पुष्कर सिंह धामी: बीजेपी की उत्तराखंड में तकदीर संवार पाएंगे नए सीएम?

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पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. वो ऐसे वक़्त में सीएम बनाए गए हैं जब विधानसभा चुनाव करीब हैं और 2017 में सत्ता में आई बीजेपी सरकार के अब तक के कामकाज पर कई सवाल हैं.
कई जानकार कह रहे हैं कि धामी को असल में 'कांटों का ताज' मिला है. उन्हें सरकार की छवि सुधारनी है. पार्टी के अंदर रूठे साथियों को मनाना है. विपक्ष के हमले की काट खोजनी है और इसके लिए उनके पास समय बहुत कम है.
विश्लेषकों की राय है, "वो एक ऐसे कप्तान के तौर पर बल्लेबाज़ी करने उतरे हैं, जिन्हें स्लॉग ओवर में क्रीज पर आने का मौका मिला है, जब तेज़ी से रन भी बनाने हैं और विकेट भी बचाना है."
उत्तराखंड समेत पांच राज्यों (गोवा, मणिपुर, पंजाब, यूपी और उत्तराखंड) में अगले साल चुनाव होने हैं. चुनाव शुरुआती महीनों में ही होंगे. इन पांच राज्यों में पार्टी के प्रदर्शन को लेकर बीजेपी अभी से सक्रिय है. बीजेपी महासचिवों की बैठकें हुई हैं और इनमें कई अहम निर्णय लिये गए हैं.
ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्य में, जहां बीजेपी मौजूदा समय में भी सत्ता में है.

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ये दोनों ही राज्य बीजेपी के लिए बेहद अहम हैं और बीजेपी किसी क़ीमत पर इन दोनों राज्यो को खोना नहीं चाहेगी. इसी कारण बीजेपी वो हर आज़माइश कर रही है जिससे उसे आगामी विधानसभा चुनावों में नुकसान ना उठाना पड़े.
उत्तर प्रदेश में पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में 67 सीट को बीजेपी एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रही है लेकिन वहीं पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में उसका संकट साफ़ नज़र आ रहा है.
पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का महज़ 114 दिन का कार्यकाल और एकाएक एक नए और कम अनुभवी चेहरे पुष्कर धामी को राज्य की बागडोर सौंपे जाने को इसी संकट से जोड़ कर देखा जा रहा है.
पुष्कर सिंह धामी ने तीन जुलाई को राज्यपाल को अपने नाम का ज्ञापन सौंपा और आज उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली.

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क्यों हुआ बदलाव?
राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों की राय है कि असल में बीजेपी ने सीएम बदलने का फ़ैसला संवैधानिक नहीं बल्कि एक राजनीतिक संकट के चलते उठाया है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जय सिंह रावत कहते हैं, ''बीजेपी एक अनुभवी पार्टी है, और ऐसा नहीं है कि जिस संवैधानिक स्थिति का हवाला देते हुए अब कहा जा रहा है कि उपचुनाव संभव नहीं, इसके बारे में पहले उसे जानकारी नहीं थी. असल में बीजेपी के सामने उपचुनाव में मुख्यमंत्री की हार का डर एक बड़ा राजनीतिक संकट था. इसका असर 2022 के चुनावों पर भी सीधा पड़ सकता था.''
उत्तराखंड में विपक्ष भी बीजेपी को लेकर आक्रामक है और कांग्रेस के नेता तो स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि बीजेपी राज्य में राजनीतिक संकट से जूझ रही है.

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नए सीएम की चुनौती
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले धामी के सामने एक नहीं बल्कि कई चुनौतियां हैं. मसलन पार्टी में जान फूंकना
उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट कहते हैं कि पुष्कर धामी के सामने सबसे बड़ी चुनौती लगभग एक साल से सरकार में जो शिथिलता आ गई है, उससे निपटना.
वह कहते हैं, "सरकार में अभी नेतृत्व परिवर्तन हुआ है. किसी युवा के हाथों में राज्य की कमान सौंपी गई है तो पहला चैलेंज यही है की अभी तक की जो स्थितियां हैं उनको सामान्य बनाया जाए."
वह कहते हैं कि तीरथ सिंह रावत के लगभग सौ दिन के कार्यकाल में, अगर शुरुआती कुछ दिनों को छोड़ दिया जाए तो उसके बाद लगातार ऐसा महसूस किया गया कि पूरा सिस्टम रुक सा गया है. लगातार आशंका बनी हुई थी कि मुख्यमंत्री फिर बदले जाएंगे. स्थिरता नहीं थी. ऐसे में नए मुख्यमंत्री धामी के आगे यही सबसे बड़ी चुनौती है कि वो पार्टी को राज्य में गति में ले आएं.

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वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी
धामी युवा हैं और पार्टी के अंदर से ही उनके जो वरिष्ठ सहयोगी हैं वह यह मान रहे हैं कि एक सबसे कम उम्र के और लगभग अनुभवहीन कार्यकर्ता को शासन की कमान सौंप दी गई है. ऐसे में धामी के आगे ख़ुद को साबित करते हुए वरिष्ठ नेताओं को साथ लाने का भी चैलेंज है. उन्हें साबित करना होगा कि वह अपरिपक्व नहीं है. उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का सहयोग भी लेकर आगे बढ़ना होगा. शपथ लेने के बाद उन्होंने ये कर दिखाने का दावा भी किया है.
हालांकि शपथ ग्रहण समारोह से पहले भी मीडिया रिपोर्ट में उत्तराखंड के कुछ वरिष्ठ बीजेपी नेताओं में पुष्कर सिंह धामी के नाम को लेकर नाराज़गी बताई जा रही थी. लेकिन धामी के शपथ लेने के तुरंत बाद इनमें से कई लोग मंत्री पद की शपथ लेते मंच पर दिखे.
लेकिन जिस परिस्थिति में, जिस माहौल में धामी को राज्य की कमान सौंपी गई है उसमें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन साधना एक बड़ी चुनौती है.

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जनता में असंतोष?
धामी के सामने जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने और पार्टी के प्रति खोया हुआ विश्वास पैदा करने की भी चुनौती है.
भारतीय जनता पार्टी को पिछले चुनाव में बड़ी जीत मिली. लेकिन अब दावा किया जाता है कि वोटरों ने जो भरोसा दिखाया वह पिछले 4 सालों में कहीं ना कहीं दरका है. मुख्यमंत्री के पास एक बहुत ही 'शॉर्ट पीरियड' है उस भरोसे को वापस लाने का और जानकार मानते हैं कि इसी कारण पार्टी ने एक युवा चेहरे पर भरोसा जताया है.
पद संभालते ही तीरथ रावत ने 'महिलाओं के फटी जीन्स पहनने' को लेकर एक बयान दिया था जिस पर विवाद हुआ और राष्ट्रीय मीडिया में उनकी कड़ी आलोचना हुई. लेकिन उनके विवादित बयानों का सिलसिला यहीं नहीं थमा. 'अमेरिका ने भारत को 200 साल तक ग़ुलाम बनाया' और 'परिवार नियोजन' पर उनके विवादित बयान जारी रहे.
बीजेपी के कई नेता ही दबे सुर में मानते हैं कि इसका पार्टी की छवि पर असर ज़रूर पड़ा.
कोरोना महामारी के दौरान भी व्यवस्था को लेकर लोगों में नाराज़गी रही और पार्टी किसी भी क़ीमत पर इसका ख़ामियाज़ा 2022 के चुनाव में नहीं भुगतना चाहेगी.
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आक्रामक विपक्ष
उत्तराखंड में बीजेपी को विपक्ष से भी कड़ी टक्कर मिल रही है.विपक्ष लगातार जनता के मुद्दों को उठाते हुए हमलावर है. पिछले कुछ दिनों में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लगातार कह रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी सरकार बनाती है तो वे भू-क़ानून लेकर आएंगे.
जनता की नाराज़गी और शासन में लगातार अस्थिरता का बना रहना कांग्रेस के पक्ष में भी जा सकता है.
बीजेपी ने अपने पिछले घोषणा-पत्र में युवाओं को नौकरी देने जैसे कई वादे किये थे और अब विपक्ष उन्हें ही उनके खिलाफ़ इस्तेमाल करते हुए आक्रामक बना हुआ है. कांग्रेस पार्टी के नेताओं का आरोप है कि जो पार्टी राज्य में मुख्यमंत्री का पद भरने में भी पशोपेश में रही है, जिस बेपटरी हुई डबल इंजन सरकार से कभी अपना घर नहीं संभला,वो युवाओं,महिलाओं,बच्चों और बुजुर्गों की समस्याओं पर क्या काम करेगी.
ऐसे में विपक्ष के तेवर को समझते हुए अपनी रणनीति तय करना भी धामी सरकार के लिए चुनौती होगी.

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ख़ुद को साबित करने की चुनौती
चुनावों से ठीक पहले मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने की रणनीति उत्तराखंड की सत्ता में क़ाबिज़ रहीं दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां अपनाती रही हैं.
वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत इसकी एक वजह पार्टिंयों के भीतरी सत्ता संघर्ष को भी मानते हैं. वो कहते हैं, ''उत्तराखंड की राजनीति की यह विडंबना है कि किसी भी पार्टी के नेता आपस में ही एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं करते. आप बीते 20 सालों का इतिहास देखें तो बीजेपी के नेताओं को बीजेपी के ही नेताओं से ख़तरा है और कांग्रेस के नेताओं को कांग्रेस के नेताओं से. ऐसे में दोनों ही पार्टियों के नेतृत्व को मुख्यमंत्री बदल-बदल कर इन्हें संतुष्ट करना पड़ता है ताकि इनकी आपसी कलह सतह पर ना आ जाए.''
कांग्रेस ने भी उत्तराखंड में 2013 की आपदा के बाद बने हालातों से पनपे असंतोष से ध्यान हटाने के लिए ऐसा ही क़दम उठाते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटा हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया था. जिसके बाद से पनपी नाराज़गी के चलते आखिरकार बहुगुणा ने कॉंग्रेस का हाथ छोड़ भाजपा का साथ थाम लिया था. नए मुख्यमंत्री की ही नहीं बल्कि नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की मृत्यु के बाद से कांग्रेस की अंदरूनी कलह के चलते उत्तराखंड नेता प्रतिपक्ष की भी राह देख रहा है.
ऐसे में नए मुख्यमंत्री पर खुद को साबित करने का दवाब भी रहेगा क्योंकि उनके चुनाव को 2022 में होने वाले चुनाव में सीधे तौर पर पार्टी के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाएगा.
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पश्चिम बंगाल जैसा संकट
जानकार मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की हार की एक बड़ी वजह यह भी थी कि उनके पास वहां कोई चेहरा नहीं था. उत्तराखंड में भी बीजेपी इस समस्या से जूझती दिख रही है. उसके पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसे वो विपक्ष के सामने चुनौती और जनता के सामने प्रबल उम्मीदवार के तौर पर पेश कर सके.
उत्तराखंड में बीजेपी साल 2017 में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर आयी थी.
त्रिवेंद्र सिंह रावत को सत्ता सौंपी गई लेकिन उनके पूरे कार्यकाल में जनता और कार्यकर्ता दोनों में ही रोष देखने को मिला. संभव है कि आलाकमान ने इसी आधार पर मार्च 2021 में तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी और अब जब लगभग सौ दिन के कार्यकाल के बाद उनकी जगह धामी मुख्यमंत्री बने हैं तो इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राज्य में पार्टी किस संकट से जूझ रही है.
धामी युवा है. उन्होंने कभी मंत्रीमंडल नहीं संभाला है और ना ही बतौर मंत्री ही काम किया है. बावजूद इसके उन्हें कमान सौंपना बीजेपी के संकट को दिखाता है कि राज्य में उनके पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है.

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उत्तराखंड का राजनीतिक सफ़र
9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आए उत्तराखंड में अब तक 10 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं. इनमें से केवल नारायण दत्त तिवारी ही अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर पाए थे.
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को उत्तराखंड में शासन के लिए तक़रीबन 10-10 सालों का वक़्त मिला है जिसमें कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के 3 चेहरे दिए तो भाजपा अब तक 6 मुख्यमंत्री के चेहरे उतार चुकी है और अब सातवें ने पदभार संभाला है.
बीजेपी ने अपने पॉंच-पॉंच साल के दो शासनकालों में तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को बदला है. ऐसे में इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता है कि केंद्र में भले ही बीजेपी के पास पीएम मोदी जैसा चेहरा हो लेकिन उत्तराखंड में उसके लिए चुनौतियां बड़ी हैं.
कॉपी- ध्रुव मिश्रा, भूमिका राय
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