नज़रिया: महिला आरक्षण विधेयक पर बीजेपी अब ख़ामोश क्यों है?

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कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि आपकी सरकार के पास लोकसभा में बहुमत है, इसलिए महिला आरक्षण बिल पारित कराएं.
सोनिया गांधी ने इस पत्र में लिखा है कि कांग्रेस इस काम में पूरी तरह से सरकार का साथ देगी.
इस मसले को इस वक़्त उठाने के क्या मायने हैं, इस पर हरिता काण्डपाल ने वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी से बात की और महिला आरक्षण विधेयक के इर्द-गिर्द होने वाली राजनीति पर चर्चा की.
पढ़ें नीरजा चौधरी का विश्लेषण:
2019 के चुनावों को लेकर बीजेपी तैयारी शुरू कर दी है. महिलाओं के तबके को लेकर बीजेपी और प्रधानमंत्री ख़ास ध्यान दे रहे हैं. उज्ज्वला स्कीम और तीन तलाक़ पर बीजेपी ने महिलाओं को साधने की कोशिश की है.
ये चर्चा रही है कि शायद चुनाव से पहले एनडीए सरकार महिला आरक्षण बिल लेकर आए और खटाई में पड़े इस विधेयक को पास कराने की कोशिश करें. हालांकि बीजेपी के लिए ये मुश्किल नहीं है क्योंकि उसके पास लोकसभा में बहुमत है.
शायद इसे भांपते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ये मुद्दा उठा दिया है क्योंकि संसद के उच्च सदन राज्यसभा में इसे पास कराने में कांग्रेस सोनिया गांधी की अहम भूमिका थी.
लेकिन लोकसभा में ये विधेयक अटक गया था क्योंकि यूपीए में कांग्रेस के साथी दल ख़ासकर समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल ने इसका विरोध किया था. लोकसभा में ये विधेयक यूपीए सरकार इस डर से नहीं लाई थी कि कहीं सरकार ही ख़तरे में न पड़ जाए.

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मगर अब वजह चाहे जो भी हो, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर महिला आरक्षण विधेयक के मुद्दे को फिर से प्रकाश में ला दिया है. अगर ये विधेयक पारित हो जाता है तो इसमें उन्हें भी कुछ श्रेय मिलेगा.
सालों से लटका महिला आरक्षण विधेयक
जब हम संसदीय मामलों में पत्रकारिता करते थे तो देखा था कि किस तरह से हर पार्टी में इसका अंदरखाने विरोध हुआ है, भले ही वे बाहर इसका समर्थन करती थीं. संसद के अंदर और संसद के बाहर भी इसका विरोध हुआ. ये कड़वा सच है.
पिछली बार इसका विरोध ये कहकर किया गया कि ये ओबीसी और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को नज़रअंदाज़ करता है. यहां तक कि ओबीसी और पिछड़े वर्ग की महिलाओं ने भी इसका विरोध किया था. लेकिन ये कभी साफ़ नहीं हुआ कि इस विधेयक से पिछड़े वर्ग की महिलाएं कैसे प्रभावित होंगी.
ये तक कहा गया कि शहरी महिलाएं संसद में आएंगी और गरीब-पिछड़ी, दलित महिलाओं को मौका नहीं मिलेगा. मगर ये साफ़ है कि जो आरक्षित चुनाव क्षेत्र होता है, वहां पर ओबीसी महिला ही आएगी न कि शहरी उम्मीदवार. ये सिर्फ विरोध करने के लिए एक तर्क था.

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ये भी सच है कि 2010 में राज्यसभा में पारित होने पर लोकसभा में अगर बीजेपी इस बिल को लेकर कांग्रेस का समर्थन कर देती तो ये क़ानून बन चुका होता. ऐसे में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और समाजवादी पार्टियों के समर्थन की ज़रूरत नहीं पड़ती. इसके अलावा अन्य छोटी क्षेत्रीय पार्टियां आज भी महिला आरक्षण के पक्ष हैं.
ओबीसी की राजनीति कहें या फिर कहें कि पुरुषों की राजनीति, जिसकी वजह से ये महिला आरक्षण बिल आज भी अधर में लटका हुआ है. इससे उन सांसदों को ख़तरा है जो संसद के एक कार्यकाल के लिए एक तिहाई उम्मीदवार खो देंगे, क्योंकि रोटेशन में ही आरक्षण मिलेगा और इसमें एक तिहाई चुनाव क्षेत्रों पर गाज गिरेगी. ऐसे में पुरुष सांसद सत्ता और ताकत के बंटवारे के लिए तैयार नहीं है.
सोनिया ने कहा राजीव ने शुरुआत की
महिलाएं शुरू से आरक्षण का रास्ता नहीं अपनाना चाहती थीं. 1975 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब टूवर्ड्स इक्वैलिटी नाम की एक रिपोर्ट आई थी. इसका संदर्भ आज भी दिया जाता है. इस रिपोर्ट में हर क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति का विवरण दिया गया था और आरक्षण पर भी बात की गई थी.
रिपोर्ट तैयार करने वाली कमेटी में अधिकतर सदस्य आरक्षण के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि महिलाएं चाहती थीं कि वो आरक्षण के रास्ते नहीं बल्कि अपने बलबूते पर आएं.
लेकिन आने वाले 10-15 सालों में ये रवैया एकदम उलट गया जब महिलाओं ने अनुभव किया कि राजनीति में हर क़दम में उनके रास्ते में कितने रोड़े अटकाए जाते हैं और उनके लिए समान मौके भी नहीं हैं. तब से महिला आरक्षण की ज़रूरत महसूस होने लगी. तभी से आरक्षण का मुद्दा सामने आया कि महिलाओं को विधानसभा और संसद में प्रतिनिधित्व देने के लिए इसकी ज़रूरत है.
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 के दशक में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने के लिए विधेयक पारित करने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य की विधानसभाओं ने इसका विरोध किया था. उनका कहना था कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आएगी.

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1992 दिसंबर में जब बाबरी मस्जिद जब ढही, तब सबका ध्यान उस तरफ़ लगा हुआ था. उस वक़्त की सरकार ने संसद में इस विधेयक को पारित करा लिया था और 1993 में ये क़ानून बन गया.
सोनिया गांधी ने अपने पत्र में ज़िक्र किया है कि राजीव गांधी ने महिला आरक्षण को लेकर पहल की थी. लेकिन आज के समय में कुछ राज्यों में निचले स्तर पर स्थानीय चुनावों में महिलाओं के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण है. इससे महिलाओं की एक नई खेप तैयार हुई है, जिन्हें स्थानीय स्तर पर प्रशासन में महारत हासिल है.
पहले-पहल महिलाएं घूंघट में आया करती थीं और इस पर काफ़ी मज़ाक होता था. कहा जाता था कि पिया बन गए पीए. मगर धीरे-धीरे घूंघट ऊपर उठ गया है.
इन महिलाओं का ध्यान बिजली, सड़क और पानी जैसे मुद्दों पर रहा है. इससे बदलाव भी आया है और अगर संसद में भी महिलाओं को आरक्षण मिलेगा तो फर्क ज़रूर नज़र आएगा.
गेंद मोदी के पाले में
सोनिया गांधी ने यूपीए सरकार के समय महिला आरक्षण बिल को पारित कराने के लिए बहुत ज़ोर लगाया था, लेकिन अब उन्होंने गेंद प्रधानमंत्री मोदी के पाले में डाल दी है.
अगर प्रधानमंत्री मोदी चाहें और छोटी क्षेत्रीय पार्टियां भी समर्थन दें तो कोई इस बिल को रोक नहीं सकता, क्योंकि उनकी सरकार के पास बड़ा बहुमत है.

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सोनिया का राजनीतिक दांव
मुझे लगता है कि ये बहुत अच्छा राजनीतिक क़दम होगा क्योंकि इससे संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. देश की आज़ादी को 70 साल हो रहे हैं लेकिन आज भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है.
संसद में करीब दस प्रतिशत महिला सांसद हैं. विधानसभाओं में तो और भी कम हैं. राजनीतिक पार्टियों में महिला पदाधिकारियों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है लेकिन राजनीति में महिलाओं की भूमिका सीमित है, जबकि आज वे हर क्षेत्र में बढ़ रही हैं.
मोदी के लिए क्या अड़चन ?
हाल ही में निर्मला सीतारमण को केंद्रीय कैबिनेट में रक्षा मंत्री बनाया गया. मोदी कैबिनेट में दो शक्तिशाली मंत्रालयों पर महिला मंत्री हैं- सुषमा स्वराज विदेश मंत्री और निर्मला सीतारामन रक्षा मंत्री.
ये राजनीति में नया दिन ज़रूर है, लेकिन नरेंद्र मोदी के पास इतनी राजनीतिक ताक़त है कि वो सालों से लटके इस विधेयक को पारित करवा सकते हैं.
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