बंगाल के रामपुरहाट में कितनी गहरी है सियासी वर्चस्व की लड़ाई: ग्राउंड रिपोर्ट

बीरभूम में हिंसा

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, रामपुरहाट (पश्चिम बंगाल) से, बीबीसी हिंदी के लिए

"भादू शेख पर हमले की ख़बर मिलते ही गांव वालों को सांप सूंघ गया और किसी अनहोनी के अंदेशे से लोगों में आतंक फैल गया था. उसके कुछ देर बाद ही उनकी मौत की खबर आई. हम लोग अपने घरों में दुबक गए और ऊपरवाले को याद करते हुए दिल थाम कर सुबह का इंतज़ार करने लगे. लेकिन करीब घंटे भर बाद ही अचानक कुछ लोगों ने हमारे घरों में आग लगा दी. मैं तो बच कर निकलने में कामयाब रही. लेकिन मेरे अब्बा और चाचा की मौत हो गई."

यह कहते हुए साजिना खातून सुबकने लगती है. उनके शब्द थम जाते हैं और आंखें बोलने लगती हैं.

सोमवार रात को पहले तृणमूल कांग्रेस नेता और पंचायत के उप-प्रधान भादू शेख की हत्या और उसके घंटे भर के भीतर ही आगजनी की घटना में आठ लोगों की मौत के बाद से ही गांव में मरघट जैसा सन्नाटा छाया था.

गांव के तमाम लोग घर छोड़ कर दूसरी जगह चले गए हैं. गुरुवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब पहली बार मौके पर पहुंची तो गाड़ियों की आवाज़ और उनसे मिलने के लिए आई पीड़ित महिलाओं की करुण वेदना से यह सन्नाटा टूटा.

ममता दो-तीन परिवारों से मिलीं और उनको पांच-पांच लाख के मुआवजे का चेक सौंपा. इसके अलावा जले हुए मकानों की मरम्मत के लिए भी दो-दो लाख के चेक दिए गए. मुख्यमंत्री ने दस पीड़ित परिवारों के एक-एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का भी एलान किया.

ममता के दौरे से पहले टीएमसी के नेता रहे भादू शेख के घर के बाहर कतार में खड़े लगने अपने हाथों में तख्तियां ले रखी थी जिन पर लिखा था हम दोषियों को सज़ा दिलाने की मांग करते हैं, ममता ने भरोसा दिया की इस मामले में दोषियों को ऐसी सख़्त सज़ा दी जाएगी जो एक मिसाल बन सके.

सोमवार की घटना के बाद से ही बीरभूम जिले में रामपुरहाट से सटा यह गांव सुर्खियों में है. मुख्य सड़क से कुछ अंदर जाते ही रास्ते पर जगह-जगह बैरिकेड लगे हैं ताकि कोई बाहरी व्यक्ति वहां नहीं पहुंच सके. यह दृश्य कोई 15 साल पहले पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदगीग्राम के नज़ारे की याद दिलाता है. वहां भी ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान पुलिस की फायरिंग में 14 लोगों की मौत के बाद इलाक़े में जाने वाली सड़क को इसी तरह बैरिकेड लगा कर घेर दिया गया था.

बीरभूम में हिंसा

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वैसे, तो शांतिनिकेतन से ही हाइवे पर जगह-जगह पुलिस तैनात नज़र आई. रामपुरहाट की ओर जाने वाले हर वाहन को रोक कर तमाम सवाल किए जा रहे थे, पत्रकार हैं बताने के बावजूद कहां से आए हैं, किस मीडिया ग्रुप के हैं आदि सवाल किए जा रहे थे.

रामपुरहाट के क़रीब आने के साथ ही पुलिस वालों और जांच चौकियों की तादाद बढ़ती जा रही थी, मुख्य सड़क से गांव की ओर मुड़ते ही किसी छावनी जैसा नज़ारा था. ममता ने कहा है कि अगले आदेश तक गांव में पुलिस कैंप रहेगा और गश्त भारी रहेगी, उन्होंने मौके पर मौजूद पुलिस महानिदेशक को पीड़ित परिवारों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया.

गांव तक जाने वाली सड़क के चप्पे चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात हैं. सीएम और कुछ अधिकारियों के अलावा सबकी गाड़ियां गांव से 15 सौ मीटर दूर ही खड़ी कर दी गईं. वहां से गांव की दूरी पैदल ही तय करनी थी. ममता के दौरे के मौके पर सिर्फ मीडिया वालों को ही घटनास्थल तक जाने की अनुमति थी.

जिस घर में एक साथ सात जले हुए शव बरामद हुए थे उसके बाहर भी पुलिस का बैरिकेड लगा है. गांव में खौफ़ का साया साफ़ नजर आता है. आज वहां जुटे लोगों में से कोई भी इस बारे में कुछ कहने को तैयार नहीं था.

ज्यादातर लोग यह कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं कि हम दूसरे मोहल्ले में रहते हैं और क्या हुआ, यह नहीं पता. आख़िर गांव के लोग और पीड़ितों के परिजन कहां गए, इसका भी कोई जवाब नहीं मिलता.

बहुत मुश्किल से एक महिला शाहीन बात करने के लिए तैयार हुई. उन्होंने कहा कि सोमवार रात को क्या हुआ, यह तो नहीं पता, मैं दूसरे मोहल्ले में रहती हूं. लेकिन गांव के लोग जान के डर से भाग गए हैं की कहीं दोबारा हमला नहीं हो जाए. उनका कहना था की मैं दीदी को देखने यहां आई हूं.

दीदी को देखने के बहाने वहां जुटी महिलाएं आपस में कानाफूसी तो कर रही थी लेकिन पत्रकारों को देखते ही चुप्पी साध लेती थी. दूसरे मोहल्ले से आए पुरुष भी कुछ कहने को तैयार नहीं थे.

पीड़ित महिलाएं

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इस गांवों और बिना इसके आपराधिक समीकरण और लोगों में ख़ौफ़ की वजह को समझना संभव नहीं है. आसपास के लोगों से बातचीत में यह सामने आया है की गांव के हर घर का कोई न कोई व्यक्ति बालू और पत्थर के अवैध खनन में शामिल था, यह कहना ज्यादा सही होगा की इस गांव ही नहीं आसपास के कई गांवों की अर्थव्यवस्था भी बालू और पत्थरों की अवैध खुदाई और बिक्री पर निर्भर है.

रामपुरहाट बाज़ार में एक चाय दुकान पर बैठे निर्मल शेख बताते हैं, बोगतुई के लोग पहले लकड़ी की तस्करी करते थे. अब बालू और पत्थर की अवैध खुदाई और बिक्री ही उनका प्रमुख धंधा है.

वो बताते हैं, "यह सब कई सालों से चल रहा है, जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर सत्तारूढ़ पार्टी के लोग ही इस काम में शामिल हैं. पार्टी बदलती है, चेहरे वही रहते हैं. पुलिस और प्रशासन सब कुछ जान कर भी आंखें मूंदे रहता है. आख़िर पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर भला कौन करेगा?"

इस दोहरी घटना के बाद ही गांव का यह अपराधिक चरित्र सामने आया है, वैसे पहले भी यह गांव बदनाम था लेकिन कोई बड़ी घटना नहीं हुई थी इसलिए सब कुछ ठीक चल रहा था.

इस मामले में नेताओं के कथित दोस्ती और ड्यूटी में लापरवाही का खामियाजा पुलिस वालों को भी भुगतना पड़ा है. दो पुलिस अधिकारियों को हटा दिया गया है, ममता ने भी यहां माना की पुलिस ने अपनी भूमिका ठीक से निभाई होती तो इस घटना को रोका जा सकता था. उनका कहना था की दोषी पुलिस वालों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी .

बीरभूम में जुटी भीड़

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बीरभूम ज़िले की लाल मिट्टी वाम मोर्चा सरकार के शासनकाल से ही हिंसा की चपेट में रही है. अब टीएमसी नेता की हत्या और उसके बाद कथित बदले के तौर पर गांव के कई घरों में आग लगा कर कम से आठ लोगों को जिंदा जलाने की घटना ने लोगों के मन में कोई 22 साल पहले हुए नानूर कांड की याद दिला दी है.

नानूर के सूचपुर इलाक़े में सीपीएम समर्थकों की एक भीड़ ने 11 भूमिहीन मज़दूरों की बेरहमी से गला काट कर हत्या कर दी थी. वह लोग भी अल्पसंख्यक और अनुसूचित जनजाति तबके के थे. उस भयावह घटना के दस साल बाद सीपीएम के 44 नेताओं और कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. उनमें जिला स्तर के कई प्रमुख नेता शामिल थे

तब इसे इलाक़े पर वर्चस्व दोबारा कायम करने के उसके अभियान के तौर पर देखा गया था. तब इलाक़े में तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे मज़बूत हो रही थी. इस हत्याकांड के बाद ममता, जो तब रेल मंत्री थी, ने मौके का दौरा किया और मृतकों के परिजनों को रेलवे में नौकरी देने का भरोसा दिया.वाम मोर्चा के शासनकाल में भी यह ज़िला राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा अशांत इलाक़े के तौर पर कुख्यात था.

पीड़ित परिवार

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इस मुद्दे पर राजनीतिक जंग भी लगातार तेज़ हो रही है. ममता ने आज भी दोहराया की यह घटना किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा हो सकती है. पुलिस इन तमाम पहलुओं की भी जांच करेगी, किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा चाहे वो हमारी पार्टी का ही क्यों न हो.

अपनी बात को वज़नदार बनाने के प्रयास में उन्होंने इलाक़े के ब्लॉक टीएमसी अध्यक्ष अनवारूल हुसैन को शीघ्र गिरफ्तार करने का निर्देश दिया. पीड़ितों का आरोप है कि अनवारूल के नेतृत्व में ही घरों में आग लगाई गई और उन्होंने ही पुलिस को समय पर गांव में आने से रोक दिया था.

विपक्षी दल ख़ासकर बीजेपी तो इस मुद्दे पर सरकार के ख़िलाफ़ बेहद आक्रामक है, राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी इस घटना पर सरकार को लगातार कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. ममता के लौटने के बाद यहां पहुंचे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने कहा की ममता यहां पिकनिक मनाने आई थी.

इस गांव के दौरे के बाद एक बात शीशे की तरह साफ हो जाती है, और वो यह की ममता बनर्जी और उनकी सरकार की असली चुनौती इस घटना के दोषियों की शीघ्र गिरफ्तारी और सजा नहीं बल्कि गांव के लोगों के मन में डर को खत्म कर उनका भरोसा लौटना है.

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