योगी आदित्यनाथ Vs सुभावती शुक्ला: गोरखपुर शहर सीट पर सपा के इस दांव के मायने क्या हैं

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश चुनाव में गोरखपुर शहर सीट से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी ने अपने प्रत्याशी के नाम का एलान कर दिया है.
सपा की टिकट पर भाजपा के पूर्व नेता उपेन्द्र दत्त शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला चुनाव लड़ेंगी.
वहीं बहुजन समाज पार्टी ने इसी सीट से ख़्वाजा शमसुद्दीन को टिकट दिया है.
गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद चुनावी मैदान में उतर चुके हैं. मंगलवार को उन्होंने गोरखपुर शहर सीट से अपना नामांकन दाख़िल किया.
हालांकि कांग्रेस की तरफ़ से इस सीट के लिए उनके उम्मीदवार की घोषणा रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं हुई है.
बाक़ी पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची पर ग़ौर करें तो समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण को टिकट दिया, वहीं बसपा ने मुसलमान को उतारा है, चंद्रशेखर ख़ुद को दलित और पिछड़ों के नुमाइंदे के तौर पर पेश कर ही रहे हैं और योगी आदित्यनाथ पहले ही कह चुके हैं क्षत्रिय होना कोई अपराध नहीं है.
इस जातिगत गणित के आधार पर गोरखपुर शहर विधानसभा सीट की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है.

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साल 2002 का क़िस्सा
यूं तो गोरखपुर शहर की ये सीट पारंपरिक रूप से भाजपा की सीट मानी जाती है. इस सीट पर 1989 से लेकर अब तक भाजपा का क़ब्ज़ा रहा है, सिर्फ़ साल 2002 को छोड़ कर.
भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला जो अभी राज्यसभा सांसद हैं, वो साल 1989 से 2002 तक गोरखपुर शहर से बीजेपी के विधायक थे.
लेकिन 2002 में बाज़ी बदल गई और बीजेपी के ख़िलाफ़ उस बाज़ी को बदलने वाले बाज़ीगर कोई और नहीं ख़ुद योगी आदित्यनाथ ही थे.
साल 2002 में टिकट बंटवारे के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ और भाजपा नेतृत्व के बीच अनबन हो गई थी.
नाराज़ योगी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बग़ावती तेवर दिखाते हुए भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला के ख़िलाफ़ अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के बैनर तले राधा मोहन दास अग्रवाल को चुनाव मैदान में उतार दिया.
राधा मोहन दास अग्रवाल पेशे से डॉक्टर थे और बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर शहर में उनका अच्छा नाम था.
तब गोरखपुर शहर की विधानसभा सीट को अपनी नाक का सवाल बनाकर योगी आदित्यनाथ ने राधा मोहन दास अग्रवाल के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया और जब नतीजे आए तो राधा मोहन दास अग्रवाल जीत गए. 2002 के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिव प्रताप शुक्ला तीसरे नंबर पर रहे थे.
बाद में योगी और भाजपा के रिश्ते सुधरे, लेकिन योगी आदित्यनाथ के समर्थन से 2002 से लेकर 2017 तक राधा मोहन दास अग्रवाल ही भाजपा की टिकट पर जीतते रहे और अबकी बार ख़ुद योगी आदित्यनाथ गोरखपुर शहर से पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं.
वैसे योगी आदित्यनाथ गोरखपुर लोकसभा सीट से 1998 से पाँच बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं.

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साल 2018 का उलटफेर
साल 2018 के उपचुनाव में यहाँ जिस तरह से उलटफेर हुआ था, उसके बाद इस सीट पर जीत के बारे में भविष्यवाणी करने वाले भी सहम कर ही बोल रहे हैं.
योगी आदित्यनाथ के साल 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर लोकसभा सीट खाली हुई.
साल 2018 में इस सीट के लिए उपचुनाव हुआ.
भाजपा ने उपेन्द्र दत्त शुक्ला को अपना प्रत्याशी बनाया. प्रवीण कुमार निषाद, समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े.
प्रवीण निषाद का पहला लोकसभा चुनाव था और वो जीत गए.
उपेन्द्र शुक्ला चुनावी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे. तीन बार पहले भी चुनाव लड़ चुके थे. कभी जीते नहीं और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव भी हार गए. फिर साल 2020 में उनका निधन हो गया.

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2022 विधानसभा चुनाव का गणित
इस बार के विधानसभा चुनाव में गणित 2018 के उपचुनाव के उलट है.
प्रवीण कुमार निषाद की निषाद पार्टी इस बार भाजपा गठबंधन के साथ है.
अब उपेन्द्र शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला को समाजवादी पार्टी ने इस सीट से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में उतारा है.

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कौन हैं सुभावती शुक्ला?
सुभावती शुक्ला गृहिणी हैं. इससे पहले राजनीति का उनका अपना कोई अनुभव नहीं है.
बीबीसी ने उनकी उम्मीदवारी को लेकर जब फ़ोन पर उनसे संपर्क साधने की कोशिश की तो उनके बेटे अमित दत्त शुक्ला ने हमसे बात की.
सुभावती शुक्ला से बात करने की हमारी गुज़ारिश पर वो बोले, "माता जी एक धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त हैं. इसलिए अभी बात नहीं हो सकती. साथ ही मैं ये भी बता दूं कि वो एक सामान्य गृहिणी हैं, बहुत कम बोलती हैं."
आगे की बातचीत में उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया कि चुनाव तो अमित ही लड़ रहे हैं, माता जी का बस नाम है.
लेकिन ऐसा क्यों? जब समाजवादी पार्टी की टिकट माँ को मिली तो बेटे को भी मिल सकती थी, फिर परिवार ने ऐसा निर्णय क्यों लिया?
इस सवाल के जवाब में अमित दत्त शुक्ला कहते हैं, "माँ हमारी सांकेतिक चेहरा ज़रूर हैं, लेकिन पिता के नाम पर सहानुभूति वोट के लिए नहीं. मेरे पिता, उपेन्द्र दत्त शुक्ला का राजनीतिक सफ़र 40 साल का था. उन्होंने हमेशा संगठन में काम किया और किसी संवैधानिक पद पर नहीं पहुँच पाए. तीन विधानसभा चुनाव भी लड़े और सब हार गए.
गोरखपुर लोकसभा सीट से भी वो नहीं जीते. इस बात का मलाल उनको हमेशा रहा. परिवार की इच्छा है कि माता जी (सुभावती शुक्ला) इस चुनाव में जीत कर सदन में पहुँच जाती हैं, तो पिता के प्रति हमारी यही श्रद्धांजलि होगी. केवल इस कारण से माताजी इस चुनाव में उतरी हैं."

उपेन्द्र दत्त शुक्ला की राजनीतिक विरासत
उपेन्द्र दत्त शुक्ला ने कुल चार बार चुनाव में हाथ आज़माया. लेकिन कभी सफ़ल नहीं हुए. उन्होंने उत्तर प्रदेश के कौड़ीराम विधानसभा सीट से तीन बार विधायक का चुनाव लड़ा और एक बार गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद का चुनाव लड़ा था.
गोरखपुर के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार मनोज कुमार सिंह कहते हैं योगी आदित्यनाथ और उपेन्द्र दत्त शुक्ला की आपस में कभी नहीं बनी.
उनके मुताबिक़, "1996 में पहली बार उपेन्द्र दत्त शुक्ला कौड़ीराम विधानसभा सीट से भाजपा के प्रत्याशी बने, लेकिन चुनाव हार गए. 2002 में उन्हें टिकट नहीं मिला. फिर 2005 में कौड़ीराम सीट पर उपचुनाव हुआ, लेकिन इस बार भी योगी आदित्यनाथ के क़रीबी शीतल पांडेय को टिकट मिला. नाराज़ होकर उपेन्द्र शुक्ला निर्दलीय चुनाव लड़े, लेकिन हार गए.
बाद में वो भाजपा में वापस आ गए. 2007 में तीसरी बार वो चुनाव लड़े. इस बार भाजपा ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन वो तीसरे स्थान पर रहे. 2012 में परिसीमन के बाद कौड़ीराम सीट नहीं रही. बाद में वो संगठन के लिए काम करते रहे. 2018 में गोरखपुर लोकसभा सीट से भाजपा ने टिकट दिया, लेकिन एक बार फिर हार का मुँह देखना पड़ा."
साल 2018 के उपचुनाव में उनकी हार के पीछे योगी आदित्यनाथ की उपेन्द्र दत्त शुक्ला से नाराज़गी को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा था.
बताया जाता है कि उपेन्द्र दत्त शुक्ला के निधन के बाद वो परिवार से मिलने नहीं गए. लेकिन बीबीसी से बातचीत में उनके बेटे ने ऐसा कोई ज़िक्र नहीं किया.
इस बार के विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र दत्त शुक्ला के बेटे अमित दत्त शुक्ला गोरखपुर शहर के पास की सहजनवा विधानसभा सीट से भाजपा का टिकट माँग रहे थे. लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला. बाद में 20 जनवरी 2022 को पूरे परिवार ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया.
बीबीसी से बातचीत में अमित दत्त शुक्ला कहते हैं, "टिकट मिलना ना मिलना किसी पार्टी के संगठन की प्रक्रिया होती है. लेकिन जो अपमान और उपेक्षा हमारी हुई वो हमें बर्दाश्त नहीं. मुझे संगठन में काम करने से भी परहेज़ नहीं है. लेकिन हमारा आवेदन भी स्वीकार नहीं किया गया.
हमें पार्टी के वरिष्ठ लोगों से ये तक कहलाया गया कि भाजपा 'मृतक आश्रितों' की पार्टी नहीं है. इस बात से मुझे बहुत दुख हुआ. मेरे पिता ने जिस पार्टी के लिए पूरा जीवन दे दिया, उस पार्टी ने हमें ये सिला दिया."
हालांकि भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने बीबीसी से बातचीत में 'उपेन्द्र दत्त शुक्ला की उपेक्षा' के परिवार के आरोपों को सिरे से खारिज़ किया और कहा कि अगर शुक्ला जी जीवित होते तो वो इस बात को कभी स्वीकार नहीं करते. लेकिन लोकतंत्र है, किसी को भी किसी सीट से चुनाव लड़ने का अधिकार है.
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समाजवादी पार्टी ने सुभावती शुक्ला पर दांव क्यों खेला ?
जब उपेन्द्र दत्त शुक्ला अपने रहते कभी चुनाव नहीं जीत सके और जब उनकी पत्नी सुभावती शुक्ला को राजनीति का कोई अनुभव ही नहीं है, ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने सपा ने उन्हें क्यों उतारा?
इस सवाल के जवाब में गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार कुमार हर्ष कहते हैं, "समाजवादी पार्टी, सुभावती शुक्ला के ज़रिए भाजपा पर दो तरह के हमले कर सकती है.
पहला मक़सद ये कि उपेन्द्र दत्त शुक्ला जो भाजपा के वरिष्ठ नेता थे, उनके नहीं रहने पर भाजपा ने उनके और उनके परिवार की सुध नहीं ली. इससे भाजपा के ख़िलाफ़ नकारात्मक प्रचार होगा. साथ ही जनता में उनके प्रति सहानुभूति भी होगी.
दूसरा मक़सद है ब्राह्मणों की नाराज़गी को भुनाने का. पिछले कुछ समय से ऐसी ख़बरें आ रही है कि योगी सरकार में ब्राह्मणों की सुनवाई नहीं है, वो उपेक्षित हैं. ब्राह्मण राजनीतिक तौर पर सचेत माने जाते हैं, हमेशा से सत्ता में अपनी प्रधानता रखने के अभ्यस्त हैं, वो फ़िलहाल मुश्किल में हैं. यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि इस चुनाव में सपा ने हरिशंकर तिवारी के परिवार को अपने साथ जोड़ा है."
हरिशंकर तिवारी गोरखपुर के कद्दावर ब्राह्मण नेता माने जाते थे जो मंदिर और योगी के प्रतिद्वंद्वी गुट के तौर पर हमेशा सक्रिय रहे हैं. वो पहले बसपा के साथ थे. फ़िलहाल वो सक्रिय राजनीति में नहीं हैं, लेकिन पिछले साल दिसंबर में उनके बेटे विनय शंकर तिवारी ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया.
कुमार हर्ष आगे ये भी कहते हैं कि समाजवादी पार्टी का ये दांव भारतीय जनता पार्टी के भीतर असंतुष्ठ नेताओं के लिए एक तरह की कॉल है, जो अपने को योगी राज में भाजपा में फ़िट नहीं पाते या ऐडजस्ट नहीं हो सके हैं. ऐसे नेताओं को समाजवादी पार्टी एक जुट कर रही है.
हालांकि 'ब्राह्मण बनाम राजपूत फ़ैक्टर' पर अमित दत्त शुक्ला दांव नहीं लगा रहे.
अपनी माँ की जीत को लेकर आश्वस्त अमित दत्त शुक्ला कहते हैं, "गोरखपुर की जनता का मूड हमेशा सत्ता विरोधी रहा है. मेरे पिता 2018 में इसी वजह से हारे. 2000 में आशा देवी किन्नर यहां मेयर बनी थीं. भाजपा चाह कर भी उस वक़्त कुछ नहीं कर पाई. इसी धरती ने पहले मंत्रियों और विधायकों को भी चुनाव हराया है."
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बीजेपी जीत के लिए क्यों है आश्वस्त?
कुमार हर्ष और मनोज कुमार सिंह दोनों मानते हैं कि जनप्रतिनिधि के तौर पर योगी आदित्यनाथ की छवि अच्छी है.
मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने गोरखपुर में काफ़ी काम कराया है. यहाँ एम्स का बनना, इंसेफ़ेलाइटिस बीमारी से निपटने की व्यवस्था और फ़र्टिलाइजर प्लांट का लगना कुछ ऐसे काम हैं जो सीधे जनता को दिखते है. इंफ़्रास्ट्रक्चर पर भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में काफ़ी काम हुआ है.
योगी आदित्यनाथ से पहले गोरखपुर से यूपी के मुख्यमंत्री बने थे वीर बहादुर सिंह. लगभग दो साल का उनका कार्यकाल रहा था. गोरखपुर की जनता में एक भाव हमेशा सुनने को मिलता है कि वीर बहादुर सिंह के कार्यकाल में बहुत विकास हुआ था. उनके निधन के बाद गोरखपुर का विकास रुक सा गया, ये भी वहाँ के लोग अक़्सर कहते हैं.
उन्हीं के कार्यकाल को याद करते हुए कुमार हर्ष कहते हैं कि अब गोरखपुर की जनता को पता है कि अगर यहाँ से मुख्यमंत्री रहता है तो ही शहर का विकास होता है. ये बात अब लोगों को समझ आ गई है और ये योगी आदित्यनाथ के पक्ष में जाती है.

कैसे हैं सीट पर जातिगत समीकरण?
सब जानते हैं कि यूपी चुनाव में जाति बहुत बड़ा फ़ैक्टर है. लेकिन भाजपा जातिगत समीकरण के साथ हिंदुत्व को भी लेकर चलती रही है. इसी फ़ॉर्मूले के तहत निषाद पार्टी के साथ भाजपा ने गठबंधन किया है.
मनोज कुमार सिंह कहते हैं, "गोरखपुर शहर सीट पर दो बातें अहम हैं. ये पूरा शहरी क्षेत्र है. 2012 के परिसीमन के बाद ये सीट भाजपा के लिए ज़्यादा अनुकूल हो गई है. यहाँ सवर्ण मतदाता ज़्यादा हो गए हैं, उसमें भी ख़ास कर कायस्थ और वैश्य जो भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक माने जाते हैं."
वो आगे कहते हैं, "जब तक इस सीट पर कायस्थ वोट में बंटवारा नहीं होगा तब तक भाजपा को हराना मुश्किल है. निषाद समुदाय पहले यहाँ अहम माने जाते थे जो अब गोरखपुर ग्रामीण सीट में ज़्यादा हैं. पिछड़ी जातियों के साथ साथ दलितों की भी 100 से ज़्यादा बस्तियां यहां है. मुसलमानों की आबादी भी परिसीमन के बाद ग्रामीण सीट पर अब चली गई है. लेकिन कुछ मुस्लिम आबादी अब भी इस सीट पर है."
हालांकि कुमार हर्ष कहते हैं कि इस बार के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी एक बार फिर समीकरण साधने में कामयाब हो रही है, ऐसा कुछ लोग कह रहे है. ऐसे में गोरखपुर सीट से बसपा ने एक मुसलमान उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है. इस बार ये देखना दिलचस्प होगा कि गोरखपुर के मुसलमान किसमें अपना विश्वास दिखाते हैं.
हालांकि मनोज कुमार सिंह कहते हैं कि विपक्ष 2018 की तरह संगठित नहीं है जिसका फ़ायदा भाजपा को मिल सकता है.
बसपा के बारे में वो कहते हैं कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार सालों से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन हर बार तीसरे नंबर पर ही रहते हैं. सपा दूसरे नंबर पर रहती है. इसके पीछे एक कारण ये भी है कि हर बार विपक्ष अपना उम्मीदवार ही बदल देता है.
भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की है. उन्होंने मंगलवार को अपना नामांकन भी दाख़िल किया है.
चंद्रशेखर इस बार के चुनाव को 'मंडल बनाम कमंडल' की लड़ाई कह रहे हैं.
कुमार हर्ष कहते हैं, "चंद्रशेखर के लिए ये लड़ाई उलटफेर से ज़्यादा एक संदेश देने की लड़ाई है. मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ लड़ने और बोलने से उनको एक स्पेस मिलता है, जो उनके लिए निजी तौर पर ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा."
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