मराठाओं को आरक्षण और बाक़ी जातियों पर चुप्पी कब तक: नज़रिया

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    • Author, दिलीप मंडल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

महाराष्ट्र कैबिनेट की मंजूरी के बाद महाराष्ट्र विधानसभा ने भी मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में 16 प्रतिशत रिज़र्वेशन को मंजूरी दे दी.

महाराष्ट्र में इससे पहले एससी-एसटी-विमुक्त जनजाति और पिछड़ी जातियों के लिए 52 प्रतिशत रिज़र्वेशन था. मराठा रिज़र्वेशन इसके ऊपर है. यानी महाराष्ट्र में अब सरकारी नौकरियों और सरकारी शिक्षा संस्थाओ में रिजर्वेशन 68 फ़ीसदी हो गया है, जो तमिलनाडु के 69 पर्सेंट आरक्षण के आसपास है.

मराठा आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में ज़ोरदार तर्क हैं. फ़िलहाल महाराष्ट्र सरकार ने पक्ष वाले तर्क के साथ जाने का रास्ता चुना है. मराठा रिज़र्वेशन के पक्ष में मुख्य तर्क इस प्रकार हैं.

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  • मराठा समुदाय हिंदू वर्ण व्यवस्था में न तो ब्राह्मण है, न क्षत्रीय और न ही वैश्य. यानी मराठा चौथे वर्ण में हैं और इस नाते सामाजिक रूप से ये समुदाय पिछड़ा हुआ है. ऊपर की तीनों कैटिगरी के लोग मराठों को नीचा मानते हैं.
  • मराठा समुदाय शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है. ख़ासकर उच्च शिक्षा संस्थानों में इस समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है.
  • सरकारी नौकरियों, ख़ासकर क्लास वन और क्लास टू की नौकरियों में मराठा समुदाय का पर्याप्त यानी संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व नहीं है.
  • व्यापार, वाणिज्य और उद्योग के क्षेत्र में मराठा समुदाय का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है.

मराठा रिजर्वेशन के ख़िलाफ़ मुख्य तर्क इस प्रकार हैं.

  • मराठा समुदाय महाराष्ट्र का प्रभावशाली समूह है, वे राजा रहे हैं और उसे किसी प्रकार का जातीय उत्पीड़न नहीं झेलना पड़ता, बल्कि ये लोग ख़ुद ही अपने से नीचे की जातियों पर जुल्म करते हैं.
  • मराठा जाति आर्थिक रूप से संपन्न है, इसके पास ज़मीन है और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और कोऑपरेटिव इकॉनमी पर नियंत्रण है.
  • मराठा समुदाय का राजनीति में अच्छा दबदबा है और इस समुदाय के कई मुख्यमंत्री बने हैं. किसी भी सरकार में इस समुदाय के ढेर सारे मंत्री होते हैं.
  • मराठा समुदाय को रिज़र्वेशन देने से कुल रिज़र्वेशन 50% से ऊपर हो जा रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी केस के फ़ैसले के ख़िलाफ़ है.
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कौन समर्थन में, कौन विरोध में

इन तर्कों और ऐसे ही तमाम और तर्कों के आधार पर मराठा आरक्षण को लेकर बहस छिड़ी है, जो आसानी से किसी नतीजे पर पहुंचने वाली नहीं है. कौन सा पक्ष मजबूत नज़र आ रहा है, इसका फै़सला इस बात से होगा कि आप इस बहस को कहां से देख रहे हैं.

जहां मराठा लोग इस आरक्षण के समर्थन में हैं, वहीं एससी-एसटी और ओबीसी के लोगों का अपना आरक्षण सुरक्षित है, इसलिए वे न तो इस आरक्षण का खुलकर समर्थन करेंगे न विरोध.

दूसरी तरफ़ इस आरक्षण से जनरल यानी ओपन कैटिगरी की सीटें कम हो जाएंगी, इसलिए जो भी समुदाय किसी भी तरह का आरक्षण नहीं पा रहा है, वो इस आरक्षण का विरोध करेगा.

आप देख सकते हैं कि तमाम पक्ष इस मामले में नीति या सिद्धांत की जगह निजी और सामुदायिक स्वार्थ से संचालित हैं. इसलिए बेहतर होगा कि इस बहस को यहीं छोड़ दिया जाए और इससे जुड़े राजनीतिक और संवैधानिक पहलुओं पर बात की जाए.

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मराठा आरक्षण का राजनीति पर असर क्या होगा?

दरअसल, मराठा आरक्षण पिछले 20 साल में चल रही एक आर्थिक-राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है. पिछले कुछ दशकों से देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा लगातार घट रहा है. यानी समृद्धि पैदा करने में कृषि क्षेत्र पिछड़ रहा है.

इस समय देश की जीडीपी में खेती का हिस्सा 17 फ़ीसदी है जबकि 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है. जीडीपी में हिस्सा घटने का मतलब है कि खेती से जुड़े लोग बाक़ी पेशों में जुड़े लोगों की तुलना में लगातार ग़रीब हो रहे हैं.

इस वजह से खेती पर निर्भर वे जातियां आर्थिक रूप से कमज़ोर पड़ रही हैं, जो एक समय मज़बूत थीं. इस वजह से उनकी ऐंठ और दबदबा भी घट रहा है. शहर और गांव का सबसे अमीर आदमी अक्सर अब ज़मींदार या भूमि का मालिक नहीं, बल्कि कोई दुकानदार, बिज़नेसमैन, डॉक्टर, वक़ील, ठेकेदार, सरकारी अफसर या कोचिंग सेंटर चलाने वाला होता है.

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सरकारी बाबू, बैंक मैनेजर, जज, विधायक, सांसद आदि का रुतबा अमीर किसान से ज़्यादा होता है. ख़ुद को ज़मींदार मानने वाला किसान अक्सर इनके सामने अदब से खड़ा होता है.

इसने कृषि आधारित कई समुदायों जैसे मराठा, पटेल-पाटीदार, जाट, कपू, रेड्डी आदि को परेशान कर दिया है. उनकी पुरानी ठाठ अब बीते दिनों की बात है.

उनसे नीचे की जाति का एक आदमी जब उनकी ज़मीन ख़रीद लेता है, या कोई ओबीसी या एससी अफसर उन्हें अपने सामने खड़ा कर देता है या इन्हीं समुदायों का कोई ज़िला जज या मैजिस्ट्रेट उनका फ़ैसला लिखता है, तो उनके अहंकार को चोट पहुंचती है.

उन्हें समझ में आने लगा है कि आर्थिक समृद्धि का सबसे प्रमुख स्रोत अब शिक्षा, सरकारी संरक्षण, बैंक लोन आदि है. इन्हें हासिल करने के उपाय के तौर पर वे आरक्षण को देख रहे हैं.

आने वाले दिनों में हम देश में पटेल-पाटीदार, जाट और कपू जैसे किसान समुदायों के आरक्षण आंदोलन को तेज़ होता हुआ देख सकते हैं. इसमें रेड्डी, कम्मा जैसी जातियां भी शामिल हो सकती हैं.

सरकार ने अगर इन आंदोलन को लेकर एक व्यवस्थित रणनीति न बनाई तो देश में कई तरह के उत्पात हो सकते हैं. मराठों ने जिस तरह आंदोलन के ज़रिए राज्य सरकार को आरक्षण देने के लिए मजबूर कर दिया, उसने बाक़ी समुदायों के आंदोलन का रास्ता खुल गया है.

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आरक्षण के लिए क्या है संवैधानिक व्यवस्था?

एससी और एसटी का आरक्षण संविधान लागू होने के दिन से प्रभाव में है और इसे लेकर कोई विवाद नहीं है. उन्हें आबादी के अनुपात में आरक्षण दिया जाता है.

विवाद पिछड़ी जाति या वर्ग के आरक्षण को लेकर है. संविधान सभा में चूंकि इसे लेकर कोई राय नहीं बन पाई, इसलिए अनुच्छेद 340 के जरिए ये प्रावधान किया गया कि एक आयोग बनेगा, जो "सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों" की तरक्की के उपाय सुझाएगा.

इस अनुच्छेद के तहत पहला आयोग 1953 में ही बन गया, जिसने 1955 में अपनी रिपोर्ट दे दी. इसमें पिछड़ेपन को चिह्नित करने के चार मापदंड बनाए गए.

  • क्या इस जाति को दूसरे लोग सामाजिक रूप से नीचा मानते हैं
  • क्या इस समुदाय के ज़्यादातर लोग शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं
  • क्या सरकारी नौकरियों में इस समुदाय का प्रतिनिधित्व कम है
  • क्या व्यापार, वाणिज्य और उद्योग में ये समुदाय पिछड़े हैं.

इस आधार पर आयोग ने 2,399 जातियों की पहचान पिछड़ी जातियों के रूप में की. लेकिन ये आयोग अपने आप में काफ़ी भ्रमित था. इसकी रिपोर्ट में आरक्षण की सिफ़ारिश की गई लेकिन रिपोर्ट सौंपते समय अध्यक्ष काका कालेलकर ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत कर दी.

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ये रिपोर्ट हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में चली गई लेकिन गृह मंत्रालय ने राज्यों से कह दिया कि वे अपने राज्य की स्थितियों के अनुसार चाहें तो पिछड़ी जातियों को आरक्षण दे सकते हैं. राज्यों में पिछड़ी जातियों को दिया जा रहा आरक्षण इसी तरह से आया.

उसके बाद, 1978 में बने दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग यानी मंडल कमिशन में पिछड़ेपन को आंकने के 11 मानदंड तय किए इसका विस्तृत ब्यौरा आप मंडल कमिशन की रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं.

इन आधारों में सामाजिक रूप से नीचा माना जाना, शारीरिक श्रम पर निर्भरता, कम उम्र में शादी, महिलाओं की वर्कफोर्स में ज़्यादा हिस्सेदारी, बच्चों का स्कूल न जाना, ड्रॉपआउट रेट, मैट्रिक पास लोगों की संख्या, पारिवारिक ज़ायदाद, कच्चा या पक्का मकान, पीने के पानी के स्रोत की घर से दूरी और क़र्ज़ का बोझ शामिल है.

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आरक्षण को लेकर विवादों की जड़ में क्या है?

आरक्षण को लेकर तमाम विवादों की जड़ में है आंकड़ों और तथ्यों का अभाव. मिसाल के तौर पर मराठा आरक्षण का विवाद ये है कि मराठा कह रहे हैं कि वे न तो शिक्षा के क्षेत्र में कहीं हैं, न ही नौकरियों में वे पर्याप्त संख्या में और व्यापार-उद्योग में तो वे लगभग लापता हैं.

वहीं दूसरा पक्ष कह रहा है कि मराठा ख़ूब समृद्ध हैं और उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए?

भारत में दरअसल 1931 के बाद के जातियों के आंकड़े हैं ही नहीं. मराठों की आबादी का आंकड़ा भी एक अनुमान ही है. काला कालेलकर आयोग और मंडल कमिशन दोनों ने सिफारिश की थी कि जो भी अगली जनगणना हो, उसमें जातियों के आंकड़े जुटा लिए जाएं.

लेकिन कांग्रेस और बीजेपी की सरकारों ने जनगणना में जाति को कभी शामिल नहीं किया. 2011 से 2015 के बीच एक अजीब किस्म की आर्थिक-सामाजिक और जाति आधारित जनगणना हुई, जिस पर 4,893 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए. लेकिन इससे जाति का एक भी आंकड़ा सामने नहीं आया.

इस वजह से कई जातियां वाजिब या ग़ैरवाजिब कारणों से आरक्षण मांग रही हैं. सरकार ये कहने की स्थिति में नहीं है कि आंकड़ों के आधार पर कौन सी जाति पिछड़ी है और कौन सी नहीं. इसलिए जिस जाति में दम है, वो आरक्षण ले रही है. जिनमें दम नहीं है, वो दम पैदा करने की कोशिश कर रही है.

क्या इन विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए सरकार 2021 की जनगणना में तमाम जातियों और उनसे जुड़े आंकड़ों का संकलन करेगी? ओबीसी की गिनती का मौजूदा सरकार का फैसला निरर्थक ह, क्योंकि ढेर सारी जातियां इससे बाहर रह जाएंगी. वे वही जातियां हैं, जो आरक्षण के दायरे में आने के लिए आंदोलनरत हैं.

अब ये सरकार को तय करना है कि वह जाति का आंकड़ा जुटाए या फिर जातियों को आंदोलन के रास्ते पर धकेले!

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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