कोरोना वायरस: आगरा मॉडल क्या हो गया है फेल?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना मामलों का पहला क्लस्टर आगरा में आया था. वहां के बारे में आपको बताना चाहूंगा कि आज वहां 92 केस आए हैं जिसमें से 5 मरीज़ पूरी तरह रिकवर हो गए हैं. 87 मरीज़ पर निगरानी रखी जा रही है और ख़ुशी की बात है कि उनमें से कोई भी केस क्रिटिकल नहीं हैं.
11 अप्रैल 2020 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने अपनी रोज़ होने वाली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आगरा मॉडल की सफलता पर एक प्रेजेंटेशन देते हुए ये बात कही थी.
लेकिन 18 दिन बाद ही इस मॉडल पर उनके सुर कुछ इस तरह से बदले.
आगरा मॉडल या भीलवाड़ा मॉडल नाम से कुछ है नहीं. हमें समझने की ज़रूरत है कि कंटेनमेंट स्ट्रैटेजी क्या है. हम आपके सामने 'बेस्ट प्रैक्टिसेस' लेकर आते हैं ये बताने के लिए कि वहां पर अच्छे प्रयास किए गए. हमने कभी भी आपको रिलेटिव सक्सेस के लिएबताया, तो उसके साथ हमेशा ये कहा कि हम एक इंफेक्शन वाली बीमारी से डील कर रहे हैं. हमारी एक दिन की चूक, हमें उस जगह दोबारा ले जा सकती है जिसमें हमारा सक्सेस नॉन सक्सेस में बदल जाए.
29 अप्रैल 2020 को उन्हीं लव अग्रवाल ने बीबीसी के ऑनलाइन सवाल के जवाब में प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये बातें कही.
महज़ 18 दिन के अंतराल में ऐसा क्या हो गया कि जिस आगरा मॉडल कंटेनमेंट प्लान की सराहना करते स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी नहीं थक रहे थे, आज वहां स्थिति इतनी ख़राब हो गई.
इस रिपोर्ट में आगरा की इसी स्थिति को विस्तार से समझिए.
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आगरा की स्थिति को समझने के लिए एक वीडियो को भी देखने की ज़रूरत है. सोशल मीडिया पर वायरल ये वीडियो आगरा ज़िले में हिंदुस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट कॉलेज का है.
यहां बने क्वारंटीन सेंटर में शहर के ही कुछ लोगों को क्वारंटीन किया गया है. वीडियो में देखा जा सकता है कि संक्रमण के डर से पीपीई किट पहने कुछ स्वास्थ्य कर्मचारी पानी की बोतल, बिस्किट और अन्य खाद्य सामग्री लोगों को फेंक कर दे रहे हैं.
क्वारंटीन किए गए लोगों को अंदर से बंद किया गया है और वे गेट के भीतर से हाथ बाहर निकालकर खाने पीने की चीज़ों को लेने के लिए उतावले होते दिख रहे हैं.
हालांकि वीडियो सामने आने के बाद ज़िलाधिकारी ख़ुद यहां पहुंचे और पूरे मामले की जाँच के आदेश दिए.
डीएम प्रभु नारायण सिंह का कहना था कि जो भी अनियमितताएं पाई गई हैं उन्हें दूर कर लिया गया है और अब लोगों को कोई दिक़्क़त नहीं है.
लेकिन पिक्चर अभी बाक़ी है.
वीडियो के अलावा ये भी सच है कि जहां 11 अप्रैल को आगरा में कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ो की संख्या 92 थी. उसी आगरा में 28 अप्रैल की सुबह 368 कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ थे. यानी 18 दिन में मरीज़ों की संख्या 4 गुना बढ़ गई.
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आख़िर कहां हुई चूक
आगरा मॉडल के शुरुआती दिनों में जब चर्चा शुरू हुई थी, उस वक़्त भी चुनौतियां कम नहीं थी.
बीबीसी से बात करते हुए आगरा के ज़िला अधिकार प्रभु एन सिंह ने 13 अप्रैल को बताया था कि तब्लीग़ी जमात के मरकज़ में शामिल हो कर आगरा पहुंचे लोग ही ज़्यादा संख्या में पॉज़िटिव पाए जा रहे थे.
और आगरा मॉडल की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती रही है, बड़ी संख्या में अस्पताल में इलाज करने और कराने वाले लोग पॉज़िटिव पाए गए.
बुधवार को आगरा के डीएम ने बीबीसी से दोबारा बात की.
उन्होंने बताया कि अब तब्लीग़ी जमात और पारस अस्पताल का मामला लगभग ख़त्म हो चुका है. वहां से कोई नया मामला नहीं आया है.
लेकिन दूसरे अस्पतालों और मेडिकल फ़ील्ड से निकल कर आ रहे लोग अब पॉज़िटिव निकल रहे हैं. कुछ सब्ज़ी और रोज़मर्रा के ज़रूरी सामान बेचने वालों के भी कोरोना पॉज़िटिव होने की पुष्टि हुई है.

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28 अप्रैल को आगरा में 368 कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ हैं.
ये आंकड़े कितनी चिंता बढ़ा रहे हैं? इस सवाल के जवाब में प्रभु सिंह कहते हैं, "आंकड़ों के बारे में मैं नहीं कह सकता. मैं प्लान बता सकता हूं. हम आज भी अपने उसी कंटेनमेंट प्लान पर काम कर रहे हैं. सर्विलांस सिस्टम इतना तगड़ा है कि हमें हर पॉज़िटिव मरीज़ का सोर्स पता है. ये हमारे लिए सबसे अच्छी बात है."
आगरा मॉडल में बतौर विशेषज्ञ शुरूआत से जुड़े एक अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्ते पर कहा, "3 अप्रैल वाले सप्ताह में कोरोना मरीज़ों की संख्या में 65 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ. इसी समय दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के मरक़ज़ में शामिल हुए लोग आगरा लौटे थे. तक़रीबन 300 लोगों की स्क्रीनिंग हुई उसमें से अब भी 105 मरीज़ तब्लीग़ी जमात के हैं."
वो आगे कहते हैं, "आगरा में कोरोनो मामलों का दूसरा पीक 18 अप्रैल के आसपास आया. आगरा के एक अस्पताल में भर्ती महिला कोरोना पॉज़िटिव पाई गईं और उसके साथ ही अस्पताल के दूसरे मरीज़ और वार्ड बॉय पॉज़िटिव पाए गए. रिवर्स ट्रेसिंग करने पर पता चला कि कई लोग जिन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई है वो भी पॉज़िटिव हैं. ये एक बड़ा आउटब्रेक था."
लेकिन इन दोनों मामलों को छोड़ दिया जाए तो शायद आगरा में कोरोना मरीज़ के मामले बाक़ी राज्यों के मुक़ाबले बहुत तेज़ी से नहीं बढ़े हैं.
आगरा के ज़िला अधिकारी के मुताबिक़ आज भी उनके यहां कोरोनो मरीज़ो का डबलिंग रेट ( दोगुनी होने की दर) 8 दिन की है, जो अप्रैल के शुरुआती दिनों में तक़रीबन 5 दिन के आसपास थी. इस लिहाज़ से देखें तो आज भी हम बेहतर कर रहे हैं.
प्रभु सिंह ने कहा, "हम तेज़ी से डबलिंग रेट को 10 दिन करने की तरफ़ बढ़ रहे हैं. ये एक शुभ संकेत हैं. विश्व भर में मरीज़ों की दोगुनी होने की संख्या देख लीजिए और यहां की देख लीजिए. इस बीमारी से लड़ने में हम भी नए हैं. एक ही चीज़ के लिए हर आदमी अलग-अलग तरीक़े से कोशिश कर सकता हैं. हम प्रयासरत हैं."
आगरा की गिनती आज की तारीख़ में उत्तर प्रदेश के कोरोना प्रभावित ज़िलों में सबसे ऊपर है.
इस वजह से राजनीतिक दलों के निशाने पर भी हैं. 26 अप्रैल को प्रियंका गांधी ने भी आगरा के बारे में चिंता ज़ाहिर करते हुए ट्विटर पर वहां के मेयर की चिट्ठी साझा की थी.
ट्वीट में उन्होंने लिखा, "आगरा शहर में हालात ख़राब हैं और रोज़ नए मरीज़ निकल रहे हैं. आगरा के मेयर का कहना है कि अगर सही प्रबंध नहीं हुआ तो मामला हाथ से निकल जाएगा."
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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी ट्वीट करने में पीछे नहीं रहे.
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रणनीति में बदलाव
तो क्या आगरा मॉडल में रणनीति में बदलाव लाने की ज़रूरत है?
इस सवाल के जवाब में जिला अधिकारी प्रभु सिंह कहते हैं, "आज ही स्टेट नोडल ऑफ़िस के अधिकारियों की बैठक हुई है. इसमें कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, एरिया सर्विलांस और टेस्टिंग पर और ज़ोर देने की बात कही गई है. पहले जहां पॉज़िटिव केस पाए जाने के बाद 24 घंटे लगते थे, उस केस के कॉन्टैक्ट को ढूंढने में अब हमने तय किया है कि 6 घंटे में ये काम कर लिया जाएगा. "
उनके मुताबिक़ ये काम चुनौती पूर्ण ज़रूर है और वक़्त ही बताएगा, हम कितना सफल हुए हैं.
फ़िलहाल आगरा में 32 कंटेनमेंट ज़ोन हैं, जिस पर पूरा ज़िला प्रशासन काम पर लगा है.
प्रभु सिंह के मुताबिक़ जब तक नए मामले इन 32 कंटेनमेंट ज़ोन से आ रहे हैं, चिंता की ज़्यादा बात नहीं हैं. हमने इन इलाक़ों में पैनी नज़र रखी है. इसके बाहर से मामले आने लगेंगे तो हमें चिंता होगी.

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क्या था आगरा मॉडल

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आगरा में कोरोना का पहला मामला, 2 मार्च को ही आ गया था. भारत सरकार के मुताबिक़ यहां क्लस्टर कंटेनमेंट सबसे पहले लागू किया गया था.
'आगरा मॉडल' में जिस भी जगह पर एक साथ कोरोना संक्रमण के कई मामले पाए जाते हैं, केंद्र सरकार के दिशा निर्देश के मुताबिक़ उसे क्लस्टर के तौर पर देखना चाहिए. इसके लिए स्वास्थ्य विभाग ने एक प्लान बनाया है - जिसे कंटेनमेंट प्लान कहा जाता है.
इस प्लान के तहत पूरे क्लस्टर को तीन हिस्सों में बांटा जाता है. आगरा में भी वही किया गया.
1. बफ़र ज़ोन - इसके प्लान के तहत 5 किलोमीटर को बफ़र ज़ोन मान कर वहां कोराना संक्रमण से निपटने की तैयारी की जाती है.
2. कंटेनमेंट ज़ोन - बफ़र ज़ोन के भीतर के 3 किलोमीटर के दायरे को एपिसेंटर या फिर कंटेनमेंट ज़ोन घोषित किया जाता है
3. हॉटस्पॉट - अंत में कंटेनमेंट ज़ोन के अंदर आने वाले पॉज़िटिव मरीज़ के घर, गली और नज़दीकी रिश्तेदारों के इलाक़े को हॉटस्पॉट मान कर सील कर दिया जाता है.

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