उत्तर प्रदेश चुनाव में ओवैसी की मौजूदगी का असर क्या होगा?- प्रेस रिव्यू

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ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी पर यूपी में मेरठ से लौटते हुए हमले के बाद उत्तर प्रदेश चुनाव में उनकी चर्चा बढ़ गई है.
वैसे तो पार्टी का आधार मुख्य रूप से हैदराबाद में है और यहीं से ओवैसी सांसद भी हैं. लेकिन, पार्टी 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद बिहार और यूपी में काफ़ी सक्रिय है. एआईएमआईएम ने बिहार विधानसभा चुनाव में पाँच सीटों पर जीत दर्ज की थी.
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने आज एआईएमआईएम की यूपी चुनाव में भूमिका को लेकर प्रमुखता एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.
अख़बार के मुताबिक़ यूपी चुनाव के लिए पार्टी ने जन अधिकार पार्टी और भारतीय मुक्ति मोर्चा के साथ एक तीसरे फ्रंट का गठन किया है, जिसका नाम है- 'भागीदारी परिवर्तन मोर्चा'.
जन अधिकार पार्टी यूपी के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और भारतीय मुक्ति मोर्चा वामन मेश्रम के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है.
अख़बार ने लिखा है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम यूपी में 100 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली है. लेकिन, पार्टी ने अब तक 66 सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे हैं, जो अधिकतर मुसलमान आबादी वाले इलाक़ों में हैं.
उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए असदुद्दीन ओवैसी लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं. उन्होंने वरिष्ठ विपक्षी नेताओं के साथ बैठकें भी की हैं. सुखदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर, प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रमुख शिवपाल यादव और आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर से उन्होंने मुलाक़ात की थी.
अपने लगभग सभी भाषणों में ओवैसी ने राज्य में सत्ताधारी बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी को निशाना बनाया है.

बीजेपी की बी टीम होने का आरोप
हालांकि, विपक्ष के मुसलमान वोटों में सेंध लगाने के कारण एआईएमआईएम पर 'बीजेपी की बी टीम' होने का आरोप भी लगाया जाता है.
सितंबर में ओवैसी ने सपा प्रमुख पर निशाना साधते हुए कहा था कि ''मुजफ़्फ़नगर दंगे होने पर अगर अखिलेश यादव ने मामले शुरू कर दिए होते तो योगी सरकार 77 मामलों को वापिस नहीं ले पाती.''
उन्होंने बार-बार यह भी कहा है कि सपा "यूपी में मुसलमानों का स्वतंत्र नेतृत्व" नहीं चाहती है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एआईएमआईएम के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि उन्हें कम से कम 10 सीटों पर कड़ी चुनौती देने की उम्मीद है. उन्होंने बताया कि ये सीटें पूरे प्रदेश में हैं, जैसे बहराईच में नानपारा, अयोध्या में राउदौली, सिद्धार्थ नगर ज़िले में डोमारियागंज, सहारनपुर देहात, गाज़ियाबाद में साहिबाबाद, मेरठ में सिवल खास.
पार्टी यूपी में अपना आधार बनाने की कोशिश कर रही है. ओवैसी को दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध के दौरान यहाँ लोकप्रियता मिली.
उनके भाषण तो यूपी में लोगों की भीड़ जुटाने में क़ामयाब होते हैं लेकिन वो वोट दिला सकते हैं या नहीं, ये देखना होगा.

सपा को वोट कटने का डर
अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''एआईएमआईएम ने 2017 में उत्तर प्रदेश चुनाव में क़दम रखा था. तब पार्टी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सभी पर हार गई थी. उन चुनावों में पार्टी को 0.24 प्रतिशत वोट शेयर मिला था.''
''पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन संभल में रहा, जहाँ उनके उम्मीदवार जाइउर रहमान 59,336 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर थे. दूसरे नंबर पर 59,976 वोटों के साथ बीजेपी के उम्मीदवार और पहले नंबर पर 79,248 वोटों के साथ सपा उम्मीदवार रहे थे.''
एआईएमआईएम ने पिछले साल पंचायत चुनाव में 23 ज़िला पंचायत सीटें भी जीती थीं.
पार्टी के लिए यूपी चुनाव में खोने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है लेकिन पार्टी जीतती है तो मुसलमान-यादव वोट-बैंक पर निर्भर समाजवादी पार्टी को उसका नुक़सान उठाना पड़ सकता है.
अख़बार से एक वरिष्ठ सपा नेता ने कहा है कि अगर एआईएमआईएम को हर सीट पर 10 हज़ार वोट भी मिलते हैं तो वो मुसलमानों के ही होंगे जो हमारी पार्टी का वोटबैंक हैं. ''ये समीकरण कई सीटों को बना और बिगाड़ सकता है और बीजेपी को मदद कर सकता है.''
साल 2011 की जनगणना के मुताबिक यूपी में 19 प्रतिशत मुसलमान आबादी है जो करीब 60-70 सीटों पर निर्णायक फ़ैसला कर सकती है. इन इलाक़ों में मुसलमान आबादी 35 से 50 प्रतिशत है.
इंडियन एक्सप्रेस से विपक्षी के ''बीजेपी की बी टीम'' होने के आरोपों को ख़ारिज करते हुए पार्टी की राज्य कार्यकारी समिति के सदस्य मोहम्मद सलमान ने कहा, ''कोई कैसे कह सकता है कि हम बीजेपी की बी टीम हैं? हमारे अच्छे प्रदर्शन के बाद ये बात ख़त्म हो जाएगी. अब हमें बिहार में कोई बी टीम नहीं कहता. वहीं, कर्नाटक जैसी जगहों पर जहाँ कांग्रेस की सरकार बीजेपी गिरा देती है. क्या कांग्रेस इसके लिए भी हमें दोषी ठहराएगी?''

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जेएनयू के कुलपति बने यूजीसी अध्यक्ष
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति एम जगदीश कुमार को शुक्रवार को केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा नियामक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) क अध्यक्ष बनाया है. अंग्रेज़ी अख़बार 'द टेलिग्राफ' ने ये ख़बर दी है.
जगदीश कुमार पाँच साल तक या 65 साल की उम्र होने तक इस पद पर बने रहेंगे. यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष डीपी सिंह का कार्यकाल दिसंबर में पूरा होने के बाद से ये पद खाली पड़ा है.
उच्च शिक्षण संस्थानों में मानकों को बनाए रखना और उन्हें अनुदान जारी करना यूजीसी की ज़िम्मेदारी है.
जेएनयू में जगदीश कुमार का कार्यकाल विवादित फैसलों और आरोपों से घिरा रहा है. जैसे पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले छात्रों के प्रवेश में अतिरिक्त वंचित अंक नीति को ख़त्म करना, विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों को चार्ज़शीट जारी करना और छात्रों पर हुए हमले में कोई कार्रवाई ना करने का आरोप.

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अवैध कब्ज़े वाले इलाक़े में चीन बना रहा पुल: सरकार
भारत सरकार ने शुक्रवार को संसद में बताया कि पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील पर चीन अवैध कब्ज़े वाले इलाक़े में पुल बना रहा है. ये इलाक़ा 1962 से चीन के अवैध कब्ज़े में हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में ये जानकारी दी.
उन्होंने बताया, ''भारत सरकार ने कभी इस अवैध कब्ज़े को स्वीकार नहीं किया है. सरकार ने कई मौक़ों पर ये स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं और हम दूसरे देशों से भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की उम्मीद करते हैं.''
ये पुल झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों को जोड़ता है जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत अहम है.
अमेरीका कि स्पेस टेकनोलॉजी कंपनी से पिछले महीने मिली सेटेलाइट तस्वीरों से पुल निर्माण की जानकारी मिली थी. इससे पता चलता है कि पुल आठ मीटर चौड़ा और 400 मीटर लंबा है. इसके निर्माण में बड़ी-बड़ी क्रेन का इस्तेमाल हो रहा है.
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