल की सहायता से अपनी ज़मीन वापस लेने का प्रयास कर रहे थे.
तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने भी कभी नानूर कांड की ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की. उसकी बजाय उन्होंने उस दौरान सीपीएम कार्यकर्ताओं की कथित मौत का ही प्रचार किया.
नानूर हत्याकांड के महीने भर बाद ही बसु ने दावा किया था कि तृणमूल कांग्रेस ने वाममोर्चा के कम से कम आठ सौ कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी है. लेकिन धीरे-धीरे सबूतों की रोशनी में यह साफ हो गया कि नानूर कांड में बीरभूम जिला सीपीएम का ही हाथ था.
यह गांव हालांकि अब उस दुखद घटना को भुला कर आगे बढ़ चुका है. लेकिन रामपुरहाट के सामूहिक हत्याकांड ने एक बार फिर लोगों के ज़ेहन में नानूर कांड की यादें ताज़ा कर दी हैं.
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