'सवर्णों को आरक्षण' के नरेंद्र मोदी के दांव से क्यों नहीं लड़ पाएंगे माया से लेकर नायडू

मोदी और अमित शाह

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    • Author, टीम बीबीसी हिंदी
    • पदनाम, नई दिल्ली

सोमवार को दिल्ली की सर्द हवाओं के बीच सियासी पारा अचानक बढ़ गया. ख़बरें आई कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार सामान्य वर्ग के ग़रीबों को अलग से 10 फ़ीसदी आरक्षण देगी. ये आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई आरक्षण की अधिकतम 50 फ़ीसदी सीमा से अलग होगा.

यानी ज़मीनी हक़ीक़त में बदलने के लिए मोदी सरकार को संविधान में संशोधन करना होगा. यानी इसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों की मुहर लगवानी होगी.

आरक्षण की मौजूदा सीमा से अधिक आरक्षण देने की कोशिश कई बार और कई सरकारों ने की है, लेकिन हर बार सुप्रीम कोर्ट ने उसे ख़ारिज किया है. पिछली बार 2014 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने चुनावों से ठीक पहले जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने की घोषणा की थी, लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, "पिछड़ेपन के लिए सिर्फ़ जाति को आधार नहीं बनाया जा सकता. पिछड़ापन का आधार सिर्फ़ सामाजिक होना चाहिए न कि शैक्षणिक या आर्थिक रूप से कमज़ोरी."

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले इसे मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. उनका कहना है कि राजनीतिक दल इस कदम को लेकर मोदी सरकार की मंशा और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों की दलील में उलझा सकते हैं, लेकिन शायद ही कोई दल खुलकर इस निर्णय की मुखालफत करेगा.

राहुल गांधी

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कांग्रेस ने कहा, "समाज के सभी वर्गों के ग़रीब लोगों को शिक्षा और रोजगार का मौका मिले, हम इस दिशा में उठाए जाने वाले हर कदम का समर्थन करेंगे और उसके पक्षधर भी रहेंगे. लेकिन हक़ीक़त ये है कि चार साल आठ महीने बीत जाने के बाद तब मोदी सरकार को ग़रीबों की याद आई. ये अपने आप में मोदी सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है."

कई दल कर चुके हैं मांग

इसकी वजह ये भी है कि कई पार्टियां पूर्व में ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग कर चुके हैं इनमें दलित नेता और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती भी शामिल हैं. मायावती ने अगड़ी जातियों के ग़रीबों को आरक्षण की कई बार मांग की है.

मायावती और सोनिया गांधी

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साल 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र में मायावती ने लिखा कि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में ग़रीब सवर्णों को आरक्षण मिलना चाहिए. मायावती ने लिखा था कि प्रधानमंत्री को संविधान के अनुच्छेद नौ में संशोधन कर आर्थिक आधार पर पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि इसे अदालत में भी चुनौती न दी जा सके.

बसपा प्रमुख ने 2007 में सत्ता में आने के तुरंत बाद भी इस मुद्दे को उठाया था. 2009 के लोकसभा चुनावों में मायावती ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो अगड़ी जाति को आरक्षण देगी. मायावती ने 2015 और 2017 में भी ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग की थी.

मायावती के अगड़ी जातियों को आरक्षण देने संबंधी मांग पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था, "अगर अन्य समुदाय के लोगों के ग़रीब बच्चों की समस्याओं की बात भी सामने आएगी तो उस पर भी ध्यान दिया जाएगा."

मायावती इकलौती नहीं

ग़रीब सवर्णों के लिए आरक्षण की बात करने वाली मायावती इकलौती नहीं हैं.

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी यानी सपा ने सवर्ण आयोग या उच्च जाति आयोग का गठन करने का वादा किया था. सपा ने कहा था कि ये आयोग इस बात पर विचार करेगा कि इस वर्ग के ग़रीबों को कैसे और कितना आरक्षण दिया जाए.

चंद्रबाबू नायडू

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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू ने भी 2016 में संकेत दिए थे कि उनकी सरकार भी अगड़ी जाति के ग़रीब लोगों को भी आरक्षण के दायरे में ला सकती है.

नायडू ने कहा था, "हम सर्वेक्षण कराएंगे. उस आधार पर हमें आर्थिक आधार पर कमज़ोर लोगों को आरक्षण का लाभ देने में कोई दिक्कत नहीं होगी."

पिछले दिनों, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और केरल सरकार में मंत्री कदकम्पल्ली सुरेंद्रन के हवाले से भी ऐसी ही ख़बरें आई थी. सुरेंद्रन ने कहा था कि आरक्षण की व्यवस्था जाति के बजाय आर्थिक आधार पर होनी चाहिए.

अमित शाह और रामविलास पासवान

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लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने कहा, "ग़रीबी की एक ही जाति होती है. हम लोग 15 फ़ीसदी की मांग कर रहे थे, लेकिन 10 फ़ीसदी दिया गया. हम इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं."

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि मोदी सरकार की इस कदम के पीछे सरकार की मंशा हाल में आए विधानसभा चुनावों से जुड़ी है. नतीजों से स्पष्ट था कि आर्थिक मुद्दे लोगों के लिए अहम हैं. मध्य प्रदेश में तो सवर्ण बीजेपी को लेकर ख़ासे नाराज़ थे, कुछ सवर्णों ने तो वहाँ अपनी अलग पार्टी भी बना ली थी. हालाँकि उसे सिर्फ़ आधा फ़ीसदी वोट ही मिला, लेकिन वो संदेश देने में कामयाब रही थी.

अब बीजेपी अगड़ी जातियों को ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह उन्हें लेकर गंभीर है. हालाँकि वो इस फ़ैसले को अमल में कैसे ला पाएगी, ये उसके लिए बड़ी चुनौती साबित होगा.

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