भारत में हज़ारों राजनीतिक दल, लोकतंत्र के लिए कितने अच्छे- कितने बुरे

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    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले छह दशकों में 2,751 राजनीतिक दलों ने भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़े हैं.

लोकसभा चुनाव लड़ने वाले दलों की संख्या 1962 में 29 थी, जोकि 2019 में बढ़कर 669 हो गई. इसमें लगभग 2200 प्रतिशत की वुद्धि हुई है. इस दौरान अरबों मतदाताओं ने लाखों पोलिंग स्टेशनों पर अपना वोट दिया है.

लेकिन आम चुनावों में केवल एक सीट भी जीतने वाले दलों की संख्या सिर्फ़ 71 प्रतिशत ही बढ़ी है. ये संख्या 1962 में 21 थी जो 2019 में 36 हो पाई है.

अपना 25वां चुनाव हारने वाले स्वतंत्र उम्मीदवार विजयप्रकाश कोंडेकर

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इमेज कैप्शन, अपना 25वां चुनाव हारने वाले स्वतंत्र उम्मीदवार विजयप्रकाश कोंडेकर

ये तथ्य भी दिलचस्प है कि 1962 से सिर्फ़ छह राजनीतिक दलों ने सभी 15 आम चुनावों में हिस्सा लिया है. 25 दलों ने 10 चुनाव लड़े हैं और उनमें से एक तिहाई ने केवल एक चुनाव ही लड़ा है.

ये हैरान करने वाले आंकड़े 'पॉलिटिकल पार्टीज़ ऑफ़ इंडिया' नाम के एक नए डाटाबेस में सामने आए हैं. अशोका विश्वविद्यालय के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा (टीसीपीडी) ने ये डाटाबेस तैयार किया है.

राजनीतिक दलों की इतनी ज़्यादा संख्या आमतौर पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक स्वस्थ लोकतांत्रिक भागीदारी की ओर ईशारा करती है. लेकिन, अगर गहराई से देखें तो कुछ और बातें भी निकल कर सानमे आती हैं.

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1406 दलों ने नहीं जीती एक भी सीट

अशोका विश्वविद्यालय में टीसीपीडी के सह-निदेशक और राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर गिल्स वर्नियर्स कहते हैं, "हम देखते हैं कि ऐसे दल अधिकतर दो या तीन लोगों से मिलकर बने होते हैं. कुछ तो सिर्फ़ एक ही व्यक्ति की पार्टियां होती हैं. वहीं, चुनाव आयोग में ऐसी भी बहुत सारी पार्टियां पंजीकृत हैं जो चुनाव नहीं लड़तीं."

चुनाव लड़ने वाले करीब 1406 दलों ने कभी एक भी सीट नहीं जीती. ये संख्या आम चुनाव लड़ने वाले दलों का 91 प्रतिशत है.

इन दलों ने अभी तक 9809 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो हार गए.

वहीं, 41 दल ऐसे हैं जिन्होंने कम से कम पांच चुनाव लड़े हैं लेकिन वो एक भी सीट नहीं जीते.

ऐसी ही एक पार्टी है 'आमरा बंगाली' जिसने नौ आम चुनावों और 26 विधानसभा चुनावों के दौरान पांच राज्यों में 100 से ज़्यादा उम्मीदवार मैदान में उतारे लेकिन वो एक भी सीट नहीं जीत पाई.

एक और पार्टी 'शोषित समाज दल' ने खासतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में 22 विधानसभा चुनाव लड़े और 353 उम्मीदवार मैदान में उतारे लेकिन इनमें से सिर्फ़ तीन उम्मीदवार ही जीत पाए.

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निर्दलीय उम्मीदवारों की बढ़ी संख्या

भारत में बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार भी होते हैं जो किसी भी पार्टी से नहीं जुड़े होते. उनमें से भी कुछ ही जीत दर्ज कर पाते हैं.

साल 1962 से 2019 के बीच जहां चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में 622 प्रतिशत का उछाल आया वहीं, जीतने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में 80 प्रतिशत की कमी आ गई.

2019 के लोकसभा चुनाव में कुल 3460 स्वतंत्र उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था लेकिन केवल चार उम्मीदवार ही जीत पाए. हारने वाले एक उम्मीदवार 75 साल के विजयप्रकाश कोंडेकर थे जिन्होंने अपना 25वां चुनाव हारा था.

उन्होंने बीबीसी ने कहा, "मैं लोगों को केवल ये दिखाना चाहता था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सिर्फ़ दलगत राजनीति ही एकमात्र रास्ता नहीं है."

शोधकर्ता कहते हैं कि राजनीतिक दलों की संख्या में तेज़ी से हुई बढ़ोतरी की वजह भारत में राजनीति से होने वाले फ़ायदे भी सकते हैं.

प्रोफेसर गिल्स वर्नियर्स कहते हैं, "चुनाव लड़ने को कई लोग अपना नागरिक अधिकार मानते हैं. वहीं, चुनाव में खड़े होने से उम्मीदवार को अपनी छवि और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ने में भी मदद मिलती है."

वह बताते हैं, "यहां नागरिक समाज, राजनीतिक दलों और सरकार के बीच बहुत कम संबंध है. लोगों को लगता है कि कुछ बदलने के लिए आपको चुनाव लड़ना जरूरी है."

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क्यों बने हज़ारों राजनीतिक दल

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में इतने अधिक राजनीतिक दल बनने की वजह बिखरी हुई भारतीय राजनीतिक व्यवस्था है.

यहां वोट के बहुमत के आधार पर जीत तय होती है यानी एक क्षेत्र में ज़्यादा वोट पाकर कोई उम्मीदवार जीत हासिल कर सकता है. इससे उसके पार्टी से अलग होकर भी जीतने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे में राजनीतिक दल टूटते हैं, नये दल भी बनते हैं और कई बार पार्टियों से अलग होकर स्वतंत्र उम्मीदवार भी खड़े होते हैं.

फिर इस जीत के साथ कई फायदे भी जुड़े हैं. राजनीतिक दल धन जुटाने के लिए चंदा ले सकते हैं. चंदे के बहाने अवैध पैसों को वैध भी बनाया जाता है. उन्हें चंदे पर आयकर में छूट मिलती है. इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए वो बिना पहचान जाहिर किए किसी व्यक्ति से चंदा ले सकते हैं.

लोकसभा या विधानसभा चुनावों में मतदान का कम से कम एक प्रतिशत हासिल करने वाले पंजीकृत दल ही ऐसे दान के लिए पात्र होते हैं.

अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों से चुनावी बॉन्ड खरीदने वाले दानकर्ताओं की जानकारी मांगी थी.

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चुनावी और राजनीतिक सुधार के क्षेत्र में काम करने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के सहसंस्थापक जगदीप छोकर बताते हैं कि राज्य पार्टी के तौर पर मान्यता के लिए पर्याप्त वोट प्रतिशत हासिल ना करने वाले या कभी चुनाव ना लड़ने वाले 69 "पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों" ने चुनाव आयोग को विवरण सौंपा था.

लेकिन, चुनावी बांड प्राप्त करने की उनकी पात्रता का आकलन करने के लिए सिर्फ़ 43 दलों के वोट शेयर का विवरण ही उपलब्ध था. 43 में से केवल एक दल ही चंदा प्राप्त करने के लिए योग्य था. कई दलों ने तो एक भी चुनाव नहीं लड़ा था.

जगदीप छोकर कहते हैं, "इलेक्टोरल बांड से लोगों के लिए राजनीतिक दलों को चंदा देकर काले पैसे को सफेद बनाना आसान हो गया है."

इससे पता चलता है कि भारत के भारी-भरकम लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बढ़ना पूरी तरह अच्छे संकेत भी नहीं देता.

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