'द कश्मीर फ़ाइल्स' पर उमर अब्दुल्ला ने क्यों किया अपने पिता फ़ारूक़ अब्दुल्ला का ज़िक्र

कश्मीर

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वो क्या मजबूरी थी कि साल 1990 में कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ना पड़ा? वे कौन लोग थे जिनके कारण लोगों को बेघर होना पड़ा? क्या सिर्फ एक ही धर्म के लोगों ने कश्मीर छोड़ा? इन सब सवालों पर पिछले 32 सालों में बहुत कुछ लिखा-बोला गया है.

लेकिन फिल्म 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के बाद कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार की कहानी पर तीखी बहस शुरू हो गई है. सिनेमा से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में फिल्म चर्चा का केंद्र बनी हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक फिल्म की तारीफ कर चुके हैं.

'द कश्मीर फ़ाइल्स' का निर्देशन विवेक अग्निहोत्री ने किया है जिसमें अनुपम खेर मुख्य भूमिका में हैं.

फिल्म का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि इस फिल्म ने कश्मीरी पंडितों के दर्द को पर्दे पर उतारा है, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म में सिर्फ कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार की कहानी दिखाई गई है और दूसरे पक्ष को पर्दे से हटा दिया गया है. साथ ही फिल्म के जरिए पूरे मुस्लिम समाज पर सवाल उठाए गए हैं.

अब ऐसा ही एक बयान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने दिया है. 'द कश्मीर फ़ाइल्स' पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि फिल्म में तरह तरह के झूठ दिखाए गए हैं.

उमर अब्दुल्ला

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मर अब्दुल्ला ने क्या कहा ?

मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "जब कश्मीरी पंडित यहां से निकले उस वक्त फ़ारूक़ अब्दुल्ला मुख्यमंत्री नहीं थे. उस समय गवर्नर जगमोहन साहब का राज था और वीपी सिंह की सरकार थी. वीपी सिंह की सरकार के पीछे बीजेपी खड़ी थी."

उमर अब्दुल्ला का कहना है कि उस समय कश्मीर छोड़कर जाने वालों में सब मजहब के लोग शामिल हैं. इसमें सिख और मुस्लिम भाई बहन भी शामिल हैं. कुछ ऐसे मुसलमान भी हैं जो अब तक वापिस नहीं आए हैं.

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फिल्म बनाने वालों पर सवाल

फिल्म पर सवाल उठाते हुए उमर अब्दुल्ला कहते हैं, "हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि वो लोग वापस आएं लेकिन मुझे नहीं लगता कि जो फिल्म बना रहे हैं वो इन लोगों की वापसी चाहते हैं. इस फिल्म से वो चाहते हैं कि वो लोग हमेशा बाहर रहें."

11 मार्च को रिलीज हुई 'द कश्मीर फ़ाइल्स' फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, दर्शन कुमार और अन्य सितारे हैं. फिल्म ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक़ 'द कश्मीर फ़ाइल्स' 100 करोड़ का बिजनेस कर चुकी है.

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पीएम मोदी से लेकर अमित शाह ने दिया बयान

पीएम मोदी भी फिल्म पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं.

उन्होंने कहा था, "भारत विभाजन की वास्तविकता पर क्या कभी कोई फ़िल्म बनी...! अब इसलिए आपने देखा होगा कि इन दिनों जो नई फ़िल्म 'द कश्मीर फ़ाइल्स' आई है, उसकी चर्चा चल रही है. और जो लोग हमेशा फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के झंडे बुलंद किए रहते हैं, वो पूरी जमात बौखलाई हुई है बीते पांच-छह दिनों से और इस फ़िल्म की तथ्यों और बाकी चीज़ों के आधार पर विवेचना करने के बजाय, उसके ख़िलाफ़ मुहिम चलाए हुए हैं."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और अभिनेत्री पल्लवी जोशी से नई दिल्ली में मुलाकात की थी.

मोहन भागवत के साथ पल्लवी जोशी और विवेक अग्निहोत्री

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इमेज कैप्शन, मोहन भागवत के साथ पल्लवी जोशी और विवेक अग्निहोत्री

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक मोहन भागवत ने फिल्म की तारीफ करते हुए कहा था ''सच की खोज करने वाले सभी लोगों को 'द कश्मीर फ़ाइल्स' फिल्म देखनी चाहिए ''

फिल्म की टीम गृह मंत्री अमित शाह से भी मिलने पहुंची थी.

अमित शाह ने ट्वीट कर फिल्म के लिए कहा था, ''अपने ही देश में अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए कश्मीरी पंडितों के बलिदान, असहनीय पीड़ा और संघर्ष की सच्चाई इस फिल्म के माध्यम से पूरी दुनिया के सामने आई है, जो एक बहुत ही सराहनीय प्रयास है.''

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फिल्म को कई राज्यों ने टैक्स फ्री भी किया है जिसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, गोवा, हरियाणा, गुजरात और मध्य प्रदेश सहित कई राज्य शामिल हैं.

वीडियो कैप्शन, द कश्मीर फ़ाइल्स फ़िल्म पर जम्मू के कश्मीरी पंडित क्या बोले?

32 साल पहले कश्मीरी पंडितों के साथ क्या हुआ था

जनवरी, 1990 कश्मीरियों के विस्थापन का सबसे बड़ा गवाह रहा है. सख़्ती के लिए जाने जाने वाले जगमोहन को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा. राज्य के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया और इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया.

18 जनवरी को उनके राज्यपाल चुने जाने की घोषणा हुई और 19 जनवरी को उन्होंने कार्यभार ग्रहण किया. कश्मीर पर 'कश्मीरनामा' और 'कश्मीर और कश्मीरी पंडित' किताबें लिखने वाले अशोक पांडेय लिखते हैं ''इसी दिन अर्धसैनिक बलों ने घर-घर की तलाशी लेनी शुरू कर दी. सीआरपीएफ के महानिदेशक जोगिंदर सिंह ने उसी दिन रात में श्रीनगर के डाउनटाउन से लगभग 300 युवकों को गिरफ़्तार कर लिया.''

20 जनवरी की रात को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और ये वही दौर था जब पड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का भी पलायन कश्मीर से हुआ, जो अगले कुछ सालों तक भी चलता रहा.

अशोक पांडेय अपनी क़िताब में लिखते हैं, ''डर और गुस्सा. इन्हीं दोनों ने मिलकर नब्बे की दशक की वो भयावह शुरुआत की जिसमें कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनने पर मजबूर किया और कश्मीरी मुसलमानों को दमन, हिंसा और डिस्टोपिया के गहरे और अंतहीन दलदल में धकेल दिया.

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