उत्तराखंड: रासुका के तहत डीएम के अधिकार तीन माह और बढ़ाने के फ़ैसले पर विवाद

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड में ज़िलाधिकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत दिए गए न्यायिक अधिकारों को और तीन महीने के लिए बढ़ाने के फ़ैसले का राज्य में विरोध शुरू हो गया है.
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, राज्य कर्मचारी यूनियन और हिंदू तीर्थ-स्थानों से जुड़े लोग सरकार की मंशा को लेकर आशंकित हैं.
कांग्रेस पार्टी ने राज्य सरकार के इस फ़ैसले को 'दमनकारी' बताया है.
उधर, धार्मिक स्थलों से जुड़े नेताओं का कहना है कि देवस्थानम बोर्ड का विरोध जारी रहेगा और रासुका भी उन्हें नहीं डिगा सकता.
वहीं राज्य कर्मचारी संघ के लोग इस फ़ैसले को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बता रहे हैं.

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'कुछ ज़िलों में हिंसा' होने की आशंका
इससे पहले, उत्तराखंड गृह विभाग ने सोमवार यानी चार अक्टूबर को एक अधिसूचना जारी की थी.
इसके अनुसार, राज्य के सभी ज़िलाधिकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत उपलब्ध न्यायिक शक्तियों के इस्तेमाल का अधिकार तीन और महीनों के लिए दे दिया गया है.
विभाग के अपर मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की ओर से जारी इस अधिसूचना में सूबे के 'कुछ ज़िलों में हिंसा' होने की आशंका जताते हुए कहा गया है कि हो सकता है कि ऐसी घटनाएं राज्य के दूसरे हिस्सों में भी फैल जाएं.
अधिसूचना जारी होने के ठीक एक दिन पहले तीन अक्टूबर को धर्मांतरण का आरोप लगाकर रुड़की में एक चर्च पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया था.
इस मामले में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के कई नेताओं समेत कुल ढाई सौ लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.

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विपक्षी नेता सरकार की दलील से असहमत
लेकिन राजनीतिक दल और विरोधी इसे दूसरे नज़रिए से भी देख रहे हैं.
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सूबे की 70 विधानसभा सीटों के लिए अगले साल फ़रवरी में चुनाव होने हैं, इसलिए इसका दुरुपयोग विरोधियों की आवाज़ दबाने के लिए हो सकता है. कांग्रेस पार्टी इसे किसान आंदोलन को दबाने की कोशिश के तौर पर भी देख रही है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने रासुका लागू करने को लोकतंत्र की हत्या करने की कोशिश क़रार दिया है. वो कहते हैं कि सरकार कर्मचारियों और किसानों की समस्याओं से डर कर भाग रही है और जनता की आवाज़ दबाने के लिए रासुका का सहारा लिया जा रहा है.
तराई के ऊधम सिंह नगर में देशभर में जारी किसान आंदोलन का असर है. हरिद्वार भी उससे अछूता नहीं. हालांकि ये राज्य के दूसरे क्षेत्रों में नहीं फैल पाया है.
पार्टी के पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर रासुका के फ़ैसले पर गंभीर चिंता जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है.
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वहीं, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव हरीश रावत ने सवाल उठाया है कि ऐसी क्या परिस्थितियां पैदा हो गईं कि रासुका लगाने का फ़ैसला किया गया और ज़िलाधिकारियों को इसे लागू करने का अधिकार दे दिया गया.
हरीश रावत ने फ़ैसले के ख़िलाफ़ मौन व्रत रखने का भी एलान किया है.

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हिंदू तीर्थ स्थानों से जुड़े लोग भी नाराज़
उधर, गंगोत्री मंदिर समीति में सह-सचिव राजेश सेमवाल ने कहा, "देवस्थानम बोर्ड के विरोध में हमलोग जान देने को तैयार हैं, तो रासुका से क्या डरना?"
मालूम हो कि पिछले 22 महीने से तीर्थ-पुरोहित और हक़-हक़ूक़धारी देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की लगातार मांग कर रहे हैं. इस व्यवस्था के लागू हो जाने के बाद उत्तराखंड के चारों धाम सहित राज्य के 51 मंदिरों का प्रबंधन सरकार के हाथों में चला जाएगा.
राज्य के मंदिरों के प्रबंधन के लिए त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने दिसंबर 2019 में चार धाम देवस्थानम बोर्ड विधेयक को विधानसभा से पारित किया था. राज्यपाल की स्वीकृति के बाद ये फरवरी 2020 में क़ानून बन गया.
बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के तीर्थ-पुरोहित और हक़-हक़ूकधारी इस बोर्ड का प्रस्ताव आने के समय से ही इसका विरोध कर रहे हैं. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इसे चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की थी. वहां से हार मिलने के बाद वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर गए हैं.
मुख्यमंत्री पुष्कर धामी से वार्ता के बाद तीर्थ पुरोहितों ने 30 नवंबर तक आंदोलन स्थगित किया है, लेकिन चेतावनी दी है कि यदि उचित हल न निकला तो विरोध को और तेज़ कर दिया जाएगा.
राजेश सेमवाल कहते हैं, "जिस भी पार्टी को मां गंगा का आशीर्वाद मिला यानी जिसने गंगोत्री विधानसभा से जीत हासिल की, सरकार उसी की बनती है."

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कमर्चारी यूनियन की आशंका
राज्य के कर्मचारी यूनियन इस क़ानून को लागू करने की अवधि बढ़ाने के फ़ैसले को लेकर आशंका जाहिर करते हैं.
राज्य कर्मचारी संघर्ष समिति के अध्यक्ष अरुण पांडे ने कहा, "रासुका गुंडों यानी ऐसे लोगों के लिए बना था, जिनसे राष्ट्र को ख़तरा है. हम लोग (कर्मचारी) तो देश के विकास के लिए काम करते हैं. कोई भी योजना बनती है तो उसे ज़मीन तक हमलोग ही पहुंचाते हैं. हमें यदि रासुका के नाम पर धमकाया जा रहा है, तो ये बिल्कुल भी ठीक नहीं है."
हालांकि जिस तरह से ज़िलाधिकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत दिए गए न्यायिक अधिकारों को और तीन महीने के लिए बढ़ाने का फ़ैसला किया गया है, उससे ये तो साफ़ हो जाता है कि राज्य में ज़िलाधिकारियों को रासुका के तहत न्यायिक अधिकार पहले से ही हासिल है. लेकिन ये पहली बार कब से लागू हुआ, इसकी जानकारी साफ़ तौर पर किसी को नहीं है.
अधिकारियों को भी नहीं पता-कब से लागू है ये प्रावधान
गृह विभाग के अपर सचिव रिद्धिम अग्रवाल सिर्फ़ इतना ही कहती हैं कि यह लगातार जारी है. वहीं, अपर मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन कहते हैं कि रासुका तो पूरे देश में लागू है और डीएम को इसके तहत शक्तियां देना भी रूटीन का ही हिस्सा है.
वो कहते हैं कि इससे ज़िलाधिकारी को क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के अधिकार मिलते हैं. आनंद बर्द्धन बताते हैं कि जब वो हरिद्वार के डीएम थे तब ज़मानत पर छूटे एक अपराधी ने सरेबाज़ार गवाह का सिर काट दिया था. उन्होंने कहा कि तब उस अपराधी पर रासुका के तहत कार्रवाई की गई थी.
आनंद बर्द्धन कहते हैं, "ज़िलाधिकारियों को अधिकार समय-समय पर दिए जाते रहे हैं. ये अभी तक सितंबर तक था ही. इसकी अवधि ख़त्म होने पर इसे बढ़कार दिसंबर तक किया गया है. जनवरी से फिर इसे तीन महीने के लिए बढ़ा दिया जाएगा."
हालांकि प्रदेश में ज़िलाधिकारियों को रासुका के तहत न्यायिक अधिकार कब से दिए गए, ये बताने में वो भी लाचारी दिखाते हैं.
नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर उत्तराखंड गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया कि रासुका के तहत ज़िलाधिकारियों को अधिकार देने की प्रक्रिया हो सकता है कि राज्य का गठन होने के कुछ सालों बाद ही शुरू हो गई हो. इसका मतलब ये हो सकता है कि उत्तराखंड में पिछले 15-17 साल से डीएम को रासुका लागू करने के अधिकार दिए जाते रहे हों.
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