आगरा का श्री पारस अस्पताल: 'ऑक्सीजन की कमी ही नहीं, अनदेखी से भी गई जान' - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, आगरा से, बीबीसी हिंदी के लिए
"26 अप्रैल को पिता जी की हालत ख़राब होने लगी. डॉक्टर ने कहा कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी हो गई है. आपको ही ऑक्सीजन का इंतज़ाम करना होगा, नहीं तो उनको बचा पाना मुश्किल है. हम लोगों ने दौड़-भाग करके ऑक्सीजन का इंतज़ाम किया लेकिन तब तक पिता जी की मौत हो चुकी थी. आईसीयू में मेरी पत्नी भी भर्ती थीं. वहां देखा तो हड़कंप मचा था. लोगों के हाथ-पैर नीले पड़ रहे थे, लोग तड़प रहे थे. 27 अप्रैल की सुबह मेरी पत्नी की भी मौत हो गई."
आगरा ज़िले की कृष्णा कॉलोनी के रहने वाले अमित चावला के पिता वासदेव चावला और उनकी पत्नी मनीषा चावला उसी श्री पारस अस्पताल में भर्ती थे जिसके मालिक वायरल वीडियो में कहते सुने गए थे कि 'मॉक ड्रिल में 22 मरीज़ छँट गए.'
दोनों का ही श्री पारस अस्पताल में पोस्ट कोविड यानी कोरोना से ठीक होने के बाद इलाज चल रहा था.
अमित के पिता की ऑक्सीजन की कमी से 26 अप्रैल को मौत हो गई और अगले दिन 27 अप्रैल की सुबह पत्नी की भी मौत हो गई.
अमित चावला के बड़े भाई अशोक चावला कहते हैं, "24 घंटे के भीतर दो लोगों की मौत से घर में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. पहले तो नियति मानकर हम लोग शांत बैठ गए थे लेकिन तीन दिन पहले अस्पताल के संचालक डॉक्टर अरिंजय जैन का वीडियो सुनकर हम अवाक् रह गए कि कोई डॉक्टर ऐसा भी कर सकता है."
अमित चावला आगरा की ही एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं. उनकी 15 साल की एक बेटी और दस साल का एक बेटा है. पत्नी पहले से ही बीमार थीं. उनकी कोविड रिपोर्ट निगेटिव आ गई थी लेकिन तबीयत ख़राब होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था.
वो कहते हैं, "23 अप्रैल को पोस्ट कोविड के कारण दिक़्क़तें थीं जिनकी वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था. जो समस्याएं थीं, उनका कोई इलाज भी नहीं किया गया. अस्पताल में न ही कोई देखने आता था. ऑक्सीजन की कमी से ही नहीं, डॉक्टरों और स्टाफ़ की अनदेखी से भी बहुत से मरीज़ों की जान गई."

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'बार-बार एंबुलेंस आ रही थीं, लाशें लेकर जा रही थीं'
अमित चावला के बड़े भाई अशोक चावला का आरोप है कि उनके पिताजी को जबरन वेंटिलेटर पर रखा गया थी जबकि उसकी ज़रूरत नहीं थी.
वो कहते हैं, "हमने पिताजी को 12 अप्रैल को भर्ती कराया गया था. डॉक्टर लगातार बताते रहे कि सुधार हो रहा है. लेकिन 20 अप्रैल को बताया गया कि उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई है, उन्हें वेंटिलेटर लगाना पड़ेगा. हमने वेंटिलेटर के लिए स्वीकृति दे दी."
"26 को अप्रैल को उन्होंने ऑक्सीजन न होने की बात कही. हमने उसका भी इंतज़ाम किया. बल्कि एक सिलेंडर अपने लिए और पांच अस्पताल के लिए अलग से इंतज़ाम किया ताकि दूसरे मरीजों की भी मदद हो सके. लेकिन कुछ काम न आया. मेरे पिताजी भी नहीं बचे और अस्पताल में कई और मरीज़ों की जान चली गई."

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कुछ ऐसी ही कहानी आगरा ज़िला कोर्ट में वकील प्रकाश चंद्र तोमर की भी है. उनके पिता के साथ भी 26 अप्रैल की रात को कुछ वैसा ही हुआ जैसा कि अमित चावला के पिता और उनकी पत्नी के साथ हुआ था.
तोमर कहते हैं कि उन्होंने 26 अप्रैल को अस्पताल में कई लोगों को मरते हुए देखा. वो बताते हैं, "पिताजी को सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी, फेफड़े में इंफ़ेक्शन भी था उनके. 25 अप्रैल को मैंने अस्पताल में एडमिट कराया. इलाज से हमें कोई सुधार नहीं दिख रहा था लेकिन वो कहते रहे कि सुधार हो रहा है. 26 अप्रैल को पहले तो उन्होंने कहा कि अस्पताल से डिस्चार्ज करा लीजिए."
"हमने कहा कि डिस्चार्ज कराकर कहां ले जाएंगे, तो वो ऑक्सीजन लाने के लिए दबाव बनाने लगे. 26 अप्रैल की रात में उन्होंने पिताजी को आईसीयू में शिफ़्ट कर दिया. हम ऑक्सीजन के दो सिलेंडर ले आए, लेकिन उन्हें प्रॉपर गैस नहीं दी गई. 27 अप्रैल को सुबह ही उन्होंने हमें बताया कि मेरे पिताजी की मौत हो गई."
प्रकाश चंद्र कहते हैं कि वीडियो वायरल होने के बाद अब उन्हें यक़ीन हो गया है कि 26 अप्रैल की रात में 'मॉक ड्रिल' के नाम पर अस्पताल में जो कुछ भी हुआ, वो जानबूझकर किया गया.
उनके मुताबिक, "मैं तो पिताजी की बीमारी देखकर परेशान था. सभी मरीजों के परिजन भी परेशान थे. अस्पताल में उस दिन बहुत अफ़रा-तफ़री मची हुई थी. बार-बार एंबुलेंस आ रही थीं और लाशें लेकर जा रही थीं. गिनती तो मैंने की नहीं लेकिन कई मरीज़ों को अपने सामने मरते हुए भी देखा और उन्हें ले जाते हुए भी देखा."
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ज़िलाधिकारी का दावा- ऑक्सीजन की कमी नहीं थी
आरोप हैं कि इस अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी की वजह से 26 और 27 अप्रैल को, दो दिन के भीतर 22 लोगों की मौत हो गई थी.
अस्पताल प्रशासन और ज़िला प्रशासन अब भी इस बात से इनकार कर रहा है लेकिन अब तक कई लोग सामने आ चुके हैं जिन्होंने इन दो दिनों में अपने परिजनों को खोया है.
फ़िलहाल आगरा ज़िला प्रशासन ने श्री पारस अस्पताल को सील कर दिया है और अस्पताल के मालिक डॉक्टर अरिंजय जैन के ख़िलाफ़ महामारी एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज किया है लेकिन ज़िला प्रशासन इन मौतों के लिए न तो अस्पताल को ज़िम्मेदार मान रहा है और न ही इतनी मौतों को स्वीकार कर रहा है.

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आगरा के ज़िलाधिकारी पीएन सिंह कहते हैं, "पहली बात तो यह कि 25, 26 और 27 अप्रैल को ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं थी. अस्पताल को जितनी ऑक्सीजन की ज़रूरत थी, उतनी आपूर्ति उसे की गई. दूसरे, ऑक्सीजन की कमी से जो 22 मौतों की बात की जा रही है वो पूरी तरह से ग़लत है और निराधार है."
"जो शिकायतें थीं, प्रारंभिक जांच के आधार पर कार्रवाई हुई है. जांच अभी जारी है. जिन लोगों की जो भी शिकायतें हैं वो एडीएम सिटी या सीएमओ के यहां दे सकते हैं. सभी तथ्यों की जांच होगी. जो भी दोषी होंगे, उनके ख़िलाफ़ ज़रूर कार्रवाई होगी."
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शिकायत दी पर दर्ज नहीं की गई- अशोक चावला
डीएम पीएन सिंह ने गुरुवार शाम बीबीसी को बताया कि अब तक उनके पास कोई शिकायत नहीं आई है. जबकि उसी दिन सुबह अशोक चावला ने हमें एडीएम सिटी को दिया गया प्रार्थनापत्र दिखाया जिसे एडीएम सिटी के दफ़्तर में दो दिन पहले यानी आठ जून को ही प्राप्त किया गया था.
कुछ और मरीज़ों के परिजन भी अपनी शिकायतें लेकर गए हैं लेकिन अस्पताल में ज़्यादातर मरीजों के परिजन आगरा के आस-पास के ज़िलों के हैं जो अभी तक अपनी शिकायत नहीं पहुंचा पाए हैं.
अस्पताल में 26 अप्रैल को चार और 27 अप्रैल को तीन मरीजों की मौत की जानकारी दी गई है.
अमित चावला के पिता और उनकी पत्नी की भी मौत इन्हीं दिनों में हुई लेकिन अस्पताल की सूची में दोनों के नाम नहीं हैं. प्रकाश चंद्र के पिता की मौत की भी जानकारी इस सूची में नहीं है.
ऐसे और भी कई लोगों के परिजन हैं जिनकी अस्पताल की सूची में जानकारी नहीं है लेकिन अस्पताल की ओर से उन्हें मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हुए हैं और उनमें से ज़्यादातर कोविड पॉज़िटिव मरीज़ ही थे.

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इस बारे में बात करने पर अस्पताल के संचालक डॉक्टर अरिंजय जैन कहते हैं, "दो अलग-अलग सूची तैयार की गई है. एक में कोविड मरीजों की मौत का आंकड़ा है जो सीएमओ दफ़्तर भेजी जाती है जबकि दूसरी सूची में सभी मौतों का आंकड़ा होता है जो नगर निगम के पास भेजा जाता है."
अमित चावला की पत्नी की जब मौत हुई तो उनके मुताबिक़, वो कोविड निगेटिव थीं लेकिन अस्पताल से उन्हें जो मृत्यु प्रमाण पत्र मिला है उसमें उन्हें कोविड पॉज़िटिव बताया गया है.
अमित कहते हैं, "पोस्ट कोविड इलाज चल रहा था पत्नी का. मृत्यु प्रमाण पत्र पर कोविड पॉज़िटिव लिखा है लेकिन जो सूची उन्होंने सीएमओ को दी है, उसमें मेरी पत्नी का नाम नहीं है."
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मुझे बदनाम करने की कोशिश- डॉ अरिंजय जैन
आगरा में सेक्टर चार की रहने वाली मीना शर्मा के दामाद कार्तिकेय लवानियां की भी उसी दिन मौत हुई थी.
इस वायरल वीडियो ने मीना शर्मा के घावों को न सिर्फ़ हरा कर दिया बल्कि उनकी निग़ाह में मानवता जैसा पवित्र शब्द ही घिनौना हो गया है.
रोते हुए वो बताती हैं, "दामाद मेरे रिकवर हो रहे थे. 25 अप्रैल उन्होंने दलिया खाया, पपीता खाया और अगले ही दिन उनकी मौत हो गई. उनके हाथ-पैर के नाखून नीले पड़ गए थे. ये सिर्फ़ और सिर्फ़ ऑक्सीजन रोकने की वजह से हुआ है."
वहीं अस्पताल के संचालक डॉक्टर अरिंजय जैन कहते हैं कि उन पर लगे आरोप ग़लत हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी थी और न सिर्फ़ उनके अस्पताल में कमी थी बल्कि पूरे आगरा में और पूरे प्रदेश में भी ऑक्सीजन की थी.
वो कहते हैं, "मैं और मेरा पूरा स्टाफ़ रात दिन लोगों को बचाने में लगा था लेकिन एक मॉक ड्रिल शब्द की वजह से मुझे बदनाम किया जा रहा है, लोगों की मौत का ज़िम्मेदार बताया जा रहा है. हम यह देखने की कोशिश कर रहे थे कि ऐसे कितने मरीज़ हैं जिनकी ऑक्सीजन पर निर्भरता बहुत ज़्यादा है ताकि उनकी पहचान करके उनके परिजनों को अतिरिक्त ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के लिए सतर्क कर दिया जाए. 22 मरीजों की मौत पूरी तरह से निराधार है."

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मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी
7 जून को डॉक्टर अरिंजय जैन का जो वीडियो वायरल हुआ, वो दरअसल 28 अप्रैल का रिकॉर्ड किया हुआ है. वीडियो में डॉक्टर जैन मरीजों के परिजनों से अस्पताल से कहीं और ले जाने को कह रहे हैं और ऐसा न करने पर ही उन्होंने इस मॉक ड्रिल का प्रयोग किया.
एक तरफ परिजनों को डिस्चार्ज करने की वजह अस्पताल ने ऑक्सीजन की कमी बताया है, तो दूसरी तरफ प्रशासन कह रहा है कि ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं थी.
यही वह समय था जब पूरे राज्य में अस्पताल, बेड और ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा था लेकिन 28 अप्रैल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि यूपी में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है.
आगरा के युवा वकील नितिन वर्मा इस पूरे मामले को मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हैं और कहते हैं कि युवा अधिवक्ता संघ की ओर से वो लोग इस मामले की पैरवी करेंगे.
नितिन वर्मा कहते हैं कि आयोग से हम आग्रह करेंगे कि इसकी निष्पक्ष जांच कराए.
वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास एक याचिका दायर करके अस्पताल के ख़िलाफ़ कठिन कार्रवाई और डॉक्टर अरिंजय जैन के ख़िलाफ़ सामूहिक हत्या का केस दर्ज करने की मांग की है.
वो कहते हैं, "ये सीधे तौर पर नरसंहार का मामला है. प्रशासन ने महामारी एक्ट में केस दर्ज करके मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की है. इस एक्ट के तहत मास्क न लगाने जैसे आरोप में केस दर्ज होता है जबकि अस्पताल ने कई लोगों की जान ले ली है."
आगरा के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि मरीज़ों को डिस्चार्ज करने के लिए इसलिए कहा जा रहा था ताकि अस्पताल में नए मरीज़ भर्ती हो सकें.
डॉक्टर के मुताबिक़, "उस वक़्त अस्पतालों में जगह नहीं थी. दिल्ली-नोएडा से भी लोग आगरा चले आ रहे थे. क्योंकि वहां भी अस्पताल भरे हुए थे. अस्पतालों ने उसका फ़ायदा उठाया. यहां पैकेज निर्धारित कर दिए गए थे. लाखों रुपये पहले ही जमा करा लिए जाते थे. आठ-दस दिन में मरीज़ को आराम नहीं होता था तो डिस्चार्ज करने के लिए बोलते थे."
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वो कहते हैं, "वो जानते थे कि दूसरी जगह भी बेड नहीं मिलेगा और ऐसी स्थिति में परिजन कोई भी क़ीमत देने को तैयार हो जाएंगे. नए मरीज़ भर्ती करने पर उससे फिर लाखों रुपये जमा कराते और जो पुराने मरीज़ थे उन्हें ज़बरन वेंटिलेटर लगा देते ताकि लाखों रुपये का बिल बना सकें."
"मुझे नहीं लगता कि इन सब घपलों की कोई जांच होगी लेकिन यदि हो जाए तो ऐसी तस्वीर सामने आएगी की ऐसे पवित्र पेशे के लिए घृणा जैसा शब्द भी छोटा पड़ा जाएगा."
बहरहाल, आरोप सही हैं या ग़लत हैं, जांच के बाद शायद इनसे कुछ पर्दा ज़रूर हटे.
लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जिन मरीजों ने इस अस्पताल में अपने परिजनों को खोया है, वो यह बात पचा नहीं कर पा रहे हैं कि जिन डॉक्टरों को वो भगवान की तरह समझते हैं, वो ऐसा अमानवीय कृत्य करने की बात सोच भी कैसे सकते हैं.
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