यूपी विधानसभा चुनाव -दूसरे चरण की 55 सीटों पर क्या होगा जीत का फैक्टर?

मायावती, योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव

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    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 9 ज़िलों की 55 विधानसभा सीटों पर इस बार मुक़ाबला कई पेंच में फंसा है.

14 फ़रवरी को होने वाले मतदान से पहले यह सवाल हर राजनीतिक खेमे से पूछा जा रहा है कि क्या इस बार नए चेहरे जीत दिला पाएंगे?

वहीं, भारी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों के उतारे जाने से मुक़ाबला कांटे का हो गया है. सवाल ये भी है कि क्या एआईएमआईएम के ओवैसी बसपा और सपा-रालोद गठबंधन का खेल बिगाड़ देंगे?

2017 के नतीजे क्या कहते हैं?

2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 55 विधानसभा सीटों में से 38 पर जीत दर्ज की थी. 13 ऐसी सीटें थी जहां भाजपा दूसरे नंबर पर रही थी. 2017 में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

सपा ने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनमें 15 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी वहीं 21 उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे.

55 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के खाते में महज दो सीटें आईं थी जबकि बहुजन समाज पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी. बहुजन समाज पार्टी के 40 उम्मीदवार तीसरे नंबर पर खिसक गए थे.

9 ज़िलों की जिन 55 विधानसभा सीटों पर 14 फ़रवरी को मतदान होना है, उन पर पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने 12 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. 12 उम्मीदवारों में से 8 ऐसे थे जिन्हें पांच हज़ार से भी कम वोट पड़े थे. सिर्फ़ संभल विधानसभा सीट पर ओवैसी की पार्टी अच्छा प्रदर्शन कर पाई थी.

इस सीट पर ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार क़रीब 60 हज़ार मतों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे. 12 में से 11 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी.

इसके साथ ही राष्ट्रीय लोकदल मुक़ाबले में कहीं नहीं थी. रालोद ने 46 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था.

बहुत मुश्किल से मुरादाबाद ग्रामीण विधानसभा सीट पर कामरान उल हक तीसरे नंबर पर पहुंच पाए थे. तब कामरान उल हक़ को क़रीब 23 हज़ार वोट पड़े थे.

इस बार नई रणनीति, नए चेहरे

भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में 55 में से 38 सीट जीती थी. इस बार भाजपा जीत के आंकड़े को बढ़ाने की कोशिश में है. इसके लिए भाजपा ने 25 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार बदले हैं. पिछली बार के जीते हुए 10 उम्मीदवारों का टिकट काट दिया है.

दूसरे चरण में 54 सीटों पर भाजपा और एक सीट पर अपना दल (सोनेलाल) के उम्मीदवार मैदान में है. खास बात ये है कि अपना दल (सोनेलाल) ने मुस्लिम उम्मीदवार को उतारा है.

हैदर अली खान को रामपुर की स्वार टांडा विधानसभा सीट से टिकट दी गई है. इस सीट पर हैदर अली ख़ान का मुक़ाबला आज़म ख़ान के बेटे अब्दुल्ला आज़म ख़ान से है.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल बताते हैं, "हैदर अली अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं. स्वार टांडा विधानसभा सीट पर नवाब खानदान का परंपरागत वोट है. हैदर अली उर्फ हमजा मियां नवाब खानदान की तीसरी पीढ़ी से हैं. इससे पहले हैदर अली के पिता और दादी चुनाव जीत कर विधानसभा और लोकसभा में जाते रहे हैं."

भाजपा के नए उम्मीदवारों में बेहट विधानसभा के नरेश सैनी और सहारनपुर से जगपाल सिंह शामिल हैं. नरेश सैनी ने 2017 में बेहट से ही कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीता था. वहीं, जगपाल सिंह बसपा की टिकट से चुनाव लड़े थे.

सपा सांसद आज़म ख़ान के बेटे और विधायक अब्दुल्ला आज़म

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क्या है सपा-रालोद की तैयारी

इस विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय लोकदल पार्टी के साथ गठबंधन है. 2017 के विधानसभा चुनाव सपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था. दूसरे चरण की 55 सीटों में 52 पर सपा और 3 पर रालोद के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं.

सपा-रालोद गठबंधन ने 55 विधानसभा सीटों में 34 पर अपने उम्मीदवारों को बदल दिया है. चार ऐसे उम्मीदवार हैं जो पिछला विधानसभा चुनाव जीते थे लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया. वहीं रालोद ने भी 3 नए चेहरों को टिकट दिया है.

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क्या बसपा का इस बार खुलेगा खाता?

पिछली हार से सबक लेते हुए बहुजन समाज पार्टी ने इस बार उम्मीदवारों के चयन में भारी फेरबदल कर दिया है. 54 विधानसभा सीटों पर बसपा ने सारे उम्मीदवार ही बदल दिए हैं. मतलब पिछली बार जो उम्मीदवार चुनाव में खड़े थे उनमें से किसी को भी टिकट नहीं दिया है.

सिर्फ़ बची हुई एक सीट पर बसपा ने अपने पुराने उम्मीदवार को मौका दिया है. रिजर्व सीट रामपुर मनिहारन पर रविंद्र कुमार चुनाव लड़ रहे हैं. 2017 विधानसभा चुनाव में रविंद्र कुमार महज 595 मतों से हार थे.

11 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां बसपा और सपा के मुस्लिम उम्मीदवारों का आमना-सामना है.

प्रियंका गांधी

कांग्रेस को कितनी बढ़त

दूसरे चरण की जिन 55 सीटों पर चुनाव है वहां 2017 चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ़ 15 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. कांग्रेस का पिछली बार समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन था.

कांग्रेस के 15 में से सिर्फ़ 2 उम्मीदवार ही जीत पाए थे.

इस बार कांग्रेस ने दूसरे चरण की 55 विधानसभा सीटों में 2017 के सिर्फ़ एक उम्मीदवार को फिर से टिकट दी है.

ये टिकट रामपुर जिले की बिलासपुर सीट से संजय कपूर को मिली है, हालांकि वो पिछला चुनाव हार गए थे.

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किसका खेल बिगाड़ेंगे ओवैसी?

दूसरे चरण के चुनाव में कई इलाके मुस्लिम बहुल हैं. मुस्लिम वोट इस बार निर्णायक साबित होंगे लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम ने 19 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारकर चुनावी गणित बिगाड़ दिया है.

2017 विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार ओवैसी की पार्टी ने 7 उम्मीदवार ज्यादा उतारे हैं. इनमें दो हिंदू उम्मीदवार भी हैं.

जानकार बताते हैं कि ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार भले ना जीतें लेकिन वो दूसरी पार्टियों का खेल बना और बिगाड़ भी सकते हैं.

ओवैसी सपा-रालोद गठबंधन के मुस्लिम जनाधार में सेंध लगाएंगे. इसका फायदा भाजपा को हो सकता है.

राजनीतिक दलों के झंडे

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मुरादाबाद में मुस्लिम उम्मीदवारों पर बड़ा दांव

दूसरे चरण के चुनाव में मुरादाबाद ज़िले की छह सीटों पर कांटे का मुक़ाबला होने जा रहा है.

वजह ये है कि सपा-रालोद गठबंधन ने 6, बसपा ने 5, कांग्रेस ने 5 और एआईएमआईएम ने 5 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं.

इन 6 सीटों पर सिर्फ़ भाजपा ने ही किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को मौका नहीं दिया है.

2017 विधानसभा चुनाव में मुरादाबाद ज़िले की 6 सीटों में से समाजवादी पार्टी ने ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद ग्रामीण, कुंदरकी और बिलारी विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की थी वहीं कांठ और मुरादाबाद नगर सीट भाजपा के खाते में गई थी.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल बताते हैं, "इस क्षेत्र का मुक़ाबला मुस्लिम राजनीति का बैरोमीटर है. यहां पर भाजपा का लाभार्थी वोटर काफ़ी मजबूत है. अगर भाजपा हिंदू मतदाताओं को भी एकजुट कर लेती है तो यहां उसे बढ़त मिल सकती है. मुरादाबाद प्रियंका गांधी का ससुराल भी है. वो ख़ुद यहां प्रचार करने आईं थीं."

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