असम: मवेशी संरक्षण बिल को 'सांप्रदायिक तनाव' से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
असम विधानसभा में बीते सोमवार को पेश किए गए असम मवेशी संरक्षण विधेयक, 2021 को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस समेत अल्पसंख्यक संगठनों ने कई तरह की शंका ज़ाहिर की है.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गायों की सुरक्षा से संबंधित इस विधेयक को विधानसभा में पेश किया था. इस प्रस्तावित क़ानून से राज्य में पशु व्यापार करने वाले लोगों की आजीविका प्रभावित होने की बात कही जा रही है. वहीं, विपक्षी दल और अल्पसंख्यक नेताओं का कहना है कि ये विधेयक सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकता है.
जबकि लोकसभा में कांग्रेस के उप-नेता गौरव गोगोई असम के गाय संरक्षण विधेयक में बदलाव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रभावित बता रहे हैं.
हालांकि, असम सरकार इस बिल का मूल उद्देश्य पड़ोसी देश बांग्लादेश में होने वाली गौ-तस्करी को रोकना बता रही है. लेकिन, इस विधेयक में कुछ ऐसे प्रावधान रखे गए हैं जिसके चलते कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं.

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मौजूदा क़ानून में बीफ़ को लेकर प्रावधान
असम में मवेशियों की सुरक्षा के लिए पहले से ही असम पशु संरक्षण क़ानून 1950 लागू है. इस पूराने क़ानून में बीफ़ के उपभोग को ग़ैरक़ानूनी नहीं माना गया है और ज़रूरी अनुमति के बाद 14 साल से बड़े मवेशी को मारने का प्रावधान है.
इस क़ानून में 'बिना प्रमाण पत्र के मवेशियों के वध पर रोक' वाले कॉलम में लिखा हुआ है कि कोई भी व्यक्ति किसी पशु का वध तब तक नहीं करेगा जब तक कि उसने उसके संबंध में उस क्षेत्र के लिए, जिसमें पशुओं का वध किया जाना है, प्रमाणित अधिकारी और पशु चिकित्सा अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं कर लिया है.
इसके अलावा पुराने क़ानून में 'उद्देश्य के लिए निर्धारित नहीं वाले स्थानों में मवेशियों के वध पर रोक' वाले कॉलम में बताया गया है कि कोई भी मवेशी जिसके संबंध में धारा 5 के तहत प्रमाण पत्र जारी किया गया है, इस संबंध में निर्धारित स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर उसका वध नहीं किया जाएगा.
भले ही असम सरकार ने नए क़ानून में गाय के वध पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई है लेकिन सरकार का कहना है कि पुराने क़ानून में "मवेशियों के वध, उपभोग और परिवहन को विनियमित करने" के लिए पर्याप्त क़ानूनी प्रावधानों का अभाव था और इसलिए एक नया क़ानून बनाना अनिवार्य हो गया था.
अब यह नया विधेयक सदन से पारित होते ही मौजूदा असम मवेशी संरक्षण अधिनियम,1950 की जगह ले लेगा.
असम के इस प्रस्तावित क़ानून में 'बीफ़' का अर्थ किसी भी रूप में मवेशियों का मांस है जिसमें "बैल, बुल्स, गाय, बछिया, बछड़ा, नर और मादा भैंस और भैंस के बछड़े शामिल हैं जिसका वध इस अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है. पुराने क़ानून में भी 'बीफ़' को इसी तरह परिभाषित किया गया है.

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नए प्रस्तावित क़ानून में क्या बदलेगा
इस नए प्रस्तावित क़ानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति 'प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से' सक्षम अधिकारी द्वारा अनुमति प्राप्त स्थानों के अलावा कहीं और से बीफ़ या बीफ़ के उत्पाद ना ख़रीद सकता है और ना बेच सकता है.
इसके अलावा ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों में ऐसी कोई अनुमति नहीं दी जाएगी जहां मुख्य रूप से हिंदू, जैन, सिख और अन्य ग़ैर-बीफ़ खाने वाले समुदाय के लोग रहते हैं. इसके साथ ही किसी मंदिर, सत्र (मठ) या हिंदू धर्म से संबंधित अन्य धार्मिक संस्थानों के पाँच किलोमीटर के दायरे में बीफ़ या बीफ़ उत्पादों के ख़रीदने और बेचने पर प्रतिबंध रहेगा.
सदन में पेश विधेयक के अनुसार केवल लाइसेंस प्राप्त या मान्यता प्राप्त बूचड़ख़ानों को ही मवेशियों को काटने की अनुमति दी जाएगी.
इसमें कहा गया है, "कोई प्रमाण पत्र तब तक जारी नहीं किया जाएगा जब तक कि पशु चिकित्सा अधिकारी की यह राय न हो कि मवेशी, गाय नहीं है और उसकी उम्र 14 वर्ष से अधिक है, या मवेशी (जो गाय, बछिया या बछड़ा नहीं है) आकस्मिक चोट या विकृति के कारण काम या प्रजनन में स्थायी रूप से अक्षम हो गया है."
कोई भी मवेशी जिसके संबंध में धारा 5 के तहत प्रमाण पत्र जारी किया गया है, विधिवत लाइसेंस या मान्यता प्राप्त बूचड़ख़ाने के अलावा किसी अन्य स्थान पर वध नहीं किया जाएगा. बशर्ते कि राज्य सरकार धार्मिक उद्देश्यों के लिए बछड़े, बछिया और गाय के अलावा अन्य मवेशियों के वध के लिए कुछ पूजा स्थलों को या कुछ अवसरों पर छूट दे सकती है.
मवेशियों के वध, बिक्री और परिवहन से संबंधित विधेयक के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले लोगों को तीन से आठ साल की क़ैद और तीन लाख से पाँच लाख रुपए के बीच जुर्माना हो सकता है. इस विधेयक में यह भी कहा गया है कि दोबारा पकड़े जाने पर सज़ा दोगुनी होगी.

मवेशियों के परिवहन को लेकर बदलाव
इस विधेयक की धारा 7 में 'मवेशियों के परिवहन पर प्रतिबंध' में कहा गया है कि वैध परमिट के बिना असम से उन राज्यों में मवेशियों के परिवहन पर प्रतिबंध होगा जहां 'मवेशियों का वध क़ानून द्वारा रेग्यूलेटेड नहीं है, और असम से होते हुए एक राज्य से दूसरे राज्य में भी मवेशियों को नहीं ले जाया जा सकेगा.
बिना दस्तावेज़ों के मवेशियों को राज्य (अंतर-ज़िला) के भीतर भी नहीं ले जाया जा सकता है. हालांकि, एक ज़िले के भीतर चराने या अन्य कृषि और पशुपालन उद्देश्यों के साथ-साथ पंजीकृत पशु बाज़ारों से मवेशियों को ले जाने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी.

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गाय की तस्करी बड़ा मुद्दा: सरकार
असम में सैकड़ों लोग मवेशियों का व्यापार कर अपना परिवार चलाते हैं. मवेशियों को ख़रीदने और बेचने के लिए कई ज़िलों में साप्ताहिक बाज़ार लगते हैं.
लेकिन, राज्य में बड़े पैमाने पर मवेशियों की तस्करी की रिपोर्ट भी सामने आती रही है. असम से पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में गाय की तस्करी लंबे समय से चल रहा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है.
ऐसा कहा जाता है कि बांग्लादेश में मवेशियों की अवैध आपूर्ति वर्तमान में यहां एक फलता-फूलता व्यवसाय है, जिसमें प्रतिदिन कई करोड़ रुपये की आमदनी होती है.
भारत और बांग्लादेश बॉर्डर 4,000 किलोमीटर से भी लंबा है जो दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी सीमा है. अकेले असम में ये सीमा 250 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी और जटिल है. क्योंकि बांग्लादेश के साथ ब्रह्मपुत्र नदी की जो सीमा है उसे गाय तस्करी के लिए आसान रास्ता माना जाता है.
ऐसा अनुमान है कि इस सीमा से हर साल क़रीब 10 लाख मवेशियों की तस्करी बांग्लादेश में होती रही है.

साल 2014 में केंद्र में बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार सत्ता में आने के बाद उसने गाय की तस्करी पूरी तरह बंद करने का वादा किया था.
इसके बाद 2016 में असम में बीजेपी शासन में आई लेकिन मवेशियों की तस्करी का कारोबार चलता रहा. इसलिए बीते चुनाव में विपक्षी दलों ने गाय की तस्करी को लेकर बीजेपी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे.
असम तथा बीजेपी की राजनीति को समझने वाले जानकार मानते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के महज़ दो महीने के भीतर हिमंत बिस्व सरमा के गायों की सुरक्षा वाला क़ानून लाने का मक़सद ही तस्करी पर रोक लगाना है.
मुख्यमंत्री सरमा ने हाल ही में कहा था कि राज्य में लगभग हर महीने 1000 करोड़ रुपए की अवैध पशु तस्करी होती है और राज्य पुलिस ने पशु तस्करी के रैकेट के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू की है.

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मुसलमानों पर निशाना: विपक्ष
लेकिन राज्य की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस असम मवेशी संरक्षण विधेयक, 2021 में ख़ासकर मंदिर-मठ के पाँच किलोमीटर के दायरे में बीफ़ पर रोक वाले प्रावधान को बहुत अस्पष्ट और विवाद उत्पन्न करने वाला बता रही है.
असम विधानसभा में विपक्ष के नेता कांग्रेस के देवव्रत सैकिया ने बीबीसी से कहा, "हमने इस विधेयक को अपने क़ानूनी विभाग से देखने के लिए कहा है और इसमें हम संशोधन लाएंगे. संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सबसे अहम रखा गया है, इसलिए यह देखना होगा कि क्या यह विधेयक किसी समुदाय के मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं करता है."
मंदिर-मठ के पाँच किलोमीटर के दायरे में बीफ़ की बिक्री और ख़रीद पर रोक के सवाल पर कांग्रेस नेता सैकिया कहते हैं, "इस तरह के क़ानून को लागू करने में समस्या आ सकती है. क्योंकि हमारे गांव में जो सत्र और नामघर होते हैं ये काफ़ी पुराने समय से स्थापित हैं. अभी असम सरकार ने सत्र और नामघर को विकसित करने के लिए वित्तीय मदद दी थी लेकिन मंदिरों के लिए कोई फ़ंड नहीं दिया. अब सरकार ने इस विधेयक में मंदिर से पाँच किलोमीटर वाला प्रावधान डाल दिया है. जबकि कुछ मंदिर नए बने हुए हैं और कुछ काफ़ी पुराने भी हैं."
"ऐसे क़ानून की व्याख्या एक विवादास्पद मुद्दा है और इससे उन समुदायों पर हमला हो सकता है जो बीफ़ खाते हैं. हम इस प्रस्तावित विधेयक में पर्याप्त और उचित संशोधन की माँग करेंगे."
ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (आम्सू) का कहना है कि मंदिरों के पाँच किलोमीटर के दायरे में बीफ़ की बिक्री पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान अतार्किक लगते हैं और ऐसे प्रावधान मुसलमानों को टारगेट करने के इरादे से लाए गए हैं.
आम्सू नेता आइनुद्दीन अहमद कहते हैं, "हमारे समुदाय के लोग बीफ़ खाते हैं और यह सालों पुरानी परंपरा है. लिहाज़ा सरकार को किसी तरह का कोई प्रतिबंध लगाने से पहले इस बात का ध्यान रखना होगा कि इससे किसी को भी ठेस ना पहुँचे."
"सरकार ने इस नए विधेयक में पाँच किलोमीटर के दायरे वाला प्रावधान जोड़ दिया है और अगर यह बिना संशोधन के पास हो जाता है तो आने वाले समय में इस क़ानून का बहुत दुरुपयोग होगा. इससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है. हम एक धर्मनिरपेक्ष देश के नागरिक हैं. लिहाज़ा सरकार को ऐसा विवादित प्रावधान तुरंत हटा देना चाहिए"
नए प्रस्तावित क़ानून के दुरुपयोग के सवाल पर आम्सू नेता का कहना है, "नए विधेयक में पुलिस अधिकारियों (उप-निरीक्षकों और ऊपर) के साथ-साथ सरकार द्वारा अधिकृत व्यक्तियों को उनके अधिकार क्षेत्र में "किसी भी परिसर में प्रवेश और निरीक्षण" करने की शक्ति प्रदान की गई है, जहां उसके पास "यह मानने का कारण है कि अधिनियम के तहत अपराध किया गया है या होने की आशंका है."
"ऐसे में इस नए क़ानून के तहत पुलिस को निर्दोष लोगों को परेशान करने का ज़्यादा मौक़ा मिल जाएगा. जबकि 1950 के मवेशी संरक्षण क़ानून में ऐसी शक्तियां केवल सरकार द्वारा नियुक्त पशु चिकित्सा अधिकारी और प्रमाणन अधिकारी को ही दी गई है."
इसके अलावा आम्सू नेता बिना वैध दस्तावेज़ों के मवेशियों को राज्य के भीतर एक ज़िले से दूसरे ज़िले में ट्रांसपोर्ट नहीं किए जाने वाले प्रावधान को भी ग़लत बताते हैं.
वो कहते हैं, "राज्य में मवेशियों की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए जितने भी बाज़ार हैं वहां गाय ख़रीदने के लिए स्थानीय लोगों से ज़्यादा आसपास के ज़िलों से लोग आते हैं और अगर सरकार इस पर रोक लगा देगी तो व्यापारी के साथ-साथ सरकार को भी राजस्व का नुक़सान उठाना पड़ेगा."

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नया प्रस्तावित क़ानून राजनीतिक एजेंडा?
गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील एआर भूइयां कहते हैं, "असम में गोमांस सेवन करने का जो मसला है, तो यहां मुसलमानों के अलावा आदिवासी और ईसाई लोग भी गोमांस खाते हैं. लेकिन मूल रूप से अगर इस बिल का लक्ष्य देखें तो इसमें गोमांस सेवन से ज़्यादा परिवहन पर ज़ोर दिया गया है. अगर यह सरकार चाहती तो गोवध पर संपूर्ण प्रतिबंध लगा सकती थी लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया."
"इस बिल में विशेष वर्गीकरण के तहत बताया गया है कि कौन-कौन से मवेशी पशु चिकित्सा अधिकारी से प्रमाण-पत्र लेने के बाद काटे जा सकते हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब 1950 से मवेशी संरक्षण का क़ानून चल रहा है तो महज़ दो महीने पहले बनी सरकार को इस बिल को लाने की ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई. इसलिए सरकार की मंशा पर संदेह हो जाता है. इस बिल से किसी का फ़ायदा होने वाला नहीं है. यह पूरी तरह राजनीतिक एजेंडा है और कुछ लोगों को ख़ुश करने के लिए लाया गया है."
सरकार को होगा नुक़सान: एआईयूडीएफ़
लोकसभा सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट यानी एआईयूडीएफ़ के विधायक अमीनुल इस्लाम भी बीजेपी सरकार द्वारा लाए गए इस बिल के पीछे हिंदुत्ववादी राजनीति को कारण मानते हैं.
विधायक अमीनुल इस्लाम ने बीबीसी से कहा, "इस बिल को लाने का सरकार का जो भी उद्देश्य हो लेकिन जो प्रावधान रखे गए हैं उससे असम सरकार को ही राजस्व में नुक़सान होगा. इसके अलावा मवेशी बेचने-ख़रीदने का कारोबार करने वाले सैकड़ों लोगों को भारी नुक़सान उठाना पड़ेगा. यह कारोबार केवल मुसलमान ही नहीं करते बल्कि नेपाली समुदाय से लेकर और कई समुदाय हैं जो मवेशियों का व्यापार करते है."

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70 साल में बहुत कुछ बदला है: बीजेपी
नए प्रस्तावित क़ानून को लाने के उद्देश्यों और इसको लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुएअसम वित्तीय निगम के अध्यक्ष और असम प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता कहते हैं, "पशु संरक्षण के लिए 1950 में जो क़ानून बना था उसके बाद इन 70 सालों में सामाजिक-राजनीतिक परिवेश से लेकर क़ानून-व्यवस्था तक बहुत कुछ बदला है."
"लिहाज़ा इस बदली हुई नई परिस्थिति में एक नया क़ानून लाने की आवश्यकता महसूस की गई क्योंकि गाय की तस्करी से लेकर अवैध बूचड़ख़ानों में जहां-तहां गाय का वध हो रहा था. गाय की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है. किसी भी इलाक़े में गाय को काटे जाने से रोकना ज़रूरी था क्योंकि हमारे देश में हिंदू, सिख और जैन समुदाय भी हैं, सबकी भावनाओं का आदर करना होगा. इसलिए इस पूरी व्यवस्था को ठीक करने के लिए यह क़दम उठाया गया है."
लेकिन इस विधेयक में मंदिर-मठ के पाँच किलोमीटर के दायरे में बीफ़ पर प्रतिबंध वाला प्रावधान है और अगर उस इलाक़े में रहने वाला कोई व्यक्ति (बीफ़ खाने वाला) बाहर से बीफ़ लाकर घर में खाता है तो उसके खाने न खाने की बात को सरकार कैसे तय करेगी?
इस सवाल का जवाब देते हुए बीजेपी नेता कहते हैं, "नए बिल के इस प्रावधान में जो समझने वाली बात है उसमें मंदिर-मठ, गुरुद्वारा तथा जैन धर्म के उपासना स्थल की पवित्रता को बनाए रखने के लिए पाँच किलोमीटर के दायरे के बाहर ही बूचड़ख़ानों की अनुमति दी जाएगी. इससे क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी."
"बात यहां किसी व्यक्ति के बीफ़ खाने की नहीं है. यानी कोई ऐसा व्यक्ति जो पाँच किलोमीटर दायरे के अंदर रहता है और वो गोमांस खाने वाला है तो वह बाहर से लाकर अपने घर में खा सकता है. हम किसी के भोजन और खान-पान पर प्रतिबंध नहीं लगाने जा रहे हैं. हमारा प्रतिबंध केवल मंदिर-मठ, गुरुद्वारा तथा जैन धर्म के उपासना स्थल के पाँच किलोमीटर के दायरे में बूचड़ख़ानों की अनुमति पर रहेगा.''
''जब कोई भी व्यक्ति बूचड़ख़ाना खोलने की अनुमति लेने आएगा उस समय संबंधित अधिकारी इस बात की जाँच करेंगे कि बूचड़ख़ाने वाली जगह की चारों दिशा में पाँच किलोमीटर के भीतर कोई मंदिर तो नहीं है और उसी आधार पर अनुमति दी जाएगी. जिन लोगों को इस बिल को लेकर किसी तरह की शंका है तो इस पर सदन में चर्चा होनी है. तब सारी बातें स्पष्ट हो जाएगी."

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'पाँच किलोमीटर के दायरे का प्रावधान ग़ैर-ज़रूरी'
ओमियो कुमार दास सामाजिक परिवर्तन और विकास संस्थान से जुड़े प्रोफ़ेसर भूपेन शर्मा असम सरकार द्वारा मंदिर-मठ के पाँच किलोमीटर दायरे में बीफ़ पर प्रतिबंध वाले प्रावधान को ग़ैर-ज़रूरी बताते हैं.
प्रोफ़ेसर शर्मा ने बीबीसी से कहा, "मवेशी संरक्षण विधेयक में जो मंदिर-मठ से पाँच किलोमीटर दायरे की बात कही गई है उसके अंदर राज्य का एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्र सम्मिलित हो जाएगा.''
''असम में जिस तरह का सामाजिक ढांचा है उसमें इस तरह के प्रावधान से समस्या उत्पन्न होने की आशंका ज़्यादा है क्योंकि यहां मंदिर किसी एक निश्चित स्थान पर नहीं हैं. इस तरह पाँच किलोमीटर के दायरे में बहुत सारे मंदिर आएंगे. लोग पेड़ के नीचे बने छोटे-छोटे मंदिरों में भी पूजा-प्रार्थना करते हैं. इस तरह पाँच किलोमीटर दायरे वाली यह धारणा ही विवादित है."
वो आगे कहते हैं, "असम की अगर जनसांख्यिकीय संरचना को देखें तो यहां मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 34 फ़ीसद है और ईसाइयों की आबादी मिलाकर यह आबादी 40 प्रतिशत होगी. ऐसे में इस तरह के प्रावधान से निश्चित तौर पर सामाजिक संघर्ष बढ़ने की आशंका होगी.''
''यह एक ग़ैर-ज़रूरी प्रावधान लाया गया है. इससे आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सामाजिक विभाजन आएगा क्योंकि इस तरह के प्रावधान का कोई सामाजिक औचित्य समझ में नहीं आता है. असम में मौजूद पशु संरक्षण क़ानून से क्या दिक़्क़तें थीं? क्योंकि अब तक इस पुराने क़ानून को लेकर किसी तरह का कोई संघर्ष देखने को नहीं मिला है. किसी की धार्मिक पहचान को लेकर कोई सवाल नहीं उठा है. कोई शिकायत भी नहीं है. ये सारी बातें सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती हैं."

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मेघालय की चिंता
इस विधेयक से पूर्वोत्तर में ईसाई बहुल राज्यों को आपूर्ति बाधित होने की आशंका दिख रही है जहां गोमांस का सबसे ज़्यादा सेवन किया जाता है.
नागालैंड और मिजोरम ने अभी तक असम के प्रस्तावित क़ानून पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने कहा कि अगर नए क़ानून से राज्य में मवेशियों की आपूर्ति प्रभावित होती है तो वह केंद्र के समक्ष इस मुद्दे को उठाएंगे.
कई सवालों के जवाब नहीं मिलते
बिल को लेकर सरकार की अपनी दलील है और विपक्ष की अपनी दलील. लेकिन इस बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.
जानकार मानते हैं कि सरकार ने इस बिल में बीफ़ खाने और नहीं खाने के आधार पर समुदायों को बांटने की कोशिश की है.
वो कहते हैं कि बिल के अनुसार सरकार का मानना है कि हिंदू, सिख या जैन समुदाय के लोग बीफ़ खाने वाले समुदाय नहीं हैं. जबकि सच्चाई यह है कि किसी भी समुदाय के सारे लोगों की फ़ूड हैबिट एक ही हो ऐसा मानना मुश्किल है.
इसके अलावा बिल में उन इलाक़ों का ज़िक्र है जहां हिंदू, सिख और जैन समुदाय के लोग अधिक संख्या में रहते हैं.
यह सच है कि भारत में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहां किसी सोसाइटी या मोहल्ले में किसी ख़ास समुदाय के लोगों को घर नहीं मिलते या फिर शाकाहारी और मांसाहारी होने के कारण भी घर मिलने में मुश्किल आती है. लेकिन यह पहली बार हुआ है जब सरकार के ज़रिए सदन में पेश किसी बिल में इस तरह की बात कही गई है.
बीजेपी नेता से जब इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने सिर्फ़ यही कहा कि अगर बिल को लेकर किसी को कोई शंका है तो सदन में इस पर बहस के दौरान उसका हल निकाल लिया जाएगा.
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