उत्तराखंड: गांवों में बढ़ता कोरोना संक्रमण, इलाज की कमी से जूझते लोग

इराणी गाँव में पहुँची टीम

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    • Author, ध्रुव मिश्रा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, देहरादून से

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पिछले तकरीबन दो हफ़्तों से लगातार बारिश और बर्फ़बारी हो रही है. साथ ही इन इलाक़ों में कोविड संक्रमण की वजह से कई लोग बुख़ार और अन्य दिक्कतों की शिकायत कर रहे हैं.

चमोली जिले के सीमांत इलाक़े निजमुला घाटी में बसे गांव ईराणी के ग्राम प्रधान मोहन नेगी कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों से उनके गांव के करीब 80 प्रतिशत लोगों को बुखार है, कई लोगों को बुखार के साथ-साथ खाँसी-जुखाम की भी शिकायत है.

इस वक्त गांव में ऐसे हालात हैं कि पेरासिटामोल तक मिलनी मुश्किल है. उनके पास कुछ एक टेबलेट्स थीं लेकिन अब कोई दवा नहीं है.

अचानक लोगों को ये कैसा बुखार आया है इसका पता बिना टेस्टिंग के नहीं लगाया जा सकता है और टेस्टिंग की यहाँ कोई भी सुविधा मौजूद नहीं थी.

चमोली जिले के प्रशासन ने मोहन नेगी को आश्वासन दिया था कि गांव में मदद भेजी जाएगी लेकिन दो हफ़्तों तक कोई भी मदद गांव में नहीं पहुँची थी.

फिर बहुत ज्यादा दबाव डालने पर दो हफ्तों के बाद शुक्रवार को गांव में टेस्टिंग के लिए टीमें आईं और कुछ गांव वालों के सैम्पल लिए.

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कंटेनमेंट ज़ोन बने गांव

जिन जगहों पर टेस्टिंग के बाद कोरोना के मरीज़ मिल रहे हैं, उन्हें कंटेनमेंट ज़ोन बनाया जा रहा है. टिहरी गढ़वाल के छाती गांव में पांच मई को कोरोना टेस्ट हुए थे.

अब तक इस गांव के 42 लोग संक्रमित पाए गए हैं, जिनमें गांव के केदार सिंह और उनका परिवार भी शामिल है.

अब प्रशासन ने इस गांव को कंटेनमेंट ज़ोन घोषित कर दिया है. पर केदार सिंह सरकारी सहायता से नाख़ुश हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "दवाइयों की जो किट दी गई है उसमें जो-जो चीजें लिखी गई हैं वह पूरी नहीं मिलीं हैं. किट में ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर का भी जिक्र किया गया है लेकिन यहां ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर दोनों गायब है, पूरे गांव के लिए सिर्फ पांच ऑक्सीमीटर और पांच थर्मामीटर दिए गए हैं."

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कोरोना टेस्टिंग से हिचक

अधिकारियों का कहना है कि लोगों की मदद करने की कोशिश जारी है लेकिन टेस्टिंग को लेकर हिचक के कारण ज़्यादा लोग टेस्ट नहीं करवा रहे हैं.

टिहरी गढ़वाल की डीएम ईवा आशीष श्रीवास्तव ने बताया, "पहाड़ों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि अगर एक टीम एक गांव जाती है तो वो दूसरे गांव नहीं जा पाती क्योंकि वहां पहुंचने में उसे काफी टाइम लगता है. हम अधिक से अधिक टेस्टिंग करवाने की कोशिश कर रहे हैं.

कोविड किट पूरी न होने के केदार सिंह के आरोप पर श्रीवास्तव कहती हैं, "बीते कुछ दिनों से ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर की आपूर्ति का संकट था क्योंकि मांग बढ़ गई थी. अब एक शासनादेश आया है कि जीवन रक्षक चीज़ें अगर ज्यादा दामों पर भी मिल रही हैं तो खरीद ली जाएं. पिछले हफ्ते से ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर की कमी नहीं है."

प्रशासन लोगों से आगे आकर टेस्टिंग करवाने की अपील भी कर रहा है.

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गांवों का हाल

उत्तराखंड में इन दिनों सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें वायरल हो रही हैं जिसमें दिखाया जा रहा है कि गांव में लोग अपने खेतों में दाह-संस्कार कर रहे हैं.

गांवों में मरने वालों का अभी कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं आया है और न ही यह पुष्टि की गई है कि मौत कोरोना संक्रमण की वजह से हुई है.

रुद्रप्रयाग ज़िले के त्यूरी गांव के रहने वाले हरेंद्र सिंह सेमवाल बीबीसी से बातचीत में बताते हैं उनकी दादी को कुछ दिनों पहले बुखार आया था. जब तबीयत ज्यादा खराब हुई तो वो उन्हें गुप्तकाशी स्थित एक अस्पताल में ले गए. वहां पता चला कि उनका ऑक्सीज़न लेवल काफी कम है.

हरेंद्र बताते हैं, "दादी का ऑक्सीजन लेवल 64 पहुंच गया था. अस्पताल में इलाज की सुविधाएं पर्याप्त नहीं थीं. उन्होंने रुद्रप्रयाग के लिए रेफर किया. रुद्रप्रयाग तक ले जाने के लिए ट्रांसपोर्ट की कोई सुविधा नहीं थी. हम दादी को नहीं बचा पाए."

बिना टेस्ट के हुई हरेंद्र की दादी की मौत को कोरोना से हुई मौत नहीं कहा जा सकता लेकिन उनके लक्षण वही थे जो कोरोना मरीज़ों के होते हैं.

फ़ोन पर बात करते हुए हरेंद्र कहते हैं कि उनके गांव में लगभग सभी परिवारों में किसी न किसी को बुख़ार है.

रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ विकासखंड के रहने वाले सुभाष रावत, गांव प्रधानों के एक संगठन के अध्यक्ष हैं. वे बताते हैं उनके अंतर्गत करीब 68 गांव आते हैं और इन सभी गांव में कई लोगों को बुख़ार है.

सुभाष आरोप लगाते हैं कि आशा कर्मचारियों को गांव में भेजा जा रहा है लेकिन उन्हें भी पर्याप्त संसाधन मुहैया नहीं कराए जा रहे हैं. वे कहते हैं कि कई बार तो खुद आशा वर्कर्स भी कोरोना पॉजिटिव पाई गई हैं.

कोरोना किट की तस्वीरें

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सीएमओ का जवाब

रुद्रप्रयाग ज़िले के प्रभारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मनोज बड़ोनी को गांव वालों की दिक्कतों के बारे में बताया गया.

डॉ. बड़ोनी ने बीबीसी से कहा, "रुद्रप्रयाग जिले के गांवों में अभी संक्रमण कम है. हमारी टीमें लगातार गांवों में जा रही हैं और आशा वर्कर कोविड की दवाइयों की किट बांट रही हैं."

लेकिन डॉक्टर बड़ोनी ने गांवों में दवाइयां और आशा वर्करों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण न होने के आरोपों को खारिज कर दिया. उनका कहना है कि दवाइयां पर्याप्त हैं और साथ ही आशा वर्करों के पास भी पर्याप्त पीपीई किट और ग्लव्स मौजूद हैं.

हालांकि, ग्राम प्रधानों को उनके गांवों के संक्रमित लोगों के बारे में जानकारी न देने की बात डॉक्टर बड़ोनी ने मानी. लेकिन, उन्होंने कहा कि एक ग्रुप बनाया गया है जहाँ जनप्रतिनिधियों से सूचनाएं साझा की जाती हैं.

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अधिकारियों का रवैया

कुछ दिनों पहले राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी के निर्देश पर उत्तराखंड के चमोली निवासी बीजेपी नेता सतीश लखेडा को कई ज़िलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से बात करने के लिए कहा गया था.

सतीश लखेडा ने बीबीसी को बताया, "पार्टी के कहने पर हमने कई ज़िलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन ख़ास सफलता नहीं मिली. यह परिस्थितियां दुर्भाग्यपूर्ण हैं. ऐसे काल में अधिकारियों को संवेदनशील होने की ज़रूरत है."

इस मामले पर बीबीसी ने स्वास्थ्य सचिव अमित नेगी से बात करने की कई बार कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.

इसके अलावा मुख्य चिकित्सा अधिकारी टिहरी, चमोली और रुद्रप्रयाग से भी बात करने की कोशिश की गई जिसमें सिर्फ़ रुद्रप्रयाग ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से संपर्क हो पाया.

छाता गांव

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विपक्ष का आरोप

विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता राज्य सरकार पर स्थिति को ठीक से न संभाल पाने का आरोप लगा रहे हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता किशोर उपाध्याय ने कहा, "दुख का विषय यह है कि अधिकारी डर गए हैं. ऐसे ही मंत्री भी छुप गए हैं. राज्य में इस वक़्त कोआर्डिनेशन की कमी है. बिना पार्टी देखे मुख्यमंत्री को सबको एक साथ बुलाना चाहिए था और अपने-अपने ज़िलों और इलाक़ों में काम करने के लिए कहना चाहिए था."

विपक्ष के आरोपों पर जवाब देते हुए भाजपा नेता नेहा जोशी कहती हैं कि राज्य में संक्रमण की दर बहुत तेज़ी से बढ़ी है लेकिन सरकार ने ज़रूरी कदम भी उठाए हैं. ज़िलों में अब कोविड सेंटर बन चुके हैं और ज़िला अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट लगाए जा चुके हैं. वो इसे सरकार की मुस्तैदी का ही नतीजा मानती हैं.

नेहा जोशी कांग्रेस के आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहती हैं, "मैं पूरे विश्वास के साथ कह रही हूं कि अगर अल्मोड़ा के गांव में कोई संक्रमित हो रहा है तो उस तक सरकार की कोविड किट पहुंच रही है. मैंने ये खुद जांचा है. ये तभी संभव हो पा रहा है क्योंकि जनप्रतिनिधि वहां सक्रिय हैं और ग्राउंड पर हैं."

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पहाड़ी ज़िलों में संक्रमण

एसडीसी फ़ाउडेंशन के अनूप नौटियाल राज्य में कोरोना संक्रमण पर नज़र रख रहे हैं.

राज्य के 13 ज़िलों में से टिहरी, पौड़ी, चमोली, चंपावत, पिथौरागढ़ और बागेश्वर पर्वतीय ज़िले हैं. इसके अलावा देहरादून और नैनीताल के कुछ हिस्से पर्वतीय क्षेत्र में आते हैं जहां घनी आबादी है.

नौटियाल कहते हैं, "एक मई से लेकर 10 मई तक उत्तराखंड के नौ पर्वतीय ज़िलों से 19,100 केस आए हैं जो राज्य के कुल केस का 27.6% हिस्सा है. अब हर चौथा केस उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में से आ रहा है."

ये भी ध्यान देने वाली बात है कि इन ज़िलों में टेस्टिंग की रफ्तार मैदानी ज़िलों की अपेक्षा धीमी है.

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राज्य में पिछले साल एक मई को कोरोना से पहली मौत दर्ज की गई थी. एक मई 2020 से एक अप्रैल 2021 के बीच हुई कुल मौतों में से पर्वतीय ज़िलों में सिर्फ़ 12% मौते हुई हैं लेकिन पहाड़ों पर मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है.

अनूप नौटियाल बताते हैं, "एक मई से 12 मई तक राज्य में मरने वालों में से लगभग 17% पर्वतीय क्षेत्रों से थे. इसमें एक ट्रेंड साफ़ दिख रहा है."

अनूप नौटियाल उत्तराखंड के पहाड़ी इलाक़ों में विशेषकर ग्रामीण इलाक़ों में संक्रमण बढ़ने की एक मुख्य वजह हरिद्वार कुंभ मेले के आयोजन को भी मानते हैं.

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