उत्तराखंडः धामी फिर बनेंगे CM या बीजेपी किसी नए चेहरे को देगी मौक़ा?

पुष्कर धामी

इमेज स्रोत, FACEBOOK

इमेज कैप्शन, पुष्कर धामी
    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तराखंड में पांचवीं विधानसभा के लिए हुए चुनावों के बाद वह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है जो हर चुनाव के बाद सिर उठाता है और वह सवाल है कि अब मुख्यमंत्री कौन? हालांकि, मुख्यमंत्री बनने के लिए कई दावेदार मैदान में हैं लेकिन हर बार की तरह इस सवाल का जवाब दिल्ली से ही आना है.

उत्तराखंड में ऐसा तीसरी बार हुआ है कि चुनाव से पहले सत्ताधारी पार्टी भावी मुख्यमंत्री के नाम के साथ चुनाव में उतरी है लेकिन परिस्थितियां इस बार अलग हैं.

2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जनरल (रिटायर्ड) बीसी खंडूड़ी के नाम के साथ सत्ताधारी पार्टी बीजेपी चुनाव में उतरी थी. तब भी पार्टी ने पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बनाए थे.

2007 में सत्ता हासिल करने पर बीसी खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने थे. उन्हें हटाकर करीब सवा साल के लिए रमेश पोखरियाल निशंक को राज्य का मुखिया बनाया गया और चुनाव से छह महीने पहले निशंक को भी हटा दिया गया.

सितंबर 2011 में जनरल (रिटायर्ड) खंडूड़ी को फिर मुख्यमंत्री बनाया गया और पार्टी उन्हीं के चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरी लेकिन खंडूड़ी अपना ही चुनाव हार गए और बीजेपी की सत्ता में वापसी नहीं हुई.

2017 में सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के नाम के साथ चुनाव में गई. लेकिन दो सीटों से चुनाव लड़े हरीश रावत तो दोनों से हारे ही, कांग्रेस भी 11 सीट पर ही सिमट गई.

इस बार अंतर यह है कि सत्ताधारी बीजेपी तो दो तिहाई बहुमत से जीत गई है लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर धामी अपनी सीट नहीं बचा पाए. इसलिए इस बार मामला उलझा हुआ है और बीजेपी में मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर चर्चा चल रही है.

एक नज़र उन नामों पर जो रेस में हैं.

पुष्कर धामी

FACEBOOK

इमेज स्रोत, FACEBOOK

बीजेपी ने इन चुनावों में पार्टी के मुख्यमंत्री रहे पुष्कर धामी पर ही दांव खेला था. चुनावी साल में पार्टी ने दो मुख्यमंत्री बदलने के बाद पुष्कर धामी को मुख्यमंत्री बनाया और प्रधानमंत्री समेत बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने युवा मुख्यमंत्री की जमकर पीठ ठोकी लेकिन धामी अपनी परंपरागत सीट खटीमा से चुनाव हार गए.

इसके बाद भी पुष्कर धामी का नाम मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे है. बीजेपी एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि चूंकि पुष्कर धामी के नाम पर ही चुनाव लड़ा गया है इसलिए उनके नाम पर सहमति बनने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

उनके अलावा अगर किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जाता तो कई विरोधी गुट सक्रिय हो जाएंगे और स्थानीय निकाय चुनावों समेत 2024 के लोकसभा चुनावों पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है.

धामी के पक्ष में लॉबिंग शुरू भी हो गई है. बीजेपी के तीन और एक निर्दलीय विधायक ने धामी के लिए सीट छोड़ने की पेशपश कर दी है.

पार्टी के सीनियर लीडर्स और धामी के मुख्यमंत्रित्व काल में कैबिनेट मंत्री रहे अरविंद पांडे और गणेश जोशी ने धामी का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर अजय ढौंडियाल कहते हैं कि लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए अच्छा तो यह होगा कि चुने हुए विधायकों में से किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाए. बीजेपी के बहुत से विधायक बहुत अनुभवी हैं और लायक हैं. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस नाम पर धामी को ही मुख्यमंत्री बना दिया जाए कि इन्हीं के नाम पर चुनाव लड़ा गया है. नई बीजेपी में कुछ भी हो सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दिनेश जुयाल भी इस बात पर सहमति जताते हैं. वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जो कह देते हैं उसे मनवाने के लिए फिर तर्क गढ़े जाते हैं. चूंकि पुष्कर धामी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया था तो अब उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है.

अब तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का उदाहरण भी सामने है. जब वह चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री बन सकती हैं तो धामी क्यों नहीं.

मदन कौशिक

मदन कौशिक

इमेज स्रोत, FACEBOOK

इमेज कैप्शन, मदन कौशिक

प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का नाम भी मुख्यमंत्री पद की रेस में बताया जा रहा है. यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री पद के लिए धामी का नाम आगे आने के सवाल पर मदन कौशिक ने कहा कि रेस में कोई नहीं होता, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही मुख्यमंत्री के नाम का फ़ैसला करेगा.

चुनाव के बाद देहरादून में मौजूद केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ने धामी की खुलकर तारीफ़ की थी और प्रदेश में जीत का क्रेडिट उन्हें दिया था लेकिन कौशिक ने इस सबको दरकिनार करते हुए जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की नीतियों को दिया.

दिनेश जुयाल कहते हैं कि चूंकि मुख्यमंत्री पद के दावेदार पुष्कर धामी चुनाव हार गए हैं तो नेतृत्व के लिहाज से प्रदेश अध्यक्ष का नाम स्वाभाविक रूप से आगे आता है. वह यह भी कहते हैं कि मदन कौशिक लंबे समय से इस कोशिश में हैं कि सिर्फ़ पहाड़ी ही प्रदेश की राजनीति के शीर्ष पर न रहे.

वह ध्यान दिलाते हैं कि मदन कौशिक बीजेपी के पहले गैर-पहाड़ी प्रदेश अध्यक्ष बनने में कामयाब रहे हैं. जुयाल कहते हैं कि मदन कौशिक के लिए गैर-पहाड़ी नेताओं का समर्थन जुटाना मुश्किल भी नहीं होगा.

लेकिन इसके विपरीत डॉक्टर अजय ढौंडियाल को नहीं लगता कि मदन कौशिक की मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी के लिए समय आ गया है.

वह कहते हैं कि बीजेपी अभी उत्तराखंड में किसी गैर पहाड़ी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का जोखिम नहीं ले सकती. इससे बीजेपी ही नहीं, अन्य दलों के नेता भी नाराज़ हो सकते हैं और पार्टी लाइन से अलग ध्रुवीकरण हो सकता है.

ढौंडियाल यह भी जोड़ते हैं कि जैसा बीजेपी का स्वभाव रहा है मुख्यमंत्री बदलने का, हो सकता है कि ये कौशिक को चुनाव के ठीक पहले मौका दे दें. क्योंकि परिसीमन के बाद मैदानी क्षेत्र में सीटें बढ़ेंगी और तब कौशिक पर दाव खेला जा सकता है.

धन सिंह रावत

त्रिवेंद्र सरकार में राज्य मंत्री और धामी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे धन सिंह रावत का नाम भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में माना जा रहा है. श्रीनगर से विधायक धन सिंह रावत संघ की पृष्ठभूमि से हैं और त्रिवेंद्र सिंह रावत के हटने के बाद भी उनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उछला था.

दिनेश जुयाल कहते हैं कि धन सिंह रावत की संघ की एक लॉबी है और उनकी ख़ास बात यह है कि वह हर बार अपना नाम उछलवा लेते हैं. हालांकि, जुयाल उन्हें गंभीर दावेदार नहीं मानते.

ढौंडियाल कहते हैं कि अगर धन सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो पार्टी के अन्य अनुभवी नेता बुरा मान सकते हैं, विद्रोह कर सकते हैं. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि मोदी-शाह की बीजेपी में विरोध का बहुत ज़्यादा अर्थ तो नहीं है लेकिन इसकी संभावना को खारिज भी तो नहीं किया जा सकता.

धामी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद भी सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत समेत कुछ पुराने नेता नाराज़ हो गए थे, जिन्हें मनाना पड़ा था.

सतपाल महाराज

FACEBOOK

इमेज स्रोत, FACEBOOK

इमेज कैप्शन, सतपाल महाराज

केंद्र में मंत्री रह चुके और राज्य में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे सतपाल महाराज का नाम भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में है. सतपाल महाराज कभी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा छुपाते भी नहीं हैं और मुख्यमंत्री न बन पाने पर मलाल भी छुपा नहीं पाते.

सतपाल महाराज का नाम हमेशा मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में होता रहा है और इस बार भी कई लोग उनके नाम की चर्चा कर रहे हैं. मुख्यमंत्री के नाम पर चर्चाओं के बीच सतपाल महाराज दिल्ली पहुंच भी चुके हैं.

निशंक, भट्ट और बलूनी

विधायकों के अलावा मुख्यमंत्री पद के लिए तीन सांसदों के नाम भी चर्चा में हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रहे रमेश पोखरियाल निशंक परिणाम घोषित होने से ठीक पहले सक्रिय हो गए थे. इससे पहले वह लंबे समय तक स्वास्थ्य कारणों से ही सही, सार्वजनिक जीवन से दूर रहे थे.

निशंक की सक्रियता का अर्थ उनकी दावेदारी से भी निकाला जा रहा है.

अजय ढौंडियाल कहते हैं कि अगर विधायकों पर सहमति नहीं बनती तो निशंक का नाम आगे आ सकता है, वह अपने नाम पर सहमति बनवा सकने में कामयाब हो सकते हैं.

हालांकि, दिनेश जुयाल को लगता है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बाद निशंक के मुख्यमंत्री बनने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि अब वह पीएम मोदी की गुड बुक में नहीं हैं.

अजय ढौंडियाल कहते हैं कि केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट को भी मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. उनकी प्रदेश के संगठन में पकड़ भी है. वह कैबिनेट मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं और उनकी छवि भी ठीक है.

दिनेश जुयाल कहते हैं कि राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी की दावेदारी को खारिज नहीं किया जा सकता. बतौर राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी उनका काम ठीक रहा है. वह मोदी-शाह के नज़दीकी भी हैं और प्रदेश में लगातार अपनी उपस्थिति बनाए रहते हैं.

हालांकि, अजय ढौंडियाल कहते हैं कि तय तो सब दिल्ली से ही होना है. क्या किसी को पता था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बनेंगे और अचानक हटा दिए जाएंगे. अभी तक कोई नहीं समझ पाया कि तीरथ सिंह रावत को क्यों लाया गया और फिर सबसे युवा विधायक पुष्कर धामी को किस गणित से मुख्यमंत्री बना दिया गया?

इसलिए दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)