आख़िर कब पास होगा महिला आरक्षण विधेयक?

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- Author, राधिका रामाशेषन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
महिला आरक्षण विधेयक को एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने पहली बार 12 सितंबर 1996 को पेश करने की कोशिश की थी.
इस गठबंधन सरकार को कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी. मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद इस सरकार के दो मुख्य स्तंभ थे, जो महिला आरक्षण के घोर विरोधी थे.
जून 1997 में एक बार फिर इस विधेयक को पास कराने का प्रयास हुआ. उस वक्त शरद यादव ने इस विधेयक की निंदा करते हुए एक विवादास्पद टिप्पणी की थी.
उनके शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं. उन्होंने कहा था, ''परकटी महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में क्या समझेंगी और वो क्या सोचेंगी.''
इस तरह उन्होंने महिलाओं को ही बांटने की कोशिश की.
साल 1998 में 12वीं लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए की सरकार में एन थंबीदुरई (तत्कालीन क़ानून मंत्री) ने इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की, जो इस वक़्त लोकसभा के उपाध्यक्ष हैं.

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राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी की सीट के पास पहुंच गए और उनके हाथ से काग़ज छीनकर फाड़ दिया.
फिर बाद में एनडीए की सरकार ने दोबारा 13वीं लोकसभा में 1999 में इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की.
उस वक़्त भी क़रीब-क़रीब यही दृश्य देखने को मिला. क्योंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, नियमों के मुताबिक़ यह शोर-शराबे में पारित नहीं हो सकता है.
यह विधेयक तभी पारित हो सकता है, जब इस पर चर्चा के बाद वोटिंग कराई जाए. राज्यसभा और लोकसभा दोनों में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बीच दो-तिहाई बहुमत से यह विधेयक पारित होना चाहिए. इसमें संयुक्त सत्र की भी कोई गुंजाइश नहीं है.
साल 2003 में एनडीए सरकार ने फिर कोशिश की लेकिन प्रश्नकाल में ही सांसदों ने खूब हंगामा किया कि वे इस विधेयक को पारित नहीं होने देंगे.
हालांकि 2010 में राज्यसभा में यह विधेयक पारित हुआ. उस दिन का दृश्य मुझे पूरी तरह याद है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आदेश दिया था कि राज्यसभा में यह विधेयक पारित हो जाना चाहिए.

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भाजपा की तरफ से अरुण जेटली ने आश्वासन दिया कि भाजपा की ओर से उन्हें पूरा समर्थन है. इस विधेयक को वामदलों का समर्थन भी हासिल था. जदयू ने भी अपना समर्थन दिया.
उस दिन पहली दफ़ा मार्शल्स का इस्तेमाल हुआ, जिसका इस्तेमाल पहले की सरकारें भी कर सकती थीं लेकिन उन्होंने नहीं किया था. उस दिन अच्छी खासी चर्चा हुई और यह विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया.
इस विधेयक को राज्यसभा में इस मक़सद से लाया गया था कि अगर यह इस सदन में पारित हो जाता है तो, इससे उसकी मियाद बनी रहती.
लेकिन यूपीए सरकार से ग़लती यह हुई कि वह तुरंत इस विधेयक को लोकसभा में लेकर गई. सरकार को उम्मीद थी कि जिस तरह इसे राज्यसभा में पास करा लिया गया वैसे ही इसे लोकसभा में भी पारित करा लिया जाएगा.

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लेकिन बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे जैसे प्रभावशाली ओबीसी नेताओं ने इस विधेयक के ख़िलाफ़ खुलकर आवाज़ उठाई. उन्होंने अपने साथ भाजपा के बाक़ी ओबीसी सांसदों को जुटाकर लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज को यह साफ़ संदेश दे दिया कि अगर इसके पक्ष में वोट आया तो वे इसके ख़िलाफ़ वोट करेंगे और पार्टी की व्हिप नहीं मानेंगे.
ऐसे में भाजपा दुविधा में पड़ गई. इससे यह विधेयक लोकसभा में टल गया. अगर इस संशोधन विधेयक को पेश करना है तो नए सिरे से इसे पेश करना होगा और सभी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी.
मुझे लगता है कि अगर एनडीए सरकार अगर इस विधेयक को लाने का मन बनाती है तो, वह सबसे पहले इसे राज्यसभा में ही पेश करेगी. हालांकि तकनीकी रूप से भाजपा, कांग्रेस और वाम अगर साथ आएं तो यह विधेयक पारित हो सकता है.
लेकिन पार्टियों के भीतर भी इस विधेयक को लेकर इतने मतभेद हैं कि इसे पारित कराना अब भी आसान नहीं होगा.
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