बीजेपी ख़ामोशी से कैसे हटा देती है मुख्यमंत्री और कहीं चर्चा भी नहीं होती?

विजय रूपाणी

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मैं मानता हूं कि गुजरात के विकास की यात्रा नए नेतृत्व में नई ऊर्जा और जोश के साथ चलती रहनी चाहिए. इसी विचार के साथ मैंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया है."

पांच साल से गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने ये कहते हुए अपना पद छोड़ दिया है. ये ज़ाहिर है कि इस्तीफ़ा देने का आदेश उन्हें केंद्रीय नेतृत्व से मिला था.

रुपाणी बीजेपी के ऐसे पहले नेता नहीं है जिन्हें कार्यकाल के बीच में ही पद छोड़ना पड़ा है.

अभी डेढ़ महीना पहले ही कर्नाटक के कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा को पार्टी ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया.

गवर्नर को इस्तीफ़ा सौंपने के बाद येदियुरप्पा ने कहा था कि उन पर केंद्रीय नेतृत्व का कोई दबाव नहीं है.

येदियुरप्पा ने ये भी कहा था कि वो अब पार्टी को मज़बूत करने के लिए काम करेंगे. इसका एक संदेश ये भी था कि उनके सीएम रहते पार्टी को लग रहा था कि पार्टी कमज़ोर हो रही है.

उत्तराखंड के तीरथ सिंह रावत तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सही से बैठ भी नहीं पाए थे कि पार्टी ने उन्हें हटाने का फ़ैसला कर लिया.

तीरथ सिंह रावत

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इमेज कैप्शन, उत्तराखंड में बीजेपी ने तीरथ सिंह रावत को चार महीने के भीतर ही सीएम पद से हटा दिया

इसी साल मार्च में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाए जाने के बाद तीरथ सिंह रावत बड़े हर्ष से सीएम की कुर्सी पर बैठे थे.

लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में ही उन्हें कुर्सी खाली करने का आदेश दे दिया गया और उन्होंने चुपचाप उसे स्वीकार कर लिया.

असम में भी पार्टी ने सर्बानंद सोनोवाल की जगह हिमंत बिस्वा सरमा को सीएम बनाया. सोनोवाल अभी केंद्र में मंत्री हैं.

इनमें किसी भी नेता ने किसी तरह का विरोध या असंतोष दर्ज नहीं किया है.

विश्लेषक मानते हैं कि इसकी एक बड़ी वजह ये है कि हटाए गए नेता ये बात जानते हैं कि उनके बोलने का बहुत अधिक असर नहीं होगा और पार्टी में उनकी जो जगह है वो उसे भी गंवा देंगे.

इतनी आसानी से नेताओं को कैसे हटा देती है बीजेपी?

येदियुरप्पा

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इमेज कैप्शन, जुलाई में बीजेपी ने येदियुरप्पा को पद से हटा दिया था

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह मानते हैं कि बीजेपी एक काडर आधारित पार्टी है जिसमें कोई भी नेता तब तक ही नेता है जब तक काडर उसके साथ है.

प्रदीप सिंह कहते हैं, "किसी भी काडर आधारित पार्टी में कोई नेता तब तक नेता रहता है जब तक काडर साथ रहता है. जिस दिन काडर साथ छोड़ देता है, नेता की राजनीतिक हैसियत नहीं रह जाती है. नेता को भी पता होता है कि अगर वो बग़ावत करेंगे तो नतीजा क्या हो सकता है. यूपी के कल्याण सिंह, गुजरात के शंकर सिंह वाघेला और मध्य प्रदेश की उमा भारती इसका उदाहरण हैं. पार्टी में समर्थन ना रहने पर इन नेताओं को पद से हटा दिया गया था."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी रुपाणी को हटाए जाने को एक ज़रूरी सर्जरी के तौर पर देखते हैं. विजय त्रिवेदी कहते हैं कि इससे पहले की बीमारी लाइलाज होती, बीजेपी ने उसकी जड़ ही काट दी है.

त्रिवेदी कहते हैं, ''यदि कोई गंभीर बीमारी हो गई है और सर्जरी की ज़रूरत है तो फिर जितना जल्दी सर्जरी हो जाए वो बेहतर रहता है. पेरासिटामोल या पेन किलर देकर कुछ समय के लिए दर्द तो कम हो जाता है लेकिन बीमारी बढ़ती जाती है. बीजेपी को लगा कि रुपाणी अब इलाज नहीं बीमारी बन गए हैं तो पार्टी ने बीमारी की जड़ ही काट दी.''

पद से हटाए जाने के बावजूद किसी खास विरोध के ना होने की एक वजह ये भी है कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इस समय मज़बूत है और विरोध करने पर कुछ हासिल नहीं होगा.

प्रदीप सिंह कहते हैं, "मोदी से पहले जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी दो ऐसे नेता थे जिनमें वोट लाने की क्षमता थी. जिस नेता में वोट लाने की क्षमता होती है, पार्टी में उसी की चलती है. बीजेपी में नरेंद्र मोदी आज ऐसे नेता है जिनके नाम पर वोट मिलते हैं. बीजेपी के सभी विधायकों और सांसदों को ये पता है कि उनकी जीत में एक बड़ी भूमिका नरेंद्र मोदी के करिश्मे की है. इसलिए बीजेपी नेता केंद्रीय नेतृत्व के ख़िलाफ़ बोल नहीं पाते हैं."

रुपाणी के कोई विरोध ना करने की एक वजह ये भी है कि वो जानते हैं कि वो अपने दम पर वोट हासिल नहीं कर सकते हैं. 2017 में केंद्रीय नेतृत्व ने ही उन्हें बिना किसी ख़ास सिफ़ारिश के मुख्यमंत्री बनाया था, अब जब केंद्रीय नेतृत्व को लग रहा है कि वो चल नहीं पाएंगे तो उन्हें हटा दिया गया है.

रुपाणी को पद से हटाया क्यों गया?

गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. पार्टी यहां कोई जोख़िम उठाना नहीं चाहती है

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इमेज कैप्शन, गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. पार्टी यहां कोई जोख़िम उठाना नहीं चाहती है

इसकी वजह स्पष्ट है. पार्टी को लग रहा है कि अगले साल दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी रुपाणी के नेतृत्व में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकेगी. गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी यहां कोई ख़तरा नहीं उठाना चाहेगी.

प्रदीप सिंह कहते हैं, "2017 में रुपाणी के सीएम रहते हुए बीजेपी बमुश्किल गुजरात का चुनाव जीत पाई थी. बीजेपी ये जानती है कि रुपाणी भले ही अच्छी सरकार चला रहे हों लेकिन उनके नाम पर वोट नहीं मिल पाएंगे. रुपाणी को हटाने का फैसला टाइमिंग के हिसाब से बहुत सही है. चुनाव से लगभग सवा साल पहले रुपाणी को हटाने का फैसला बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है."

विजय रुपाणी को किसी की सिफ़ारिश पर गुजरात का सीएम नहीं बनाया गया था. जब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था तब ही ये तय था कि ये कुछ समय के लिए ही है, हालांकि वो थोड़ा समय लंबा हो गया. बीजेपी ने कई राज्यों में तटस्थ जाति के मुख्यमंत्री बनाए हैं ताकि बड़ी जातियों के नेताओं के बीच की प्रतिद्वंदिता की काट की जा सके. रुपाणी भी तटस्थ जाति से ही थे.

माना जा रहा है कि कोरोना महामारी को दौरान राज्य में उपजी नाराज़गी भी रुपाणी को हटाए जाने की एक वजह हो सकती है. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसके जातिगत कारण अधिक हो सकते हैं.

हाल ही में संपन्न हुए सूरत लोकल बॉडी इलेक्शन में बिना किसी ठोस जनाधार वाली आम आदमी पार्टी ने 27 सीटें हासिल की थीं. इसने बीजेपी खेमे में चिंता पैदा कर दी है.

रुपाणी जैन सुमदाय से आते हैं जिसकी आबादी राज्य में सिर्फ़ दो प्रतिशत है. वहीं बड़ा राजनीतिक आधार रखने वाला पाटीदार समुदाय में बीजेपी के प्रति नाराज़गी है.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "विजय रुपाणी जी के बारे में कहा जा रहा है कि वो कोविड का प्रबंधन नहीं कर पाए और पार्टी को राजनीतिक नुकसान हुआ. ये बात कहीं हद तक सही हो सकती है. लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि बीजेपी को लग रहा है कि पाटीदार समुदाय उससे नाराज़ है और इसका नुक़सान आगामी विधानसभा चुनावों में हो सकता है."

वहीं प्रदीप सिंह कहते हैं, "कोविड को लेकर राज्य में असंतोष ज़रूर है. ऐसा माना जा सकता है कि विजय रुपाणी के जाने से जो पार्टी विरोधी भावना या लहर थी वो भी चली जाएगी."

रुपाणी को हटाने का संदेश क्या है?

मोदी और रूपाणी

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विश्लेषक मानते हैं कि इसके दो स्पष्ट संदेश हैं, पहला यह कि बीजेपी में उसी नेता की जगह रहेगी जो पार्टी को चुनावी जीत दिलाने का दम रखता हो और दूसरा ये कि पार्टी का नेतृत्व संगठन के काम पर बहुत बारीक़ नज़र रखे हुए है.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "रुपाणी को हटाए जाने का मतलब है कि पार्टी की जो लीडरशिप है वो पार्टी के अंदर, संगठन में जो काम हो रहा है उस पर बहुत बारीक और गंभीर नज़र रखे हुए हैं. पार्टी को जब भी लगता है कि सुधार की ज़रूरत है तो वो निर्णय लेती है."

त्रिवेदी कहते हैं, "गलती को सुधार लेना गलती नहीं होती है. यदि आपको लगता है कि गलत फैसला हो गया है तो आप सही फ़ैसला ले लेते हैं. पार्टी ने उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को सीएम बनाया लेकिन जब पार्टी को लगा कि गलती हो गई है तो उसमें सुधार भी किया गया और फिर पुष्कर सिंह धामी को सीएम बनाया गया. यानी बीजेपी अपने गलत फैसलों को सही करने के लिए तैयार है और इसे लेकर पार्टी में कोई झिझक नहीं है."

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि बीजेपी ये संदेश भी दे रही है कि वह चुनावी जीत के लिए जोख़िम उठाने के लिए भी तैयार है. प्रदीप सिंह कहते हैं, "दो मुख्यमंत्रियों के बाद उत्तराखंड में तीसरा मुख्यमंत्री बनाना एक बड़े जोख़िम का काम था. बीजेपी ने ये जोख़िम उठाया और निर्णय लिया. अब लग रहा है कि बीजेपी का ये फ़ैसला सही रहा है."

वहीं विजय त्रिवेदी कहते हैं, "पार्टी के लिए नेताओं को हटाने के का एक फ़ायदा ये भी होता है कि बाकी नेताओं को ये संकेत जाता है कि यदि वो गलती करेंगे तो उन्हें भी हटाया जा सकता है. दूसरा ये भी संदेश जाता है कि कोई एक नेता सीएम बन गया है तो इसका मतलब ये नहीं है कि बाकी नेताओं के लिए मौके ख़त्म हो गए हैं. पार्टी ने बाकी सभी नेताओं को भी ये संदेश दिया है कि सिर्फ़ उन्हीं नेताओं की ही जगह है जो पार्टी को चुनाव जिता सकते हैं."

बीजेपी का फ़ोकस सिर्फ़ चुनावी जीत पर

विजय रूपाणी और अमित शाह

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विश्लेषक मानते हैं कि इस समय बीजेपी के लिए वही नेता अहम है जो चुनावी जीत दिला सकता है. यदि नेता में जीत दिलाने का दम है तो उसकी 'नाकामियों को भी नज़रअंदाज़' किया जा रहा है.

उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में भी कोरोना का कुप्रबंधन एक मुद्दा रहा है. लेकिन योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाया गया है. बल्कि पार्टी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को और मज़बूत किया है.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "बीजेपी को लगता है कि यूपी में योगी आदित्यनाथ अभी भी पार्टी को चुनाव जिता सकते हैं. जबकि गुजरात में पार्टी को लगा कि रुपाणी चुनाव नहीं जिता सकते हैं. नेता की चुनाव जिताने की क्षमता ही इस समय सबसे बड़ा फ़ैक्टर है."

त्रिवेदी कहते हैं, "जब पार्टी को लगा कि कर्नाटक में येदियुरप्पा के साथ चुनाव नहीं जीता जा सकेगा तो पार्टी ने इतने बड़े नेता को हटाने का फ़ैसला कर लिया क्योंकि पार्टी के लिए चुनाव जीतना सबसे अहम है. विजय रुपाणी को हटाने का फ़ैसला पार्टी की राजनीतिक ज़रूरत की वजह से लिया गया है."

कांग्रेस इस तरह के फ़ैसले क्यों नहीं ले पाती है?

सोनिया गांधी

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इमेज कैप्शन, विश्लेषक मानते हैं कि इस समय कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व कमज़ोर है और इसलिए ही पार्टी बड़े फ़ैसले नहीं ले पा रही है.

भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी ने भी हाल के महीनों में अंदरूनी कलह का सामना किया है लेकिन पार्टी कोई बड़ा निर्णय नहीं ले सकी है. छत्तीसगढ़, राजस्थान और पंजाब में क्षेत्रीय नेताओं की कलह जगज़ाहिर है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक में पार्टी बग़ावत की वजह से सत्ता भी गंवा चुकी हैं.

विश्लेषक मानते हैं कि इसका मतलब है कि कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व कमज़ोर हो चुका है और इसलिए ही क्षेत्रीय नेता खुलकर विरोध दर्ज करवा रहे हैं.

प्रदीप सिंह कहते हैं, "कांग्रेस इस तरह के निर्णय नहीं ले पाने के दो कारण हैं. पहला कारण तो यही है कि केंद्रीय नेतृत्व कमज़ोर हो गया है. दूसरा कारण ये है कि गांधी परिवार की वोट हासिल करने की क्षमता कम हो गई है. आज से दस-पंद्रह साल पहले यदि सोनिया गांधी दिल्ली से एक फ़ोन भी कर देतीं तो राज्य में बिना किसी विरोध के नेतृत्व में बदलाव हो जाता. लेकिन आज स्थिति ये है कि कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता दिल्ली में गांधी परिवार को अपनी ताक़त दिखाकर चले जाते हैं."

सिंह कहते हैं, "इतिहास गवाह है कि जब भी केंद्र कमज़ोर होता है तब क्षत्रप सिर उठाते हैं. कांग्रेस में केंद्रीय नेतृत्व कमज़ोर हो गया है, हाई कमान कमज़ोर हो गया है इसलिए ताक़त रखने वाले क्षेत्रीय नेता विरोध के सुर अपना रहे हैं."

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