कामाख्या मंदिर में एक पखवाड़े तक चलने वाली दुर्गा पूजा का क्या है इतिहास?

कामाख्या मंदिर

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

गुवाहाटी में मौजूद कामाख्या मंदिर में भी देश के दूसरे हिस्सों की तरह दुर्गा पूजा का उत्सव जारी है. लेकिन यहां की पूजा उनसे काफ़ी अलग है. नीलांचल की पहाड़ियों पर स्थित कामाख्या मंदिर में दुर्गा पूजा आयोजन का इतिहास क़रीब हज़ार साल पुराना है.

कामाख्या मंदिर में यह उत्सव कृष्ण नवमी से शुरू होता है और अश्विन माह की शुक्ल नवमी के दिन समाप्त होता है. इसलिए इसे 'पखुआ पूजा' भी कहा जाता है. कामाख्या में दुर्गा पूजा अनोखे तरीके से की जाती है. यहां देवता (पीठ स्थान) का आनुष्ठानिक स्नान किया जाता है, भैंस, बकरी, कबूतर, मछली की बलि दी जाती है, साथ ही साथ लौकी, कद्दू और गन्ने भी चढ़ाए जाते हैं.

पूजा उत्सव में 'कुमारी पूजा' के अनुष्ठान का बड़ा महत्व है. कामाख्या को विश्व का सर्वोच्च कुमारी तीर्थ भी माना जाता है.

कुमारी पूजा

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इमेज कैप्शन, कुमारी पूजा में कुंवारी लड़की को सजाकर देवी कामाख्या के रूप में पूजा की जाती है

दुर्गा पूजा में कामाख्या की कुमारी पूजा

कामाख्या देवालय के धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष प्रबंधन समिति के प्रमुख मोहित चंद्र शर्मा ने बीबीसी से कहा, "हमारे यहां नवरात्रि से पूजा शुरू नहीं होती. यहां कृष्ण पक्ष की नवमी से ही दुर्गा पूजा प्रारंभ हो जाती है और शुक्ल नवमी अर्थात 15 दिनों तक चलती है.''

वो कहते हैं, ''नवरात्रि से हमारे यहां दुर्गा पूजा के साथ ही कुमारी पूजा शुरू होती है. नवरात्रि में बाहर से काफ़ी लोग यहां चंडी पाठ करने आते हैं. लेकिन हमारे यहां दुर्गा पूजा शुरू होने के पहले दिन से ही चंडी पाठ शुरू हो जाता है."

किंवदंती है कि कोलासुर ने एक बार स्वर्ग और पृथ्वी पर क़ब्ज़ा कर लिया, देवता मदद के लिए महाकाली के पास गए, काली ने फिर से जन्म लेकर एक युवती के रूप में कोलासुर का वध किया.

कुमारी पूजा

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कुमारी पूजा के पीछे का दर्शन

आस्था रखनेवालों का कहना है कि नारी शक्ति की याद में कुमारी पूजा की जाती है जिसमें एक युवती को नई लाल साड़ी, माला, सिंदूर, आभूषण, इत्र आदि से ख़ूबसूरती से सजाकर देवी कामाख्या के रूप में पूजा जाता है.

युवती को सृजन, स्थिरता और विनाश को नियंत्रित करनेवाली शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.

पूजा उत्सव से जुड़े अलकेश शर्मा बताते हैं, ''कुमारी पूजा हर साल नवरात्रि के पहले दिन से शुरू होती है. पहले दिन, एक कुमारी की पूजा होती है. दूसरे दिन दो कुमारियों की पूजा होती है. इस तरह, पांच साल की बच्चियों की पूजा भगवती कुमारी के रूप में की जाती है. कुल 45 कुमारियों को देवी के रूप में पूजा जाता है.''

कामाख्या मंदिर

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कामाख्या की पूजा विधि हज़ार साल पुरानी

कामाख्या मंदिर में पूजा की विधि की जानकारी देते हुए देवालय प्रबंधन समिति के प्रमुख मोहित चंद्र शर्मा कहते है, "कामाख्या मंदिर में हज़ारों साल पहले जिस विधि के तहत पूजा-अर्चना होती थी, आज भी उसी विधि के अनुसार पूजा होती है.''

वो बताते हैं, ''यहां तक​ कि कोविड के समय भी हमारे एक पुजारी रोज़ाना पूजा करने मंदिर आते थे. उस दौरान किसी भी अन्य व्यक्ति को परिसर के भीतर भी आने की अनुमति नहीं थी. लेकिन कामाख्या में एक दिन भी पूजा बंद नहीं हुई. हमारे पुजारी ब्रह्म मूहुर्त में स्नान कर मंदिर आते है और पूरी विधि के साथ मां कामाख्या की पूजा करते हैं."

उनके अनुसार, "मां कामाख्या की सभी रूपों में पूजा होती है. मां कामाख्या के बाद ही अब दुर्गा के रूप में पूजा हो रही है. इसलिए देवी को प्रसन्न करने के लिए ऐसा कोई ख़ास मंत्र तो नहीं है, लेकिन जब हम मां कामाख्या को प्रणाम करते हैं तो यह मंत्र 'कामाख्या वरदे देवी नील पर्वतवासिनी त्वं देवी जगन्नमाता योनी मुद्रे नमोस्तुते.' बोलते हैं. मां की पूजा जब कामेश्वरी के रूप में करते हैं, तब 'कामाख्ये काम संपन्ने कामेश्वरी हर प्रिये...कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरी नमोस्तुते' के मंत्र का उच्चारण करते हैं. मंत्र चाहे कोई भी हो, लेकिन देवी की मन से भक्ति करने पर ही वो प्रसन्न होती हैं."

कामाख्या मंदिर के पुजारी मोहित चंद्र शर्मा

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इमेज कैप्शन, कामाख्या मंदिर के पुजारी मोहित चंद्र शर्मा का परिवार कन्नौज से कामाख्या आया था

कन्नौज से रिश्ता

असम में ज़्यादातर मंदिरों के मुख्य पुजारी की तरह इस मंदिर के पूजारी भी 'बोरदेउरी समाज' के हैं. इस शब्द का इस्तेमाल अहोम राजाओं के समय से ही होता रहा है.

मोहित चंद्र शर्मा का परिवार भी कन्नौज से कामाख्या आया था. वो बताते हैं, "कामाख्या मंदिर में पुजारियों का इतिहास एक हज़ार साल पुराना है. 10वीं सदी में असम में पाल राजवंश का साम्राज्य था. उस दौरान राजा धर्मपाल ने उत्तर प्रदेश के कन्नौज से पांच पुजारियों के परिवार को यहां लाकर बसाया था.''

शर्मा के अनुसार, ''हमारा परिवार तब से कामाख्या देवी की पूजा करता आ रहा है. इस समय चार ही परिवार बचे हैं. उनके परिवार के कुल पुरुषों की संख्या 465 है. यही लोग कामाख्या मंदिर के मूल पुजारी हैं. एक निश्चित समय के बाद प्रत्येक परिवार के पुजारी की कामाख्या मंदिर में पूजा करने की बारी आती है."

51 शक्तिपीठों में से सिर्फ़ कामाख्या मंदिर को ही महापीठ का दर्जा हासिल है

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इमेज कैप्शन, 51 शक्तिपीठों में से सिर्फ़ कामाख्या मंदिर को ही महापीठ का दर्जा हासिल है

कामाख्या 51 शक्तिपीठों में से एक

कामाख्या मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है. इसका उल्लेख कालिका पुराण में मिलता है.

पौराणिक कथा है कि सती ने जब अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अग्नि समाधि ले ली, उसके बाद उनके वियोग से परेशान भगवान शिव, सती का शव अपने कंधे पर लेकर तीनों लोकों में तांडव करने लगे. और तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव को काट दिया. जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुआ. मान्यता है कि माता सती की योनि का भाग कामाख्या में गिरा था और तब यहां कामाख्या पीठ की स्थापना हुई थी.

कामख्या में जो मंदिर मौजूद है उसका निर्माण 15वीं सदी में हुआ था.

51 शक्तिपीठों में से सिर्फ़ कामाख्या मंदिर को ही महापीठ का दर्जा हासिल है. मंदिर में दुर्गा और जगदंबा का कोई चित्र या उनकी मूर्ति नहीं है. पूजा के लिए कुंड पर फूल अर्पित किया जाता है.

इस कुंड को हमेशा फूलों से ढककर रखा जाता है. यह कुंड माता सती की योनि का भाग है जिसकी पूजा-अर्चना की जाती है. इस कुंड से हमेशा पानी रिसता रहता है. इसलिए इसे फूलों से ढक कर रखा जाता है.

ऐसा कहा जाता है कि हर साल जून महीने में यहां होने वाले अंबुबाची मेले के दौरान पास बहने वाले ब्रह्मपुत्र का पानी तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है. मान्यता है कि पानी का ये लाल रंग कामाख्या देवी के मासिक धर्म के चलते होता है.

दूसरे शक्तिपीठों से अलग कामाख्या देवी के मंदिर में प्रसाद के रूप में भक्तों को लाल रंग का गीला कपड़ा मिलता है. कहा जाता है कि जब मां को तीन दिनों के लिए मासिक धर्म होता है, तो सफेद रंग के कपड़े को मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है. तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाज़े खुलते हैं, तब वो कपड़ा माता के रज यानी लाल रंग से भीगा होता है.

कोरोना वैक्सीन

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वैक्सीन ले चुके लोग ही कर सकते हैं दर्शन

कोरोना के सख़्त प्रतिबंधों के बीच कामाख्या मंदिर के दरवाजे उन भक्तों के लिए फिर से खोल दिए गए हैं जिन्होंने कोविड-19 वैक्सीन की दोनों डोज़ लगवा लिए हैं. हालांकि जिन लोगों ने वैक्सीन की सिंगल डोज़ ली है, वे भी मंदिर में जाकर और बाहर परिक्रमा कर पूजा कर सकते हैं. लेकिन उन्हें भीतर गर्भगृह में दर्शन करने की अनुमति नहीं है.

कोरोना संक्रमण का ख़्याल करते हुए मंदिर परिसर में सुरक्षा के सभी प्रोटोकॉल लागू किए गए हैं. कोरोना के चलते कामाख्या मंदिर को क़रीब तीन महीने तक बंद रखा गया. बीते 18 अगस्त से इसे फिर से खोल दिया गया. हालांकि अब असम और उसके बाहर के श्रद्धालु भी पूजा-अर्चना के लिए कामाख्या मंदिर आने लगे हैं.

असम सरकार द्वारा जारी की गई नई एसओपी के अनुसार, अब मंदिर के अंदर गर्भगृह में प्रति घंटे 60 दर्शनार्थी को प्रवेश की अनुमति है.

देवी कामाख्या के दर्शन के लिए नई दिल्ली से आए 32 साल के मनीष कहते हैं," गुवाहाटी की यात्रा के बारे में जब योजना बन रही थी, तभी मां कामाख्या के दर्शन करने की सोच ली थी. मैंने कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज़ ले रखी है, इसलिए मंदिर में प्रवेश करने में कोई परेशानी नहीं हुई. हालांकि मंदिर में पहले के मुकाबले भीड़ काफ़ी कम थी. कामाख्या देवी के यहां पहुंचना ही बहुत बड़ी बात होती है."

लॉकडाउन

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लॉकडाउन में पुजारियों कोरोटी के लाले

कोविड-19 संक्रमण से बचने के लिए जब सरकार ने लॉकडाउन लगाने का एलान किया, तब कामाख्या मंदिर में भक्तों का आगमन बिल्कुल बंद हो गया. कामाख्या मंदिर के अधिकतर पुजारी दूसरे प्रदेश से आने वाले यजमानों के रहने की सुविधा अपने घरों पर ही उपलब्ध करवाते आ रहे हैं. कोविड के चलते मंदिर क़रीब तीन महीने बंद रहा.

मोहित चंद्र शर्मा कहते हैं, ''पुजारियों का घर दर्शनार्थियों के सहारे चलता है. मंदिर में भक्तों के आने पर लगी पाबंदी ने पुजारियों की आर्थिक स्थिति पर भारी असर डाला था.'' उस दौरान, असम सरकार ने कामाख्या मंदिर के पुजारियों की वित्तीय मदद की थी.

स्वामी विवेकानंद
इमेज कैप्शन, 1901 में स्वामी विवेकानंद भी कामाख्या के एक पंडा के घर पर तीन दिन रुके थे

स्वामी विवेकानंद भी ठहरे एक पंडा के घर

मोहित चंद्र शर्मा कहते है, "कामाख्या मंदिर के 90 फ़ीसदी पुजारियों का घर मंदिर के दर्शनार्थियों से चलता है. कोविड के दौरान, पुजारियों को आर्थिक तौर पर बहुत परेशानी उठानी पड़ी. हमारे यहां भक्तों के पंडा (पुजारी) के घर पर रुकने की बहुत पुरानी परंपरा रही है. 1901 में स्वामी विवेकानंद भी कामाख्या के एक पंडा के घर पर तीन दिन रुके थे.''

वो बताते हैं, ''इस परंपरा के तहत दूसरे राज्यों से आने वाले यजमान अपने पंडा के यहां ही रुकते है. यहां के पंडा अपने यजमान के लिए घर पर हमेशा एक-दो कमरे खाली रखते है. यजमान के ठहरने पर उनसे इन्हें कुछ पैसे मिल जाते हैं. लेकिन कोरोना के दौर में भक्तों के न आने या कम आने से सभी पंडों को काफ़ी आर्थिक नुक़सान उठाना पडा. अब धीरे-धीरे फिर से कामाख्या मंदिर में भक्तों का आना शुरू हुआ है."

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