कोई यूपीए नहीं है- ममता बनर्जी ये कह कर क्या जताना चाहती हैं

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुंबई में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद पवार से मुलाक़ात के बाद पत्रकारों से कहा, "यूपीए क्या है? कोई यूपीए नहीं है."
दरअसल बुधवार को पत्रकारों ने ममता बनर्जी से पूछा था कि क्या शरद पवार को यूपीए का नेतृत्व करना चाहिए? इसके जवाब में ममता बनर्जी ने यूपीए पर ही सवाल उठा दिए और नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया.
ममता ने कहा, "आज जो परिस्थिति चल रही है देश में, जैसा फ़ासिज़्म चल रहा है, इसके ख़िलाफ़ एक मज़बूत वैकल्पिक ताक़त बनानी पड़ेगी, अकेला कोई नहीं कर सकता है, जो मज़बूत है उसे लेकर करना पड़ेगा."
हाल के दिनों में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के बाहर कई दौरे किए हैं और विपक्ष के नेताओं से मुलाक़ात की है. राजनीतिक विश्लेषक इसे ममता बनर्जी की विपक्ष की राजनीति में कांग्रेस की जगह लेने की कोशिश के रूप में देखते हैं.
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस यूपीए का हिस्सा रही है लेकिन साल 2012 में वो इससे अलग हो गईं. 2014 और फिर 2019 चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद ये गठबंधन सिमट गया है.

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क्या है यूपीए?
2004 में बनीं राजनीतिक परिस्थितियों के जवाब में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतशील गठबंधन यानी यूपीए बना था. तब से ही यूपीए ने कई चुनौतियों का सामना किया है. शुरुआत में वामदल इसका अहम घटक थे लेकिन साल 2008 में वो इससे अलग हो गए. यही नहीं यूपीए के कई सहयोगी दलों ने अपनी बात मनवाने के लिए दबाव की राजनीति का भी इस्तेमाल किया.
2004 से 2014 के बीच कांग्रेस के नेतृत्व में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार का हिस्सा रहे कई दल गठबंधन का साथ छोड़ गए. 2009 के चुनाव में यूपीए ने अप्रत्याशित जीत हासिल की, वहीं 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ी बीजेपी के सामने गठबंधन को करारी हार भी मिली.
2004 के चुनाव से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था. लेकिन चुनावों में कांग्रेस 145 सीटों के साथ देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. बीजेपी को उस चुनाव में 138 सीटें मिलीं थीं.
सीटों के लिहाज़ से बीजेपी और कांग्रेस के बीच तब बहुत अधिक फासला नहीं था. लेकिन धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाले राजनीतिक दल बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के उद्देश्य से एकजुट होने लगे. कांग्रेस सबसे बड़ा दल थी ऐसे में गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस के पास ही आया.
2004 चुनाव के बाद बनी परिस्थितियों में सीपीएम के तत्कालीन महासचिव वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने गठबंधन बनाने के प्रयासों का नेतृत्व किया.

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चार वामदलों- सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक ने गठबंधन का समर्थन तो किया लेकिन सरकार में शामिल नहीं हुए. वामदलों ने सरकार का समर्थन करने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिम प्रोग्राम-सीएमपी) पर हस्ताक्षर किए. ये समझौता 14 मई 2004 को हुआ था.
यूपीए में कांग्रेस और लेफ्ट के अलावा 14 पार्टियां शामिल हुईं. ये थीं- आरजेडी, डीएमके, एनसीपी, पीएमके, टीआरएस, जेएमएम, एमडीएमके, एआईएमआईएम, पीडीपी, आईयूएमएल, केसी (जे), आरपीआई (जी) और आरपीआई (ए).
बीजेपी के ख़िलाफ़ बने इस दल के नेता पहले इस गठबंधन के नाम में सेक्युलर शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे लेकिन तमिल नेता एम करुणानिधि ने यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलाएंस का सुझाव दिया और सभी ने ये नाम स्वीकार कर लिया.
डॉ. मनमोहन सिंह ने 22 मई 2004 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. राषट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, लोकजनशक्ति पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष रामविलास पासवान, टीआरएस के प्रमुख के चंद्रशेखर राव, डीएमके के ए राजा और टीआर बालू, झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन और पीएमके के अंबुमणि रामदास ने भी मंत्रीपद की शपथ ली.

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यूपीए को लगे झटके
धर्म-निरपेक्षता के आधार पर बने इस गठबंधन को शुरुआत से ही झटके लगते रहे. तेलंगाना राष्ट्र समिति ने तेलंगना प्रांत की मांग को लेकर साल 2006 में गठबंधन छोड़ दिया. 2007 में एमडीएमके के नेता वाइको सरकार पर सीएमपी पर ना चलने के आरोप लगाते हुए गठबंधन से अलग हो गए.
गठबंधन को सबसे बड़ा झटका 2008 में लगा. वामदल भारत सरकार और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते का विरोध कर रहे थे. सरकार इस समझौते पर आगे बड़ी तो वामदलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया.
अल्पमत में आई सरकार के के सामने विश्वासमत हासिल करने की चुनौती थी. लेकिन मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने गठबंधन का समर्थन किया और सरकार बच गई.
आगे चलकर साल 2009 में प्रादेशिक राजनीतिक समीकरणों की वजह से जम्मू-कश्मीर की पीडीपी और तमिलनाडु की पीएमके गठबंधन से अलग हो गईं.
2009 का यूपीए

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साल 2009 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने अपनी ताक़त बढ़ाते हुए 206 सीटें हासिल कीं. इस बार गठबंधन में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और फ़ारूख़ अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस भी शामिल हो गईं. ममता बनर्जी को केंद्र में रेल मंत्रालय मिला.
इस बार वामदलों ने यूपीए का समर्थन नहीं किया. लालू प्रसाद यादव की आरजेडी को सरकार में शामिल नहीं किया गया. हालांकि राजद ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की तरह ही बाहर से गठबंधन का समर्थन किया.
ममता बनर्जी ने साल 2012 में गठबंधन से समर्थन वापस ले लिया था. आगे चलकर डीएमके समेत कई और घटक अलग-अलग मुद्दों पर गठबंधन से अलग हो गए.
कांग्रेस का पतन
यूपीए 2 के कार्यकाल के दौरान भारत में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक बड़ा जनआंदोलन भी खड़ा हुआ. 2जी और कोयले से जुड़े कथित घोटाले मीडिया की सुर्ख़ियां बनते रहे. 2014 में हुए चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई. ये कांग्रेस की अब तक के चुनावों में सबसे कम सीटें थीं.
बीते सात सालों में कांग्रेस को एक के बाद एक झटके लगे हैं. पार्टी के कई बड़े नेता साथ छोड़ गए हैं. केंद्र ही नहीं राज्यों की राजनीति में भी पार्टी सिमटी है.
राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश कहते हैं, "कांग्रेस की जो नीतियाँ रही हैं, ख़ासकर यूपीए-2 की नाकामी की वजह से कांग्रेस की लोकप्रियता समाज के हर वर्ग में गिरी. ख़ासकर कॉरपोरेट और समाज के ऊँचे तबक़े के बीच में, जनता ने कांग्रेस को नकार दिया."
वो बताते हैं कि 2014 के चुनावों के बाद से एक तरह से देखा जाए तो तकनीकी रूप से यूपीए नहीं है. विपक्षी दल भी यूपीए के बजाए 'एक जैसी विचारधारा वाली पार्टी' का ही इस्तेमाल करते हैं.
उर्मिलेश उदाहरण के तौर पर ध्यान दिलाते हैं कि महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस मिलकर सरकार चला रहे हैं, लेकिन वो यूपीए नहीं है.
वो कहते हैं,"ममता बनर्जी यूपीए की तरफ से बोल रही हैं जबकि वो तो यूपीए का हिस्सा भी नहीं है. वो तो वाजपेयी सरकार के दौरान एनडीए में भी थीं."
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अब ममता बनर्जी के बयान के मायने क्या हैं?
2021 में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने अपना जलवा बरकरार रखते हुए बीजेपी को करारी शिकस्त दी. बीजेपी ने अपनी पूरी ताक़त पश्चिम बंगाल में झोंक दी थी. बावजूद इसके ममता विजयी रहीं और एक बड़ी नेता बनकर उभरीं है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने वामदलों के साथ गठबंधन बनाया लेकिन इस गठबंधन का कोई असर नहीं रहा.
चुनाव जीतने के बाद ही ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान और प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश की है. मगर जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतने के बाद से ममता बनर्जी में एक भटकाव दिख रहा है.
उर्मिलेश कहते हैं,"जिस तीव्रता से वो चुनाव के दौरान बीजेपी और सांप्रदायिक राजनीति पर हमला कर रही थीं, अब उसमें थोड़ा भटकाव दिखाई देता है. तृणमूल से जुड़े सूत्र ये बताते हैं कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के वामपंथी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से बहुत नाराज़ हैं. ममता बनर्जी को लगता है कि इतने अहम चुनाव में कांग्रेस ने तीसरा फ्रंट बनाने की कोशिश की."
तो क्या अब यूपीए नहीं है?
कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष दलों की बैठकों में टीएमसी भी शामिल होती रही. लेकिन हाल के महीनों में टीएमसी ने दूरी बनाने की कोशिश की है.
अभी संसद के शीतकालीन सत्र से पहले जब कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों की बैठक हुई तो टीएमसी इससे दूर रही. टीएमसी नेता डेरेक ओ ब्रायन ने तो ट्वीट कर ये स्पष्ट किया कि टीएमसी कांग्रेस की सहयोगी नहीं है.
कांग्रेस के नेतृत्व में हुई इस बैठक में दस अन्य दलों ने हिस्सा लिया जिनमें डीएमके, एनसीपी और वामदल भी शामिल रहे.
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ऐसे में सवाल उठता है कि यदि भविष्य में विपक्षी दलों का गठबंधन बनता है तो उसका रूप क्या होगा?
उर्मिलेश कहते हैं, "भविष्य में यदि व्यापक स्तर पर विपक्ष की एकजुटता यदि कोई शक्ल लेती है और गठबंधन बनता है तो जरूरी नहीं है कि उसका नाम यूपीए ही रखा जाए...लेकिन ये एक तकनीकी मुद्दे से या नाम के मुद्दे से ज्यादा एक राजनीतिक विषय है. मुझे नहीं लगता कि ममता का ये कहना सही है कि यूपीए नहीं है."
ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेताओं के बयानों से स्पष्ट है कि उन्हें कांग्रेस से नाराज़गी है. लेकिन ये नाराज़गी कम और क्या विपक्ष में कांग्रेस की जगह लेने की कोशिश ज़्यादा है, इस सवाल पर उर्मिलेश कहते हैं, "ऐसा हो सकता है कि ममता बनर्जी के सलाहकार प्रशांत किशोर ने उन्हें समझा दिया हो कि वो ही विपक्ष की एकजुटता का केंद्र और नेतृत्व हो सकती हैं और वो उसी के लिए प्रयास कर रही हों. शायद ममता के दिमाग़ में ये हो कि भले ही कांग्रेस बड़ी पार्टी है लेकिन विपक्ष का नेतृत्व करने का मौका उन्हें दिया जाए."
वहीं महाराष्ट्र में सरकार में शामिल एनसीपी के नेता शरद पवार यूपीए का हिस्सा रहे हैं. शरद पवार और ममता बनर्जी के बीच हुई बैठक में क्या बात हई है अभी ये सार्वजनिक नहीं है. लेकिन ममता के शरद पवार से मिलने को भी एक व्यापक गठबंधन की संभावनाओं को ज़रूर बल मिला है.

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लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस को नज़रअंदाज़ कर कोई बीजेपी के ख़िलाफ़ कोई असरदार गठबंधन बनाया जा सकता है.
उर्मिलेश कहते हैं, "कांग्रेस अभी भी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है. कांग्रेस भले ही बुरी स्थिति में हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल के कांग्रेस की जगह लेने की कोई गुंजाइश दिखाई नहीं देती. तृणमूल एक क्षेत्रीय पार्टी है और उनकी नेता का प्रभाव भी एक ख़ास क्षेत्र तक सीमित है.
"कांग्रस के पास कश्मीर से लेकर केरल तक नेता और संगठन हैं. शायद ही देश का कोई प्रांत या हिस्सा हो जहां कांग्रेस का झंडा उठाने वाले लोग ना हों.कांग्रेस एक पुरानी पार्टी है जिसकी अपनी कमज़ोरियां और कमियां हैं लेकिन तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले उसकी अलग और बड़ी राष्ट्रीय पहचान है."
ममता बनर्जी ने हाल के दिनों में कांग्रेस के कई नेताओं को अपनी तरफ़ खींचा है. पूर्वोत्तर से लेकर गोवा तक ममता बनर्जी ने अति-सक्रियता दिखाई है. लेकिन विश्लेषकों को लगता है कि ऐसा करने से ही कांग्रेस की जगह नहीं ली जा सकती है.
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