उत्तर प्रदेश चुनाव: यूपी की राजनीति में छोटे दलों की क्या भूमिका है?

छोटे दलों के नेता

इमेज स्रोत, Getty Images/nishadparty4u/omprakashrajbhar

इमेज कैप्शन, आरएलडी के जयंत चौधरी, निषाद पार्टी के डॉ संजय निषाद, अपना दल की अनुप्रिया पटेल और सुभासपा के नेता ओम प्रकाश राजभर
    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय चुनाव आयोग ने बीते शनिवार उत्तर प्रदेश समेत कुल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान कार्यक्रम का ऐलान कर दिया है.

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में सात चरणों में मतदान कराने का फ़ैसला किया है. इस घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो गयी है.

भारतीय जनता पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एवं बसपा अपने-अपने स्तर पर ज़ोर-आजमाइश कर रही हैं.

लेकिन बड़ी पार्टियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के तमाम छोटे दल भी इस चुनाव में अपना भविष्य तलाश रहे हैं.

इन दलों में जयंत चौधरी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय लोक दल, डॉ संजय निषाद की निषाद पार्टी, ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा, और अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल शामिल है.

लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नज़र डालें तो एक बात के संकेत मिलते हैं कि उत्तर प्रदेश में मतदाता किसी एक पार्टी को बहुमत दे रहे हैं. और 403 विधानसभा सीटों वाले इस राजनीतिक रूप से जटिल प्रदेश में पूर्ण बहुमत के लिए 202 सीटें जीतना ज़रूरी है.

साल 2007 के चुनाव ने मायावती को 206 सीटों के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया, 2012 के चुनाव ने अखिलेश यादव को 224 सीटों के साथ मुख्यमंत्री बनाया और 2017 में 312 सीटों के साथ योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम बने.

दिसंबर में निषाद पार्टी और बीजेपी की संयुक्त रैली में अमित शाह और योगी आदित्यनाथ

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, दिसंबर में निषाद पार्टी और बीजेपी की संयुक्त रैली में अमित शाह और योगी आदित्यनाथ

छोटी पार्टियों का साथ चाहतीं बड़ी पार्टियाँ

पिछले चुनावों में बड़ी पार्टियों ने स्पष्ट बहुमत हासिल ज़रूर किया है लेकिन इस बार चुनाव से पहले बीजेपी के अमित शाह और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव समेत अन्य बड़े दलों के नेता इन छोटी पार्टियों को अपने साथ लाने की कोशिशें करते दिख रहे हैं.

लखनऊ के रमाबाई मैदान में हुई महानिषाद रैली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें बीजेपी के अमित शाह समेत कई बड़े नेता शामिल हुए थे.

ऐसे में सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन छोटे क्षेत्रीय दलों की क्या भूमिका है. इनका राजनीतिक महत्व कितना और किस क्षेत्र में है, और इस चुनाव पर ये दल क्या असर डाल सकते हैं.

बीबीसी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र से बात करके इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.

ओम प्रकाश राजभर

इमेज स्रोत, Facebook/omprakashrajbhar

इमेज कैप्शन, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ ओम प्रकाश राजभर

ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी

राजभर समुदाय के प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर ने हाल ही में एक निजी चैनल के साथ इंटरव्यू में दावा किया है कि बीजेपी नेता और मंत्री सपा से टिकट मिलने की बाट जोह रहे हैं.

उन्होंने ये बात बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह से बैठक के बाद कही है, क्योंकि इस मुलाक़ात के बाद से उत्तर प्रदेश में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है.

कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या हाल ही में समाजवाद पार्टी के साथ गठबंधन करने वाले ओम प्रकाश राजभर चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थाम सकते हैं.

साल 2017 में राजभर ने बीजेपी के साथ गठबंधन करके चार सीटें हासिल की थीं. और इस चुनाव के बाद से अशोक राजभर की महत्वाकाँक्षाएं बढ़ी हैं.

ओम प्रकाश राजभर

इमेज स्रोत, Facebook/omprakashrajbhar

उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र मानते हैं कि जब-जब बड़ी पार्टियां छोटे दलों को अपने साथ जोड़कर चुनाव में जाती हैं तो छोटे दलों को इसका फायदा मिलता है. लेकिन इन दलों के नेता बड़ी पार्टियों के लिए चुनौती बन जाते हैं.

वे कहते हैं, "राजभर इस समय बीजेपी के लिए चुनौती बन गए हैं. अगर पिछले चुनाव में राजभर बीजेपी के साथ नहीं लड़ते तो ये चाहे कितना भी दावा करें तो इनकी मौजूदगी राजनीतिक सफलता के लिहाज़ से नहीं दिखती. अब मसला ये है कि वह पिछले चुनाव में इतनी सीटें जीत चुके हैं तो उन्हें राजनीतिक सफलता दिखती है."

बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह के साथ मुलाक़ात पर योगेश मिश्र कहते हैं कि "ये बैठकें सिर्फ ये बता रही हैं कि इस समय बीजेपी और सपा दोनों ही दल किस चुनावी विवशता से गुज़र रहे हैं."

साल 2002 में स्थापित होने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का प्रभाव क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश की लगभग दो दर्जन सीट पर माना जाता है.

हालांकि, ओम प्रकाश राजभर दावा करते हैं कि उनका समाज प्रदेश की लगभग 100 सीटों पर अपना प्रभाव रखती है.

ये भी पढ़ें -

अनुप्रिया पटेल

इमेज स्रोत, Facebook/AnupriyaSPatel

इमेज कैप्शन, अनुप्रिया पटेल

अनुप्रिया पटेल का अपना दल

उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से विशेषत: वाराणसी और इसके आसपास के क्षेत्र में कुर्मी वोटरों का प्रतिनिधित्व करने वाली 'अपना दल' इस समय बीजेपी के साथ गठबंधन में है.

कांशीराम के साथ काम कर चुके डॉक्टर सोने लाल पटेल ने साल 1995 में अपना दल की स्थापना की थी. लेकिन इस समय अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल हैं.

अपना दल द्वारा कुर्मियों के प्रतिनिधित्व के दावे पर योगेश मिश्रा कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में चार ऐसे तबके हैं जिनकी मौजूदगी पूरे उत्तर प्रदेश में है. इनमें ब्राह्मण, ठाकुर, दलित और मुसलमान शामिल हैं. इनके अलावा अन्य जातियों के अलग-अलग इलाके हैं. और इन इलाकों के अपने नेता हैं. जैसे कुर्मी बाराबंकी से लेकर बहराइच तक हैं, बनारस से लेकर सोनभद्र तक हैं, फतेहपुर से लेकर बुंदेलखंड तक हैं.

लेकिन यूपी में ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जो इन तीनों जगहों पर कुर्मियों का नेता रहा हो. बाराबंकी से बहराइच तक बेनी प्रसाद वर्मा थे, बनारस में सोनेलाल पटेल रहे और अब अनुप्रिया पटेल हैं...ऐसे में ये जातियां अपने नेता बदलती रही हैं."

अनुप्रिया पटेल फिलहाल मिर्ज़ापुर से सांसद हैं और उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उनके हिस्से में 9 सीटें हैं.

लेकिन अनुप्रिया पटेल और उनकी माँ कृष्णा पटेल के बीच तनाव की ख़बरों के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि सोने लाल पटेल ने जिन कुर्मियों का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी पार्टी खड़ी की थी, वह कुर्मी समाज माँ या बेटी में किसे स्वीकार करेगा.

ये भी पढ़ें -

जयंत चौधरी

इमेज स्रोत, Hindustan Times

इमेज कैप्शन, अखिलेश यादव के साथ जयंत चौधरी

जयंत चौधरी का राष्ट्रीय लोकदल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ये इतिहास रहा है कि जब-जब यूपी में राष्ट्रीय पार्टियां मजबूत होती हैं तो इसका नुकसान क्षेत्रीय पार्टियों को उठाना पड़ता है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से लेकर मेरठ, मुजफ़्फ़रनगर और बिजनौर आदि इलाकों में प्रभाव रखने वाला राष्ट्रीय लोकदल इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है.

साल 2014 और 2017 के चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की धमक का सबसे ज़्यादा राजनीतिक नुकसान राष्ट्रीय लोकदल को ही उठाना पड़ा है.

चौधरी अजीत सिंह ने साल 1996 में इस पार्टी का गठन किया था. इसके बाद से धीरे-धीरे पार्टी ने ज़मीन पर अपनी जगह बनाई थी. साल 2002 की बसपा सरकार में आरएलडी को दो कैबिनेट मंत्री पद हासिल हुए थे.

इसके बाद साल 2004 के चुनाव में आरएलडी ने तीन लोकसभा सीटें हासिल कीं. इसके 10 साल बाद 2014 में आरएलडी ने यूपीए के झंडे तले चुनाव लड़ा और सारी सीटें गंवा बैठी.

इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी ने सिर्फ 1 सीट जीती और आख़िर में उस सीट से भी हाथ धो बैठी.

योगेश मिश्र बताते हैं, "राष्ट्रीय लोकदल का प्रभावक्षेत्र सहारनपुर से शुरू होकर आगरा बेल्ट तक है. और इस दल की सबसे ख़ास पहचान ये है कि इसमें जो नेता जिस जाति का होता है, वह हमेशा अपनी जाति बाहुल्यता वाले इलाके से लड़ना चाहता है."

ये भी पढ़ें -

केशव देव मौर्य

इमेज स्रोत, Twitter/Akhilesh Yadav

इमेज कैप्शन, केशव देव मौर्य के साथ अखिलेश यादव

केशव देव मौर्य का महान दल

साल 2008 में बहुजन समाज पार्टी से अलग होकर महान दल की स्थापना करने वाले केशव देव मौर्य ने हाल ही में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है.

उत्तर प्रदेश के मौर्य, भगत, भुजबल, सैनी और शाक्य जैसी कई जातियों के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले केशव देव मौर्य का पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ विधानसभाओं में अच्छा दखल माना जाता है.

लेकिन केशव देव मौर्य उसी ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके नेता केशव प्रसाद मौर्य और स्वामी प्रसाद मौर्य हैं.

योगेश मिश्र कहते हैं, "यूपी में जिस समाज के नेता केशव प्रसाद मौर्य हैं, उसी समाज के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और केशव देव मौर्य हैं. और इनमें से स्वामी प्रसाद और केशव प्रसाद बीजेपी में हैं. अगर केशव प्रसाद मौर्य पूरे उत्तर प्रदेश में मौर्य समुदाय के नेता होते तो बीजेपी को स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने साथ लाने की ज़रूरत क्यों पड़ती? ये ज़रूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों के नेता हैं."

हालाँकि, मंगलवार को स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी का दामन छोड़ दिया और अब वो भी समाजवादी पार्टी के साथ हैं.

ये भी पढ़ें -

डॉ संजय निषाद

इमेज स्रोत, Facebook/nishadparty4u

इमेज कैप्शन, डॉ संजय निषाद एक जनसभा में

निषाद पार्टी

उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों को समझने वाले प्रोफेसर बदरी नारायण ने हाल ही में बीबीसी के साथ बातचीत में निषाद समुदाय के महत्व को समझाया है.

प्रोफेसर बदरी नारायण कहते हैं, "नदियों के किनारे बसने वाला ये समुदाय चुनावी गणित के लिहाज़ से काफ़ी ख़ास है. उत्तर प्रदेश में निषाद हर नदी के किनारे पर पाए जाते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना से सटे ग़ाजियाबाद और नोएडा से लेकर दूसरे तमाम इलाकों में ये समुदाय पाया जाता है. इसके बाद पूर्वांचल में गंगा के कछार क्षेत्र में इलाहाबाद से लेकर अन्य जगहों पर निषाद अच्छी ख़ासी संख्या में मौजूद हैं.

हर जगह निषाद एक महत्वपूर्ण समुदाय है जो कि राजनीति को प्रभावित करता है. लेकिन निषाद हर दल के लिए महत्वपूर्ण है. बीजेपी लगातार इसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. हालांकि, बीजेपी का इसमें पहले से ही काफ़ी आधार है.

इसके साथ ही समाजवादी पार्टी की भी हिस्सेदारी है इस समुदाय में. यही नहीं, बीएसपी भी इस समुदाय से वोट हासिल करती है. लेकिन इस बार लड़ाई इस बात की है कि सबसे ज़्यादा वोट किसे मिलेंगे. बीजेपी इसी दिशा में कोशिश कर रही है. बीजेपी की तमाम कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए जो लाभार्थी बने हैं, अब उन्हें अपनी ओर खींचने की कोशिश हो रही है."

हालांकि, हाल ही में लखनऊ में हुई रैली के बाद अमित शाह से अपने हित की घोषणा न सुनने के बाद निषाद समुदाय के लोगों में बीजेपी के प्रति नाराज़गी का भाव दिखा था.

लेकिन निषाद पार्टी के नेता डॉ संजय निषाद फिलहाल बीजेपी के साथ बने हुए हैं.

ये भी पढ़ें -

शिवपाल यादव

इमेज स्रोत, Twitter/shivpalsinghyad

उत्तर प्रदेश में अन्य छोटे दल

इन चार दलों के बाद उत्तर प्रदेश में शिवपाल यादव से लेकर पीस पार्टी समेत तमाम छोटी पार्टियां हैं.

लेकिन योगेश मिश्र मानते हैं कि छोटी पार्टियां बड़ी तब हो जाती हैं जब लोकसभा या विधानसभा चुनावों में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है.

ये दल अपने समाज की जनसंख्या के एक निश्चित फीसद का नेतृत्व करते हैं. और यह नेतृत्व बड़े दलों के लिए कभी वरदान तो कभी चुनौती बन जाता है.

ये भी पढ़ें -

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)