बिहार: पटना के निजी अस्पतालों में कोविड-19 का इलाज कितना आसान, कितना मुश्किल?
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Author, नीरज प्रियदर्शी
पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"मेरे पिताजी को सांस लेने में बहुत तकलीफ़ हो रही थी. शाम के सात बजे उन्हें पटना के पारस अस्पताल में ले कर गया. डॉक्टरों ने दो मिनट भी नहीं देखा होगा और कोविड-19 की मुहर लगाकर एनएमसीएच रेफर कर दिया. मैं विनती करता रह गया कि उन्हें कम से कम ऑक्सीजन दे दी जाए पर अस्पताल वालों ने नहीं दी."
"ऑक्सीजन की कमी से एनएमसीएच पहुंचते-पहुंचते पिताजी की मौत हो गई. एंबुलेंस वाले ने 10 किमी से भी कम दूरी के लिए मुझसे 15 हज़ार रूपये का किराया लिया. एनएमसीएच में भी 24 घंटे तक गिड़गिड़ाता रहा, तब जा कर बॉडी को बैग में डालकर श्मशान घाट ले गए. जलाने के लिए लकड़ी भी नहीं ली, बस पेट्रोल छिड़ककर जला दिया."
ये शब्द उस शख़्स के हैं जिन्होंने हाल ही में अपने पिता को कोरोना वायरस के चलते खो दिया है.
स्थानीय मीडिया से बात करते हुए वो कहते हैं, "हालात ऐसे हैं कि आप अस्पताल वालों के पैर भी पकड़ लीजिए लेकिन फ़िर भी वे आपकी नहीं सुनेंगे."
अस्पताल में भर्ती नहीं होने की वजह से ना तो कोरोना टेस्ट हो पाया और ना ही इस शख़्स को ये पता चल पाया कि उनके पिता कोरोना पॉजिटिव थे या नहीं.
संक्रमित प्रशासनिक अधिकारी की मौत
बीते बुधवार बेगूसराय के ज़िला कार्यक्रम अधिकारी अरविंद कुमार की कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद मौत हो गई है.
अरविंद कुमार के भाई डॉक्टर मनोज कुमार कहते हैं, "मेरे भाई को डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर और ठीक से सांस नहीं ले पाने की शिकायत पहले से थी. तबीयत बिगड़ने पर हम उन्हें पहले आईजीआईएमएस ले गए लेकिन भर्ती ही नहीं किया. वहां से निजी अस्पतालों पारस और रूबन में ये सोचकर गए कि भले ज़्यादा पैसा लगेगा मगर इलाज़ जल्दी हो जाएगा."
"वहां से भी कोविड-19 मरीज़ मानकर उन्हें पीएमसीएच में रेफ़र कर दिया गया. पीएमसीएच से उन्हें एम्स भेजा गया और वहां से एनएमसीएच भेजा गया. इस दौरान चक्कर लगाने में ही भाई की मौत हो चुकी थी."
कोरोना वायरस के इलाज़ में बिहार के सरकारी अस्पतालों में कुव्यवस्था और कुप्रबंधन की ख़बरें तो पहले से आ रही हैं. लेकिन अब यहां के निजी अस्पताल गंभीर मरीजों को भी अपने यहां भर्ती करने में आनाकानी कर रहे हैं.
कोरोना वायरस टेस्ट से पहले ही निजी अस्पताल मरीज़ों को सरकारी कोविड अस्पतालों में रेफ़र कर रहे हैं. जबकि 20 जुलाई को तत्काल प्रभाव से लागू सरकारी आदेश के मुताबिक़ पटना के 18 निजी अस्पतालों में कोविड मरीजों के लिए 290 बेड अलग से आवंटित हैं.
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'कितना भी पैसा दीजिए, कोई भर्ती नहीं करेगा'
पारस और रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल पटना के बड़े निजी अस्पतालों में शामिल हैं.
सरकारी आदेश के मुताबिक़ रूबन में उपलब्ध बेड की संख्या 180 है और इनमें से 40 बेड कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए आरक्षित हैं.
सरकारी आदेश में अस्पतालों का फ़ोन नम्बर भी ज़ारी किया गया है लेकिन फ़ोन लगाने पर लगता नहीं और किसी का फ़ोन उठाया नहीं जाता.
22 जुलाई को रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल में जाकर पूछने पर अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा, "हम लोग अभी किसी कोरोना वायरस संक्रमित मरीज़ को नहीं ले रहे हैं क्योंकि उनके लिए अलग व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है."
यह बताने पर कि सरकार ने इस बारे में आदेश भी जारी किया है, कर्मचारी बताते हैं, "आदेश जारी हुआ है तो हो सकता है कि कोई अलग व्यवस्था करके मरीजों को रखा जाए."
अस्पताल के अंदर प्रवेश से पहले शरीर का तापमान मापा जा रहा है. कोई भी लक्षण नहीं मिलने पर ही प्रवेश की अनुमति दी जा रही है.
इसी तरह का हाल दूसरे बड़े निजी अस्पताल पारस एचएमआरआई का है. यहां कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के लिए 30 बेड आरक्षित हैं.
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बिहार सरकार ने अपने आदेश में यह स्पष्ट लिखा है कि कोरोना पॉजिटिव मरीज़ अथवा उनके परिजन चाहें तो अपने खर्च पर निजी अस्पतालों में मरीज़ का इलाज करा सकते हैं.
पारस में भर्ती नहीं किए जाने और अस्पतालों के चक्कर काटने में अपने पिता को खो चुके नवीन कुमार कहते हैं, "इस वक़्त पारस अस्पताल में आप चाहें कितना भी पैसा दे दीजिए, लेकिन अगर मरीज़ में कोरोना का कोई एक भी लक्षण है तो भर्ती नहीं लिया जाएगा."
पारस के कर्मचारी भी मरीज़ों को भर्ती नहीं करने को लेकर सवालों पर वैसा ही जवाब देते हैं जैसा रूबन के कर्मचारियों से मिला.
हमने यह भी पूछा कि आख़िर कब तक वो अपने यहां कोरोना मरीज़ों को भर्ती करने लगेंगे? इस पर वो कहते हैं, "हमें कोई जानकारी नहीं है. बड़े अधिकारियों से पूछिए."
बीती 22 जुलाई तक पटना के निजी अस्पताल कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की भर्ती नहीं कर रहे थे.
लेकिन 24 जुलाई की शाम को अस्पताल प्रमुखों से बातचीत में पता चला कि वे 23 जुलाई से कोविड मरीजों को अपने यहां रखने लगे हैं.
पारस अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर तलत हलीम कहते हैं, "बहुत जल्दी में हमें सारी तैयारियां करनी पड़ी हैं. 23 जुलाई की शाम से हमने कोविड के गंभीर मरीजों को रखना शुरू कर दिया है. हमारे यहां कुल 30 बेड हैं जिनमें से 3 आईसीयू के हैं. आईसीयू को छोड़ बाकी सारे बेड ऑक्यूपाई हो चुके हैं. आईसीयू को हमने जानबूझकर खाली रखा है ताकि ज़रूरत पड़ने पर किसी भी मरीज़ को तत्काल वहां शिफ्ट किया जा सके."
रूबन अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर सत्यजीत कुमार सिंह के मुताबिक़ उनके यहां भी 23 जुलाई की शाम से कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों को रखा जाने लगा है. 40 में से 35 बेड ऑक्यूपाई हो चुके हैं, बाक़ी के पांच आईसीयू वाले बेड हैं.
डॉक्टर सत्यजीत कहते हैं, "फ़िलहाल तो हमारे सारे बेड ऑक्यूपाई हो चुके हैं. मगर हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि बिस्तरों की संख्या 45 से 50 हो जाए. सभी बिस्तरों तक पाइपलाइन से ऑक्सीजन पहुंचाने का काम शुरू हो गया है."
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क्या है प्रक्रिया और कितना आएगा ख़र्च?
सरकार की तरफ़ से जारी किए गए आदेश के मुताबिक़ जो मरीज़ अपने खर्चे पर चाहें तो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज़ करा सकते हैं.
हमने पारस अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर तलत हलीम से यह भी पूछा कि उनके यहां कोविड-19 के इलाज़ का ख़र्च क्या आएगा?
वे कहते हैं, "डीएम के साथ सहमति बनी है कि हम अपने जनरल टैरिफ़ के अनुसार ही चार्ज करेंगे. हमारे अस्पताल में फिलहाल दिसंबर 2019 के टैरिफ़ के हिसाब से चार्ज किया जाता है. कोविड-19 के लिए कोई विशेष टैरिफ़ नहीं है."
डॉक्टर तलत ने बताया, "जो मरीज़ मामूली और गंभीर लक्षण वाले होंगे केवल उन्हीं को भर्ती किया जाना है. फ़िलहाल तो हमारे बेड भर गए हैं लेकिन नए मरीजों के लिए वेटिंग लिस्ट जारी किया जाएगा. कोरोना टेस्ट का रेट वही होगा जो सरकार ने तय किया है. लेकिन जिन मरीजों का एंटीजन टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आया है उनके लिए हम एचआरसीटी टेस्ट करेंगे. इसके अलावा एडमिट करने के समय चार और टेस्ट किए जाएंगे. इन जांचों का कुल खर्च 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब आएगा. जनरल वार्ड में एक दिन के बेड का चार्ज 2,650 रूपये है."
बिजनेस ख़राब होने का डर
20 जुलाई को तत्काल प्रभाव से लागू किए गए आदेश को प्राइवेट अस्पतालों ने तीन दिन बाद 23 मई से मानना शुरू तो कर दिया, मगर एक ही दिन बाद सबके यहां कोरोना के लिए आवंटित बेडभ र गए हैं.
एक मरीज़ के परिजन दोनों बड़े प्राइवेट अस्पतालों में गुहार लगाने के बाद लौट गए और आखिरकार मरीज़ को एनएमसीएच में भर्ती करा दिया.
वे कहते हैं, "दरअसल, प्राइवेट अस्पताल अपने यहां कोरोना वायरस का इलाज करना ही नहीं चाहते. इसलिए बेड भर जाने का बहाना दे रहे हैं."
आख़िर निजी अस्पताल अपने यहां कोरोना वायरस का इलाज करना क्यों नहीं चाहते हैं?
पटना के एक अस्पताल प्रबंधक नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "अस्पतालों का मुनाफ़् सर्जिकल इलाज़ में होता है. कोरोना का इलाज़ मेडिसिनल इलाज़ है. और इसके लिए एक बेड कम से कम 10 दिनों तक ऑक्यूपाई होगा. ज़्यादा दिन भी हो सकता है."
"यहां के अधिकांश निजी अस्पतालों की बिल्डिंग एक ही है. जो निजी अस्पताल अपने यहां एक बार कोविड-19 मरीज़ को एडमिट कर लेगा, दूसरे मरीज़ उसके यहां आने से डरेंगे. और कौन चाहेगा अपना बिजनेस ख़राब करना!"
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सभी ज़िलों के निजी अस्पतालों के लिए आदेश
निजी अस्पतालों में कोरोना पॉज़िटिव मरीजों के इलाज़ के लिए बिहार सरकार का आदेश सभी जिलों के लिए ज़ारी हुआ है.
जिलाधिकारियों को यह ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे अपने यहां के निजी अस्पतालों को जिनमें सुविधाएं और सेवाएं अच्छी हैं, चिह्नित करें और वहां पर कोरोना पॉज़िटिव मरीजों के इलाज़ की व्यवस्था कराएं.
मंगलवार को मुख्य सचिव दीपक कुमार की अध्यक्षता में कोरोना से निपटने के लिए बनाए गए सरकार के कोर ग्रुप की बैठक हुई थी. उसमें यह तय हुआ था कि इन अस्पतालों में कोरोना के लिए एक विशेष रिसेप्शन बनाया जाएगा जहां कोई भी व्यक्ति कोरोना से संबंधित हर तरह की जानकारी हासिल कर सकता है.
लेकिन पटना समेत दूसरे जिलों से जुटाई गई हमारी जानकारी में अभी तक सिर्फ़ पारस और रूबन में ही कोविड पॉज़िटिव पेशेंट को रखा जा रहा है. हालांकि, वहां फिलहाल बेड खाली नहीं हैं.
जबकि सूबे में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़कर 31 हज़ार को पार कर गए हैं, अस्पतालों में भर्ती नहीं किए जाने और इलाज़ के बिना मौत की खबरें आम हो चली हैं.
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.