उत्तर प्रदेश चुनाव मतगणना: दस मार्च को पता चलेगा योगी या अखिलेश, कौन बनेगा यूपी सीएम

उत्तर प्रदेश विधान सभा के बारे में जानने लायक ज़रूरी बातें

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नजीते 10 मार्च को आएंगे. राज्य की 403 विधानसभा सीटों पर सात चरणों में चुनाव कराए गए.

इन विधानसभा सीटों पर मतदान की प्रक्रिया दस फरवरी से शुरू हुई थी और सात मार्च को आख़िरी चरण के मतदान के बाद दस मार्च को मतगणना होगी.

उत्तर प्रदेश जहां देश में आबादी के नज़रिए से सबसे बड़ा राज्य है. वहीं, राजनीतिक तौर पर भी इसे काफ़ी अहम माना जाता है.

जनसंख्या, राजनीतिक जागरूकता, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता आंदोलन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश, देश का एक बहुत ही महत्वपूर्ण राज्य है.

भारत की लगभग 16.17% आबादी इस राज्य में रहती है. क्षेत्रफल के लिहाज से ये राज्य - राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के बाद पांचवे स्थान पर है और भारत का 7.3% भूमि क्षेत्र इस राज्य में आता है.

उत्तर प्रदेश में 75 ज़िले हैं, 80 लोकसभा सीटें, 31 राज्य सभा सीटें हैं और 404 विधानसभा सीटें एवं इसके विधान परिषद में 100 सदस्य हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है. ऐसे में बीजेपी और कांग्रेस समेत सभी दलों के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव काफ़ी अहम है.

और उत्तर प्रदेश में बीजेपी से लेकर कांग्रेस, सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी आदि के शीर्ष नेताओं ने रैलियां कर जीत के लिए अपना पूरा ज़ोर लगाया.

साल 2017 में निर्वाचित वर्तमान विधान सभा का कार्यकाल 14 मार्च 2022 को ख़त्म होने वाला है.

उत्तर प्रदेश विधान सभा के बारे में जानने लायक ज़रूरी बातें

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नतीजे कब आएंगे?

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर सात चरणों में निम्नलिखित तारीख़ों पर मतदान कराना तय किया था.

पहले चरण का मतदान 10 फरवरी

दूसरे चरण का मतदान 14 फरवरी

तीसरे चरण का मतदान 20 फरवरी

चौथे चरण का मतदान 23 फरवरी

पांचवे चरण का मतदान 27 फरवरी

छठवें चरण का मतदान 3 मार्च

सातवें चरण का मतदान 7 मार्च

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे 10 मार्च को आएंगे.

यूपी विधान सभा जीतने वाले का फ़ैसला कैसे होगा?

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में जीत का जादुई आंकड़ा है 202. चुनावी मैदान में उतरी जो भी पार्टी या पार्टियों का गठबंधन इस आंकड़े तक या इसके पार पहुंच जाएगा, अगली सरकार उसी की होगी.

उत्तर प्रदेश विधान सभा विधान मंडल का निचला सदन है.

इसमें 403 निर्वाचित सदस्‍य और राज्‍यपाल की ओर से मनोनीत एक आंग्‍ल भारतीय सदस्‍य होते हैं.

विधान सभा का कार्यकाल कुल पांच साल का होता है, अगर वो इसके पहले विघटित न हो गई हो. वर्तमान सत्रहवीं विधान सभा का गठन 14 मार्च, 2017 को हुआ था.

उत्तर प्रदेश विधान सभा के बारे में जानने लायक ज़रूरी बातें

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मुख्य उम्मीदवार कौन हैं?

बीजेपी जीतती है तो एक बार फिर योगी आदित्यनाथ सूबे के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बैठेंगे. समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए इस बार चुनाव में ज़ोर लगाया है, वहीं बीएसपी की मायावती भी एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहेंगी.

इनके अलावा चुनाव में जिन चेहरों की जीत पर सबकी नज़र रह सकती है, वो हैं बीएसपी प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर जिन्हें पार्टी ने मुख्तार अंसारी का टिकट काटकर प्रत्याशी बनाया, बीजेपी नेता और मौजूदा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, दूसरे उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा, राय बरेली से मौजूदा एमएलए अदिति सिंह, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी नेता ओम प्रकाश राजभर, शिवपाल सिंह यादव, बीजेपी की प्रमुख दलित चेहरा बेरी रानी मौर्य.

मायावती

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उत्तर प्रदेश के प्रमुख निर्वाचन क्षेत्र कौन से हैं और मुख्य चुनावी मुद्दे क्या हैं?

उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों की चुनाव के लिहाज़ से अलग-अलग अहमियत है और हर क्षेत्र के अपने अलग मुद्दे और समस्याएं हैं.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानों का मुद्दा प्रमुख है. जिसमें गन्ने के बक़ाए का भुगतान, एमएसपी जैसे अहम मसले हैं.

बुंदेलखंड में पानी की समस्या हमेशा से रही है. ये इलाक़ा सूखा प्रभावित है. इसे उत्तर प्रदेश का उपेक्षित इलाक़ा माना जाता है. कहा जाता है कि ये विकास के एजेंडे में नहीं रहता.

वहीं अवध के सेंट्रल लखनऊ के इलाक़े में कोविड के कुप्रबंधन का मुद्दा चुनाव में उठा. साथ ही जो वादे पूरे नहीं हुए हैं उनका मसला भी जनता में देखने को मिला. उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बेरोज़गारी भी बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया.

वहीं पूर्वांचल में जहां से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद आते हैं, वहां गोरखपुर में हर साल दिमाग़ी बुख़ार का प्रकोप देखा जाता है. इस साल भी उसका असर देखने को मिला है.

वहीं सोशल मीडिया पर आए दिन प्रदेश की ख़स्ताहाल सड़कें चर्चा का विषय बनती हैं. वहीं प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और आसपास के इलाक़ों में भी विकास का मुद्दा उठता देखा गया. हाल में बारिश के पानी में वाराणसी का क्षेत्र भी डूब गया था.

ये सवाल बार-बार उठाया जाता है कि प्रधानमंत्री ने वाराणसी को जापान के क्योटो जैसा बनाने का वादा किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है. लेकिन राम मंदिर निर्माण का काम शुरू होने को बीजेपी अपनी उपलब्धियों में गिनाती नज़र आई.

वाराणसी में बुनकर का काम करने वाले लोगों का काम कोविड में ठप हो चुका था. पूरे प्रदेश में लॉकडाउन से उपजी अलग-अलग समस्याएं हैं. कोरोना के दौरान प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी कई सवाल उठे.

चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे थे, नेताओं के बयानों में हिंदू-मुस्लिम का ज़िक्र भी बढ़ता जा रहा था. इस चुनाव में ध्रुवीकरण का दांव भी चुनावी पार्टियों ने चला.

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यूपी में बीते चुनाव में क्या हुआ?

पिछले यानी 2017 के यूपी विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें अपने नाम करके बड़ी जीत हासिल की थी.

403 सीटों वाली विधान सभा के लिए बीजेपी ने चुनाव में 39.67 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए थे.

एसपी यानी समाजवादी पार्टी को 47 सीटें मिली थीं, बीएसपी यानी बहुजन समाज पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं जब कि कांग्रेस सिर्फ सात सीटें जीत सकी थी.

इस चुनाव में पिछले चुनाव से अलग क्या रहा?

इस चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में सबसे ख़ास बात योगी आदित्यनाथ हैं. 2017 में बीजेपी के पास राज्य में पहले से कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं था लेकिन इस बार योगी आदित्यनाथ का चेहरा है, जिनके पास सरकार को क़रीब पांच साल चलाने का अनुभव भी है.

इसके अलावा यह भी तय है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अलग-अलग चुनाव मैदान में थी, दोनों दलों ने पिछला विधानसभा चुनाव भी अलग-अलग ही लड़ा था, लेकिन 2019 का आम चुनाव दोनों दलों ने एक साथ लड़ा था.

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का समाजवादी पार्टी से गठबंधन था लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. इस बार यूपी में कांग्रेस का चेहरा प्रियंका गांधी हैं और असदउद्दीन औवेसी भी चुनाव मैदान में थे.

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ईवीएम और वीवीपैट क्या है?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (जिसे ईवीएम भी कहा जाता है) इलेक्ट्रॉनिक साधनों का प्रयोग करते हुए वोट डालने या वोटों की गिनती करने के काम को करने में मदद करती है.

चुनाव आयोग पर दी गई जानकारी के मुताबिक़, ईवीएम को दो यूनिटों से तैयार किया गया है: कंट्रोल यूनिट और बैलट यूनिट. इन यूनिटों को केबल से एक दूसरे से जोड़ा जाता है. ईवीएम की कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी के पास रखी जाती है.

बैलेटिंग यूनिट को मतदाताओं द्वारा मत डालने के लिए वोटिंग कंपार्टमेंट के भीतर रखा जाता है. ऐसा ये सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि मतदान अधिकारी आपकी पहचान की पुष्टि कर सके. ईवीएम के साथ, मतदान पत्र जारी करने के बजाय, मतदान अधिकारी बैलेट बटन को दबाता है जिससे मतदाता अपना मत डाल सकता है.

वहीं वीवीपैट यानी वोटर वेरिफिकेशन पेपर ऑडिट की बात करें तो ये ईवीएम के साथ लगी एक मशीन होती है, जो असल में एक प्रिंटर की तरह होती है.

ईवीएम से मतदान करने के बाद वीवीपैट से निकलने वाली पर्ची ये पुष्टि करती है कि आपका वोट उसी उम्मीदवार को गया है, जिसे आपने वोट दिया है.

वीवीपैट से निकली पर्ची पर उम्मीदवार का नाम और उसका चुनाव चिन्ह छपा होता है. एक वोटर के तौर पर आप सात सेकेंड तक इस पर्ची को देख सकते हैं, जिसके बाद ये सीलबंद बॉक्स में गिर जाती है. वीवीपैट की ये पर्ची मतदाता को नहीं दी जाती.

मतों की गिनती के वक़्त अगर कोई विवाद होता है तो इन पर्चियों की भी गिनती की जा सकती है.

चुनाव आयोग कहता है कि ईवीएम में किसी भी तरह की गड़बड़ी कर पाना संभव नहीं है. हालांकि, समय-समय पर इन मशीनों की प्रामाणिकता पर सवाल उठते रहे हैं. अक्सर, चुनाव हारने वाली पार्टियां सवाल उठाती हैं कि इन मशीनों को हैक किया जा सकता है.

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